मुसलमान औरतों की खुशकिस्मती (Muslim women’s luck)

आज से पचास साल बाद अगर कोई 2017 के भारत के बारे में जानने के लिए उसके अखबार उठाए तो इस नतीजे पर पहुँचेगा कि यहाँ बेरहम और कूढ़मगज मुसलमान मर्द अपनी औरतों को तीन बार तलाक-तलाक-तलाक  कहकर घर से खदेड़े दे रहे थे और उनके दर्द से भारत के प्रधान मंत्री और बाकी मंत्रियों का दिल पारह-पारह हुआ जा रहा था।

मुसलमान औरतों का उनके जुल्मी मर्दों से उद्धार, यही भारत सरकार उसकी शासक पार्टी का मिशन बन गया था। सोते जागते उन्हें एक ही धुन थी: आखिर कौन सा तरीका, कौन सी हिकमत अपनाई जाए कि सड़कों पर मारी मारी फिर रही इन तलाकशुदा बिचारी मुसलमान औरतों को इस हैवतनाक जुल्म से बचाया जा सके।

मुसलमान मर्दों की बेरहमी तो जगजाहिर थी ही। वे दुनिया भर में जब देखो तब बेक़सूर लोगों को बम से उड़ा दिया करते थे, और तो और हमेशा इस फिराक में रहते थे कि जब मौक़ा मिले गाय जैसे बेजुबान जानवर को भी काट डालें। भारतीय संस्कृति में गाय और औरत को एक ही तरह से बेसहारा माना जाता है जिसे मर्द की परस्तिश की दरकार होती है।

मुसलमान मर्दों की इस फितरत को इस सरकार की पार्टी ने पहले से पहचान लिया था। मुसलमान औरतें उनके दोहरे जुल्म का शिकार थीं। उनकी हवस इतनी ज्यादा थी कि उन्होंने एक जिहाद ही चला रखा था जिसे लव जिहाद के नाम से जाना जाता था। इसके तहत वे हिंदू लड़कियों पर डोरे डालते थे और उनका मजहब बदलकर उन्हें खराब कर दिया करते थे। उन्हें चार निकाह की सहूलियत थी। इसका फायदा उठाकर वे मासूम हिंदू लड़कियों को अपनी मुसलमान औरतों की सौत बना कर ले आया करते थे। इस वजह से मुसलमान औरतों का हक मारा जाता था।

मुसलमान औरतों को उनके मर्द और उनका हक़ मुकम्मिल मिल सके, इस वजह से लव जिहाद के खिलाफ धर्म युद्ध चलाना पड़ा। हिंदू लड़कियाँ तो खैर इतनी बेखबर हैं कि उन्हें क्योंकर मालूम हो वे जिन मुसलमान मर्दों पर फिदा हो जाती हैं, उन्हें बाहर के पैसे से जिम जाकर अपनी देह बनाते हैं और उसी पैसे की मोटरसाइकिल पर लड़कियों को घुमाते हैं। ज़्यादा गोश्त खाने,और उसमें भी गोमांस की वजह से उनका मिजाज तामसिक और कामुक हो जाता है। शाकाहार का अभियान  दरअसल उनमें सात्विक प्रवृत्ति पैदा करने के लिए ही चलाया गया।

यह हवस इन मुसलमान मर्दों को पीढ़ी दर पीढ़ी मिलती चली आई है। सौ साल पहले हमारे पुरखों ने भी खबरदार किया था कि मुसलमान मर्द हिंदू औरतों की लूट पर आमादा हैं और हमें उनकी हिफाजत में लग जाना चाहिए। इसी वजह से आज के वजीरे आला की सरपरस्ती में गुजरात में बाबू बजरंगी जैसे समाज सुधारकों ने एड़ी चोटी का पसीना बहाकर गुमराह हिंदू लड़कियों को हजार हजार किलोमीटर दौड़कर बरामद किया। जहाँ इस पुण्य कार्य  के लिए उन्हें परमवीर चक्र या पद्म विभूषण मिलना चाहिए, वहीं एक औरत मुखालिफ निज़ाम और एक नासमझ हिन्दू औरत जज के चलते उन्हें जेल काटनी पड़ी। लेकिन काला पानी तो सावरकर जैसे वीर को भी झेलना पड़ा था। आज खैर, वे बाहर हैं। अब वक्त आ गया है कि उन्हें उनकी इस महान योगदान के लिए पुरस्कार दिया जाए।

यह साजिश और शक्लों में भी चल रही थी। अपने बीच से खूबसूरत और दिलकश मर्दों को ये फिल्मों में भेजा करते थे। पहले तो ये हिंदू नाम रखते थे लेकिन बाद में इनकी हिम्मत इस कदर बढ़ गई कि अपने नाम से फिल्में चलाने लगे। औरतों को लुभाने के लिए ये अपनी शर्ट उतार कर घूमा करते थे। इनके जवाब में एक हिन्दू लाल ह्रितिक रोशन आया लेकिन लोगों की आदत इस कदर बिगड़ चुकी थी कि वे लौट कर फिर खानों पर ही आ गए।

मुसलमान मर्दों की इस फितरत को पहचान कर ही 2002 में गुजरात के वजीर ने मुसलमान मर्दों की हम पाँच हमारे पचीस की साजिश को पहचान लिया था। यह मुसलमान मर्दों की तादाद बढ़ाने की एक मुहिम का कोड वर्ड था जिसे वक्त रहते पकड़ लिया गया। 2002 में गुजरात में हिन्दुओं को साजिशन उकसा कर अपने ऊपर हमले करवाके और अपने घर जलाकर मुसलमान मर्द कैम्पों में अपनी औरतों को जबरन रखे हुए थे और इन्हें बच्चे पैदा करने की फैकट्री की तरह इस्तेमाल करने वाले थे कि इस कोड के मायने समझ आ गए और उन कैम्पों को तोड़ दिया गया।

असल अजाब इन मुसलमान मर्दों से पैदा होता है। मुसलमान औरतों को भी वे बच्चे पैदा करने की मशीन की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यह तो मुसलमान औरतों की खुशनसीबी है कि अब उनके हमदर्द सरकार में आ गए हैं। हालाँकि वे सख्त मिजाज हैं और वक्त-जरूरत इसके सबूत मिलते हैं जैसे 2002 में उन्होंने मुसलमान मर्दों को सबक मिले, इसलिए अपना दिल सख्त कर लिया था। लेकिन बुनियादी तौर पर वे समझाने बुझाने में यकीन रखते हैं। उन्हें इंसानियत पर भी भरोसा है। वे जानते हैं कि यह नहीं हो सकता कि कोई कौम, भले ही वह मुसलमानों जैसी पिछड़ी क्यों न हो, इस खूबी से एकदम खाली हो। इसीलिए वे मुसलमान मर्दों में पढ़े लिखे रौशनख्याल लोगों को आवाज़ दे रहे हैं कि वे खौफ़ से निकलें और उनके काँधे से कांधा मिलाकर मुसलमान औरतों को सदियों से चले आ रहे इस जुल्म से छुटकारा दिलाएँ।

क्या पढ़े लिखे मुसलमान मर्द इतने खुदगर्ज और बेहिस हैं कि वे इस आह्वान का उत्तर न दें और इस महान यज्ञ में आहुति न डालें! आज उनकी इंसानियत के इम्तहान की घड़ी आ गई है!

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