A deluge and then the delusion – Kedarnath

 

The media has been full of stories recently about Prime Minister Modi claiming that he was prevented from helping with reconstruction of the Kedarnath temple, damaged in the cloudburst and deluge of June 2013. And about his resolve to reconstruct the shrine this time.

We can only hope that the Supreme Court is awake. To tell him that he cannot reconstruct a shrine or a pilgrimage site belonging to a particular religion using the tax payers’ money. The court has only recently used the secular principle of state craft to say that the Mosques, Rozas, Khankahs and Dargahs damaged by the rioting mob in 2002 could not reconstructed by public exchequer. Continue reading

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क्या लिखें और क्या न लिखें?

क्या लिखें और क्या न लिखें? क्या छापें और क्या न छापें? ये प्रश्न हमेशा ही लेखकों, संपादकों और प्रकाशकों के सामने आते हैं. खबरनबीसों के लिए इसकी एक कसौटी जॉर्ज ऑरवेल ने बना दी थी. उनके मुताबिक़ खबर तो वह है जिसे ताकतवर या कोई भी दबाने या छिपाने की कोशिश करता है. इसके अलावा बाकी सब जो छपता है वह जन संपर्क या प्रचार है. साहित्य के मामले में भी लगभग यही बात लागू होती है. क्या उसे पढ़ने में आनंद आता है, क्या उसमें नयापन है और क्या उसे पढ़कर कहा जा सकता है कि हाँ! इससे फर्क पड़ता है. बर्तोल्त ब्रेख्त इस बात को एक दूसरे तरीके से कहते हैं. उनका कहना है कि लिखा वह जाना चाहिए जो महत्त्वपूर्ण हो. बारिश में बूँदें नीचे को गिरती हैं और कुर्सी में एक पीठ होती है, यह भी सच है या यथार्थ है, लेकिन वह कुछ ऐसा नहीं जो क्षण या समय के महत्त्व को चिह्नित करता हो. ऐसा लिखते चले जाने का, जो यथार्थ के वर्णन का भ्रम पैदा करे, कोई अर्थ नहीं. Continue reading

उदारता और बड़प्पन हो, दिमागी संकीर्णता नहीं

भारतीयों के लिए यह बड़ी खुशी की खबर है कि इंग्लैंड हो या अमरीका या कनाडा, दीवाली वहाँ के राष्ट्रप्रमुखों की तरफ से धूमधाम से मनाई गई. इसकी एक व्याख्या इस प्रकार भी की जाती है कि देखिए, आखिर हिंदू धर्म का लोहा इन मुल्कों ने भी मान लिया. यह हिंदू धर्म की महानता की इनके द्वारा स्वीकृति है. जबकि वे यह भी कह सकते थे कि ईसाई बहुल इन देशों के राष्ट्रप्रमुखों ने अगर अपने देश के एक अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के त्यौहार में शिरकत की है तो इसे उनका बड़प्पन माना जाना चाहिए. इस पर अगर उस मुल्क के बहुसंख्यकों ने हायतौबा नहीं मचाई है,अगर इसे हिन्दुओं का तुष्टीकरण नहीं कहा है तो इसे उस देश की जनता की उदारता के प्रमाण के रूप में लिया जाना चाहिए. Continue reading

खतरनाक होगा अभिव्यक्ति को नियंत्रित करना

प्रोफेसर कांचा इलैया ने पूछा है कि क्या वैश्य समुदाय में कोई भी ऐसा नहीं जो उनकी किताब का लिखकर जवाब दे सके/ अगर उन्होंने अपनी किताब में यह कहा है कि सामाजिक संपत्ति का अधिकांश यह समुदाय हड़प कर जाता है तो इसका लिखकर तार्किक विरोध किया जा सकता है। ऐसा न करके कांचा की गर्दन उतार लेने, उन्हें सड़क पर घेरकर मार डालने की धमकियां सांसदों और नेताओं ने तो दीं ही, उनपर हमला किया गया और एक तरह से वे मजबूर कर दिए गए कि खुद को घर में बंद कर लें। Continue reading

गाँधी जो अपने ही देश में अफवाह बन गए हैं

गाँधी जयंती गुज़री ही है. यह किंचित सुखद आश्चर्य की बात है कि गाँधी में अभी भी नौजवानों की दिलचस्पी बनी हुई है.उनके जन्मदिन के पहले महू के तीन मुसलमान नौजवान आए जो गाँधी के बारे फैली भ्रांतियों पर बात करना चाहते थे. उनके पास जो सवाल थे वे ही सवाल मैंने देश के अलग-अलग हिस्से में बार-बार सुने हैं.

एक आरोप यह है कि उन्होंने ब्रह्मचर्य के प्रयोग के नाम पर ऐय्याशी की और लड़कियों और औरतों का लाभ उठाया. लेकिन बड़ा आरोप गाँधी पर देश के बँटवारे को लेकर है. यह कि उन्होंने देश का विभाजन करवाया, अगर करवाया नहीं तो कम से कम रुकवाया नहीं. दूसरा आरोप है कि उन्होंने पटेल और उनके पहले सुभाष को दरकिनार करके नेहरू को प्रधानमंत्री बनवाया. तीसरा संगीन आरोप है कि उन्होंने भगत सिंह की फाँसी न सिर्फ नहीं रुकवाई बल्कि उसे जल्दी करवाने में अंग्रेजों के साथ मिलकर साजिश की.ये आरोप तो हर जगह सुनने को मिलेंगे. लेकिन अगर आप वामपंथियों के बीच हैं तो वे बड़ी मुश्किल और वक्त की मजबूरी की वजह से गाँधी की उपादेयता से सहमत तो दिखेंगे लेकिन जब वे इसे लेकर आश्वस्त हों कि वे प्रायः अपनों के बीच ही हैं तो देश की आज की दुर्दशा के लिए वे भी गाँधी को दोषी बल्कि अपराधी ठहराते सुनाई पड़ते हैं. उनकी कई शिकायतें गाँधी से हैं, एक है पूंजीपतियों से गाँधी की मित्रता, और पूँजीपतियों के प्रति उनकी पक्षधरता. Continue reading