नेहरू : घाटियों के फूलों की खुशबू और हिमाच्छादित ऊँचाइयों की पुकार का जवाब

‘भारत वही होगा जो हम हैं. हमारे विचार और कार्य ही उसे आकार देंगे…हम उसके बच्चे हैं, आज के भारत के नन्हें टुकड़े, लेकिन हम कल के भारत के जनक भी हैं. अगर हम बड़े हैं तो भारत भी बड़ा होगा, अगर हम क्षुद्र मस्तिष्क और संकीर्ण नज़रिए वाले हुए तो भारत भी वैसा ही होगा. अतीत में हमारी परेशानियों की वजह यही संकरी निगाह और तुच्छ कार्य रहे, जो भारत की महान सांस्कृतिक विरासत से इतना बेमेल था.’ Continue reading

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Compensation most foul

8 October should be remembered as the date when India crossed yet another rubicon.  Pratap Bhanu Mehta has talked about one while discussing the so called surgical strikes by India. He says that it was not the cross border attack by the Indian army  was unique or which India did for the first time. It was the public act of the ministers of this government intended to humiliate Pakistan which was quite new. Continue reading

Bilkis Bano : An exception and a rule

Bilkis Bano is an exception and a rule. Ruling out capital punishment for the crime committed on her, the court held that the violence perpetrated on her, though inhuman and unacceptable did not fall in the rarest of the rare category. The judges were uncannily right. It was not an exception, or rare, even if looked in the context of the anti- Muslim violence in Gujarat of 2002. It was , however not a momentary rage which engulfed Bilkis. It was  part of a well thought out strategy, as  a team of women activists from different countries like France, Germany, U.K., The Netherlands, Sri Lanka and India found out nearly two years after the Gujarat pogrom of 2002. After a visit to Gujarat and a painstaking research , the group wrote a report titled Threatened Existence- A Feminist Analysis of the Genocide in Gujarat. Continue reading

उर्दू का जश्न … वाह वाह और आह आह!

जनाब बी एम सिंह अमृतसर से हर साल दिल्ली आते हैं। उर्दू के जश्न में शामिल होने। यह जलसा हर साल ही दिल्ली में होता है और भीड़ उमड़ पड़ती है। उर्दू से मुहब्बत का यह स्वाभाविक उभार है, कोई प्रदर्शन नहीं। दिन भर उर्दू प्रेमी जमे रहते हैं और जावेद अख़्तर से लेकर गुलज़ार तक को ललक के साथ सुनते हैं। यह ऐसा मौक़ा भी है कि दुनिया भर से उर्दू के लेखक इकट्ठा हों और भारत के उर्दू प्रेमी उनके साथ का मज़ा ले सकें।उर्दू की ख़ास जगह पाकिस्तान से आनेवाले लेखकों , कलाकारों का ख़ास इंतज़ार रहता है। Continue reading

घृणा और हिंसा की हर वारदात का विरोध ही सभ्यता को ज़िंदा रखेगा (On Paresh Rawal)

“अरुंधती रॉय को सेना की गाड़ी के आगे बाँध देना चाहिए बजाय पत्थर चलाने वालों के.” क्या परेश रावल ने गुस्से में यह वाक्य कह दिया? लेकिन गुस्सा किस चीज़ पर?क्या कल या परसों अरुंधती रॉय ने कुछ कह दिया है जिसे परेश रावल बर्दाश्त न कर सके? Continue reading

महीना मार्क्स का है (Karl Marx)

महीना मार्क्स का है. जन्मदिन कुछ पीछे छूट गया, लेकिन उनके दो सौ साल पूरे होने पर नये सिरे से मार्क्स पर बहस-मुबाहसा शुरू हुआ है. भारत में लेकिन अभी ऐसी ताकतों का बोलबाला है जो मार्क्स-मैकॉले-मुसलमान की एक राष्ट्र विरोधी तिकड़ी की कल्पना करके इन सबको देशनिकाला देने की मुहिम चला रही हैं. यह अभियान जितना “बौद्धिक” है, उतना ही शारीरिक भी. Continue reading