हिंसा-प्रतिहिंसा (Violence- Counter violence)

छत्तीसगढ़ के सुकमा में सी आर पी एफ़ के पचीस नौजवानों की हत्या स्तब्धकारी है. निंदा जैसा शब्द इस हत्याकांड के लिए बहुत हल्का है. इस हत्याकांड की आलोचना या भर्त्सना के लिए यह ज़रूरी नहीं कि साथ ही उन हत्याओं की भी याद दिलाई जाए जो इन इलाकों में सुरक्षा बल के हाथ होती रही हैं और जिनमें कम उम्र की आदिवासी लड़कियाँ और किशोर मारे जाते रहे हैं. उन बलात्कारों की भी नहीं जो इस क्षेत्र की आदिवासी औरतों की रोजाना की आशंका है.

हर हत्या अपने आप में एक अद्वितीय अस्तित्व का विनाश है, इसलिए उसकी निंदा बिना किसी किन्तु परन्तु के की जानी चाहिए. जो पचीस जवान मारे गए, उन्हें सिर्फ राष्ट्र हित में शहीद कहकर कर्तव्य निर्वाह नहीं कर लिया जा सकता. हरेक व्यक्ति संबंधों का एक ताना बाना भी है इसलिए उसके जाने का अर्थ है, उस ताने बाने को छिन्न भिन्न कर देना.

हत्या मात्र की इसी कारण निंदा होनी चाहिए. हत्या करते वक्त अपने निशाने को चेहरा विहीन कर देने पर ही आप उसकी आदमियत को देखने से खुद को बचा लेते हैं. इस हत्याकाण्ड की निंदा के लिए यह कहना भी ज़रूरी नहीं कि मारे गए जवान प्रायः किसान घरों के हैं या निम्न आर्थिक हैसियत के हैं. इसका अर्थ सिर्फ यह है कि हम इसकी छूट दे रहे हैं कि वर्गीय आधार पर भिन्न व्यक्ति की हत्या की जा सकती है. अमीर, सामंत या पूंजीपति की हत्या भी वर्ग सिद्धांत का सहारा ले कर जायज़ नहीं ठहराई जा सकती, नहीं की जानी चाहिए.

हत्या हिंसा का चरम रूप है. हिंसा कई रूप ले सकती है, ज़रूरी नहीं कि वह हमेशा हथियारों के जरिए या शारीरिक क्षति में व्यक्त हो. बिना खून बहाए या चोट पहुँचाए हिंसा कतई संभव है. लेकिन खून बहाना एक दूसरा स्तर है. हत्या की कोई भरपाई नहीं है, उसका हर मुआवजा नाकाफी है. हत्या के बाद वापस जाने की कोई उपाय नहीं. एक अनंत पछतावा रह जाता है. प्रत्येक हत्यारा, वह कितने ही महान और उदात्त उद्देश्य के लिए हत्या कर रहा हो, हर हत्या के बाद अपने व्यक्तित्व को नए सिरे से क्षत होता देखता है. हत्या एक स्तर पर स्वयं उसकी मनुष्यता का लोप है. यह भी कहा ही जाना चाहिए कि प्रत्येक हत्या एक रूप में अपराध है.

हत्या या हिंसा मतभेद निबटाने का या अपनी बात स्थापित करने का तरीका नहीं हो सकता. हत्याओं के बल पर वक्ती दबदबा ज़रूर कायम किया जा सकता है, अपने विपक्षी में भय का संचार किया जा सकता है लेकिन वह कभी भी स्थाई नहीं होता. पूरी दुनिया के, कम से कम पिछली एक सदी के इतिहास से हम जानते हैं कि हिंसा को मुख्य पद्धति बनाकर न्याय का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सका है. फिर भी हिंसा का आकर्षण कम नहीं होता.

पुरानी कहावत है और हर संस्कृति में मौजूद है: हिंसा हिंसा को ही जन्म दे सकती है. उसने कभी शान्ति का रास्ता हमवार किया हो, इसके उदाहरण शायद ही हों. फिर भी, यह विडंबना ही है कि इस बात को बहुत खून बहा कर ही हर पीढ़ी अपने लिए नए सिरे से सीखती है. इतिहास उसका शिक्षक नहीं बन पाता. और यह भी देखा जाता है प्रत्येक हिंसा खुद को प्रतिहिंसा कह कर वैध ठहराने की कोशिश करती है. तर्क यह है कि प्रतिहिंसा का आधार मौजूद है और इसलिए प्राथमिक हिंसा को खत्म करने पर ही प्रतिहिंसा खत्म की जा सकती है.

माओवादी समूहों की हिंसा को प्रतिहिंसा कहा जाता है और इस तरह उसके लिए एक तर्क खोजा जाता है. लेकिन यदि सशस्त्र वर्ग संघर्ष के रास्ते ही राज्य सत्ता हासिल करने का सिद्धांत हो, तो हिंसा का अतर्क इस सिद्धांत में है. भारत और विश्व की ज़्यादातर कम्युनिस्ट पार्टियों ने इस सिद्धांत को कमोबेश छोड़ दिया है. वे प्रायः संसदीय पद्धति को स्वीकार करके जनता को अपने विचार से सहमत करने की कोशिश करती हैं. लेकिन हमेशा ही एक ऐसा राजनीतिक समूह बना रहता है जो हिंसक क्रान्ति के रूमान से निकल नहीं पाता. हिंसक क्रांतियों से बने समाज टिक नहीं पाए और उन्होंने, जैसा वादा था, नई मनुष्यता को जन्म नहीं दिया.

राज्य की हिंसा गलत है और राज्य विरोधी हिंसा उस गलत को ठीक करने का एक तरीका है, यह समझ आम है. प्रायः राज्य की हिंसा को उचित माना जाता है क्योंकि राज्य को एक कुदरती चीज़ की तरह देखने की आदत पड़ चुकी है. वैसे ही जैसे लम्बे समय तक राजा को ईश्वरीय माना जाता था. राज्य कानूनों के जरिए हिंसा के साधनों पर और उसके उपयोग पर एकाधिकार का दावा करता है. लेकिन जब राज्य और जनता के हितों में टकराव हो तब क्या करें?

मेरे कम्युनिस्ट मित्र शैलेंद्र ने कहा कि जिसके कंधे पर बन्दूक हो, एक तरह से हर वह व्यक्ति राज्य है एक निहत्थे के सामने या उसकी अपेक्षा. हिंसा के साधन कभी भी समान रूप से वितरित नहीं किए जा सकते. हिंसा के साधनों पर अधिकार की इस असमानता में ही हिंसा की अस्वीकार्यता का तर्क है.

अक्सर हिंसा को वीरता से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन कोई भी हिंसक कृत्य खुद को किसी भी तरह बचाकर प्रतिपक्षी को अधिकतम क्षति पहुँचाने का ही होता है, इसलिए उसे वीरता कैसे कहा जाए, यह प्रश्न बना रहता है. प्रतिपक्षी को चकमा देना या उसके सबसे नाजुक हिस्से को पहचान कर उसपर वार करना हिंसा में स्वीकार्य है. लेकिन इसी से यह भी स्पष्ट है कि इसमें कोई वीरता नहीं. बीसवीं सदी का सबसे हिंसक कृत्य हिरोशिमा और नागासाकी पर अमरीका का अणु बम का हमला था. ऊपरी तौर पर वह जापान पर हमला था लेकिन इस दोनों शहरों की जनता की किसी भी तरह इन बमों का जवाब नहीं दे सकती थी. इस हमले में कोई वीरता न थी. कायरतापूर्ण इसे ज़रूर कहा जा सकता है.

गृहमंत्री ने सुकमा के हमले को कायरतापूर्ण कहा है. हर हिंसक कार्रवाई, हर हमला कायरतापूर्ण है. वीरता और कायरता के इस द्वैध के कारण ही हमले के बाद जवानों की मौत के बाद यह बताना ज़रूरी हो गया कि जवानों ने भी माओवादियों  का जवाब दिया और उनके लोग मारे. सी आर पी एफ़ के हथियार लूट लिए गए, यह अलग से शर्म की बात मानी जाएगी.

माओवादी समूह यह कहकर उत्तर देंगे कि यह युद्ध है और युद्ध में सब जायज़ है. दिलचस्प यह है कि सरकार भी इसे युद्ध ही कहना चाहती है. इस हिंसक स्थति को युद्ध कह देने पर दोनों पक्षों के लिए हिंसा के जारी रहने को और अलग अलग तरीके की हिंसा को जारी रखने को जायज़ ठहराने का आधार मिल जाता है.

निरंतर सड़क बनाने और निगरानी के उपाय करने की बेचैनी दरअसल इस ‘युद्ध’ में हर इंच ज़मीन पर अपने प्रभुत्व की घोषणा से जुड़ी है. जो भी पक्ष हो या प्रतिपक्ष, वह इस घोषणा को स्वीकार नहीं कर सकता. ऐसी स्थति में हिंसा का यह चक्र भी रुक नहीं सकता. इसकी तीव्रता या निरंतरता में कमीबेशी भले हो.

पहला कदम हिंसा को नामंजूर करने का होगा. यह पहले कौन करेगा, यह बड़ा सवाल है. क्या अपनी ओर से हिंसा की समाप्ति की घोषणा अनिवार्यतः पराजय की घोषणा ही है?

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