कनकलता को न्याय कब और कैसे मिलेगा ?

कनकलता चार साल से मेरी छात्रा है. लेकिन मैं उसकी जाति नहीं जान पाया.यह  न जान पाना मेरी जाति निरपेक्ष प्रगतिशीलता का प्रमाण है या  कनकलता जैसी छात्राओं के जीवन को लेकर  मेरी उदासीनता का? यह प्रश्न पिछले   एक हफ्ते से मुझे मथ रहा है .क्योंकि एक हफ्ता पहले  संयोगवश अपने एक दूसरे छात्र विनीत के ब्लॉग को पढ़ते हुए मुझे  यह मालूम हो पाया कि कोई पन्द्रह दिन पहले कनाकलाता , उसकी बहनों और भाई  को दिल्ली विश्वविद्यालय के करीब पड़ने वाले मोहल्ले मुखर्जी  नगर में उसके मकान मालिक ने बुरी तरह पीटा. माँ बाप और  शिक्षक से  पिटने के अनुभव हममें से कई के हैं. हमें उनके, अतार्किक  ही सही क्रोध के कारणों का पता होता है,  बाद में हँसी भी  आती है और हम अपनी चोट कई बार भूल जाते हैं. लेकिन कनक लता के मकानमालिक ने जिस क्रोध के मारे उसे  मारा, वह इस बात से पैदा हुआ था कि वह उसके मकान में सवा साल से बिना यह राज खोले रहे जा रही थी कि वह दलित है. उसका पूरा मकान छू दिया गया था और उसके पोते-पोतियों को भी खिला-पिला कर कनकलता ने भ्रष्ट कर दिया था.

क्या यह पर्याप्त कारण न था कि वह क्रुद्ध हो? कनकलता  को क्या हक था कि वह एक भले आदमी के मकान में पूरी बात बताए रहने लगे?  क्या  इस वजह से  मकान मालिक को यह अधिकार नहीं मिलता कि वह उसे मकान खाली करने को कहे?  उन इशारा करने को उसका पानी बंद कर दिया, फिर भी वह वहां रहने की जिद क्यों किए  जा  रही थी? तीन मई की रात को जब कनकलता बर्तन धोने नीचे के नल पर गई और उसने  अपने भाई को पीने के पानी के लिए  बाल्टी लेकर   आने को कहा, तब उसके मकान मालिक का गु्स्सा  फूट पड़ा.  एक ‘चमारिन’ की यह हिम्मत? यह असंवैधानिक शब्द है और इसका प्रयोग संज्ञेय अपराध है, यह कनकलता को पता था और उसके भाई  को भी, जो इस घटना के तीन रोज़ बाद ही कल्याण पदाधिकारी के तौर पर दिल्ली सरकार में अपनी जगह लेने वाला था.

अपनी जाति और अपने अस्तित्व के दूषण को लेकर गालियाँ सुनने और पिटने के बाद कनकलता और उसके भाई को मुखर्जी नगर थाना ले जाया गया और उस  पूरी रात से लेकर अगले दिन चार बजे तक उन्हें वहां बिठाए रखा गया.बुरे कहानीकार की तरह आपकी अतिरिक्त दया उपजाने को मैं यह नहीं लिख रहा , बल्कि सिर्फ़  इसलिए  कि यह सच है कि कनकलता के बीमार भाई  को थाने  में कुछ भी खाने को और पीने को नहीं दिया गया. जब उसकी  बहन ने उसे पानी दिया और वहां पड़े ग्लास में उसने  वह पीना चाहा तो थाने के  एक अधिकारी ने डपट कर  उसे मुँह न लगाने और  ऊपर से पीने को कहा. मारे अपमान के कनक के भाई ने फिर पानी नहीं पिया. इस थाने की मुखिया एक स्त्री है, पर वह ‘शर्मा’ पहले  है,  यह  इन  दलितभाई- बहनों को तब मालूम पड़ा जब उसने इन्हें बार बार यह कहा कि अनुसूचित जाति उत्पीडन  कानून  का इन जैसे लोग नाजायज़ फायदा उठा कर भले  लोगों को तंग करते हैं.
उच्चतम न्यायालय ने यह किसके लिए कहा था कि प्राथमिकी दर्ज करने में कोताही न की जाए ?  मुखर्जी  नगर थाने ने इनकी शिकायत दो दिनों तक दर्ज नहीं की.  आखिर वह  बिना तथ्यों की पूरी पड़ताल किए बिना  किसी के भी देने पर  कैसे किसी भद्र नागरिक  के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई शुरू कर सकती थी? यह बताना ज़रूरी है कि कनक की शिकायत दर्ज तभी हुई जब साथ  ही निष्पक्षता से बाध्य मुखर्जी नगर पुलिस ने मकानमालिक की ओर से  भी कनक और उसके भाई बहनों पर मार-पीट और यौन दुर्व्यवहार आदि का मामला दर्ज कर लिया. पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करते समय बार- बार कहने पर भी अनुसूचित जाति उत्पीडन से जुड़ी धाराएं नहीं ही लगाईं . अपने बच्चों की ख़बर सुन कर बोकारो से भागे- भागे  आए पिता को उस क्षेत्र  के पुलिस  प्रमुख ने  बड़ी शिष्टता से, जो कि उच्च जाति के संस्कारों से ही सम्भव है, यह समझाने की कोशिश  की कि वे क्यों बेवजह मामले को बढाने पर तुले हैं, क्यों नहीं  कुछ ले-देकर बात ख़त्म करते! अब यह बड़ी नाइंसाफी होगी कि आप पुलिस की इस सामाजिक भूमिका के प्रति जागरूकता पर उसकी प्रशंसा करने की जगह उससे खफा हो जाएँ. वह मात्र दंडात्मक गतिविधियों  से  ऊपर उठ कर सामाजिक तनाव को कम करने  का जटिल काम कर रही है, क्या आप यह नहीं देखते? पुलिस को मामले की गंभीरता का पूरा अहसास  है, और वह काफ़ी सावधानी बरत रही है  यह इससे भी ज़ाहिर होता है कि उसने कई बार इन भाई बहनों से  उनका  जाति प्रमाण पत्र माँगा. पीटने ओर गाली देने के पहले मकान मालिक ने यह प्रमाण पत्र नहीं मांगा था! पुलिस के सामने उस परिवार की एक महिला ने जाति  का प्रमाण शकल में ही होने की बात कह कर यहकहा ही था कि इस शकल -सूरत को लेकर वे उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते.
घटना को बीते तीन हफ्ता हो गया है. पहले दिन अखबारों और इलेक्ट्रोनिक माध्यम ने दिलचस्पी दिखाई पर आगे  किसी में इसे लेकर उत्सुकता नहीं रही कि न्याय की सरंचना ने कनक की शिकायत का क्या किया. कनक स्त्री है और दलित है. या दलित है और स्त्री है? जो भी हो उसने महिला आयोग में अर्जी भेजी, अनुसूचित जाति आयोग में भी गुहार लगाई. इन दोनों ने  इसे  सुना , इसका कोई सबूत नही मिलाहै. पता चला कि दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों के प्रतिनिधियों को यह छात्र का नहीं, परिवार का मामला लगता है, इसलिए  उन्होंने  अपनी ओर से कुछ न करना ही बेहतर समझा. दलित अस्मिता को लेकर राजनीतिक गोलबंदी करने वाले दलों के लिए यह प्राथमिकता का मामला नहीं. वामपंथी दलों और छात्र संगठनों ने भी इसे मुद्दा बनाना ज़रूरी नहीं समझा. दिल्ली में ही स्थापित राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग और न्यायालय इस घटना का स्वतः संज्ञान नहीं ले पाए.
मेरे लिए लेकिन सवाल यह है कि क्यों दिल्ली में  रहते हुए, विभाग आते-जाते हुए भी दो हफ्ता बीत जाने के बाद ही, वह भी संयोग से मुझे इस घटना का पता  चल सका ! और उसके बाद मैं अपने दलित अधिकार से जुड़े साथी संगठनों पर ही क्यों झल्लाया कि अब तक कुछ ठोस क्यों नहीं हो सका है! क्यों  कनकलता के साथ किए गए इस अपराध पर उसका विश्वविद्यालय सरकारी तंत्र को कुछ कहना ज़रूरी नहीं समझ पाया ? उसके माँ-पिता ने शिक्षा  लेने के जिस नागरिक दायित्व की पूर्ति के लिए अपने बच्चों को एक धर्म निरपेक्ष सरंचना में दाखिल कराया , वह अपने आप को उनकी ज़िंदगी से  कितना जुडा महसूस करती है? क्या यह सचमुच कक्षा के बाहर का प्रश्न है?
टिपण्णी को मैं लेकिन खीझ पर ख़त्म नहीं करूंगा. आपको यह सूचना देना आवश्यक है कि कनक और उसके भाई   बहनों ने इस अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ाई छोड़ी नहीं है, कि  उनके माता पिता ने उन्हें समझौते की आसान राह पकड़ने  का उपदेश नहीं दिया है, कि उनके साथ विनीत, मीनाक्षी, मुन्ना जैसे उनके मित्र खड़े हैं, जो दलित नहीं  हैं , लेकिन ख़ुद को  इस लड़ाई के लिए जिम्मेदार समझते हैं.  प्रश्न यह है कि क्या कनकलता जिस राज्य की नागरिक है, वह इस संघर्ष में शामिल होने को उतना ही तत्पर है?

– विलंबित, जनसत्ता, मई, 2008

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s