जियो इंस्टिट्यूट विवाद:अजन्मे संस्थान का ‘श्रेष्ठ’ होना

Published on Jul 10, 2018

 

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शुजात बुखारी : इस वक्त कौन किसके लिए दुआ करे?

“शुजात बुखारी मार डाले गए”, यह खबर गोली की तरह लगी. कुछ वक्त तक सन्नाटे में गुजरा,खबर के मायने समझने में.शुजात की शांत,सम पर रहनेवाली आवाज़ अब कभी सुनने को नहीं मिलेगी, यह सोचना भी मुश्किल था.लेकिन यह सच था कि कश्मीर की जनता ने अपना सच्चा हमदर्द खो दिया.भारत ने भी एक ऐसा मध्यस्थ गँवा दिया जो उसकी राजकीय हिंसा की समझौताविहीन आलोचना करते हुए भी उसके साथ संवाद की वकालत सबसे अच्छे ढंग से करता था.पूरी दुनिया ने ऐसी आँखें खो दीं जिनसे वह कश्मीर को दोस्त की तरह देख और समझ सकती थी. Continue reading

Bully Nationalism

“I have a feeling that we may slowly lose our democratic rights or civil rights, when there is a bully. But much more than that when there is a bully we become cowards,” Thus spake the old wise man from Karnataka. The year was 2014. Elections were round the corner. The BJP had chosen its man from Gujarat as its leader. There was excitement in certain sections of the society regarding the choice. Some of our vocal thought leaders tried to convince us that the man truly represented the constituency of hope and change that  the staid politics of secularism failed to address. India, we were told, was  impatient for change and only the dynamism of the Gujarati man could unshackle her from her status quo. Continue reading

वक्त-बेवक्त :परशुराम जयंती पर

परशुराम जयंती पर फरसे के साथ निकाली गई शोभायात्रा

परशुराम जयंती पर फरसे के साथ निकाली गई शोभायात्रा

गुरु और शिष्य की जो कथाएँ भारत में प्रचलित हैं, उनमें प्रायः गुरुओं ने अपने उन शिष्यों के साथ अन्याय किया है, जिन्होंने अपनी प्रतिकूल सामाजिक परिस्थिति से लड़ते हुए शिक्षा ली।

नाटे कद के मौलवी साहब अपनी लंबी दाढ़ी के साथ उछल-उछल कर सीता स्वयंवर का वर्णन रामचरित मानस से पढ़कर सुना रहे हैं। अली जावेद को पचास साल बाद भी वह आनंद याद है जो इस विवाह के दौरान परशुराम के अचानक प्रवेश और फिर उनके और राम के अनुज लक्ष्मण के बीच संवाद के चलते उस क्लास के बच्चों को मिलता था। इलाहाबाद के उस गाँव से बहुत दूर और उनकी तकरीबन एक पीढ़ी बाद मुझे बिहार के कस्बे सीवान में हिंदी की कक्षा में पढ़ाया गया लक्ष्मण-परशुराम संवाद याद है। मेरे भी एक पीढ़ी बाद के सर्वेश सिंह को यह प्रसंग अलग से याद रह गया है जिसका उल्लेख तुलसी पर लिखते हुए वे करते हैं, “शिव-धनु, शिव की अजित शक्ति का प्रतीक था। किंतु उसे राम बात ही बात में तोड़ देते हैं – ‘लेत चढ़ावत खैचत गाढ़े। काहु न लखा देख सब ठाड़े।’ किसी ने देखा भी नहीं और धनुष टूट गया। और इस पर तुलसी की खुशी देखें – ‘कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति वचन उचारही।’ सारे जन, देव भी, इस पर खुश हैं – ‘देखि लोग सब भये सुखारे।’

ठीक इसी समय परम शिव-भक्त और पराक्रमी परशुराम का प्रवेश होता है। आते ही वे शिव-धनु-भंजक का नाम पूछते हैं। तुलसी का कथा-सेंस देखें कि वे परशुराम के मुकाबले लक्ष्मण को खड़ा कर देते हैं। कुछ इस भाव से कि तुम्हारे लिए तो यही काफी है! और अपने समय के महान योद्धा को लक्ष्मण खुली चुनौती देते हैं – ‘इहाँ कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं।’ न केवल चुनौती अपितु उस शिवभक्त को सरे दरबार अपमानित भी करते हैं – ‘मन मलीन तन सुंदर कैसे। विष रस भरा कनक घट जैसे।’ लक्ष्मण को कोई चुप नहीं कराता। केवल मीठे संकेतों में राम ‘नयन तरेरे’ हैं। परसुराम को तुलसी एक भारी दबाव भरी स्थिति में ला खड़ा कर देते हैं। लोग उन्हें हँसते हुए देखते हैं। सारे राजा-गण तटस्थ हैं। परशुराम कुछ देर तक अपना फरसा पटकते हैं किंतु वे मन से हारने लगते हैं।

अब अंतिम चोट स्वयं राम करते हैं। लगभग धमकी भरे स्वर में कहते हैं – ‘जौ तुम औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं।’ और मन से हारे वीर को बाद में राम कुछ मधुर वचन कहकर खुश करते हैं तथा उसे उसके नए कर्म क्षेत्र – तपोवन – की ओर विदा करते हैं – ‘कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।’

परशुराम के क्रोध का शमन बाद में राम युक्तिपूर्वक करते हैं, लकिन पहले वे अनुज लक्ष्मण को रोकते नहीं, जब वे शिव का धनुष टूटने की खबर से कुपित परशुराम के साथ वयसानुकूल संयम छोड़कर मजाक करते हैं: धनुष पुराना था, छूते ही टूट गया। अब इस पर इतना खफा होने की क्या बात ! धरती को क्षत्रियविहीन करने का प्रण धारण किए परशुराम ने राम से मुलाक़ात के बाद उनके संयमित स्वभाव से प्रभावित होकर अपना आक्रामक अभियान छोड़ा।

कहा जाता है कि अनेकानेक क्षत्रियों का रक्तपान कर चुका फरसा जब समुद्र में वे फेंकते हैं तो समुद्र फरसे के भीतर की हिंसा से घबराकर पीछे हट गया और एक द्वीप उभर आया जिसे हम कोंकण कहते हैं।

कथा और यथार्थ आपस में इस कदर मिल जाते हैं कि कौन गल्प है और कौन तथ्य, इसका विवेक करना संभव नहीं रहता। इसकी हमेशा ज़रूरत भी नहीं। लेकिन जब एक गल्प को तथ्य कहा जाने लगे तो उससे गुंथे दूसरे गल्प की तार्किक व्याख्या कठिन हो जाती है। मसलन, राम कथा के परशुराम के दर्शन हमें महाभारत में भी होते हैं। जैसे मानस के पाठकों को परशुराम उद्धत किशोर लक्ष्मण के साथ संवाद में ही याद हैं , वैसे ही महाभारत के पाठकों को वे याद हैं कर्ण को दिए गए शाप के कारण, जो बाकी देवताओं के षड्यंत्र के साथ मिलकर कर्ण की मृत्यु का कारण बनता है।

कर्ण परशुराम से अपनी जाति छिपाकर और खुद को ब्राह्मण कहकर शिक्षा ग्रहण करते हैं। एक दिन श्रांत गुरु कर्ण की गोद में सर रखकर विश्राम कर रहे हैं कि एक कीड़ा कर्ण की जांघ में गहरा घाव कर देता है। पीड़ा को कर्ण दबाते हुए निश्चल बैठे रहते हैं कि गुरु की तंद्रा भंग न हो। लेकिन जांघ से बहता हुआ रक्त उन्हें छू जाता है और उनकी नींद टूट जाती है। परशुराम यह मान नहीं सकते कि ब्राहमण इतनी पीड़ा सह सकता है। कर्ण जब बताते हैं कि उनका शिष्यत्व लेने के लिए ही उन्होंने जाति छिपाई थी तो इससे खुश होने की जगह वे उन्हें शाप देते हैं: युद्ध की जो शिक्षा उन्होंने कर्ण को दी है, वे उसे उसी समय भूल जाएँगे जब उनको उसकी सबसे अधिक ज़रूरत होगी। अपना ज्ञान नए समुदाय तक पहुँचाने की जगह उसे अपने जाति-समुदाय तक सीमित रखना ही कर्तव्य है।

गुरु और शिष्य की जो कथाएँ भारत में प्रचलित हैं, आश्चर्य है, उनमें प्रायः गुरुओं ने अपने उन शिष्यों के साथ अन्याय किया है, जिन्होंने अपनी प्रतिकूल सामाजिक परिस्थिति से लड़ते हुए शिक्षा ली और इसके लिए उन्हें गुरु बनाया। द्रोणाचार्य का एकलव्य के साथ अन्याय और परशुराम का कर्ण के साथ।

इक्कीसवीं सदी के ब्राह्मणों को अपनी आत्मछवि के निर्माण के लिए परशुराम का स्मरण करते वक्त क्या उनकी ये कथाएँ याद हैं? दूसरे, क्यों वापस जाति हासिल करनी ही है? फिर जातिविहीन समाज के स्वप्न का क्या होगा? यह भी क्यों न याद रखें कि फरसा आखिरकार उन्होंने फ़ेंक दिया था! फिर आज उनकी याद करते हुए शोभायात्रा निकालने वाले उसी फरसे को क्यों निकाल लाए, जिसकी रक्तपिपासा से प्रतापी समुद्र तक घबरा गया था और जो खुद परशुराम ने फ़ेंक दिया था!

 

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Karnataka : Congress must forge regional alliances

I think 2019 is now a game wide open. What the results are telling the opposition, especially the Congress, is that there isn’t a vote surge for the BJP. The Congress had a higher vote share in Karnataka than the BJP. The dream of a Congress-mukt Bharat is now over.

The results should also make the Congress realise that there are no shortcuts. Rather than going for opportunistic and populist mandates, like giving the Lingayats the status of separate religion, they have to take the difficult route: They must talk about their idea of India.

Congress must keep talking to regional forces, however minor they might appear, and forge alliances with them. The magnanimity it showed after the Karnataka election, the party should have shown before. They could have formed a pre-poll alliance and secured the state. Continue reading

Saying a Prayer for Our India, the Best Land in the World

Something cracked in me when I heard that a group of Namazis at one of the gatherings at Gurgaon sang Sare Jahan Se Achchha Hindostan Hamara after offering their Namaz this Friday. Why did they have to do it? Who forced them to do it? There was no overt diktat but obviously the worshipping Musalmans thought it necessary to assure their Hindu onlookers that even when they were Muslims, their loyalty to the nation of India could not be questioned. Continue reading