वतनपरस्ती का सबूत

“मैं अपने बच्चे के स्कूल से बहुत खुश हूँ कि उसने उसे नटखट नन्दलाला का चरित्र खेलने दिया.”यह ट्वीट मीडिया के लिए एक खबर था.उस बच्चे की तस्वीर के साथ जो नन्हा-सा है और जिसने बाँसुरी अपने मुँह में दबा रखी है.

यह ट्वीट क्यों खबर है?क्योंकि यह जिस शख्स की है उसका नाम है नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और तस्वीर उनके बेटे की है. जिस अखबार की इंच इंच के लिए मारा मारी होती है, उसे यह खबर इसलिए लगी कि यह उसी नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का बेटा है जिसे उसी के कस्बे में राम लीला में भाग नहीं लेने दिया गया था.

जो बाप से छीन लिया गया, वह उसके बच्चे को मिला इससे वह खुश है.शुक्रगुजार भी.

जन्माष्टमी का दिन है. पिछले सालों के अखबारों और अब सोशल मीडिया की घूमती तस्वीरें दिमाग में नाच जाती हैं:एक बुर्काधारी औरत मोरपंख लगाए अपने नन्हे को या तो गोद में लिए या या टोपी लगाए कोई व्यक्ति बालगोपाल का भेस धरे अपने बच्चे की उंगली पकड़े हुए

जन्माष्टमी है इसलिए याद आया, वरना ऐसी तस्वीर भी याद है जिसमें दिए सजाए हुए उनकी पांतों को घेरे दुपट्टा लपेटे किशोरियाँ कैमरे की ओर देख रही हैं.यह दीवाली का वक्त हुआ करता है.

जब भी दशहरा आता है, अभी भी हर अखबार में और वेब साईट्स पर पाठकों को यह ज़रूर बताया जाता है कि फलाँ फलाँ जगह परंपरा है कि मुसलमान ही रावण का पुतला बनाते हैं और राम का मुकुट भी.

यह भी सूचना दी जाती है कि जिसे पारंपरिक हिंदू लड़कियों के जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण अवसर कहते हैं, यानी उनका विवाह, उस अवसर पर कम से कम उत्तर भारत में अनिवार्य मानी जाने वाली बनारसी साड़ियां मुसलमान उँगलियों से सँवारी जाती हैं.

अभी राखी का त्यौहार गुजरा है और देखा कि मेरा इंतजार यों ही न था.परवेज़ अख्तर ने नज़ीर अकबराबादी की नज़्म लगा रखी थी, ”नज़ीर आया है बाम्हन बन के राखी बाँधने प्यारे; बँधा लो उस से तुम हँस कर अब इस त्यौहार की राखी।“

अब जन्माष्टमी पर भी परवेज़ साहब ने वही नज़्म फिर से पढ़ने को मुहैया कराई है जिसे वे हर साल इस उम्मीद में लगाते रहते हैं कि हमें ज़ुबानी याद हो जाए, “यारो सुनो ! ये दधि के लुटैया का बालपन । और मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।। मोहन-सरूप निरत करैया का बालपन । बन-बन के ग्‍वाल गौएँ चरैया का बालपन ।। ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन। क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन।” यह भी नज़ीर अकबराबादी की ही नज़्म है.

अपने इलाहाबाद के करारी गाँव के छोटे कद के मौलवी साहब की याद करते हुए हमारे दोस्त अली जावेद की आँखों में चमक आ जाती है जो राम चरित मानस के राम लक्ष्मण संवाद को साभिनय पढ़ाते हुए उसका मज़ा लेते थे और बच्चों को भी उसे पढ़ने का सही क़ायदा बताते थे.

इससे आगे बढ़ जाएँ तो 15 अगस्त को यह बहुत हल्की सी नज़्म भी साझा की ही जानी होती है, “मुहम्मद है इबादत और मैं वतन पे ईमान रखता हूँ, वतन की शान की खातिर हथेली जान पर रखता हूँ!! क्यों पढ़ते हो मेरी आँखों में नक्शा पाकिस्तान का/मुसलमान हूँ मैं सच्चा, दिल में हिन्दुस्तान रखता हूँ!”

और तो और अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने वाले और उस जगह सीनाजोरी से जम जानेवाले राम जन्मभूमि मंदिर वहीं क्यों बनना चाहिए और क्यों जो मुसलमान उसका विरोध करते हैं, उनकी मुसलमानियत में खोट है यह बताकर उन्हें कायल करने के लिए उस इक़बाल तक का जाप करते हैं जिसे दूसरे मौकों पर वे पाकिस्तान का पिता कहते सुने जाते हैं. यह बताने को कि जब इकबाल तक ने राम को इमामे हिन्द मान लिया है तो बाबरी मस्जिद की उस जमीन पर उनके हक़ को चुनौती देनेवाले आप कौन!

अगर आख़िरी उदाहरण छोड़ दें तो यह सब कुछ नेक इरादे से किया जाता है. मुसलमान इस साँझा संस्कृति से अभिन्न हैं, इसे गढ़ने में उनका योगदान है, यही साबित करने की कोशिश की जाती है.

फिर भी मुसलमानों के खिलाफ शक और नफ़रत बढ़ती चली जाती है.

यूरोप में यहूदी शक और नफरत के दायरे में थे. उनका खात्मा करने का इरादा हिटलर का था. लेकिन यह भी याद रखें,स्टालिन को यहूदियों से उतनी ही घृणा थी.और खुद को उदार बतानेवाले यूरोप ने जर्मनी से बेदखल यहूदियों को पनाह न दी,सुदूर अरब में फिलस्तीन का रास्ता दिखाया.

यहूदियों के यूरोपीय संस्कृति में योगदान, उनकी मानवीयता आदि के बारे में भी कुछ उसी तरह जर्मनों और ईसाइयों को शिक्षित करने का प्रयास किया जाता था जैसे भारत में मुसलमानों को लेकर किया जाता रहा है.

थियोडोर अडोर्नो ने इसपर लिखा कि अगर आप कातिल के सामने मकतूल के गुण गिनाने लगें तो उससे क़त्ल का उसका इरादा ज़रा भी हल्का नहीं पड़ता. कहा जा सकता है कि इससे शायद वह और पक्का हो जाता है.

यहूदी इसलिए नहीं मारे गए कि उन्हें लेकर यूरोप में गलतफहमी थी जिसे दूर कर लेने भर से मसला सुलझ जाता. वह तो थी ही. इसके लिए सिर्फ शायलॉक को याद कर लेने की ज़रूरत है.

फिर यहूदी हों या मुसलमान, यह सिर्फ सूचना,जानकारी या संपर्क का अभाव नहीं है जो उनके खिलाफ पूर्वग्रह या नफरत पैदा करता है.

अगर सिर्फ यह पूर्वग्रह या अलगाव है जो हिंसा का जन्म देता है तो 1984 के सिखों के कत्लेआम की कैसे व्याख्या की जाएगी जिन्हें हिंदू अपना रक्षक मानते हुए बड़े हुए?

या मैं क्यों अपने उस पड़ोसी को मार डालता हूँ जिसके घर चुपके चुपके गोश्त खाने मैं जाया करता था या कोई मुस्लिम विरोधी हिंसा में उस औरत का बलात्कार कैसे कर बैठता है जिसे वह बुआ या बहन कहा करता था और जो बार बार इस रिश्ते ही दुहाई देकर रहम की भीख माँगती मारी जाती है या कोई अपनी छत से अपने पड़ोसी की छत पर पेट्रोल या किरासन डालकर उसे क्यों जला डालता है? यह जानकारी या संपर्क या आवाजाही की कमी नहीं जो हिंसा का कारण हो.

मुसलमानों के ‘मानवीय’,‘हिंदू मित्र’ होने या ‘भारतीय’ होने के हरेक उदाहरण के बाद जो सवाल किया जाता है, वह है “यह सब तो ठीक, लेकिन…?” या, “इसके बावजूद…

आप कितने ही आंकड़े गिनाते रहें कि मुसलमानों में बहुविवाह लोकप्रिय नहीं, कि उनकी जन्म दर ऐसी नहीं कि वे भारत में हिन्दुओं पर भारी पड़ें, या यह कि उनमें तीन तलाक नगण्य है, इससे उनपर हमले या उन्हें औकात बताने के इरादे में कोई कमी नहीं आती.

आप कितना ही कुरआन से आयतें निकालते रहें जिससे साबित हो इस्लाम अमन का मजहब है वह संदेह का स्रोत बना रहता है.

और यह कोई नहीं पूछता कि किसी की अशिक्षा या पिछड़ापन उसके खिलाफ हिंसा की वजह कैसे हो सकती है? या यह कि हर पैदा होने वाली मुसलमान संतान भारत के लिए वैसे ही स्वाभाविक क्यों नहीं जैसे एक हिंदू पैदाइश है?

इसका मतलब सिर्फ यह है कि हिंसा का स्रोत वह नहीं जिसे निशाना बनाया जाता है बल्कि वह है जो निशाना बनाता है और हमला करता है. जो निशाने पर है उसे खुद को दुरुस्त करने की ज़रूरत नहीं, हिंसा को अपना अधिकार माननेवाले के इलाज की और उसे नियंत्रित करने की ज़रूरत है.

इसीलिए इस स्वाधीनता दिवस पर या आगे मुसलमानों को न तो मदरसे पर या अपनी गाड़ियों पर तिरंगा लगाने की ज़रूरत है और न सस्ते देशप्रेम के शेर भेजकर दुनिया जहान को अपने वतनपरस्त होने का सबूत देने की मजबूरी.

जब इस बार एक मुसलमान नौजवान की यह टिप्पणी पढ़ी तो संतोष हुआ कि अब ऐसी पीढ़ी आ गई है जो इस वतन पर अपनी दावेदारी के लिए हिंदुओं की दिलजोई की मजबूरी से बंधी नहीं है. जैसे कभी किसी ने पिछली सदी में कहा था कि स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है उसी तरह यह पीढ़ी कह रही है कि इस मुल्क पर उसका जन्मसिद्ध अधिकार है और उसे हासिल करने के लिए उसे कुछ भी अलग से करने की बाध्यता नहीं. बेहतर हो कि हम इस पीढ़ी को सावधानी और सम्मान के साथ सुनें और उसकी पीठ न ठोकें बल्कि हमारा सहारा लेकर जो हाथ उनपर उठ रहे हैं, उन्हें बीच में पकड़ें.

चूँकि इस टिप्पणी की खबर नहीं बनेगी और कोई इसका स्क्रीन शॉट न छापेगा, इसे पूरा ही उद्धृत करना  होगा,

“एक मुसलमान होने के नाते मुझे पब्लिक स्पेस में राष्ट्रगान गाना, वंदे मातरम चिल्लाना या कोई भी ऐसा अमल जिससे राष्ट्र प्रेम साबित होता हो, बिल्कुल अच्छा नहीं लगता, मुझे तिरंगा लहराना अच्छा नहीं लगता, शहीदों को श्रद्धांजलि देना भी नही, सेना का जयघोष करना भी नहीं और देश का यशगान करना भी नहीं, मेरे लिए ये सब बातें बुज़दिली की निशानी लगती हैं। मैं अपने मुस्लिम दोस्तों से पूछना चाहता हूं कि फेसबुक पर “i love my india” लिख कर आप क्या साबित कर रहे हैं, और आपको साबित करने की ज़रूरत ही क्यों पड़ती है, किसी गैर-मुस्लिम के लिए देश प्रेम का इज़हार बिल्कुल आम सी बात है जैसे अम्मी अब्बू या गर्लफ्रेंड से इज़हारे मोहब्बत हो लेकिन एक मुस्लिम के लिए देश प्रेम के इज़हार के मायने अलग हैं, उसे बहोत ज़ोर से लगभग चीखते हुए जय भारत का नारा लगाना पड़ता है, ताकि कुछ लोग सुनें कि एक मुसलमान है और भारत से प्रेम करता है, उसे गाय की सेवा करते हुए किसी मुसलमान की फ़ोटो संजो कर रखनी पड़ती है ताकि वो ज़रूरत पड़ने पर खुद को गौसेवक के रूप में भी साबित कर सके। ड्राइवर सलीम और डॉ. कफील के अच्छे कामों का ढिंढोरा पीटना पड़ता है ताकि उनकी ओट में वो खुद को छुपा सके, उसे भारत की आज़ादी के संघर्ष में शामिल सेनानियों की लिस्ट में उर्दू नाम तलाशना पड़ता है ताकि राष्ट्रवादी तानों की मार पर उन्हें ढाल बना सके, यही इस देश के मुसलमानों की दशा है, लेकिन मैं इस लहर के विपरीत खड़ा हूँ, कोई मेरी देशभक्ति पर सवाल खड़ा करेगा तो मैं अपनी ज़िंदगी से देशप्रेम के सारे सबूत मिटा दूंगा, कोई मुझे गद्दार कहेगा तो मैं गद्दारी का ही अभिनय करने लगूंगा, मैं किसी सदाये मोहब्बत पर पिघल तो सकता हूँ लेकिन किसी की अकड़ के आगे झुक नहीं सकता, मुझे इस जमीन की मिल्कियत का ताना देने वालों तुम मुझे सता भी नहीं सकते और डरा भी नहीं सकते।”

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One thought on “वतनपरस्ती का सबूत

  1. Munna Jha says:

    जो नफ़रत करते हैं, जो जुल्म करते हैं, वो पूरा भारत नहीं है। वैसे भी भारत में नहीं दुनिया के बहुत सारे देशों ने, उन्हें, आतंकवादी का ठप्पा लगा दिया गया है, उनसे घृणा की जाती है। भारत तो उनके लिए सबसे सुरक्षित देश है। उनके बीच तो, मुस्लिम औरतें, तक सुरक्षित नहीं है। अगर भारत, उनकी आधी आवादी को सुरक्षा देना चाहता है, और पुरुषों की आतंकवादी सोच ख़त्म करना चाहता है, तो दिक्कत क्या है? अगर देश का वफ़ादार है, तो बढ़-चढ़कर दिखाना चाहिए, और लोगों को भी प्रेरित करना चाहिए। क्या कलाम को, देशभक्त होने की परीक्षा देनी पड़ी थी?

    जो उन्हें छेड़ते हैं, वो तो उदंड होते हैं, हम उन्हें हिन्दू से संज्ञा क्यूँ दें, जैसे, एक आतंकवादी मुस्लिम नहीं होता। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में भी तो, उन्होंने जीना हराम कर रखा है, कश्मीर और बंगाल, सबसे बड़ा उदाहरण है। जहाँ उनकी संख़्या बढ़ जाती है, वहाँ, वो राज करने लगते हैं। हिन्दू, तो मुस्लिम की चादर पर भी पैसे चढ़ाता है, कितने मुस्लिमों ने ऐसा उदाहरण पेश किया है? हिंदू मंदिरों से भी पैसे जाते हैं।
    आख़िर, पाक़िस्तान, किसके लिए, अलग किया गया था? उस देश के मुस्लिम, असुरक्षित कैसे हो सकते हैं, जहाँ के हिन्दू बुद्धिजीवी उनकी रक्षा करने के लिए तैयार हों।
    हमारे देश में, किसी को सुरक्षा देने की आवश्यकता नहीं है, यहाँ सभी सुरक्षित हैं। अत: सबसे ज़्यादा, अच्छी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना ज़रूरी है।

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