विद्या, वीरता और विनय (Wisdom, velour and modesty)

विद्या से वीरता का क्या सम्बन्ध? क्यों भारतीय संस्कृति में विद्या और वीरता दोनों शब्द एक साथ नहीं आते?  क्यों विद्या का युग्म विनय के साथ ही बनता है? ‘विद्या ददाति विनयम्’ ही शास्त्रकार ने क्यों कहा? संस्कृत की जो उक्तियाँ कहावत की तरह लोक कंठ में बसी हुई हैं, उनमें से एक यह है.

विद्या विनय देती है. अज्ञेय ने अपनी कविता में लिखा कि मंदिर के द्वार पर खड़ा भीतर घंट घड़ियाल बजते और भक्तों के कंठ से होते कीर्तन के शोर-शराबे के बीच मैं पाता हूँ कि मेरा गला रुँधा हुआ है. जितना ही अधिक मैं जानता जाता हूँ, उतना ही हकलाता हूँ. विद्या का संबंध संकोच से है, अपनी सीमा के ज्ञान से है. ज्ञान से सिर्फ यही लाभ होता है कि हमें ज्ञान की अपारता का पता चलता है. ज्ञान अहंकार का शत्रु है. जो ज्ञानी है, वह सबसे पहले यह कहता है कि वह क्या नहीं जानता और किस विषय पर बात नहीं कर सकता.

श्लोक की जिस पंक्ति में विद्या को विनय का स्रोत बताया गया है, उसी के अगले अंश में कहा है कि विनय से पात्रता आती है. पात्रता कई वस्तुओं की हो सकती है. श्लोक में धन की पात्रता अर्जित करने की बात है. लेकिन धन भी क्यों चाहिए? धन से धर्म का पालन किया जा सकता है और उससे सुख का लाभ होता है. लेकिन यहाँ धन भी निजी लाभ के लिए साधन एकत्र करना नहीं है. वह व्यापक विश्व के लिए सुख का इंतजाम करने के लिए ही है.

ऐसा नहीं कि विद्या का संबंध वीरता से एकदम नहीं है. लेकिन वीरता है ही क्या? वीर शब्द कान में पड़ते ही सक्रियता का ध्यान आता है. जान लेने और देने पर आमादा लोग. हो सकता है, आपको आश्चर्य हो लेकिन सरदार पूर्ण सिंह ने अपने निबंध “सच्ची वीरता” में वीर के रूप में पहला नाम कुम्भकर्ण का लिया है, “सच्चे वीर पुरुष धीर, गम्भीर और आज़ाद होते हैं। उनके मन की गम्भीरता और शांति समुद्र की तरह विशाल और गहरी या आकाश की तरह स्थिर और अचल होती है। वे कभी चंचल नहीं होते। रामायण में वाल्मीकि जी ने कुंभकर्ण की गाढ़ी नींद में वीरता का एक चिह्न दिखलाया है। सच है, सच्चे वीरों की नींद आसानी से नहीं खुलती। वे सत्वगुण के क्षीर समुद्र में ऐसे डूबे रहते हैं कि उनको दुनिया की खबर ही नहीं होती। वे संसार के सच्चे परोपकारी होते हैं।“

पूर्ण सिंह का यह निबंध इसका उदाहरण है कि वीरता पर वे कैसे बात करते हैं जिन्हें अपनी संस्कृति का ज्ञान और बोध है. वीरता जितना देह का गुण नहीं उतना मन का गुण है. देखिए पूर्ण सिंह आगे क्या लिखते हैं: “एक बागी ग़ुलाम और एक बादशाह की बातचीत हुई। यह ग़ुलाम क़ैदी दिल से आज़ाद था । बादशाह ने कहा – मैं तुमको अभी जान से मार डालूंगा। तुम क्या कर सकते हो? ग़ुलाम बोला, “हां, मैं फाँसी पर तो चढ़ जाऊँगा, पर तुम्हारा तिरस्कार तब भी कर सकता हूं।” बस इस ग़ुलाम ने दुनिया के बादशाहों के बल की हद दिखला दी। बस इतने ही ज़ोर, इतनी ही शेखी पर ये झूठे राजा शरीर को दुःख देते और मारपीट कर अनजान लोगों को डराते हैं। भोले लोग उनसे डरते रहते हैं। चूँकि सब लोग शरीर को अपने जीवन का केंद्र समझते हैं, इसीलिए जहां किसी ने उनके शरीर पर ज़रा ज़ोर से हाथ लगाया वहीं वे डर के मारे अधमरे हो जाते हैं।“

वीरता देह से अधिक मस्तिष्क में है.

यह दिलचस्प है कि पूर्ण सिंह अपने लेख में वीरों के रूप में कुंभकर्ण के अलावा मंसूर, पैगंबर मुहम्मद, शम्स तबरेज़ और ईसा का नाम लेते हैं, नानक और भगवान शंकर के साथ. जितने उदाहरण वे देते हैं, उन सबमें प्रसंग दूसरे पर आक्रमण का या उसे हानि पहुंचाने का नहीं, खुद को जोखिम में डालने का है. शंकर से एक कापालिक उनका सर माँगता है और वे तो ठहरे औघड़दानी! मौज में आकर सर उतार उसे खुशी खुशी दे देते हैं.

नानक को पकड़ जब बाबर के सिपाही उनके सर बोझा रख उसे ढोने को कहते हैं तो वे चल पड़ते हैं, लेकिन बोझा ढोते हुए भी अपने साथी मर्दाना से कहते हैं, “सारंगी बजाओ!” वह सारंगी बजाता है और नानक गाते हैं.

वीर के स्वर में कटुता नहीं आ सकती. जैसे कटुता नहीं, वैसे ही किसी के प्रति घृणा भी नहीं. उसे उत्तेजित करना असंभवप्राय है. अपना निर्णय वह स्वयं लेता है, किसी के कहने या आदेश से तो कतई नहीं. धीरता और गाम्भीर्य उसके स्वभाव के अंग हैं: वह वीर क्या जो टीन के बर्तन की तरह झट गरम और झट ठंडा हो जाता है। सदियों नीचे आग जलती रहे तो भी शायद ही वीर गरम हो और हज़ारों वर्ष बर्फ उस पर जमी रहे तो भी क्या मजाल जो उसकी वाणी तक ठंडी हो। उसे ख़ुद गर्म और सर्द होने से क्या मतलब ? कारलायल को जो आज की सभ्यता पर गुस्सा आया तो दुनिया में एक नई शक्ति और एक नई जवानी पैदा हुई। कारलायल अंग्रेज़ ज़रूर है, पर उसकी बोली सबसे निराली है। उसके शब्द मानो आग की चिंगारियां है, जो आदमी के दिलों में आग सी जला देते हैं। अब कुछ बदल जाए, मगर कारलायल की गर्मी कभी कम न होगी। यदि हज़ार वर्ष दुनिया में दुखड़े और दर्द रोएं जाएँ तो भी बुद्ध की शांति और दिल की ठंडक एक दर्ज़ा भी इधर-उधर न होगी। यहां आकर भौतिक विज्ञान के नियम रो देते हैं। हज़ारों वर्ष आग जलती रहे तो भी थर्मामीटर जैसा का तैसा.”

पुनः यदि अपने प्राचीन ग्रन्थों का ही स्मरण करें, तो वीर के उदाहरण के रूप में वे नहीं आते, जिनकी हम मंदिर बनाकर आराधना करते हैं, बल्कि वे हैं जो इन आराध्यों के द्वारा मारे गए हैं. महाभारत का कर्ण याद आता है. सूर्य का अंश था उसमें, ज्ञानी था, उसे मालूम था कि विजय आखिरकार पांडवों की होगी लेकिन कुंती के कहने पर भी उसने पक्ष नहीं बदला. जाति का दंड उसे भोगना पड़ा. गुरु ने ज्ञान और जाति के बीच के संबंध के मर्यादा की रक्षा के लिए ही शाप दे दिया, जो सिखाया, जब उसकी आवश्यकता होगी, उसी समय उसे भूल जाओगे. कर्ण को पता था कि जो ब्राह्मण उससे कवच और कुंडल मांग रहा है, वह उसे मृत्यु के लिए अरक्षित कर रहा है.लेकिन कर्ण ने अपने जीवन की जगह अपने मूल धर्म का पालन करना उचित समझा.

क्या यह आश्चर्य नहीं कि कहते हम वीर अर्जुन को हैं, कर्ण को नहीं! अर्जुन की अद्वितीयता के लिए एकलव्य को ही नहीं, अनेकानेक वीरों को रास्ते से छलपूर्वक हटाना पड़ा. कृष्ण जनमानस में एक हद तक लांछित हैं क्योंकि उन्होंने चतुराई को बड़ा गुण बताया. कर्ण हो या दुर्योधन, कवि के ही नहीं, जन के मन में भी एक दुःख है उनके लिए. क्या वह जानता है कि पूजा वस्तुतः वह सफलता की कर रहा है, वीरता की नहीं.

वीरता का संबंध खुद को जानने से है और वह विद्या का क्षेत्र है. वीर का नाम जाप करने से वीरता नहीं आती, उनके चित्र रोज़ आते जाते देखते रहने से भी नहीं. फिर सुनिए, पूर्ण सिंह क्या कहते हैं: “जब कभी हम वीरों का नाम सुनते हैं तब हमारे अंदर भी वीरता की लहरें उठती हैं और वीरता का रंग चढ़ जाता है। परंतु वह चिरस्थाई नहीं होता। इसका कारण सिर्फ़ यही है कि हमारे भीतर का मसाला तो होता नहीं। हम सिर्फ़ खाली महल उसके दिखलाने के लिए बनाना चाहते हैं। टीन के बर्तन का स्वभाव छोड़कर अपने जीवन के केंद्र में निवास करो और सच्चाई की चट्टान पर दृढ़ता से खड़े हो जाओ। अपनी ज़िंदगी किसी और के हवाले करो ताकि ज़िंदगी के बचाने की कोशिशों में कुछ भी वक़्त ज़ाया न हो। इसलिए बाहर की सतह को छोड़कर जीवन के अंदर की तहों में घुस जाओ, तब नए रंग खुलेंगे । द्वेष और भेद दृष्टि छोड़ो, रोना छूट जाएगा। प्रेम और आनंद से काम लो, शांति की वर्षा होने लगेगी और दुखड़े दूर हो जाएंगे। जीवन के तत्त्व का अनुभव करके चुप हो जाओ, धीर और गंभीर हो जाओगे। वीरों की, फ़क़ीरों की, पीरों की यह कूक है — हटो पीछे, अपने अंदर जाओ, अपने आप को देखो, दुनिया और की और हो जाएगी। अपनी आत्मिक उन्नति करो।“

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