किसान कब किसान है (When is a farmer a farmer?)

कौन है वह जो मंदसौर में मारा गया? सरकारों के कुछ नुमाइंदों का कहना है कि वह किसान हो नहीं सकता क्योंकि उसने शर्ट पैंट पहन रखी थी.इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि जो मारे गए, उनमें से किसी के नाम खेत न था. तो क्या वे किसान थे या नहीं? उन्नीस साल का अभिषेक दिनेश पाटीदार छात्र था और उसके पिता को अभी तक परिवार की साझा अठाईस बीघा की ज़मीन में अपना हिस्सा बाकायदा मिला नहीं है. तो अभिषेक को किसानों के आन्दोलन में जाने का हक था या नहीं या वह उसके योग्य था अथवा नहीं? या, जैसा पिछले तीन बरस से आंदोलनकारी छात्रों को सरकारी उपदेश दिया जाता है,उनका काम है क्लास जाना और सिलेबस पूरा करना,परीक्षा देना.अगर वे दाएँ-बाएँ देखते हैं तो भटके हुए हैं.फिर अगर राज्य,जो कि हम सबका सबसे बड़ा अभिभावक है,दंड देता है तो गलत ही क्या है?

बाईस साल का पूरनचंद अपनी बी एस सी की पढ़ाई जारी नहीं रख सका क्योंकि उसे अपने पिता की मृत्यु के बाद अपने सात बीघा के खेत का ध्यान रखना था,जो अब तक उसके नाम नहीं है. सोयाबीन,लहसुन की फसल में नुकसान से परेशान वह आंदोलन में शामिल हुआ और बीच में पानी पी रहा था कि गोली से मारा गया. तेईस बरस के चैनराम के परिवार के ज़मीन तो थी लेकिन सरकार ने औने पौने मुआवजे में ले ली थी और परिवार का गुजारा मुश्किल था.चैनराम फौज में भर्ती होने की कोशिश कर रहा था. तीस वर्षीय सत्यनारायण दो सौ रुपए रोज़ दिहाड़ी के घर लाता था जो उसके परिवार के छह बीघा खेत की कुल आमदनी से कहीं अधिक था.इन सबसे अधिक उम्र थी साथ बीघा खेत के परिवार के एक सदस्य चौवालीस के कन्हैयालाल की, जिसके बच्चे अभी पढ़ रहे हैं और जिसे गाँववाले बहादुर बताते हैं.उसे गुमान न था कि जुलूस पर गोली चला दी जाएगी.

जुलूस में शामिल सब कहते हैं कि पुलिस ने चेतावनी तो दी थी लेकिन उन्हें लगा कि पहले तो वह पानी  या आँसू गैस छोड़ेगी.सीधे गोली चल जाएगी, यह किसी ने ख्याल न किया था.सरकार ने कहा कि गोली उसकी पुलिस ने नहीं चलाई थी और उसे मालूम नहीं कि कहाँ से गोली चली. अगर इतने बड़े आन्दोलन पर सरकार की नज़र न थी और अगर उसकी पुलिस और सी आर पी ऍफ़ के रहते किसी और ने ऐसी गोलीबारी की कि इतनी मौतें हो गईं तो फिर उस सरकार के बने रहने का औचित्य ही क्या है? दो रोज़ गुज़र जाने के बाद मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री ने माना कि गोली पुलिस ने ही चलाई थी.फिर दो रोज़ तक गोली के स्रोत से अनजान बने रहकर वह किसे झाँसे में रख रही थी?

राज्य और केंद्र सरकारें यह साबित करने पर तुली हैं कि आन्दोलन असली किसान नहीं कर रहे. मध्य प्रदेश ले पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र की सरकार ने कहा है कि वह सिर्फ असली किसानों से बात करेगी.वह असली किसान कहाँ है?

कुछ केन्द्रीय मंत्री कह रहे हैं कि किसानों को भड़काया जा रहा  है आन्दोलन के लिए. विपक्षी दल क्यों इसमें शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं, यह उनका सवाल है.आन्दोलन जनतन्त्र का अभिन्न हिस्सा है,सिर्फ विधान सभा या संसद का चुनाव नहीं.और विपक्ष का काम है सरकार के खिलाफ असंतोष,अगर है,तो उसे संगठित करना और जहाँ वाजिब लगे उसे पैदा करना.

इन सबसे अलग पहले दिए इन संक्षिप्त ब्योरों में भारतीय गाँव में रहनेवाले किसान की असली हालत के बारे में पता लगता है. सरकार चाहे तो तकनीकी तौर पर मारे गए हर किसी के बारे में कह सकती है कि किसी के नाम खेत न था इसलिए कानूनन कोई किसान नहीं. अभी प्रत्येक निहत व्यक्ति के परिवार को एक करोड़ के मुआवजे का ऐलान हुआ है.लेकिन उसे हासिल करने की कानूनी मशक्कत का किस्सा भी शायद कभी कहा जाएगा.इस मुआवजे से यह भी समझ में आता है एक मरा किसान जिंदा किसान से अधिक कीमत का होता है,वह भी तब जब सरकारी गोली से मारा जाए.

अक्सर हम शहरी लोगों के लिए,जो अब सब्जी भी पन्नी में लिपटी,चिकनी खरीदने के आदी हैं जिनपर खेत की मिट्टी का कोई निशान भी न हो,किसान और खेत एक अबूझ पहेली हैं. यही कारण है कि रामायण और महाभारत पर अंग्रेज़ी में किताब लिखनेवाले विवेक देबरॉय किसान पर टैक्स लगाकर राज्य के लिए अधिक आय का उपाय सुझा सकते हैं.भूलते हुए कि भारत में तकरीबन सतासी प्रतिशत किसान ऐसे हैं जिनके पास दो हेक्टेयर या उससे कम ज़मीन है.इससे होनेवाली सालाना आमदनी पचास हजार रुपए से अठासी हजार रुपए तक की है.एक किसान परिवार को पांच से छह हजार रुपए पर,अगर ईश्वर की कृपा रही,गुजारा करना है और नीति निर्धारक इस पर भी आँख गड़ाए बैठे हैं.अगर औसत आय ले लें,जिसमें खेती, मवेशी, खेती से इतर काम से होनेवाली कमाई शामिल है तो महीने में साढ़े छह हजार से भी कम बैठता है. क्या खाएँ, क्या पीएँ क्या ले परदेस जाएँ!

इस किसान को प्रगतिशील बनाने के लिए सरकारों को बड़ी जुगत लगानी पड़ती है,एक पूरा का पूरा चैनल ही खोलना पड़ता है.यह पी साईनाथ पिछले बीस बरस से बता रहे हैं कि किसानों का शत्रु अगर कोई है तो विकास का वह तरीका जिसे हमने रामबाण मान लिया है.इसमें कार के लिए साथ से नौ प्रतिशत के ब्याज पर कर्ज मिल जाएगा लेकिन ट्रैक्टर पर 14% का ब्याज लगेगा और स्वयं सहायता समूहों के जरिए गरीब ग्रामीण औरतों को 36% के ब्याज पर ही कर्जा मिल सकेगा.

किसान का लेन देन कोई बहुत बड़ा नहीं और वह प्रायः नकदी में होता रहा है.पिछले वर्ष बाज़ार से नोट हटा लेने से इस पूरे कारोबार पर क्या कहर टूटा,यह जानने की न तो इच्छा और न फुर्सत ही शहरियों में है.वे शहर में भीड़ बढ़ने की शिकायत करते हैं,यह जानने की कोशिश नहीं करते कि क्यों 2001 से 2011के बीच गाँव से शहर की ओर रुख करने वालों की तादाद क्यों पिछले 90 वर्षों से कहीं ज्यादा हो गई! जो किसान को सीधे विश्व बाज़ार से जोड़ देने का वादा करते हैं वे साईनाथ की इस चेतावनी को नहीं सुनते कि विश्व बाज़ार की उथल पुथल का सीधा शिकार किसान होगा. किसान अब वे फसल उपजा रहे हैं जिसकी स्थानीय स्तर पर खपत नहीं. इस तरकीब से किसान,जो मिट्टी से जुड़ा होता है,अब खेती के इस तरीके के चलते अपने माहौल से ही बेगाना हो चला है.

किसान हर किसी के लिए एक किस्म का सरदर्द है.पूँजीवाद की नज़र, जो सुनने में घिसा पिटा लगता है,लेकिन जो चिर क्षुधित है,अब भूमि और उसके भीतर छिपे खजाने पर है.कारखाने का उत्पादन अब सांस तोड़ रहा है और वित्तीय पूँजी का जादू जब टूटता है तो किसी भी तूफ़ान या सुनामी से ज्यादा बर्बादी होती है लेकिन भीतरमार की तरह.किसान जब अपनी ज़मीन छोड़ने से इनकार करता है तो पिछड़ा हुआ, मूर्ख माना जाता है, जिस विकास का व्याकरण मालूम नहीं. यही तो मार्क्सवादी बुद्धदेव बाबू और उनके साथियों ने सिंगूर और नंदीग्राम के किसानों पर नाराज़ हो कर कहा था.भूमि पर आधारित अर्थव्यवस्था पिछड़ी मानी जाती है लेकिन अब प्रगतिशील पूँजीवाद को सिर्फ और सिर्फ वही भूमि चाहिए.

किसान सिर्फ अपनी ज़मीन से बेदखल नहीं हो रहा, वह अब हमारी चेतना से भी विस्थापित हो रहा है. इसलिए शहर में जब उसकी तरफ से नारे लगते भी हैं तो त्वचा छू कर गुजर जाते हैं,हमारे मन पर चोट नहीं करते.हमें अपने किसान का किस्सा जानना होगा और बयान भी करना होगा.

 

 

 

 

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