संकीर्णता की सांकल

हिंदुओं को आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। अपने भीतर झांकने की, खुद को टटोलने की। यह बात अधिकतर हिंदुओं को अटपटी जान पड़ती है, क्योंकि अपने बारे में उनके खयाल बहुत ऊंचे हैं। लेकिन आज एक शोधार्थी ने, जिन्हें किसी भी कोण से पतित धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं कहा जा सकता, लिखा है कि दूसरे धर्मों पर अंगुली उठाने के पहले हिंदुओं को सोचने की आवश्यकता है कि क्यों उनके बीच जाति-व्यवस्था बनी हुई है। क्यों कोई शंकराचार्य आदि-शंकराचार्य की तरह तूफान नहीं खड़ा कर देता, हिंदू मतावलंबियों को उनके पाखंड के प्रति सचेत क्यों नहीं करता, क्यों नहीं उन्हें फटकार लगाता कि वे अपनी बेटियों को दान करना बंद करें, कि वे भ्रूण में ही उन्हें न मार डालें, कि वे ईश्वर के बनाए मनुष्यों के बीच अन्यायपूर्ण भेदभाव की व्यवस्था का ध्वंस करें।

हैरानी होती है, जब हिंदुओं को कहते सुनते हैं कि मुसलमान पिछड़े हुए हैं और उन्हें आधुनिक बनने की आवश्यकता है। कुछ साल पहले गणेश के चित्रों और प्रतिमाओं को मुसलमान या ईसाई दूध नहीं पिला रहे थे। यह नहीं कहा जा रहा कि मूर्खता सिर्फ हिंदुओं के खाते है, लेकिन वे इससे अछूते नहीं, इतना अहसास तो उन्हें होना ही चाहिए। कुछ का कहना है कि इस प्रकार के विश्वास उतने घातक नहीं, जितना जातिगत भेदभाव है।

शिक्षा संस्थानों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की घोषणा जब की गई, उच्च जाति के हिंदुओं ने कहना शुरू किया कि जाति तो अब खत्म हो रही है, इसकी चर्चा उठाना एक पुराना राग छेड़ना और समाज को बांटना है। उसी समय जब आल इंडिया मेडिकल साइंसेज के हॉस्टल में दलित छात्रों के साथ हिंसक बर्ताव की खबर सुन कर हम वहां गए तो हॉस्टल की दीवारों पर दलित-विरोधी गालियां देख कर हतप्रभ रह गए। संभ्रांत माने जाने वाले, देश के सबसे प्रतिभाशाली हिंदुओं की भाषा में उनके चरित्र की गिरावट की अभिव्यक्ति थी, लेकिन इसे लेकर कोई शर्मिंदगी नहीं थी।

जिस घटना की जांच करने हम गए थे उस पर बात करने के साथ कुछ वरिष्ठ अध्यापक यह समझाने लगे कि संस्थान में जाति का तो नाम ही किसी ने नहीं सुना था, जब तक कि आरक्षण की घोषणा नहीं की गई थी। जांच आगे इसलिए नहीं चल पाई कि जिन दलित छात्रों ने शिकायत की थी वे फिर संपर्क में ही नहीं रहे। कुछ अध्यापकों ने बताया कि उन्हें बुला कर धमकाया गया था कि क्या उन्हें अपना करिअर बर्बाद करना है!

जिन्हें यह गुमान है कि जातिगत भेदभाव पुराने जमाने का किस्सा भर रह गया है, उन्हें नेशनल कौंसिल आॅफ एप्लाइड इकॉनोमिक रिसर्च और यूनिवर्सिटी आॅफ मेरीलैंड के सर्वेक्षण का अध्ययन करना चाहिए, जो देश भर के बयालीस हजार घरों को आधार बना कर किया गया। इससे मालूम होता है आज के विकासातुर भारत में पैंतीस प्रतिशत हिंदू अब भी अस्पृश्यता का पालन करते हैं। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा ब्राह्मणों का है, यानी बावन प्रतिशत। पिछड़ी जाति और अनुसूचित जाति के लोग भी छुआछूत बरतते हैं और जैन या सिख पीछे नहीं हैं। हिंदुओं से होकर यह बीमारी मुसलमानों में भी घुस गई है। लेकिन बीमारी का स्रोत हिंदू धर्म के भीतर है, यह मानने के लिए बहुत प्रतिभा की आवश्यकता नहीं।

इससे दिलचस्प इस पर आने वाली कुछ प्रतिक्रियाएं हैं। वे इस सर्वेक्षण को झुठलाने के लिए खाने-पीने की आदतों, चौके आदि में साफ-सफाई के खयाल, निजी निर्णय आदि के तर्क के सहारे साबित करना चाहती हैं कि सर्वेक्षण पूर्वग्रहग्रस्त है। कुछ इससे तसल्ली कर लेना चाहते हैं कि अन्य धर्मों के लोगों में भी यह पाया जाता है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस भेदभाव भरे देश में इस्लाम के समानता के संदेश के आकर्षण की चर्चा की थी। लेकिन हिंदू धर्म की जाति-व्यवस्था ने इस्लाम का ही नहीं, ईसाइयत का भी भारतीयकरण कर डाला और उनके भीतर के बराबरी के वादे की धार कुंद कर दी। कहा जा सकता है कि यहां इस्लाम और ईसाइयत हिंदू धर्म के हाथों पराजित हुई। लेकिन यह एक ऐसी जीत है, जिसके लिए विजेता को लज्जित होना चाहिए।

हर समाज और धर्म में भेदभाव रहा है, लेकिन उससे लड़ने की इच्छा के बिना वह खत्म नहीं हुआ है। उसके लिए पहले उसको स्वीकार करना पड़ता है। हिंदू समाज की एक बड़ी दिक्कत यह है कि वह इस यथार्थ को स्वीकार ही नहीं करता। सतीश देशपांडे कहते हैं कि ऊंची जाति के लोगों के लिए जाति-श्रेष्ठता इस हद तक स्वाभाविक हो चुकी है कि जाति अब उनके लिए अदृश्य ही रहे तो अच्छा है। इसलिए वे जाति की कोई चर्चा ही नहीं चाहते और ऐसा करने वालों पर ही समाज में कटुता फैलाने का आरोप लगाते हैं।

कांचा इलैया ने हाल में एक लेख में बताया है कि एक केंद्रीय विश्वविद्यालय ने एक ब्राह्मण अध्यापक को अपना कुआं खोदने की इजाजत दी, क्योंकि वे हर किसी के स्पर्श से दूषित म्युनिस्पालिटी के नल का पानी नहीं पी सकते थे। मैसूर से पैंतीस किलोमीटर दूर कुप्पेगाला के स्कूल में, जहां से कर्नाटक के प्रगतिशील, समाजवादी माने जाने वाले मुख्यमंत्री पढ़े हैं, ऊंची जाति के गांव वालों ने उपद्रव कर दिया, क्योंकि बच्चों का दोपहर का खाना दलित के हाथों बन रहा था।

ओड़िशा के एक गांव से भी यह खबर आई कि ब्राह्मण माता-पिताओं ने अपने बच्चों को दलित के हाथ का बनाया खाने से मना किया। ऐसी खबरें हिमाचल प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से भी आती रहती हैं। लेकिन उनमें सनसनी नहीं होती और उनको सुन कर किसी का खून नहीं उबलता। अब तो अधिकारी वर्ग इतना चतुर हो गया है कि वह पहले ही गांव वालों की भावनाओं का खयाल रखते हुए सही जाति के रसोइए का इंतजाम कर लेता है।

कांचा कहते हैं कि जो माता-पिता अपने बच्चों को अस्पृश्यता की शिक्षा दे रहे हैं, उन्हें अपराध का बोध कराना फौरन जरूरी है। वे कहते हैं कि क्या कोई नेता ‘दलित का बनाया ही खाओ’ जैसा आंदोलन चला सकता है?

अगर हिंदू फिर शुतुरमुर्ग की तरह इस तर्क की ढाल के पीछे छिपना चाहते हैं कि यह दूसरे धर्मों में भी है, तो उन्हें इसका उत्तर देना होगा कि उनके धर्मशास्त्र में इसका विधान क्यों है? पहले उन्हें कबूल करना होगा कि इस भेदभाव को उनके शास्त्रों की मान्यता है और उन शास्त्रों से खुद को अलग करना होगा। लेकिन एक दूसरी चतुराई, जो अक्सर हिंदुओं ने की है, वह यह कि वे कहते हैं कि अब वे ग्रंथ उनके लिए प्रासंगिक ही नहीं हैं, इसलिए वे उन्हें अस्वीकार करने या उनसे अलगाव की घोषणा की आवश्यकता ही नहीं समझते।

अगर जाति अब प्रासंगिक नहीं तो ब्राह्मण बनाने का पूरा आयोजन, यज्ञोपवीत आदि क्यों? जब तक इस देश में एक घर में भी ब्राह्मण बनाने की परिपाटी रहेगी, जाति-भेद और हिंसा रहेगी। इस प्रथा को पोलियो की बीमारी की तरह ही समझना होगा, अगर एक बच्चा भी टीकाकरण से रह गया, तो पोलियो की बीमारी पूरे देश को ग्रस सकती है। इस देश का दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक युग में गांधी और पेरियार जैसे दूसरे लोग पैदा न हुए।

हिंदू धर्म को खुद से लड़ने की आवश्यकता है। अपनी असुरक्षा और घृणा से। उसका स्रोत उसके भीतर है, उसकी बनावट में। जब तक वह शत्रु की तलाश बाहर करता रहेगा और उनसे युद्ध करता रहेगा, कमजोर ही बना रहेगा। उसे पूछने की आवश्यकता होगी कि क्यों उसके भीतर धर्म के अर्थ को लेकर ही वैसी बहस नहीं है, जैसी इस्लाम या ईसाई धर्मों में है। क्यों उसके भीतर किसी प्रकार का आधुनिक मुक्तिकारी अध्यात्म नहीं उभरा, जो अन्य धर्मावलंबियों को भी अपनी ओर खींचे? हिंदुओं ने अपने पूर्वजों के धर्म में क्या जोड़ा है, जो उनका पैदा किया है, जो नया है? हिंदू धर्म का राष्ट्रीयकरण करके उसकी सीमा बांधने के अलावा किया क्या है उन्होंने?

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One thought on “संकीर्णता की सांकल

  1. कौशल पाण्डेय says:

    जातिगत भेदभाव , छुआछूत २०-२५ साल पहले की तुलना में आज कमोबेश थोडा कम हुआ है और शहरों मेें अधिक सुधार हुआ है। गांव मे परिस्थिती जरूर शोचनीय बनी हुई है। इसके दो कारण हो सकते है : अशिक्षा और राजनेता।
    अनपढ़ जनता अपनी दकियानूसी सोच से बाहर नही निकल पाती, रूढ़ियों में जकड़ी हुई है और इसी का फ़ायदा राजनेता उठाते हैं और जनता को पंडित, ठाकुर, वैश्य, चमार आदि वोटों मे बाँट देते है। आज की सबसे बडी विडंबना यह भी है कि कुछ पढ़े लिखे विद्वान कहे जाने वाले लोग भी इस मानसिकता से बाहर नही निकल पाए हैं तो केवल ग्रामीण और अनपढ़ जनता का दोष नही है। किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी और संस्कृत विभाग को सवर्ण जातियों का अड्डा माना जाता है जहाँ पर सरनेम, जाति, क्षेत्र देखकर एडमीशन मिलता है़। अभी ४-५ दिन पहले की बात है मैंने अख़बार में पढ़ा कि उर्मिलेश जी ( वरिष्ठ पत्रकार) से हिन्दी के उच्च कोटि के विद्वान नामवर सिंह जी ने एक साक्षात्कार में उनकी जाति के विषय पूछा (आप ठाकुर हैं)। अब अाप ही बताइए जब विद्वान जन जातिगत भेदभाव से बाहर नहीं निकल पा रहें हैं तो और लोगों से क्या उम्मीद करें……।

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