अगस्त के ढलते पखवाड़े में धृतराष्ट्र आलिंगन की याद

युद्ध समाप्त हो चुका है. मात्र अठारह दिनों का युद्ध. लेकिन कहा जाता है महाभारत. क्योंकि यह रणक्षेत्र में कौरवों और पांडवों की सेनाओं के आमने सामने मुकाबले के बहुत पहले से शुरू हो गया था. पांडवों ने बारह बरस का वनवास तो गुजारा ही था, एक वर्ष का अज्ञातवास भी उन्हें साथ में झेलना पड़ा था. फिर भी दुर्योधन ने सुई की नोंक भर ज़मीन देने से इनकार कर दिया. पांडव तो सिर्फ पांच गाँव भर भूमि ही चाहते थे. कृष्ण ने मध्यस्थता का प्रयास किया, लेकिन सत्ता और अपनी शक्ति के मद से चूर दुर्योधन ने कृष्ण को नहीं सुना. वे खाली हाथ लौट आए.

फिर युद्ध हुआ. होना ही था. कौरवों की तरफ थीं अक्षौहिणी सेना और पांडवों के पक्ष में थे कृष्ण. युद्ध, युद्ध न था, संहार था: पांडवों ने युद्ध जीत लिया. लेकिन कीमत उसकी बहुत थी. कौरवों की ओर से लड़ने वाले भीष्म और द्रोणाचार्य भी मारे गए. दोनों धर्म जानते थे, लेकिन अधर्म की ओर से लड़ने को बाध्य थे. भीष्म को अधिक मूल्य चुकाना पड़ा. अपने कुल का संहार होते देखना था उन्हें. शरशय्या पर अपनी ही मृत्यु की प्रतीक्षा करनी थी. खुद कहा उन्होंने अपने शिष्य अर्जुन को, बाणों से धरती को बींधकर उनके लिए मौत का बिस्तरा तैयार करने को. युद्ध के अंत और अपने अवसान की प्रतीक्षा में चुभन न हो तो फिर इस मृत्यु और बाकी मौत में फर्क कैसे रहे!

नीति-अनीति, धर्म-अधर्म, करणीय-अकरणीय का भेद जाता रहा. बलराम क्षुब्ध हुए अपने अनुज कृष्ण पर जब उन्होंने एक एक करके पांडवों को छलपूर्ण युक्तियों का प्रयोग करना सिखाया. उनका क्रोध बाँध तोड़ गया जब कृष्ण ने संकेत किया दुर्योधन की जंघा की ओर जो गांधारी की दृष्टि की ओट में रह जाने के कारण अरक्षित रह गई थी. और भीम ने वहीं वार किया. युद्ध में फिर कुछ भी न बचा.

कृष्ण अग्रज की भर्त्सना समझते थे, लेकिन उदास हो कर यही कह सकते थे, “भैया, इसीलिए तो युद्ध रोकना चाहता था. युद्ध अपने आप में अनैतिक है. एक बार आरंभ हो गया फिर लक्ष्य धर्म नहीं, विजय मात्र है. मेरा कार्य विजय सुनिश्चित करना था.”

युद्ध और पांडवों की मांग न मानने का तर्क क्या था दुर्योधन का? “धर्म क्या है, जानता हूँ किन्तु उस ओर प्रवृत्ति नहीं है. अधर्म क्या है, यह भी पहचानता हूँ लेकिन उससे निवृत्ति नहीं है.” तर्क सत्ता की बाध्यता का है.

युद्ध परिणति तक पहुँचा. गांधारी और धृतराष्ट्र ने अपने सारे पुत्रों के संहार की कथा सुनी. पांडव भी क्षत-विक्षत थे. किसने अपना पुत्र न खोया था, किसके घर खालीपन न था?

कृष्ण ने कहा विजयी, हालाँकि रक्ताक्त पांडवों से कि वे अपने बुजुर्ग धृतराष्ट्र और गांधारी से मिलें ही. वे शत्रु पक्ष के भलें हों, उनके भी बड़े थे.

पांडव पहुँचे अपने चाचा और चाची के सम्मुख. धृतराष्ट्र की छाती जल रही थी पुत्रों के वियोग से. भीतर ही भीतर तूफ़ान उमड़ रहा था. देख नहीं सकते थे. इशारे से ही भीम को बुलाया. आलिंगन के लिए बाँहें फैलाए हुए. भीम को ही क्यों ?

भीम बढ़ने ही वाले थे कि कृष्ण ने पुनः बरजा. भीम के सामने एक पाषाण मूर्ति भीमाकार रखी. आलिंगन को आतुर धृतराष्ट्र की बांहों में वह मूर्ति बढ़ा दी गई.

प्रतिशोध की वास्तविकता कठोर थी स्नेह प्रदर्शन की तरलता की अपेक्षा. लौह प्रतिमा को दुर्योधन मान धृतराष्ट्र ने जब अपनी भुजाओं में उसे कसा तो सबने देखा विस्फारित नेत्रों से उसे चूर चूर होते.

धृतराष्ट्र को तुरत अहसास हुआ कि क्या किया है उन्होंने. जोरों से क्रंदन कर उठे, “हा! क्या कर डाला मैंने!” बाद में उन्हें पता चला कि उन्हें एक पाप से बचा लिया गया है.

धृतराष्ट्र के इस आमंत्रण को भारतीय लोकमानस ने प्रसंग से अलग करके एक अलग ही प्रतिष्ठा दी. एक चेतावनी, जब युद्धरत पक्ष आमने सामने हों तो प्रतिपक्षी की भावुकता भरी वाणी को निष्ठुर यथार्थवादी कानों से सुनना.
धृतराष्ट्र आलिंगन लोकबुद्धि के सबसे दिलचस्प शब्दों में से एक है. शक्तिशाली जब सम्मुख हो तो उसके प्रत्येक प्रस्ताव की ठीक से जाँच किए बिना उसे ग्रहण भी करना खुद को जोखिम में डालना है.

क्या धृतराष्ट्र आलिंगन परिष्कृत रूप है “मुँह में राम बगल में छुरी का”? दोनों में बात एक है, लेकिन धृतराष्ट्र आलिंगन में जो आलिंगन है वह इस कृत्य की भीषणता को और तीव्र कर देता है.

थोड़ा आगे जाकर यह भी सोचा जा सकता है कि जब भी कोई कहे कि मुझे और तुम्हें एकाकार हो जाना चाहिए तो भी इस प्रस्ताव को सावधानी से जाँचना पड़ेगा. किसी को अपना बनाने का एक तरीका उसे हड़प कर लेना भी है. इस तरह दूसरा पूरी तरह पहले में मिल जाता है.

इस वजह से “आओ,हम तुम मिल जाएं” यह न्योता सुनकर फौरन दौड़ पड़ने की जगह ठिठक कर दुबारा बुलानेवाले को फिर समझ लेने की आवश्यकता है.

मालूम नहीं क्यों अगस्त के ढलते पखवारे में अचानक धृतराष्ट्र आलिंगन की याद आ गई?

http://thewirehindi.com/16032/dhritrashtra-aalingan-by-apoorvanand/

As August Comes to an End, I Am Suddenly Reminded of Dhritarashtra’s Embrace

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One thought on “अगस्त के ढलते पखवाड़े में धृतराष्ट्र आलिंगन की याद

  1. सर क्या इसका सम्बन्ध नीतीश और बिहार की राजनीति से है ? मतलब मुझे लगा ऐसा पढ़ते हुए ||

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