क्या राजनीति सिर्फ जोड़-तोड़ का खेल भर है? (Is politics only about strategies?)

राजनीति क्या सिर्फ रणनीति का खेल है?क्या उससे आदर्श की संभावना पूरी तरह समाप्त हो गई है?क्या अब हम किसी राजनेता या दल की प्रशंसा सिर्फ इसलिए करने को बाध्य हैं कि उसने कुशल या चतुर रणनीति के जरिए अपने विरोधियों को हक्का बक्का छोड़ दिया है?ये प्रश्न भारत के लिए,खासकर,उसकी राजनीति के सन्दर्भ में प्रासंगिक हो उठे हैं. राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक दलों की भूमिका ने  हमें इन पर नए सिरे से इन सवालों पर सोचने को मजबूर किया है. Continue reading

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