भविष्य की कल्पना के पंख

राष्ट्रवाद का नारा फिर से बुलंद किया जा रहा है. यह अलग बात है कि इस बार मीडिया को भी वह बेसुरा मालूम पड़ रहा है. भारतीय जनता पार्टी के पुराने पड़ चुके अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी इस राष्ट्रवाद को ठीक-ठीक परिभाषित करने नागपुर, यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पहुंच गए हैं. इस आशंका के पर्याप्त आधार हैं कि एक बार फिर से भारत नामक विचार को लेकर एक वैचारिक आक्रमण किया जाएगा. विडंबना यह है कितकरीबन छह साल तक  भारतीय जनता पार्टी का शासन भुगत चुकने के बाद भी हमारे किसी राजनीतिक दल में स्वचालित आक्रमण का सामना करने की तैयारी नहीं दिखाई दे रही है.
आज़ादी के पहले और उसके बाद महात्मा गाँधी  हों या जवाहरलाल नेहरु, इन दोनों ने खुद को जनता के शिक्षक के रूप में तैयार किया और वह लगातार उस दायित्व का निर्वाह करते रहे. प्रधानमंत्री नेहरू की प्रांतीय मुख्यमंत्रियों को नियमित रूप से लिखी गई चिट्ठियों को पढ़ें – वे सिर्फ कामकाजी चिट्टियां नहीं है. नेहरु मुख्यमंत्रियों को अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य से परिचित कराते हैं, वैज्ञानिक आविष्कारों और दार्शनिक प्रश्नों तक पर विचार करते हैं. क्या यह काम अभी कोई राजनेता कर रहा है?

आक्तावियो पाज ने नेहरू पर लिखते हुए उनकी इस खासियत की ओर ध्यान दिलाया था. लोकतंत्र भारत के लिए नई अवधारणा थी और लोगों को उसमें शिक्षित करना ही उसके टिकाऊपन और गुणवत्ता की गारंटी कर सकता था.

नेहरू को गुजरे हुए चालीस साल हो चुके हैं. किसी विचार के बनने और नष्ट होने के लिए यह काफी है. इन चालीस सालों ने भारत के विचार को पूरी तरह बनते हुए देखा है. अब इसे लोकतांत्रिक सहिष्णुता माना जाता है कि हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार को सम्मानपूर्वक सुने. मंच पर संघ प्रमुख के साथ देश के संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति भी मौजूद हों.
नेहरू जो चेतावनी अपने भाषणों, लेखों में लगातार देते रहे, दुर्भाग्य से उनके बाद की पीढ़ियों के लिए वह धुंधली होती चली गई. इतनी धुंधली की स्वयं गाँधीदियों और विनोबा के शिष्यों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में संवाद योग्य बहुत कुछ दिखाई देने लगा. सेवाग्राम की बापू कुटी और नागपुर के हेडगेवार भवन की दूरी खत्म होती जान पड़ने लगी. सेवाग्राम में ऐसे भारतवादी निवास करने लगे जो एक साथ बापू के विचार अपनाने और संघ की सेवा करने का दावा करते हैं.
भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में यह दुर्घटना क्यों हुई? इसके ढेर सारे कारण खोजे जा सकते हैं, पर इसकी वजह राजनीति की उदात्तता में एक प्रकार के स्खलन में भी देखी जा सकती है. राजनीति में अपने आपको रोज़-रोज़ की तिकड़मों में शेष कर दिया. राजनीतिज्ञों और दलों ने अपने लक्ष्यों की नैतिक और दार्शनिक आधारभूमि तलाश करने के काम को अपना नहीं माना. ‘रोजमर्रापन’ में उलझी हुई राजनीति के बारे में 1949 में कोलंबिया विश्वविद्यालय में दिए गए एक भाषण में नेहरू ने कहा, ‘इतिहास गढ़ने का दम भरने वाले हम लोग घटनाओं के दासों की तरह रोज-ब-रोज के काम करते हैं. घटनाएं हमारी आंखों के आगे घटती होती चली जाती हैं और हमें भय  जकड़ लेता है और उससे फिर नफरत आती है.’

1949 में नेहरू ने घटनाओं की गुलामी कर रही भयग्रस्त राजनीति से सावधान किया था जो नफरत के अलावा और कुछ पैदा नहीं कर सकती. पिछले चालीस सालों में लोगों में भय और घृणा पैदा करना और असुरक्षित मानसिकता को राष्ट्रीय मानसिकता बनाना ही इस प्रकार की राजनीति का काम बन गया. क्या यह आश्चर्य की बात है कि चालीस वर्षों में एक भी राजनेता ऐसा नहीं दिखलाई पड़ा जिसने राजनीति के अपने उद्देश्य की भी कभी व्याख्या की हो. किसी ने उस भविष्य की कल्पना नहीं की जो लोकतांत्रिक राजनीति का लक्ष्य होगा. राजनेताओं की बौद्धिक और सर्जनात्मकता अक्षमता का कोई संबंध लोकतंत्र के विचार के ह्रास से जरूर है. कल्पनाशीलता और विचारों के नवोन्मेष के अभाव ने संकीर्णता पैदा की और लोकतंत्र के विचार को ही अमूर्त कर दिया. यही वजह है कि अत्यंत आधुनिक विचारों में दीक्षित हमारे मध्यवर्ग को बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद भी अन्य संगठनों की तरह के ऐसे संगठन जान पड़ने लगे जिनके ‘विचारों’ को जगह देना और सम्मानपूर्वक प्रचारित करना उसका ‘लोकतांत्रिक कर्तव्य’ हो गया.
भारत के लिए बीसवीं  सदी अभी तक ख़त्म नहीं हुई. बीसवीं सदी के शुरू में सामाजिक आर्थिक उत्पीड़न के विरुद्ध बराबरी के आदर्श को लेकर लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का जो अभियान शुरू किया गया वह अभी भी अपने लक्ष्य से दूर है. सभ्यता और संस्कृति की जो परिभाषाएं इस बीच प्रचलित और सम्मानित हुई उन्होंने मनुष्य और समाज के बीच  बाड़ेबंदियों को और बढ़ाया. आज संभवत: समय और अवसर है कि वह पीढ़ी जो लगभग उतनी ही  उम्र रखती है जितनी नेहरू की मृत्यु, अपनी किताबों पर पड़ी गर्द झाड़े और जीवन के अपने लक्ष्य की फिर से परिभाषा करें. वह पीढ़ी जो इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर पैदा हुई और बढ़ी, उसे 1949 के नेहरू को सुनना चाहिए: ‘अधिक मुझे घेर ले रहा है, एशिया, यूरोप और अमरीका का अतीत और वर्तमान की तलवार की धार पर पांव टिका कर मैं भविष्य में झांकने की कोशिश करता हूँ. स्वतंत्रता के शिल्प समूह की स्वतंत्रता के रूप में कल्पना नहीं की जा सकती, बल्कि स्वतंत्र राष्ट्रीय समूह में व्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में उसे देखा जाना चाहिए, जिसका व्यापकटार परिप्रेक्ष्य विश्व की स्वतंत्रता का होगा.’
क्या हम अतीत के  अपने बोध का परिष्कार कर सकते हैं जिससे हमारे वर्तमान की चेतना को एक आधार मिल सके और भविष्य की कल्पना को पंख मिल सकें?

  • जनसत्ता, अक्टूबर, 2004
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