संकीर्णता की सांकल

हिंदुओं को आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। अपने भीतर झांकने की, खुद को टटोलने की। यह बात अधिकतर हिंदुओं को अटपटी जान पड़ती है, क्योंकि अपने बारे में उनके खयाल बहुत ऊंचे हैं। लेकिन आज एक शोधार्थी ने, जिन्हें किसी भी कोण से पतित धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं कहा जा सकता, लिखा है कि दूसरे धर्मों पर अंगुली उठाने के पहले हिंदुओं को सोचने की आवश्यकता है कि क्यों उनके बीच जाति-व्यवस्था बनी हुई है। क्यों कोई शंकराचार्य आदि-शंकराचार्य की तरह तूफान नहीं खड़ा कर देता, हिंदू मतावलंबियों को उनके पाखंड के प्रति सचेत क्यों नहीं करता, क्यों नहीं उन्हें फटकार लगाता कि वे अपनी बेटियों को दान करना बंद करें, कि वे भ्रूण में ही उन्हें न मार डालें, कि वे ईश्वर के बनाए मनुष्यों के बीच अन्यायपूर्ण भेदभाव की व्यवस्था का ध्वंस करें। Continue reading