स्मृति का दायित्व :आत्मालोचनात्मक हो सुरक्षात्मक नहीं (25th anniversary of Babri Masjid demolition)

बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किए हुए पचीस साल हो गए. यह एक ऐसी वर्षगाँठ है जिसे रजतजयंती शायद ही कोई कहना चाहे. क्योंकि इसमें रजत की कांति जैसा कुछ भी नहीं है.यह ऐसी वर्षगाँठ नहीं जिसकी प्रतीक्षा उत्सुकता से की जाती है.फिर भी ऐसे मौकों को नज़रंदाज करना आसान है,उनसे आँख मिलाना मुश्किल.यह एक ऐसा दर्दनाक वाकया है जो हम सबको अपनी इंसानियत के वजूद पर शक करने को मजबूर करता है. Continue reading

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When a border was carved on a nation’s psyche

There are very few dates which evoke contradictory emotions in different communities living side by side in a nation. In the history of India 6 December is a date Hindus and Muslims remember differently. It is a day that may even be called a border. A border, which has created two distinct zones of sensibilities, one Hindu and the other Muslim. It ensured that from now on there would be little they would share. They don’t intersect, they don’t meet. They look at each other, not with interest but with suspicion.
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छह दिसंबर : पश्चात्ताप, क्षमायाचना और आत्मचिंतन का दिन

6 दिसंबर हिंदुओं के लिए पश्चात्ताप, क्षमायाचना, आत्मचिंतन और अनुताप का दिन होना चाहिए. न कि गर्व का और न शौर्य का. खासकर उनके लिए जो स्वयं को राम का भक्त कहते हैं. क्योंकि आज ही के दिन पच्चीस साल पहले उनके नाम पर उनकी तरफ से स्वयं को रामभक्तों की सेना कहने वालों ने एक ऐसा जघन्य कृत्य किया था जिसके कारण पूरी दुनिया के सामने हिंदू धर्म का सर हमेशा के लिए कुछ नीचे हो गया.वह कृत्य कायरता का था,धोखेबाजी का था और उससे भी बढ़कर अपने पड़ोसियों के विरुद्ध मन में जमा घृणात्मक हिंसा का था. Continue reading

सिर्फ अपने समुदायों तक सीमित : आंग सान सू की और पोप फ्रांसिस

पोप फ्रांसिस आखिरकार म्यांमार में रोहंगिया शब्द का उच्चारण नहीं कर पाए. चार दिनों की म्यांमार यात्रा के दौरान एक बार भी वे उस समुदाय का नाम नहीं ले सके जिसके बारे में वे एकाधिक बार अपने स्थान वेटिकेन से बोल चुके हैं.उन्होंने खुद पिछले साल कम से कम दो बार अपने ईसाइयों को रोहंगिया मुसलमानों के लिए प्रार्थना करने को कहा था.लेकिन पिछले मंगलवार को वे जब म्यांमार की नेता नांग सांग सू की से मिले तो एक बार भी उन्होंने रोहंगिया शब्द का उल्लेख नहीं किया. Continue reading

भारत कभी एक अहिंसक समाज नहीं, बल्कि हिंसा के प्रति असहज समाज रहा है

भारत पारंपरिक रूप से एक अहिंसक समाज रहा है, यह धारणा या मिथ भारतीयों में इस क़दर घर गईहै कि जो इसकी आलोचना करे वे उसका सर तोड़ देने को तैयार हो जाते हैं।इतिहासकार उपिन्दर सिंह अपनी किताब “ प्राचीन भारत में राजनीतिक हिंसा” में इस मिथ पर विचार करती हैं।वे देखने की कोशिश करती हैं कि प्राचीन भारत में राजनीतिक हिंसा या हिंसा मात्र को लेकर क्या रवैया था। इसके लिए वे पुरातात्विक अभिलेखों , राजाओं के अभिलेखों, ऐतिहासिक वृत्तों, धर्मशास्त्रीय ग्रंथों, साहित्यिक रचनाओं का सहारा लेती हैं।वे इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि हिंसा का प्रयोग हमेशा से बहस का विषय रहा है। यह किसके द्वारा, किन परिस्थितियों में किस सीमा तक स्वीकार्य है,इसपर अलग अलग मत रहे हैं।लेकिन हिंसा चिंता का विषय बनी रही है। यहाँ तक कि राजा, या राज्य , जिसे हिंसा का अबाधित अधिकार प्राप्त लगता है, निर्बाध रूप से हिंसा का प्रयोग नहीं कर सकते,यह बार बार अलग अलग जगह कहा जाता है। Continue reading

कुँवर नारायण सिर्फ मनुष्य बनना चाहते थे

 

“कवि कुँवर नारायण केवल मनुष्य बनना चाहता है.यही उसका रोग है,यही उसकी समस्या है.” कोई तिरपन साल पहले ज्ञानात्मक संवेदना के कवि मुक्तिबोध ने तब के युवा कवि के काव्य-संग्रह ‘परिवेश:हम तुम’ पर लिखते हुए कुँवर नारायण को ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक चेतना’ का कवि कहा था. Continue reading