स्थानीय मौत और राष्ट्रीय रवैया

हिंदुस्तान मुसलमानों की कत्लगाह में तब्दील होता जा रहा है. दिल्ली की सीमा पर लगे वल्लभगढ़ के पास चलती ट्रेन में दिन दहाड़े तीन मुस्लिम नौजवानों पर हमला, जिसमें एक की चाकू के वार से मौत हुई, न तो पहला है और न आख़िरी होनेवाला है.ठीक उसी के साथ खबर आई कि झारखंड में चतरा  के पिपरवा में पुलिस ने सलमान एराकी नामक नौजवान को उसके घर के बाहर गोली मार दी. अभी इस खबर को समझने की कोशिश करते कि मालूम हुआ कि पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर में गांववालों ने मवेशी चोरी के शक पर तीन लोगों को मार डाला. इसके पहले राजस्थान के प्रतापगढ़ में सी पी आई एम एल के और स्थानीय तौर पर सक्रिय कार्यकर्ता ज़फर को सरकारी निगरानी दल के लोगों ने मारा जब उन्होंने शौच को जा रही महिलाओं की तस्वीर लेने से उन्हें मना किया. इस पिटाई के बाद उनकी मौत हो गई .

चारों चार तरह की घटनाएं हैं लेकिन इन सबमें जो मारे गए, वे मुसलमान थे, क्या यह महज इत्तफाक है? ईद की खरीददारी कर घर लौट रहे जुनैद को मारने वाले ने उस वक्त नशे में होने का तर्क दिया है और यह कि उसे भीड़ और उसके दोस्त लगातार उकसा रहे थे कि जुनैद और उसके भी गोमांस खोर हैं ,उन्हें मार डालो. जुनैद,शाकिर और हाशिम पर लगातार हमला होता रहा और उन्हें किसी ने बचाने की कोशिश भी न की. मारकर जुनैद को स्टेशन पर फ़ेंक दिया गया. और अब पुलिस कहती है कि मौके पर किसी ने कुछ नहीं देखा.

जुनैद अभी किशोर ही था. पंद्रह बरस का.उसे और उसके भाइयों को पीटते और चाकुओं से मारते वक्त हिंदू मर्द क्या सोच रहे थे और इस कत्ल का तमाशा देखने वाले बाद में किस चैन के साथ अपने घरवालों के साथ निवाला ले सके होंगे और आराम की नींद भी?

ये घटनाएँ अब इस रफ़्तार से हो रही हैं कि मीडिया को थकन होने लगी है और इस पर बात करने वाले भी मुँह फेर लेते हैं: आखिर खबर तो एक ही है, वही पुरानी और घिसी पिटी कि मुसलमान मारे जा रहे हैं. इसमें नया और खास क्या है?

हर बार चूँकि एक या दो मौतें ही होती हैं, सुनने वालों के लिए और शासकों के लिए यह कोई बहुत गंभीर मसला नहीं बनता.और ये भारत के अलग- अलग इलाके में होती हैं इसलिए आप इन्हें स्थानीय ठहरा देते हैं, इनमें कोई राष्ट्रीय रवैया देखने से इनकार करते हैं.एक क़त्ल से दूसरे क़त्ल में इतना फासला होता है कि इनके बीच किसी सूत्र की तलाश करना एक धर्मनिरपेक्ष षड्यंत्र माना जाता है. अधिक से अधिक इसे कुछ बदमाशों की हरकत मानकर मामूली क़ानून व्यवस्था का मसला बना दिया जाता है.

इस सबके बावजूद हम जानते हैं, मारने वाले और चुप रहनेवाले भी कि मुसलमान को मारना इस मुल्क में तिलचट्टे को मारने की तरह ही है. उसे मारना आसान है और न तो पुलिस, न प्रशासक और न राजनेता इसका बुरा मानते हैं.

हर हत्या या मौत के बाद उसका औचित्य तुरत खोज लिया जा सकता है.पिपरवा में मारे गए राजा पर पहले भी आपराधिक मामले थे, इससे उसका अपराधी होना साबित हो जाता है, दिनाजपुर में तो वे मवेशीचोर थे यह पहले ही कह दिया गया है. क्या अपराधी के मारे जाने पर अफ़सोस किया जाना चाहिए?

अपराधी, अगर वह मुसलमान हो, कानूनी प्रकिया के बाहर मारा जा सकता है. यह बात एक राज्य के मुख्यमंत्री ने आपनी जनता से पूछी थी कि भरी सभा में कि क्या जो मुजरिम है, उसे छोड़ दिया जाए? क्या उसे मारना गलत है?सोहराबुद्दीन शेख,उसकी बीवी कौसर बी और तुलसी प्रजापति को पुलिस ने मार डाला था और गुजरात का मुख्यमंत्री जनता से इसका समर्थन मांग रहा था. जब ऐसा किया जा रहा था तो ‘जिसे मुजरिम मानो उसे मार डालो’ के सिद्धांत का प्रचार ही किया जा रहा था. यह भी कि जुर्म भी अदालत के बाहर तय किया जा सकता है.

उस मुख्यमंत्री के देश के सबसे बड़े शासकीय पद पर पहुँचते ही यह सिद्धांत भी देश के क़ानून से ऊपर जनता के मन में स्थापित हुआ. इसी शख्स ने भारत की जनता को बूचड़खाने और गोशाला में चुनाव करने को भी कहा था. हर चीज़ जो बूचड़खाने की किसी भी तरह याद दिलाती हो, नफरत के काबिल है, एक तरह का जुर्म है और उसका इन्साफ करने का हक जनता को है.जनता सर्वप्रमुख है और सरकार उसकी हिफाजत के लिए है, यह सन्देश पिछले तीन सालों से उन सबको दिया गया है जो मुसलमानों पर हमलों में शामिल रहे हैं. वे जन हैं और मुसलमान ‘अतिरिक्त जन’ हैं. जिसने उन्हें एक राज्य में अपनी औकात में रखना सिखा दिया, वह पूरे देश में भी ऐसा ही कर सकता है,यह भी साबित होता जा रहा है.

जो बार बार यह कहकर तसल्ली दिया करते थे खुद को और दूसरों को भी कि यह देश इतनी विविधताओं  से भरा है कि यहाँ एक किस्म की नफरत घर नहीं कर सकती, वे अब देखकर हैरान हैं कि मुस्लिम विरोध कैसे इस देश को एक सूत्र में बाँध रहा है और जाति विभाजित हिंदू समाज के लिए भी किस तरह वह गोंद का काम कर रहा है.

कुछ लोगों का ख्याल है कि मुसलमान ही अपने खिलाफ नफरत के लिए जवाबदेह हैं और उन्हें अपने रहन सहन का तरीका बदलना चाहिए. कुछ का कहना है कि उन्हें खुद सोचना चाहिए कि आखिर हिन्दुओं की तरह की सहिष्णु कौम भी क्यों उनसे उत्तेजित हो जाती है? आखिर सिख भी अल्पसंख्यक हैं और जैन या पारसी भी,उन्हें तो हिंदू कुछ नहीं करते! इस तर्क में बेईमानी और झूठ है. मौक़ा पड़ने पर बल्कि मौक़ा मिकाल कर सिखों को पूरे भारत में जो 1984 में लूटा और मारा गया, वह हिन्दुओं ने किया था! ईसाइयों को उनकी हैसियत बीच बीच में हिंदू ही बताते रहे हैं.

यह तय है कि मुस्लिम विरोध शायद हिन्दुओं के मन से आसानी से न जाए जैसे ढेर सारे पूर्वग्रह नहीं जाते. लेकिन किसी के खिलाफ पूर्वग्रह उसे मार डालने की दलील नहीं. अभी अगर हिन्दुओं को लग रहा है कि वे यह कर सकते हैं तो इसकी वजह सिर्फ एक है: अभी ऐसे लोगों की सरकार की सरपरस्ती का भरोसा उन्हें है जो मुसलमानों को इस मुल्क के लिए गैरज़रूरी मानते हैं.इसका सबूत सिर्फ यह है कि इस मुस्लिम विरोधी नफरत होने के बावजूद इतने वर्षों में उनकी हत्याओं का ऐसा मंजर देखा नहीं गया था. इसलिए अगर ये हत्याएं रोकनी हैं तो इस सरकार को हटाए बिना यह मुमकिन नहीं.

 

 

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