उर्दू का जश्न … वाह वाह और आह आह!

जनाब बी एम सिंह अमृतसर से हर साल दिल्ली आते हैं। उर्दू के जश्न में शामिल होने। यह जलसा हर साल ही दिल्ली में होता है और भीड़ उमड़ पड़ती है। उर्दू से मुहब्बत का यह स्वाभाविक उभार है, कोई प्रदर्शन नहीं। दिन भर उर्दू प्रेमी जमे रहते हैं और जावेद अख़्तर से लेकर गुलज़ार तक को ललक के साथ सुनते हैं। यह ऐसा मौक़ा भी है कि दुनिया भर से उर्दू के लेखक इकट्ठा हों और भारत के उर्दू प्रेमी उनके साथ का मज़ा ले सकें।उर्दू की ख़ास जगह पाकिस्तान से आनेवाले लेखकों , कलाकारों का ख़ास इंतज़ार रहता है।

 इस साल लेकिन राष्ट्रीय फ़िज़ा बदली हुई है। उर्दू तो ठीक लेकिन पाकिस्तानी उर्दू सीने में फाँस की तरह है। सो, एक भी पाकिस्तानी लेखक, कवि, गायक तीन दिनों में कहीं नज़र न आया।

ख़बर मिली कि किश्वर नाहीद दिखी थीं, लेकिन उनसे उनकी कविता कोई न सुन पाया। मालूम हुआ कि इस बार आयोजकों ने किसी पाकिस्तानी लेखक को दावत ही नहीं दी थी। ऐसा नहीं कि न्योता नहीं दिया था, निमंत्रण भेजा था लेकिन सम्मानित दर्शक और श्रोता की तरह शामिल होने के लिए, अपनी कविता या गद्य पढ़ने को नहीं।

किश्वर से शायद औरतों के बीच कविता सुनाने को कहा गया। उन्होंने कहा कि वे शायर हैं, कोई औरतों की शायर नहीं, मर्दों को उनसे पर्दादारी क्यों! 

आयोजक ने कहा , हमने बड़ी इज़्ज़त से किश्वर बाज़ी को बुलाया है, वे हमारी आपा हैं, लेकिन इस बार जो माहौल है, उसमें हमने पाकिस्तान के दोस्तों को सिर्फ़ श्रोता या दर्शक के रूप में ही बुलाया।

किश्वर दुखी और नाराज़ होकर निकल गईं।

काँख भी छिपी रहे और मुट्ठी भी तनी रहे, यह हिंदी के एक कवि ने कहा, विद्रोह की मुद्रा पर बात करते हुए। विद्रोह जो तानी हुई मुट्ठी के अंदर दबी कायरता को छिपा नहीं पाती।

बेहतर होता कि आयोजक पाकिस्तान से किसी को न बुलाते। तब कम से कम कहा जा सकता था कि हमारा मुल्क ऐसा हो चुका है कि हम अपने पुराने दोस्तों को बुला नहीं सकते। जो हालात जैसे हैं, उनका बयान तो होता! लेकिन पाकिस्तान से लेखकों को सिर्फ़ दर्शकों की तरह बुलाने में असलियत को छिपाने की जुगत ज़्यादा थी। किश्वर से वह बर्दाश्त न हुई।

उर्दू को जश्न की तरह मनाने का नतीजा यही हो सकता था। 

भारत का उर्दू के साथ एक अजीब सा रिश्ता रहा है। यह चाहत की दुनिया है, कोई खो गया सपना, कोई बिसरी सी धुन। उर्दू के मायने हैं वाह, वाह, आफ़रीन, आफ़रीन और बस!  

उर्दू किसकी ज़ुबान रह गई है अब और क्यों!

शायद ही कोई भाषा हो जिसपर इस क़दर हमले किए गए हो और जिसे तक़रीबन मार ही डाला गया हो। आज़ादी के बाद उर्दू को पाकिस्तान के लिए ज़िम्मेदार ठहरा कर उसकी जगह उत्तर प्रदेश के स्कूलों से ही बाहर कर दिया गया। बाक़ी जगह भी स्कूलों से उर्दू निकाल बाहर की गई। उर्दू के साथ हिंदुओं और सिखों ने फ़ैसला करके रिश्ता तोड़ा।इस क़दर वतन बदर कर दी गई ज़ुबान को पनाह दी मुसलमानों ने। हमारे दोस्त शैलेंद्र कहते हैं, हमें शुक्रिया अदा करना चाहिए अपने मुसलमान हमवतनों का कि उन्होंने एक ज़ुबान को बचा लिया।

लेकिन मुसलमान के साथ उर्दू का रिश्ता यों पक्का होने पर वह और गुनहगार हुई। जितनी आसानी से इस मुल्क में  मुसलमानों को निशाना बनाया जा सकता है, उतनी ही आसानी से उर्दू को भी।

क्या आपको याद नहीं कि इसी दिल्ली में एक दीवार पर उर्दू की इबारत दर्ज करने के चलते भीड़ ने कलाकारों पर हमला कर दिया था?

उर्दू का जश्न सुनकर इस वजह से मन में कड़वाहट भर जाती है। ज़रीदार कुर्ते और शलवार,  सुनहरे बटनोंवाली शेरवानियाँ। वाह, वाह और आह, आह! अच्छा हो कि यह सब न हो।

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