प्रेमचंद का ककहरा (On Premchand-democracy and opposition)

“जर्मनी में नाज़ीदल की अद्भुत विजय के बाद यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में जर्मनी फ़ासिस्ट हो जाएगा और वहाँ नाजी-शासन कम से कम पाँच वर्ष तक सुदृढ़ रहेगा?यदि एक बार नाज़ी शासन को जमकर काम करने का मौका मिला तो वह जर्मन के प्रजातंत्रीय जीवन को, उसकी प्रजातंत्रीय कामना को अपनी सेना और शक्ति के बल पर इस तरह चूस लेगा कि पच्चीस वर्ष तक जर्मनी में नाज़ी दल का कोई विरोधी नहीं रह जाएगा.” Continue reading

प्रोफ़ेसर यशपाल : बच्चे को समझ का चस्का लगाओ

अफ़सोस था तो सिर्फ इसका कि पिछले कुछ महीनों से सोचते रहने के बावजूद प्रोफ़ेसर यशपाल से मिलने नहीं जा सके. इस बार नॉएडा सेक्टर 15A की ओर बढ़ते हुए बार बार यही सोचते रहे. पता था कि वे बीच बीच में हस्पताल आ जा रहे हैं और अक्सर सामने की दुनिया से निकलकर कहीं और खो जाते हैं, फिर भी! Continue reading

MOOCS going global, giving access: miracle or myth?

http://test.policyreview.tv/podcast/967/7865

Going Global 2014
29 Apr 2014
Going Global 2014 saw more than 1,000 delegates, 250 speakers and over 50 exhibitors from across the higher and further education sectors. They met in Miami to examine the impact that internationalisation can have on the global education community. The conference consisted of a series of sessions based around the themes of inclusion, innovation and impact. Catch up with video, podcasts and documents from the event on these pages.
13:30

2.7 MOOCS going global, giving access: miracle or myth?

Prof. Paul O’Prey, Vice-Chancellor, University of Roehampton, UK;
Prof. Apoorvanand Jha, Professor of Hindi, University of Delhi, India;
Prof. Adam Habib,Vice-Chancellor, University of Witwatersrand, South Africa;
Prof. Daphne Koller, CEO and Founder Coursera, USA;
Simon Nelson, CEO Futurelearn, UK.
After 37.20 minutes

शिक्षक, शिक्षण संस्थान और शिक्षा व्यवस्था

गर्मी की छुट्टियाँ आखिरकार ख़त्म हो गईं. इस छुट्टी से वे जलते हैं जो शिक्षक नहीं.उन्हें लगता है कि यह कुछ ज्यादा ही आराम है.उनका कहना है कि वैसे भी शिक्षक बहुत कम काम करते हैं. हफ्ते में दस या बारह  कक्षा उनके हिसाब से मज़ाक है.जैसे वे वैसे ही सरकारें शिक्षकों के सिर्फ दस-बारह कक्षाओं के काम को देखते हुए उनकी तनख्वाह का कोई तर्क समझ नहीं पातीं. वैसे,छुट्टियों के दौरान जब कक्षाएँ बंद हो जाती हैं, अध्यापकों को आराम रहता हो,ऐसा नहीं. परीक्षा समाप्त होने के बाद उत्तर पुस्तिकाओं की जाँच से लेकर नए सत्र के लिए दाखिलों में वे किसी न किसी तरह व्यस्त ही रहते हैं.इसलिए दो महीने का अवकाश एक मिथ है. Continue reading

संघ के उल्लास का विस्फोट है जय श्रीराम का नारा

“जय श्री राम”, इस नारे से नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का स्वागत किया भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने.टेलीविज़न के सामने बैठे पत्रकार को वह रात याद आ गई जब हाथ में हरवेहथियार लिए झुण्ड ने उसकी गाड़ी घेर कर उसे “जय श्रीराम” का नारा लगाने को मजबूर किया.अपने परिवार की जान बचाने को उसने हाथ जोड़कर राम की महिमा का उद्घोष किया था.अपनी वह लाचारी और अपमान वह भूल नहीं सकता. Continue reading

दहशत का भूगोल

आज़ादी के चार साल बाद जब प्रधानमन्त्री नेहरू से पूछा गया कि वे अपनी सरकार के काम काज के बारे में क्या सोचते है ताओ उन्होंने कहा कि 1946-1947 के भयानक हिंदू-मुस्लिम दंगों और मनुष्य जाति के इतिहास की सबसे बड़ी आबादी की हिजरत के बाद लोगों को वापस बसा लेने को वे अपना सबसे बड़ा हासिल मानते हैं. एक हद तक अमन भी कायम कर लिया गया था और यह कोई छोटी बात न थी कि उतनी भीषण घृणा के बीच भी भारत में एक धर्म निरपेक्ष  व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय स्वीकृति बनाई जा सकी थी. गाँधी, नेहरू और पटेल के नेतृत्व की उपलब्धि थी एक राष्ट्रीय विवेक का विकास जो संकीर्ण नारों और उत्तेजनाओं के आगे खामोश नहीं हो गया. नेहरू के लिए यह कितना आसान था  कि वे पकिस्तान से आई जनता की बदले की भावना को सहला कर अपने लिए एक बड़ी जन स्वीकृति प्राप्त कर लें.  1947-1948 में दिल्ली की मस्जिदों को पकिस्तान से घर-बार गवां कर आए सिखों और हिन्दुओं से खाली कराने के लिए  बड़े नैतिक  साहस और धर्मनिरपेक्ष राज्य की दीर्घजीविता के लिए आवश्यक वैचारिक दृढ़ता चाहिये थी. सौभाग्य से उस वक्त तक गाँधी जीवित थे और अन्य नेताओं में इन्हें लेकर हिचकिचाहट न थी.
दिल्ली में कई जगह एक साथ बम धमाकों और उनमें हुई मौतों ने एक बार फिर हमारे राज्य के मूल्यों को झकझोर दिया है. एक पूर्व राष्ट्रपति कड़े कानूनों की मांग कर रहे हैं, उसके पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने भी दहशतगर्दी के खिलाफ असाधारण क़ानून बनने की वकालत की थी. उदार लोकतांत्रिक मूल्यों में  यकीन रखने वाले अखबार लिख रहे हैं कि हम युद्ध के बीच हैं और ऐसी स्थिति में जिन अधिकारों को हम सहज मानते थे अगर उन पर कुछ रोक भी लगे तो हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए.  सबसे बड़े विपक्षी दल की बाछें खिल गई दीखती हैं और वह सत्ता में वापस  आने पर पोटा दुबारा लागू करने का वादा कर रहा है.  कुल मिला कर एक ऐसा माहौल बनता दीख रहा है जो राज्य को असीमित अधिकार देने और उसके पुलिस राज्य में बदलने को स्वाभाविक मानने पर बाध्य करे जिसमें एक विशेष धार्मिक समुदाय के लोगों की गैरकानूनी गिरफ्तारी, उनको यंत्रणा  देना और मुठभेडों   में हत्याएं दहशत से लड़ने के जायज तरीके मान लिए जाएँ.
दिल्ली में धमाके कम तीव्रता वाले थे. मौतें और भी हो सकती थीं. यहाँ सवाल मारे गए लोगों की असली संख्या का नहीं है, इस अहसास का है कि हम भी मारे जा सकते थे. यह ख्याल  दिल्ली के हर किसी के लिए और दिल्ली आने वाले हर  किसी के भीतर हिंसा की एक ऐसी सूरत की कल्पना करने पर मजबूर करता है जिसके निशाने पर बिना किसी वजह के वह भी है. इस बेवजह आक्रमण के विरुद्ध किसी भी तरह की कारवाई के लिए इस प्रकार वह कोई भी सहमति दे सकता है क्योंकि ऐसा करके उसकी सुरक्षा निश्चित की जा रही है. नागरिक अधिकार , आज़ादी आदि  ऐसे माहौल में असुविधाजनक शब्द बन जाते हैं और अप्रासंगिक भी. फिर पूरा शहर  बीसियों बरस से अपनी ज़िन्दगी में शामिल लोगों को उजाड जाते और उन्हें वतन बदर करते हुए मौन स्वीकृति देता है जैसा धमाकों  के बाद जयपुर  में हुआ जहाँ बँगला बोलने वाले मुसलमानों की बस्तियां ज़मीन्दोज़र दी गयीं और शहर की आँख  नम भी न हुई.इनमे रहने वाले वे थे जो कल तक शहर का कचरा बीनते थे, उन्हें रिक्शों पर ढोते थे , जो घरों की सफाई करते थे . शहर ने उन्हें अपनी ज़िन्दगी से निकाल बाहर कर दिया.
प्रतापभानु मेहता ने ठीक ही लिखा है हमारे  रोजमर्रा  के घर-बाजार, कारोबार का भूगोल धीरे धीरे दहशत के भूगोल में तब्दील हो रहा है. यही बात हमारे  मानसिक भूगोल के बारे में कही जा सकती है . वह दहशतगर्दी और  हिंसा के एक राजकीय आख्यान की क्रीडास्थली  बन गई  है. वह उस प्रत्यक्षदर्शी की तरह है जिसके मन में दहशतगर्द की तस्वीर पहले से बनी हुई है. अगर उसके आधार पर आप रेखांकन तैयार करवाएं तो एक ख़ास किस्म के लोगों को पकड़ने में आसानी होगी.ऐसे लोग पकड़े जा रहे हैं,उठाये जा रहे हैं लेकिन हम उनकी और से बोलने को तैयार नहीं हैं.
हम इसीलिये असुविधाजनक सवाल करने को भी तैयार नहीं हैं. यह इत्तफाक ही है कि दिल्ली की ख़बर के बीच अन्दर  के पन्नों  पर एक अखबार ने अयोध्या से एक संमाचार छापा कि भाजपा के  पूर्व सांसद राम विलास  वेदांती ने पुलिस से इस नाम पर जेड  श्रेणी की सुरक्षा मांगी कि उन्हें अल-कायदा और सिमी की ओर से जान से मार देने की धमकियाँ आ रही है. पुलिस ने उनके मोबाइल को टैप करके इन धमकियों को भेजने वालों को जब पकडा तो पाया कि वे कटरा के बजरंग दल के शहर  प्रमुख रमेश त्रिपाठी और वहीं की हिंदू युवा वाहिनी के संयोजक पवन पाण्डेय थे. पता चला कि भाजपा के नेता और बजरंग दल के इन नेताओं ने मिल कर यह षड़यंत्र रचा था. सिमी और अल कायदा की दहशत पैदा  करके एक अशांति और असुरक्षा का माहौल खडा करने की यह कोशिश का परदाफाश  पुलिस  ने  ही किया. इनदोनों का कहना था की वेदांती को तोगडिया की तरह सुरक्षा नहीं मिल रही थी इसलिए उन्होंने यह नाटक किया. बाद में पुलिस ने वेदांती के कहने पर इन दोनों को छोड़ दिया.
सिमी अब एक मिथकीय आवरण है जिसके पीछे दहशत की कोई भी कार्रवाई अंजाम दी जा सकती है. कानपुर में बम बनाते  बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के मारे जाने , उसके पहले नागपुर, नांदेड आदि में धमाकों की तैयारी में बजरंग दल जैसे संगठनों के कार्यकताओं के लगे होने के साफ सबूतों के बाद न तो पुलिस ओर न जनसंचार माध्यम उस बात को आगे बाधने को तैयार है. क्यों? क्यों नहीं भाजपा के नेता वेदांती को गिरफ्तार किया जाता? क्या एक प्रकार की हिंसा की साजिश राष्ट्रीय ओर एक ओर राष्ट्र-विरोधी मान ली गई है?
अगर एक प्रकार की हिंसा को राज्य का मौन संरक्षण मिलता रहेगा तो दूसरी हिंसा की जगह बढ़ती जायेगी. जिस समय दिल्ली में धमाकों में मारे गए लोगों कीचिताएं  जल रही थीं , उसी समय कर्नाटक में गिरिजाघर ओर इसाईओं   के घर जलाए  जा रहे थे ओर वडोदरा में मुसलमानों की बस्ती जलाई जा थी और  उन पर गोली चलायी जा रही थी. दिल्ली के धमाकों के जिम्मेदारों का हमें अपता नहीं, उनकी खोज की जानी है लेकिन उडीसा,, गुजरात, कर्णाटक, उत्तरप्रदेश के दहशतगर्दों को तो हम जानते हैं. क्या हम उनके खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत रखते हैं? यह हिम्मत हमारे भीतर 1947 में थी. क्या हम तब से बहुत दूर निकल आए हैं?
– विलंबित, जनसत्ता सितंबर, 2008