हत्या को कहना चाहता हूँ हत्या

ओ मेरी धर्षिता माँ
मैं सिर्फ़ खड़ा रहना चाहता हूँ तुम्हारे पास
पूछना नहीं चाहता कौन सा रंग था ध्वजा का जिसे तुम्हारी देह में गाड़ा था
कौन थे वे लोग पूछना नहीं चाहता
क्यों ऐसा लगने लगा है मुझे कि कहीं मैं तो नहीं था वह
यह एक ठंड भरी रात है
और रक्त

चंद्रमा की निर्विकार चाँदनी में मुझे कुछ दिखाई भी तो नहीं देता
तुम्हारे पास पहुँचने को मैं चलते-चलते बहुत थक गया लगता हूँ
मेरे पाँव खून की दलदल में फँस गए हैं और मैं और नीचे ही नीचे धँसता चला
जा रहा हूँ
क्या है यह खून का धुंआँ जो मेरे फेफड़ों में फँस गया है और मुझे खाँसी आ
रही है लगातार
सैकड़ों शताब्दियों से मेरी छाती में जमा खूनी बलगम
थक्कों में गिर रहा है बाहर
आह, मैं साँस लेना चाहता हूँ ,
एक लम्बी और खुली साँस,
क्या यह बहुत कठिन है ईश्वर
मैं तुम्हें पुकारना चाहता हूँ
मैं एक प्रार्थना करना चाहता हूँ
अपने लिए
और मेरे पास देखता हूँ कोई शब्द ही नहीं है
मेर गले में एक अस्पष्ट सी घरघराहट है
लेकिन उसका तो कोई अर्थ नहीं
क्यों मुस्करा रहे हैं मेरी असमर्थता पर पाब्लो नेरुदा
क्यों ब्रेख्त हंस रहे हैं क्यों नाजिम
माय्कोव्स्की क्या कहना चाह रहे हो तुम
पिछली शताब्दी से ढेर सारी आवाजों का एक तूफान मेरे करीब आ रहा है
साइबेरियाई बर्फानी हवा
कराहती हुई घुसती जा रही है मेरे हर रोम छिद्र में
और एक संगीत जो पिस गया है इस तूफ़ान में
मेडल श्टाम क्या गा रहे थे तुम जब तुम्हारी उंगलियाँ गल रही थीं उस महायात्रा में
तुम्हारा वह गान इतना धुंधला क्यों सुनाई दे रहा है मुझे
मैं एक शब्द चाहता हूँ वाल्टर बेंजामिन
सिर्फ़ एक शब्द जो मुझे इस दलदल में सहारा दे
जिसकी ऊष्मा को पहन सकूं अपनी आत्मा पर
मैं धंस रहा हूँ और बचना चाहता हूँ
और मैं एक घुटी हुई चीख सुनता हूँ
सौ साल से जो मेरा पीछा कर रही है
‘लगता है उन्होंने एक बाड़ा डाल दिया है मेरे गिर्द जिसे मैं फांद नहीं पाता
… उन्होंने घेर लिया है मुझे और मैं हिल भी नहीं सकता ‘

ओह, गोर्की , मैं क्यों नहीं था तुम्हारे पास उस क्षण , क्यों नहीं मैंने
हाथ बढाया अपना
मैं मैकबेथ नहीं हूँ , मैं चीखना चाहता हूँ, फिर भी क्यों मेरी
आत्मा पर हैं खून के धब्बे
एक शब्द चाहिए मुझे मेरे खुदा
कोई यकीन नहीं

एक शब्द
निरंग
विशेषणहीन
एक शब्द
जिसे मैं
इस घरघराती छाती पर मल सकूँ
क्या ऐसा शब्द मनुष्य की भाषा से बहिष्कृत कर दिया गया ,
जाने कब से खोज रहा हूँ उसे मेरे मालिक
एक विशेषणहीन शब्द,

मैं 

हत्या को कहना चाहता हूँ हत्या 

जीवन को जीवन

 

Advertisements

नंदीग्राम : यह किसकी लड़ाई है दोस्‍तो ?


बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नंदीग्राम पर कब्जे के लिए शासक दल के हिंसक अभियान पर जो बयान दिया, उसने सन 2002 में गोधरा के बाद गुजरात में भड़के दंगों का औचित्य ठहराने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान की याद दिला दी। ‘उन्हें उन्हीं की जुबान में जवाब दिया गया है’ और ‘हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है’ में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। गुजरात के मुख्यमंत्री पर यह आरोप लगा कि उन्होंने अपने आप को सारे गुजरातियों का नहीं, बल्कि एक संप्रदाय विशेष का मुख्यमंत्री मान लिया है। बंगाल के मुख्यमंत्री से भी यह सवाल किया गया है कि वे सारे बंगाल के मुख्यमंत्री हैं या सिर्फ शासक दल सीपीएम के? Continue reading

गाँधी धीरे धीरे एक अफवाह में बदल गए…(Gandhi is like a rumour)

गाँधी पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है. भले ही इस बार इसका स्रोत वह है जिसका नाम गाँधी से जोड़ने में ही संकोच होता है. होना तो यह चाहिए था कि पिछले साल के अंत में बाहर के देशों के लिए  और इस साल भारत के लिए प्रकाशित अंथोनी परेल की पुस्तक “गाँधियाना” से गाँधी पर नए सिरे से बहस शुरू हो. या उसके कुछ वक्त पहले आई अजय स्कारिया की किताब “ अनकंडीशनल इक्वालिटी: गाँधीज़ रिलिजन ऑफ़ रेजिस्टेंस” से गाँधी के समानता, धर्म, प्रतिरोध जैसे मूल्यों से रिश्ते पर विचार के सूत्र लिए जाएँ, या उसके भी पहले मकरंद परांजपे की पुस्तक “द डेथ एंड आफ्टरलाइफ ऑफ़ गाँधी” से इस पर सोचना शुरू करें हम कि गाँधी की मृत्यु के बाद, जो कि दरअसल उनकी हत्या थी, भारत ने गाँधी को कैसे जीवित रखा. Continue reading