दावे पर ज़ोर देना है, न कि दीन की हिफ़ाज़त पर (on Bengal violence)

जिसे साम्प्रदायिक हिंसा कहते है, अब बंगाल उसकी चपेट में आ रहा है. दो रोज़ से 24 परगना के बशीरहाट में किसी एक आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट से क्रुद्ध मुसलमान उपद्रव और हिंसा में लिप्त हैं. यह हिंसा इतनी ज़्यादा है कि आज मुख्यमंत्री ने उस इलाके में इन्टरनेट बंद करने का आदेश दिया. स्कूल और दुकाने बंद हैं और सुरक्षा बल लगातार गश्त लगा रहे हैं.

हिंसा में दुकानों को जलाया और बर्बाद किया गया है जो ज़्यादातर हिन्दुओं की हैं. यह कहना भी मुश्किल है कि इस हिंसा को मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच दंगा कहा जाए या अपने पवित्र स्थल या धर्म को तथाकथित रूप से अपमानित करती हुई फेसबुक पोस्ट से नाराज़ मुसलमानों की हिंसा मात्र !अब तक की खबरों से मालूम होता है कि उपद्रवी मुसलमानों की भीड़ ही हमलावर रही है और सिवाय फेसबुक पोस्ट करने वाले के हिंदू इसमें शरीक नहीं हुए हैं.

पहले मांग यह थी कि फेसबुक पोस्ट जारी करने वाले को गिरफ्तार किया जाए. वह ग्यारहवीं कक्षा का एक किशोर निकला. जाहिर है,पोस्ट कहीं और से चली होगी और उसने सिर्फ उसे आगे बढ़ा दिया होगा.अब तक किसी को या नहीं मालूम कि उसमें ठीक ठीक क्या है, लेकिन जाननेवाले यह बताते हैं कि वह मुसलमानों को चिढ़ाने के ख्याल से ही बनाई गई लगती है.

लड़का गिरफ्तार हो गया. पुलिस ने चुस्ती से कम लिया.फिर भी हिंसा हुई.यह भी कहा जा रहा है कि गिरफ्तारी से मुसलमानों की आहत भावना संतुष्ट नहीं हुई हैं. तो वे चाहते क्या थे?क्या उस लड़के को उसी वक्त सज़ा दी जानी चाहिए थी और क्या वह सज़ा भीड़ देती?

यह कहा जा रहा है कि जब फेसबुक पोस्ट की खबर के फैलने से गुस्सा भी आम हो गया तो कायदे से पुलिस  को यह सार्वजनिक तौर पर बताना चाहिए था कि दोषी की गिरफ्तारी हो गई है. लेकिन क्या उसके ऐसा करने से हिंसा न होती?दूसरे कि क्या अब हर चीज़ सड़क पर निबटाई जाएगी? क्या पुलिस पर प्रशासन अपना हर कदम जनता को रिपोर्ट करेगा और उसकी मंजूरी के बाद ही वह कदम सही माना जाएगा?

क्या बशीरहाट के मुसलमान राजस्थान, झारखंड, उत्तर प्रदेश, जम्मू के हिन्दुओं की तरह तुरत फुरत अपनी मर्जी के मुताबिक़ इन्साफ करना चाहते हैं जो उन्हें पीट पीट कर मार डालते हैं जो उनके मुताबिक़ अपराध कर रहे हैं?

क्या पुलिस को यह मौक़ा न मिलना चाहिए कि वह पता करे कि मुसलमानों को चिढ़ाने की यह कोशिश शुरू कहाँ से हुई?

जिसकी भी यह मंशा थी, वह कहीं बैठा मुस्करा रहा होगा कि उसकी तरकीब कामयाब हुई और मुसलमान आखिर उसके फंदे में आ ही गए! यह एक तरह से मालदा की घटना का दुहराव ही हुआ.

मालदा में भी इसी तरह पैगम्बर और मजहब के अपमान से गुस्साए मुसलमानों ने सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया था. यह नोट करने की बात है कि उनका हमला हिन्दुओं पर न था और न हिन्दुओं को वहां कोई नुकसान पहुँचा था.लेकिन  सड़क पर गाड़ियों को आग लगाते मुसलमानों की तसवीरें खूब घूमती रहीं और स्थापित यही हुआ कि मुसलमानों को मौक़ा दो और देखो!

बशीरहाट में मुसलमान बहुसंख्या में हैं., बंगाल में ही वे दूसरे राज्यों के मुकाबले ज़्यादा तादाद में हैं. राजनीतिक दलों में भी वे दिखलाई पड़ते हैं. स्थानीय स्तर पर भी वे दब कर नहीं रहते.इसलिए स्वाभाविक है कि गरीबी और आम खुशहाली में हिस्सा कम होने के बावजूद वे खुद को अभिव्यक्त करने में उस तरह संकुचित नहीं रहते जैसे दूसरे राज्यों में.यह याद कर लेना चाहिए कि वाम मोर्चे की सरकार ने जब सिंगुर और नंदीग्राम में कहर ढाया तो राज्य की हिंसा का मुकाबला करने में मुसलमान दूसरे किसानों के साथ थे और मारे भी गए.

यह भी उतना ही सच है कि बंगाल में साम्प्रदायिक हिंसक भावना सतह के नीचे प्रवहमान रही है. वाम मोर्चे के वक्त ऊपरी हिंसा भर न दिखी,और कभी भीतर के इस मवाद को बाहर निकालने की कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्रवाई हुई नहीं.

यह भी दिलचस्प है कि बंगाल के सबसे प्रभावशाली समाचार समूह का एक अघोषित निर्णय है कि इस प्रकार की हिंसा को वह खबर नहीं बनने देगा. यह शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति समाज को देखने नहीं देती कि यह बीमारी उसके भीतर मौजूद है. सही रिपोर्टिंग के अभाव में अफवाहें कारगर हो जाती हैं. धूलागढ़ की हिंसा की खबर को भी इसी तरह दबाने की कोशिश हुई थी.हालाँकि इस बार खबरें बाहर आ रही हैं.

बशीरहाट की हिंसा निहायत ही अहमकाना है. जायज़ तो उसे किसी भी तरह नहीं ठहराया जा सकता. अगर मुसलमानों को यह नहीं मालूम कि फेसबुक जैसी चीज स्थानीय नहीं और जिसके खिलाफ वे अपना गुस्सा अपनी ही संपत्ति को बर्बाद करके कर रहे हैं ,हो सकता है वह किसी और मुल्क में या राज्य से चली हो तो उनकी अक्ल पर तरस ही खाया जा सकता है! फिर उनकी मूर्खता क्या इन्साफ करने में किसी की मदद कर रही है?

चौबीस परगना के इस हिस्से की हिंसा पर केंद्र में सत्तारूढ़ और बंगाल को हथियाने को बेचैन भारतीय जनता पार्टी का रवैया निहायत गैर जिम्मेदाराना है अगर आपराधिक न कहा जाए उसे. उसके ऊँचे नेताओं ने बिना किसी आधार के बयान जारी कर दिया कि हिन्दू औरतों के बलात्कार की खबर आ रही है. यही नहीं उन्होंने बिना वहाँ गए यह भी बता दिया कि कितने मुसलमान हिंसा कर रहे थे.यह भी ध्यान देने की बात है कि मुसलमानों की हिंसा की तो उन्होंने बात की लेकिन एक बार भी उस फेसबुक पोस्ट की निंदा नहीं की.वह निश्चय ही हिंसा भड़काने के विचार से डाली गई होगी और उसकी निंदा होनी ही चाहिए. लेकिन भाजपा ने यह नहीं किया.

ममता बनर्जी ने सख्त तरीके से मुसलमानों को भी चेतावनी दी है कि उनकी हिंसक हरकत को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. यह अच्छा है क्योंकि भाजपा उन्हें मुस्लिम परस्त साबित करने पर लगी है.

भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं कि केरल, बंगाल और त्रिपुरा उनके कब्जे में आ जाए. पिछले दिनों उनकी बढ़ती आक्रामकता और वहां की सरकारों को बार बार मुस्लिमपरस्त कहकर बदनाम करने के उनके प्रचार से इस साजिश को समझा जा सकता है.

लेकिन ममता बनर्जी को अपनी लोकप्रियता की परीक्षा देनी होगी. उन्हें मुसलमानों से खुलकर बात करनी होगी. और भारत के हर मुसलमान को भी यह समझना होगा कि उसे किसी भी मुद्दे पर अहिंसक प्रतिरोध के अलावा किसी दूसरे उकसावे से सावधान रहना है. मुद्दे ढेर सारे हैं. सबसे बड़ी बात, हिन्दुस्तान में अभीमुसलमानों का शहरी हक खतरे में है.उसपर विरोध जाहिर करने की जगह अगर एक फेसबुक पोस्ट पर वे गाड़ियां और दुकानें जलाने लगते हैं तो फिर खुदा ही उनकी खैर करे!

यह वक्त भारत के प्रत्येक मुसलमान के अपने शहरीयत के दावे पर जोर देने का है, न कि खुद को दीन का मुहाफिज साबित करने का!न तो इस्लाम को उनकी हिफाजत की ज़रूरत है, न पैगंबर को. उसका वकार पहले से साबित है. लेकिन मुसलमानों को अपनी दुनियावी ज़िंदगी में इज्जत और हक से रहने के लिए ज़रूर जद्दोजहद करने की ज़रूरत है.

 

 

 

 

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One thought on “दावे पर ज़ोर देना है, न कि दीन की हिफ़ाज़त पर (on Bengal violence)

  1. Suresh Kumar says:

    ऐसे मुद्दों की नाजुकता को समझते हुये इसे प्रसार माध्यमों से दूर रखना चाहिए। वजाए मुद्दों के विश्लेषण के हमे इसके समाधान पर ज़ोर देना चाहिए जिससे हिंसक माहौल में तनाव को कम किया जा सके । राजनेता एवं राजनीति के सोच को दरकिनार कर सकारात्मक विचारों का प्रचार प्रसार करना चाहिए । वैसे आपका ये विश्लेषण ज्ञानवर्धक है।

    सुरेश कुमार, वरिष्ठ सचिवालय सहायक, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार।

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