गाँधी धीरे धीरे एक अफवाह में बदल गए…(Gandhi is like a rumour)

गाँधी पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है. भले ही इस बार इसका स्रोत वह है जिसका नाम गाँधी से जोड़ने में ही संकोच होता है. होना तो यह चाहिए था कि पिछले साल के अंत में बाहर के देशों के लिए  और इस साल भारत के लिए प्रकाशित अंथोनी परेल की पुस्तक “गाँधियाना” से गाँधी पर नए सिरे से बहस शुरू हो. या उसके कुछ वक्त पहले आई अजय स्कारिया की किताब “ अनकंडीशनल इक्वालिटी: गाँधीज़ रिलिजन ऑफ़ रेजिस्टेंस” से गाँधी के समानता, धर्म, प्रतिरोध जैसे मूल्यों से रिश्ते पर विचार के सूत्र लिए जाएँ, या उसके भी पहले मकरंद परांजपे की पुस्तक “द डेथ एंड आफ्टरलाइफ ऑफ़ गाँधी” से इस पर सोचना शुरू करें हम कि गाँधी की मृत्यु के बाद, जो कि दरअसल उनकी हत्या थी, भारत ने गाँधी को कैसे जीवित रखा.

आखिर परेल ने पूरा जीवन गाँधी को समझने में लगा दिया है और उस पर भी वे जब उनपर कोई नई प्रस्तावना देते हैं तो दावे के साथ नहीं. अजय युवा अध्येता हैं और भारत के ग्रामीण और आदिवासी जीवन को अच्छी तरह उन्होंने देखा है. मकरंद साहित्य के अध्यापक और विद्वान हैं. ये सब गाँधी को देखने के नए कोण पेश करते हैं.

गाँधी ही सौ खण्डों में हैं, अपने लेखों में, भाषणों, प्रार्थना सभा के वक्तव्यों और सबसे ज़्यादा अपनी चिट्ठियों में. यह सब पढ़ने में बहुत समय लगता है. तो क्या तब तक गाँधी पर अपनी राय स्थगित रखी जाए?

किताबों से चर्चा शुरू करने में एक कठिनाई है, उन्हें पढ़ना पड़ता है. और उसमें वक्त लगता है. पढ़ना, अगर कायदे का हो, उस बीच ही पाठक की अनेक पूर्व मान्यताओं पर सवाल उठाता है, अगर उन्हें ध्वस्त न भी करता हो. लिखने और पढ़ने के लिए इस प्रकार एक प्रकार की विनम्रता चाहिए जो बयानबाजी और फिर उसपर बहस में ज़रूरी नहीं.

प्रायः राजनेताओं में विद्वानों जैसा विनय मृगमरीचिका ही है. अक्सर वे किसी भी वस्तु या व्यक्ति समझने से ज्यादा उसका इस्तेमाल करने में रुचि रखते हैं. लेकिन दुर्भाग्य यह कि सार्वजनिक चर्चा विद्वानों से अधिक इन नेताओं के माध्यम से शुरू होती है. इसलिए उसको नज़रअंदाज करने की सुविधा हमारे पास नहीं.

गाँधी के साथ एक दिक्कत भारत में यह है कि उनपर बात करने के लिए किसी तैयारी की ज़रूरत नहीं समझी जाती. मुझसे मेरे एक पुराने कम्युनिस्ट मित्र ने शिकायत की कि तीस जनवरी पर उन्हें बोलने को नहीं बुलाया जाता क्योंकि वे गाँधी की आलोचना करते हैं. मैंने उनसे पूछा कि गाँधी के बारे में उन्होंने अपनी धारणा कैसे बनाई. क्या उन्होंने गाँधी का कुछ भी पढ़ा है? इसका उत्तर नकारात्मक था, लेकिन उससे ज्यादा चिंता की बात यह थी कि उन्हें यह शर्त बेतुकी जान पड़ी. आखिर उन्होंने भूपेश गुप्ता और हीरेन मुख़र्जी को पढ़ रखा था और उनके जरिए वे गाँधी को जितना जानते थे, वह काफी होना चाहिए था. लेकिन हीरेन मुखर्जी तो मार्क्सवादी होने के बावजूद या उसके साथ साथ स्वयं को गाँधी का प्रशंसक कह सकते थे और यही ई.एम.एस.नम्बूदरीपाद के लिए भी सच था. कम्युनिस्टों और गाँधी में एक द्वंद्वात्मक रिश्ता था, कम से कम उनके जीवन तक और उसके बाद भी जब वे कम्युनिस्ट जीवित रहे जिन्होंने या तो कभी गाँधी के साथ काम किया था या उनके वक्त सक्रिय थे. लेकिन एस ए डांगे, हीरेन मुखर्जी या ई एम एस नम्बूदरीपाद ने गाँधी पर सुचिंतित पुस्तकें लिखना आवश्यक समझा. बाद के कम्युनिस्टों के लिए गाँधी को जानना उतना ज़रूरी नहीं रह गया था.

गाँधी धीरे धीरे एक अफवाह में बदल गए. जैसे अफवाहों पर यकीन कर लेने के अलावा चारा नहीं रहता और उन्हें सत्य की तरह प्रचारित करने में भी, उसी तरह गाँधी की छवियाँ भी प्रचारित की गई हैं. और इन सबमें गाँधी का सरलीकरण है.

गाँधी के साथ तीन तरह का व्यवहार हुआ: उनकी हत्या के बाद भारतीय राज्य ने उनका पूरी तरह राजकीयकरण कर दिया. यह गाँधी  जैसे अराजकतावादी के लिए बड़ी विडंबना की बात थी. उनकी हत्या की शर्म से उबरने के लिए प्रायः उसके कारण पर बात करना बंद कर गाँधी को एक अजातशत्रु संत की तरह प्रचारित किया गया. तीसरे, उनके राजनीतिक पक्ष को पूरी तरह से ओझल करके उन्हें एक धार्मिक व्यक्तित्व या संत की प्रतिष्ठा दे दी गई.

गाँधी के साथ हमारा रिश्ता एक प्रकार के संभ्रम का है. आप उनका आदर करने को बाध्य हैं बिना उन्हें समझे. वे आलोचना से परे हैं और उनकी सिर्फ पूजा की जा सकती है. उनके शिष्य और मित्र जवाहरलाल नेहरू ने युवा रिचर्ड एटनबरो को चेतावनी दी थी कि वे अपनी फिल्म में उन्हें देवता की तरह चित्रित न करें.

बड़े लोगों के बारे में यह उक्ति ठीक बैठती है कि पूर्ण हमेशा अंशों के योग से बड़ा होता है. गाँधी के जीवन के अनेक अंश ऐसे हैं जिनपर आलोचनात्मक तरीके से बात की जा सकती है. वर्णाश्रम के प्रति उनका रुख, औरतों की राजनीतिक आंदोलनों में भागीदारी को लेकर अनेक स्थलों पर उनका संकोच,  दक्षिण अफ्रीका में आरम्भ में अफ्रीकियों के प्रति उनका नजरिया, भारत लौटने पर ब्रिटिश सेना के लिए भर्ती की मुहिम चलाने का उनका निर्णय, इन सबपर आलोचना होनी चाहिए. एक मत यह है कि खिलाफ़त की हिमायत करके और भारत में उस आन्दोलन का प्रचार करके उन्होंने ही आगे राजनीति और धर्म के घालमेल के लिए आधार बनाया.

लेकिन जैसा पहले निवेदन किया गया, पूर्ण अंशों के योग से बड़ा होता है. तो गाँधी को सिर्फ इन हिस्सों में ही नहीं समझा जा सकता. गाँधी से एक बार अफ्रीका के लोगों के लिए सन्देश का अनुरोध किया गया. उत्तर में उन्होंने कहा, मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है.

गाँधी की इस उक्ति को अहंकारपूर्ण कहा जा सकता है. लेकिन वे सिर्फ यह कहना चाहते थे कि उनका सम्पूर्ण जीवन प्रयोगों की एक श्रृंखला है. प्रयोग हमेशा सफल नहीं होते. प्रयोग जिस पूर्व धारणा से शुरू किए जाते हैं, वह प्रयोग के कर्म में पूरी तरह निरस्त हो सकती है या बदल जा सकती है. जैसे गाँधी का यह कहने से शुरू करना कि ईश्वर ही सत्य है और अंत में यहाँ पहुँचना कि सत्य ही ईश्वर है. लेकिन प्रयोगकर्ता को यह सुविधा नहीं है कि वह अपनी प्रतिपत्ति पर संदेह करते हुए ही अपना प्रयोग करे. पहले उस उसपर विश्वास करना होता है. भले ही उसका विरोध उस समय की बड़ी से बड़ी प्रतिभा ही क्यों न कर रही हो. भारत लौटने के बाद तिलक और एनी बेसेंट जैसी शख्सियतों के विरोध के बावजूद अंग्रेज़ी सेना में भारतीयों की भर्ती की उनकी जिद को इसी तरह समझा जा सकता है.

गाँधी के गाँधी बनने का बड़ा कारण था अपनी आलोचना को शत्रुता न मानना. आश्चर्य नहीं कि उनके सबसे प्रिय लोगों में रवीन्द्रनाथ टैगोर और नेहरू उनके निःसंकोच आलोचक भी थे. लेकिन आलोचक और निंदक में फर्क है. गाँधी को अपने उत्तर जीवन में प्रायः दूसरे किस्म के लोगों से ही सामना हुआ है.

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s