पुलिस की हिचकिचाहट

यह स्तम्भ प्रायः निराशाजनक खबरें ही सुनाता रहा है. फिर भी इतने सारे समाचार हैं जिन पर हम बात नही कर पाते, मसलन उत्तर प्रदेश में हाल में हुई माध्यमिक परिक्षाओं में फेल हो गए लाखों छात्रों की सुध सफलता की  गोल-गोल, घुमावदार, चक्करदार सीढियों पर चढ़ते जाने की धुन में लगे इस समाज में किसी ने नहीं ली.  वे क्या किसी के बच्चे नहीं? करोड़ों रुपयों की सालाना तनख्वाह के प्रभामंडल से बाहर नाकामयाब जमात बढ़ती ही जाती है. असफलता की इस राष्ट्रव्यापी परिघटना का कोई समाजशास्त्रीय विश्लेषण हो रहा हो, इसका प्रमाण हमारे पास नहीं. स्कूली किताबों में  अपने -अपने समुदाय के नायकों के प्रतिनिधित्व को लेकर जो इतने संवेदनशील और मुखर रहते हैं, ऐसे नेताओं के मन के किसी कोने में भी असफलता के पीछे  की राजनीति पर विचार करने की जगह नहीं दिखाई देती. 

अभी हम लेकिन इस विषय पर बात नहीं कर रहे.  एक महीना पहले जिस कनकलता की चर्चा इस स्तम्भ में की गई थी, उसके न्याय के संघर्ष के बारे में कुछ खुशखबरी है. यह बताया गया था कि कनकलता और उसके परिवार पर मामले को छोड़ देने और उस मकानमालिक से कुछ भरपाई लेकर समझौता कराने को दिल्ली के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के पुलिस प्रमुख चंद्रहास यादव दबाव दाल रहे थे. यह भी बताया गया था कि बहुत हँगामे के बाद प्राथिमिकी तो  दर्ज की गई, लेकिन वह सिर्फ़ मार-पीट का जिक्र करती थी, मुखर्जी  नगर थाना की मुखिया इंदिरा शर्मा ने अनुसूचित जाति / जनजाति उत्पीडन से जुड़ी धाराएं नहीं लगाईं. थाने में ही कनकलता के भाई को गिलास में पानी पीने से रोका गया और इंदिरा शर्मा द्वारा धमकाया गया. देह में पानी की कमी होने पर भी थाने ने उसे अस्पताल ले जाने की जहमत मोल नहीं ली.  इस तरह कनकलता पर दलित होने के चलते उसकी पिटाई करने का जितना संगीन जुर्म उसके मकानमालिक का है, उससे कम मुखर्जी नगर थाना के अधिकारियों और उनके भी ऊपर चंद्रहास यादव का नहीं माना जा सकता, बल्कि उनका कुछ अधिक ही है क्योंकि उन्होंने कनकलता को उसका संवैधानिक अधिकार लेने के रास्ते में बाधा  पहुंचाई.
एक महीने से कनकलता की  इन्साफ की  इस लड़ाई को व्यापक करने के मकसद से दलित अधिकारों के संगठनों के साथ- साथ दूसरे छात्र संगठन और नागरिक अधिकारों की रक्षा के  लिए प्रतिबद्ध समूह गोलबंद हो  रहे थे.  उन्होंने ठीक ही दिल्ली के पुलिस मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन का निर्णय किया. जो छात्र , शिक्षक और अन्य नागरिक इकठ्ठा हुए वे सब  दलित नहीं थे, हालांकि उनके सामने  यह भी साफ था कि वे किसी सामान्य  नागरिक अधिकार के लिए नहीं, दलित नागरिक अधिकार के लिए वहां आए थे.

नौजवानों को सिर्फ़ कामयाबी की दौड़ में लगे रहने तालीम देने को अपना फर्ज समझ बैठे विश्वविद्यालयों  के परिसर से निकल आए ये युवा मेडिकल कालेजों  और आई. आई. टी. के उन युवाओं से कितने अलग थे जो अपनी सुविधाओं के बचाव को बराबरी की मांग मान लेने के लिए पिछले एक साल से ”आन्दोलन” किए जा रहे हैं. इन ”आन्दोलनकारियों’ और उनके माता-पिताओं और कई शिक्षकों ने भी बार बार कहा है कि जाति अब एक बीती हुई बात हो चुकी है, असल चीज़ है शिक्षा और योग्यता. इसमें शक है कि कनकलता का मसला इस आत्मग्रस्त तबके का ध्यान खींच पाया हो.
प्रदर्शन के दौरान जब अधिकारियों ने मिलने को कहा तो यह नहीं पता था कि वे अपनी तैयारी करके बैठे हैं. उन्होंने बताया कि प्राथमिकी में भले न हो, लेकिन बाद में अनुसूचित जाति उत्पीड़न से जुड़ी धाराएं लगा दी गई हैं और जांच अधिकारी इसी वजह से ए. सी.पी. चंद्रहास यादव बनाये गए हैं. जब यह पूछा गया कि अगर प्रासंगिक धाराएं लगा दी गई थीं तो नियमानुसार अभियुक्त की गिरफ्तारी क्यों नही की गई. इस पर यह जवाब मिला कि उन्होंने तो उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत ले रखी है, कैसे गिरफ्तार करें!

धारा लगाने और जमानत लेने के बीच चौदह दिन का वक्त था, फिर इस बीच गिरफ्तारी क्यों न हो सकी? यादव ने इतने भोलेपन से कहा कि गिरफ्तार करने को जब-जब गए घर पर कोई न मिला कि उस गंभीर महाल में भी हँसे बिना न रहा जा सका. कनकलता ने बताया कि उसी बीच यादव ने उसे अपने दफ्तर बुलाया था और वहाँ मकानमालिक के परिवार के लोग भी मौजूद थे, जब उस पर मामला छोड़ देने और वहीं समझौता कर लेने को कहा गया था. यादव इसका विरोध बड़ी कमजोर आवाज में कर पाए.
यादव की मौजूदगी में ही बताया गया कि जांच उनके हाथ से ली जा रही है. साथ ही यह भी समझाने की कोशिश की गई की चूंकि अनुसूचित जाति उत्पीडन से जुड़ी धाराएं बड़ी सख्त हैं, और अक्सर पुलिस को उनके दुरुपयोग का अंदेशा रहता है, आम तौर पर वह अपनी और से पूरी तफ्तीश और  तसल्ली करके ही गिरफ्तारी जैसा कडा कदम उठाना चाहती है.  यह स्पष्टीकरण ही था जो  कानूनी तौर पर सही न था, यह इसे बताने वाले अधिकारी भी समझ रहे थे. वे गृह मंत्रालय के उन निर्देशों से परिचित थे जो ऐसे मामलों में फौरन गिरफ्तारी को कहते हैं. इसलिए वे  उत्पीड़कों के ख़िलाफ़ कार्रवाई को लेकर पुलिस के अन्दर जो हिचकिचाहट है, उसका समाजशास्त्रीय कारण दे रहे थे और उसके मनोवैज्ञानिक पक्ष का विश्लेषण करने की अपील कर रहे थे. अपने विभाग की ओर से वे शर्मिंदगी और झेंप महसूस कर रहे थे, ऐसा प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल से बात कर रहे उन अधिकारियों के लहजे से लगता था. उन्होंने यह वादा किया कि मकानमालिक की जमानत का पुलिस सक्रिय विरोध करेगी, छः मई से बीस मई के बीच, जिस दिन अग्रिम जमानत ले ली गई, पुलिस की ओर से कार्रवाई में हुई ढिलाई की जांच की जाएगी  और कनकलता को सुरक्षा दी जाएगी.
कनकलता के न्याय के संघर्ष के साथियों के लिए यह अच्छी ख़बर थी. बाहर बारिश में भींगते और फिर धूप में सूखते प्रदर्शनकारी मित्रों के पास लौटते हुए पाल दिवाकर ने कहा कि अगर पुलिस ने स्वाभाविक रूप से कानूनी कदम उठाये होते  तो  महीने भर की इस इस जद्दो-जहद की क्या ज़रूरत पड़ती! पर उस हिचकिचाहट का क्या जवाब जो सिर्फ़ दिल्ली में नहीं, पूरे देश में पुलिस के मन में मुसलमानों के, ईसाइयों के, आदिवासियों के, दलितों के, औरतों के हक की हिफाजत करने से पुलिस को रोक देती है!

आंखों के आगे गोहाना, झझ्झर के दृश्य घूम गए, बिहार में आरा में भैंस चोरी के आरोप में पकड़ लिए गए चार दलितों को कुर्सी पर बैठ कर अपने सामने  कुचल -कुचल कर मरवाते पुलिस अधिकारियों का चित्र फिर गया. याद आया 1984 में देश भर में लूटे, जलाये, मारे जाते हुए सिखों के पक्ष में कदम उठाने से भारत की पुलिस हिचक गई थी, 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराते लोगों पर कार्रवाई करने में पुलिस ही नहीं, अर्ध सैनिक बल भी हिचक गए थे, भागलपुर में मुसलमानों का कत्ल कर रहे हमलावरों के ख़िलाफ़ कदम उठाने में पुलिस हिचक गई थी, मुम्बई में मुसलमानों पर हमला कर रहे शिव सैनिकों को रोकने में पुलिस हिचक गई थी, 2002 में गुजरात में मुसलमानों का कत्लेआम करने में वह हिचकी ही नही थी, उसने कई जगह बचते मुसलमानों को कातिलों के हवाले भी किया, हाशिमपुरा में भी यही!

आज़ादी के बाद का भारतीय पुलिस का इतिहास उसकी कमजोर तबकों के पक्ष में और ताकतवर के खिलाफ कदम उठाने में उसकी हिचकिचाहट का इतिहास है. अपनी बनावट में यह पुलिस अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, औरतों, गरीबों की विरोधी है. जब इसके कुछ अधिकारी हमें इस हिचकिचाहट को समझने को कहते हैं और यह आश्वस्त करते हैं कि पुलिस सीखने की प्रक्रिया से गुजर रही है,  तो हम उन्हें यह कहना चाहते हैं कि आप बहुत देर कर रहे हैं, इस बीच ज़ुल्म के शिकार लोगों के आंसुओं और खून से भरी घाटी और चौड़ी होती जाती है और  इस घाटी में जो भंवरें बनेगीं, उनमें फँस कर इस राष्ट्र का विचार कहीं लापता हो जाएगा.

 

  • विलंबित, जनसत्ता, जून, 2008
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