इंसानियत शक के दायरे में (Farmers’ killings)

मध्य प्रदेश में किसानों की मौत के बाद जो प्रतिक्रिया आई है सरकार की, वह यह है कि गोली कैसे चली, यही उसे नहीं मालूम नहीं है. दूसरे, यह भी कहा जा रहा है कि जो आंदोलन कर रहे हैं वे किसान नहीं हैं. महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि वे असली किसानों के नेताओं से बात करेंगे.

तो जो लोग आंदोलन कर रहे हैं, जो अपनी फ़सल सड़क पर फेंक रहे हैं, जो लोग दूध और फ़सल बर्बाद कर रहे हैं, आप ये कह रहे हैं कि वे किसान नहीं हैं. यह भी कहा जा रहा है कि वे शर्ट पैंट पहने थे, इसलिए वे किसान नहीं हैं. अगर यह भारतीय संस्कृति वाली सरकार है कि जब तक आप धोती न पहने हों, बिना कुर्ता या बिना चप्पल के न हों, तब तक वह आपको किसान नहीं मानेगी, तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि हम किस तरह के निज़ाम में रह रहे हैं.

सबसे बुरी बात है सरकार का शर्मिंदा न होना. हमने इसके पहले भी आंदोलन देखे हैं. इसके पहले भी गोलियां चली हैं. लेकिन गोलियां चलने पर जब इंसान की मौत होती है, तो सरकार थोड़ी देर के लिए अपना सर झुकाती है. वो कहती है कि एक मजबूरी थी, हमें गोली चलानी पड़ी, लेकिन हमें बुरा लग रहा है.

लेकिन यह पहली सरकार है, चाहे राज्य सरकार हो, केंद्र सरकार हो, केंद्र सरकार के मंत्री हों, शासक दल के प्रवक्ता हों, आप उनके स्वर में थोड़ी सी भी शर्म, दुख, तकलीफ़ नहीं देखेंगे. यह हमारे लिए सबसे ज़्यादा चिंता का विषय है कि हमने कैसे लोगों को अपने देश का नेता चुन लिया है जो किसानों के मारे जाने पर ज़रा भी दुखी नहीं हैं?

बात यह सामने आ रही है कि जो आंदोलन कर रहे थे वे आंदोलनकारी थे ही नहीं. कुछ लोग उनको पापी कहना चाहते हैं, कुछ उपद्रवकारी कहना चाहते हैं. कुछ लोग कह रहे हैं नक़ली किसान थे. यह कहा जा रहा है कि वे शर्ट पैंट कैसे पहने हुए थे. जैसे गांव के लोग शर्ट पैंट पहनते ही नहीं हैं.

दो बातें बहुत साफ हैं, पांच मौतें हुई हैं. बाद में पता चला कि नौ लोगों की मौत हुई है. नौ लोग मारे जाएं, गोली चले और सरकार अगर यह कहे कि हमें नहीं मालूम है कि गोली किसने चलाई, कैसे चली तो इसका मतलब सरकार जैसी कोई चीज़ नहीं है. यह अपने आप में सरकार की स्वीकृति है और ऐसी सरकार को बने रहने का हक़ नहीं है. दूसरा, यह हो सकता है कि सरकार झूठ बोल रही है. यह भी साबित करता है कि सरकार को बने रहने का हक़ नहीं है.

लेकिन इससे भी बड़ी बात है असंवेदनशीलता. पहले तकलीफ ज़ाहिर करनी चाहिए. यह बिल्कुल हो सकता है कि एक आंदोलन हो, जिसमें टकराव हो. लेकिन उस टकराव के बाद अगर मौतें हुई हैं तो मुख्यमंत्री, मंत्री, प्रशासन या केंद्रीय मंत्रियों के बयानों से कोई तकलीफ़ ज़ाहिर नहीं होती है.

मध्य प्रदेश सरकार जिस असंवेदनशीलता और ढिठाई के साथ मौतों से इनकार कर रही है, यह इसके पहले मैंने कभी नहीं देखा. आंदोलनों पर गोलियां लगभग हर सरकार ने चलाई हैं, लेकिन उसके बाद सरकार झुकती है, दो क़दम पीछे हटती है. यहां तो एक बेशर्मी है, ढिठाई है. जो मारे गए हैं, सरकार कह रही है कि वे किसान ही नहीं थे. आंदोलनकारी नक़ली लोग हैं. इससे ज़्यादा बेहिसी मैंने पहले कभी नहीं देखी.

मैंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का बयान पढ़ा जिसमें वे कह रहे हैं कि मैं असली किसानों के नेता से बात करूंगा. यह असली किसानों के नेता कौन हैं और नक़ली किसानों के नेता कौन हैं? इससे बहुत स्पष्ट है कि वे किसानों को बांटकर देखने की कोशिश कर रहे हैं और इस पूरे आंदोलन को नकार देना चाहते हैं.

किसान जब अपनी उपज बर्बाद करता है तो उस दर्द को शहर का कोई भी व्यक्ति नहीं समझ सकता है जिसमें खेत में हाथ नहीं लगाया हो, जिसने पसीना नहीं बहाया हो. यह एक त्रासद समय है कि हम ऐसी हुक़ूमतों के दौर में हैं जिसके पास दिल ही नहीं है. विचारधाराओं और आंदोलनों की बात छोड़ दीजिए.

मैं तो बस इतना कहूंगा कि अगर सरकार के मन में किसानों के प्रति संवेदनशीलता नहीं है तो वह हम समझ सकते हैं, लेकिन समाज के बाक़ी तमाम तबके जो ज़िंदा ही किसानी के सहारे रहते हैं, अनाज, सब्ज़ियां और दूध आदि के सहारे, वे अगर उन्हें उगाने वालों के प्रति ज़रा भी संवेदनशील नहीं हैं, और उनके साथ एकजुटता ज़ाहिर नहीं कर सकते, तो यह बहुत दुखद है.

यह बहुत स्पष्ट है कि चुनाव के समय आप जो घोषणा कर देते हैं वह घोषणा सिर्फ़ लुभाने के लिए है. उसका वास्तविक अर्थ कुछ भी नहीं है. अगर आप उसे वास्तविक मानकर उस पर ज़ोर देने लगते हैं तो सरकार कहती है कि वह तो हमने आपको अपनी ओर खींचने के लिए कहा था. उसे आप वास्तविक क्यों मान रहे हैं. किसानों के साथ लगातार यही हो रहा है.

यह जो भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, इसके पहले यह जनसंघ नाम का राजनीतिक संगठन था. उसे याद करें तो जनसंघ का नारा ही था ‘हर खेत को पानी हर हाथ को काम’. वहां से यहां तक पहुंचे, जहां कह रहे थे कि किसानों को डेढ़ गुना क़ीमत देंगे. सरकार जब उद्योगों और उद्योगपतियों को इतनी भारी भरकम सब्सिडी दे सकती है तो किसानों को सब्सिडी देने में इतनी हिचकिचाहट क्यों है?

ये लोग नारा लगाते हैं जय जवान जय किसान! जबकि हमें पता है कि ज़्यादातर जवान किसान के ही बच्चे हैं. आप सैनिकों के सहारे अपनी देशभक्ति प्रमाणित नहीं करते रह सकते हैं. हमें शहर के लोगों से भी यह कहना है कि आप जो लोग किसानों के लिए आवाज़ नहीं उठा रहे हैं, यह हमारे लिए चिंता का विषय है.

आज अगर हम ज़िंदा हैं वो खेतों के सहारे ज़िंदा हैं. अगर इन खेतों में अपना पसीना, अपना ख़ून और अपना आंसू गिराने वालों के साथ हम थोड़ी देर के लिए खड़े नहीं हो सकते तो हमारी इंसानियत भी शक के दायरे में है. हम सबको मिलकर अपनी इंसानियत को साबित करना है और यह लड़ाई बहुत लंबी चलनी है.

क्योंकि जिस समाज में और जिस क़िस्म के निजाम में हम रह रहे हैं, वहां हज़ारों करोड़ का क़र्ज़ तो माफ़ कर दिया जाएगा, उसे राष्ट्र के विकास के लिए ज़रूरी कहा जाएगा, लेकिन किसान का कुछ हज़ार का क़र्ज़ माफ़ नहीं किया जाएगा. उसके पीछे लठैत भेजे जाएंगे. उसे जेल में डाला जाएगा और जब वह आंदोलन पर उतरेगा तो उसे गोली मार दी जाएगी. फिर यह कहकर उसका अपमान किया जाएगा कि वह हंगामा करने वाला दंगाई था, वह किसान नहीं था.

हमें इन सारी चीज़ों को एक कड़ी में जोड़कर समझने की ज़रूरत है. और इस लड़ाई में लंबे दौर तक साथ चलने की तैयारी करने की ज़रूरत है.

(अपूर्वानंद ने यह भाषण बीते सात जून को दिल्ली के मध्य प्रदेश भवन के सामने मंदसौर में किसानों की हत्या के ख़िलाफ़ हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान दिया था जिसको  वायर हिन्दी ने लेख का शक्ल दिया है .)

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One thought on “इंसानियत शक के दायरे में (Farmers’ killings)

  1. कौशल पाण्डेय says:

    बहुत अच्छा भाषण/लेेख । किसी भी पार्टी की सरकार हो उसे संवेदनशील अवश्य होना चाहिए। तभी वह किसानो, गरीब मजदूरों और हाशिये पर जी रहे लोगों का कुछ भला कर सकती है।

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