पाकिस्तान : हिंसक वृत्ति को धर्म की आड़ (Pakistan : Religion-blasphemy law)

उत्तरी पाकिस्तान के मर्दां शहर की अब्दुल वली खान यूनिवर्सिटी में छात्रों ने अपने एक सहपाठी की पीट पीट कर हत्या कर दी. हमला उन्होंने तीन छात्रों पर किया था, दो ज़ख़्मी हालत में हस्पताल में हैं. पहले अब्दुल्ला नाम के छात्र को घेर कर उसपर हमला शुरू हुआ. पुलिस ने जब किसी तरह उसे बचाया तो अखबारों के मुताबिक़ तकरीबन तीन हजार छात्रों की भीड़ ने हॉस्टल का रुख किया. वार्डन ने गेट बंद किया, लेकिन उसे तोड़ कर मशल नामक तेईस साल के छात्र को निशाना बनाया गया. उसे बुरी तरह मारा गया और फिर गोली मार दी गई. पुलिस परिसर में थी लेकिन भीड़ के आगे उसने खुद को बेबस मान लिया. पैंतालीस लोग गिरफ्तार हैं और तफ्तीश चल रही है.
हमले की वजह? शक था कि मशल और अब्दुल्ला ऐसा फेसबुक पेज चला रहे हैं जिस पर अहमदिया मत का प्रचार किया जाता है और यह उनके मुताबिक़ इस्लाम का अपमान है, ईशनिंदा है. कहा जाता है कि अब्दुल्ला और मशल दोनों ने इंकार किया कि वे अहमदी नहीं हैं, लेकिन उनकी एक न सुनी गई. भीड़ को किसी भी तरह रसूल या इस्लाम की बेहुरमती बर्दाश्त न थी और शिकार उनके सामने थे.
ईश्वर, इस मामले में अल्लाह के प्यारों ने उनके प्रति अपनी वफादारी का इजहार करने के लिए एक शख्स की जान फिर से ली. अल जज़ीरा के मुताबिक़ 1990 से अब तक कोई 69 लोग इस ईशा निंदा के सहक या आरोप की वजह से मारे जा चुके हैं. चाहें तो कह सकते हैं कि करोड़ों के मुल्क में सताईस साल में यह कोई बड़ी संख्या नहीं है. लेकिन ईश निंदा का क़ानून पाकिस्तान के अत्यंत अल्प संख्या में बचे रह गए ईसाइयों, हिन्दुओं, अहमदी मतावलंबियों किसी भी ऐसे व्यक्ति से कोई पुराना हिसाब चुकता करने का जरिया हो सकता है. यह क़ानून इसलिए बाकी कानूनों के मुकाबले खतरनाक और मानवाधिकार विरोधी है कि इसमें सज़ा मौत की है और माफी की कोई गुंजाइश नहीं है.
ईश निंदा का क़ानून अब पाकिस्तान की पवित्र गाय है जिसे छूने की हिमाकत शायद ही कोई करे. गवर्नर सलमान तासीर ने तो सिर्फ यह जुर्रत की थी कि इसकी एक आरोपी ईसाई महिला से अपनी सहानुभूति जाहिर की और इस क़ानून की अतार्किकता की तरफ इशारा भर किया. एक पुलिसवाले, मुमताज कादरी ने उनके इस जुर्म की सजा के लिए अदालत जाना भी ज़रूरी नहीं समझा और उन्हें मार डाला. उसे फाँसी हुई, इसे नोट किया जाना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी कि फाँसी के पहले जेल में वह तकरीबन धर्म गुरु का दर्जा हासिल कर चुका था और लोग उसके हाथ चूमने को बेताब रहते थे. एक सुशिक्षित और सुसंस्कृत तासीर की मैय्यत में उतने लोग न थे जितने फाँसी के बाद कादरी की मैय्यत में. आज लोगों के चंदे से उसके परिवार ने एक बड़ी सी मस्जिद बनवाई है और अभी वह और भव्य होने वाली है. विडंबना तो यह है कि कातिल की उस निशानी पर जा कर लोग रूहानी तसल्ली की खोज करते हैं .
पाकिस्तान में ईश निंदा के क़ानून के सबसे ताज़ा शिकार एक धर्म प्रचारक जुनैद जमशेद हैं. उनपर ईश निंदा का आरोप लगाया गया है. उन्होने सार्वजनिक रूप से सफाई दी है और माफी माँगी है. दिक्कत सिर्फ यह है कि इस क़ानून में माफी की कोई जगह ही नहीं है. इस तरह अब जमशेद की जान भी खतरे में है.
पाकिस्तान के अखबारों में आप इस किस्म की बहस पढ़ सकते हैं कि इश निंदा के लिए इस्लाम में माफी की जगह है. बार बार आधिकारिक धार्मिक विद्वानों को उद्धृत किया जाता है और समझाने की कोशिश की जाती है कि ईश निंदा भले गुनाह हो, उसमें क्षमा का स्थान है. लेकिन कितना ही धार्मिक स्रोतों का हवाला दिया जाए, जनमत पर फर्क नहीं पड़ता दीखता.
तो क्या पाकिस्तान के सारे मुसलमान अतार्किक हो चुके हैं? निश्चय ही ऐसा नहीं है. लेकिन एक बार जब समाज ने कट्टर मूर्खता के आगे असर झुका दिया तो अब उसका सीधा खड़ा होना नामुमकिन दीख रहा है. हिंसक वृत्ति को धर्म की आड़ उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा और वकालत है.
दुनिया के लगभग पच्चीस प्रतिशत देश ऐसे हैं जहाँ इस किस्म के क़ानून, सुप्तावस्था में ही सही, हैं. लेकिन जो खुद को सभ्य कहते हैं उन्होंने धर्म की हिफाजत के लिए कानूनों का सहारा छोड़ दिया है.
अगर धर्म को इंसानी निजाम के कानूनी सहारे से बचाना हो, तो फिर उसका वकार क्या है? मनुष्य की यह हिमाकत ही है कि वह खुद को ईश्वरीय प्रतिष्ठा का संरक्षक माने. लेकिन वह अक्सर यह करता है. इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि इंसानों की बड़ी आबादी को काबू में कैसे रखा जाए. धर्म इसमें सबसे मददगार है.

भारत अब तक इस मर्ज से बहुत कुछ आज़ाद था. लेकिन मुहावरे वाली पवित्र गाय अब क़ानून की तरह भारत के मुसलमानों और दलितों के गले का पत्थर बन गई है. अपने बगल के मुल्क से सबक लेने की जगह हम उसके नक़्शे कदम पर चलना तय कर चुके है.
मशल को जिस तरह मारा गया, वह इखलाक या पहेलू खान की ह्त्या से बहुत फर्क नहीं है. लेकिन यह याद दिलाने पर गोभक्त हिंदू वैसे ही भड़क उठते हैं जैसे पाकिस्तान में रसूल के माननेवाले मजहबी मुसलमान. बाकी में साहस बचा भी नहीं है.
पाकिस्तान खुदकुशी की राह पर आगे बढ़ रहा है. सवाल हिन्दुओं या ईसाइयों से पाकिस्तान की ज़मीन को पाक करने का नहीं अब यह है कि वहां मुसलमान किनके रहमोकरम पर हैं. मुमताज कादरी का मजार पाकिस्तान की इस दयनीय परिणति का एक उदाहरण है. लेकिन अब भारत में ऐसे अनेक जीवित स्मारक सीना ताने घूम रहे हैं, बल्कि हमारी सरकारों में हैं.
मशल मुसलमान था जिसे मुसलमानों ने मारा, पहेलू मुसलमान था जिसे हिन्दुओं ने मारा. वजह एक ही है और वह हिंसक मूर्खता है. अब इसकी सख्त ज़रूरत है कि दक्षिण एशिया के हिंदू, मुसलमान, बौद्ध और अन्य धर्मावलंबी इस पर विचार करें कि उनके समाज इंसानियत के रास्ते पर कैसे मुड़ेंगे. पहले ही देर काफी हो चुकी है, और देर तबाही का न्योता है.

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