नेहरू की छवि

जवाहरलाल नेहरू से एक शिकायत कई लोगों की और कई पीढ़ियों की रही है और वह यह है कि वह उतने सख्त नहीं थे जितना किसी देश के प्रमुख को होना चाहिए. सख्ती को बड़ा चारित्रिक गुण मानने की भूल शताब्दियों से लगभग सारे समाज करते आए हैं और उन्होंने हर बार इसकी सजा भुगती है. नेहरू के मुकाबले दो सख्त छवियां हमेशा पेश की जाती हैं, एक गाँधी की और दूसरी सरदार पटेल की. इंद्रियासक्ति पर विजय प्राप्त करने की गाँधी की कष्टकर तपस्या दुनियावी लोगों की नज़र में उन्हें बहुत ऊपर उठा देती है. पटेल भी निर्ममतापूर्वक निर्णय लेने की क्षमता वाले राजनेता माने जाते रहे हैं. नेहरू की छवि इनकी तुलना में एक कोमल, सौंदर्यवादी की रही है जो प्रकृति और मनुष्य जीवन के उत्सव में खुलकर खेलने से खुद को रोक नहीं पाता. सुंदरता से विरक्ति नेहरू के जीवन का सिद्धांत नहीं था. क्या हिंदुस्तान का सांसारिक मध्यवर्ग नेहरु को इसलिए नापसंद करता है कि वह तपस्वी नहीं हो पाए?
हीरेन मुखर्जी ने नेहरू की मृत्यु के कुछ ही महीनों बाद उन पर एक बहुत ही प्यार भरी किताब लिखी. उसमें उन्होंने लिखा, ‘ नेहरु की मुस्कुराहट, उनके बटनहोल में लगा लाल गुलाब, बच्चे हो या बड़े, सबसे पेश आने का उनका मोहक अंदाज़, प्रकृति की ध्वनियों और नजारों से उनका लगाव, ये उनके मन के सौंदर्यवादी रुझान की गवाही देते थे.’
अमृता शेरगिल को नेहरू ने अपनी ‘ आत्मकथा ‘ भेंट की. बाद में अमृता शेरगिल ने इस मुलाकात को उन्हें लिखे पत्र में याद किया और लिखा कि उन्हें ‘ आत्मकथाएं’ उबाऊ लगती हैं क्योंकि अक्सर उनमें आत्मश्लाघा बहुत होती है. लेकिन उन्होंने कहा कि वह शायद नेहरू की आत्मकथा पढ़ें  क्योंकि, ‘आप कभी-कभी अपने आभामंडल को अलग कर पाते हैं. आप मैं यह कहने की क्षमता है,’ जब मैंने पहली बार समंदर को देखा’ जबकि दूसरे कहेंगे, जब समंदर ने मुझे पहली बार देखा.’  काश कि मैं आपको और अच्छी तरह जान पाती. मैं हमेशा उन लोगों की ओर आकर्षित होती हूँ जो इतने ईमानदार हैं कि बिना विसंगति के उन में अंतर्विरोध हों और जो अपने पीछे अफसोस की बू न छोड़ जाएं. ‘ आगे कलाकार अमृता शेरगिल नेहरू की छवि से उन पर पड़े प्रभाव के बारे में लिखती हैं  ‘आप सख्त नहीं हैं. आपका चेहरा कोमल है. मुझे आपका चेहरा पसंद है, यह संवेदनशील, ऐंद्रिक और साथ ही विरागयुक्त भी.’
अमृता शेरगिल ने नेहरू के चेहरे को परखते हुए एक साथ आवेग और विराग को देखा था. खासी भीड़ भरी जिंदगी जीने वाले नेहरू को अक्सर अकेलापन महसूस होता था. अल्मोड़ा जेल से कमला नेहरू को एक ख़त में उन्होंने लिखा,  ‘अकेलेपन का मेरा अहसास और तीखा हो गया है. यह एकाकीपन आत्मा और मस्तिष्क का है. मुझे मालूम है कि यह मेरा सौभाग्य है कि इतने सारे लोग मुझे चाहते हैं और उनका संग मुझे मिला हुआ है फिर भी उनके और मेरे दरमियान बड़ी खाई है. याद रखो कि सबसे अधिक अकेलापन भीड़ में महसूस होता है, वन में नहीं, ऐसी भीड़ में जो न जानती है और न समझती है. जब लोग एक-दूसरे को समझते हों तो उनके दिलोदिमाग के बीच संवाद होता है. उत्साह और साहस निसंदेह अच्छी चीज़ है, बहुत दूर नहीं मदद करती….. कोई गाँठ सिर्फ उत्साह से नहीं खोली जा सकती….’

एक जगह नेहरू ने नारों से अपनी विरक्ति ज़ाहिर की है. उन्हें शायद इसका अहसास था कि मात्र नारे समझने वाला समूह दो तरह के नारों में फर्क करना भूलने लगता है क्योंकि वहाँ उत्साही प्रमुख होता है, एक तरह का उत्साह भरा शोर जिसके पीछे समझ की कमी ज़ाहिर होती है. नेहरू ऐसे न थे जो एक लीक तय करने के बाद उससे कभी न हटे. अपने विचार की भी लगातार परीक्षा, इसलिए अपने आप पर हमेशा एक संदेश. एक जगह उन्होंने लिखा है,’ हम सब शायद अकेले लोग हैं, कभी-कभी उस पर संदेह करते हुए जो हम बोलते या करते हैं. ‘
मधु लिमये ने नेहरू और गाँधी को लेकर जो किताब लिखी है उसमें नेहरू के एक पहलू पर उनका भी ध्यान गया है कि वे कुछ भी कहकर ‘लेकिन ‘ या ‘फिर भी’ ज़रूर लगा देते हैं. मधु लिमये इसे उनके हाल अनिश्चय का सूचक मानते जान पड़ते हैं – लेकिन अमृता शेरगिल इसी चीज़ को उनकी इमानदारी से जोड़ती हैं.
वीर वे होते हैं जो कुछ सोच लेने के बाद उससे पीछे नहीं हटते. क्रांतिकारियों का गुण भी यही माना जाता है, वे हर चीज़ को एक सकारात्मक छवि में बदल देना चाहते  हैं और जिन्हें दुर्बलता बर्दाश्त नहीं. हीरेन मुखर्जी इसी वजह से यह कहते हैं कि नेहरू का चरित्र अधिकतर क्रांतिकारियों की तरह एक तत्ववादी सांचे में नहीं ढला था, उनमें विभिन्न दर्शनों को ग्रहण करने का रुझान था, वैविध्य के प्रति उनमें सहिष्णुता थी. बहुत सारी चीजों को लेकर निर्णय लेने में उनमें हिचकिचाहट थी. हीरेन मुखर्जी इन सबको भारतीय विशिष्ट ताकत  कहते हैं, ‘क्योंकि क्या हमारे प्राचीन ऋषियों ने परिभाषाएं तलाश करते समय अक्सर यह नहीं कहा, ‘नेति, नेति’
नेहरु की अनिश्चियात्मकता उनके लोकतांत्रिक स्वभाव के कारण ही थी. इलाहाबाद में किसी प्रोफेसर ने उन्हें कहा कि उत्सुक छात्रों के कुछ समूह के साथ, जो कुछ सोचने की कोशिश कर रहे थे, वे उनकी एक बैठक करना चाहते थे. नेहरू ने थोड़े परिहास में उन्हें उत्तर दिया, ‘ज़रूर, लेकिन खुद मेरे भीतर के समूह का क्या?’
ऐसा नहीं कि नेहरू कभी फैसला करते ही नहीं थे और कठोरतापूर्वक निर्णय नहीं ले पाते थे. बंटवारे के आस-पास बिहार में जब सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे और हज़ारों-हज़ार हिंदुओं की भीड़ ने मुसलमानों पर धावा बोला तो पुलिस ने गोली चलाई और सैकड़ों जाने गईं. नेहरू उस समय बिहार में थे. दिन भर के अपने कठिन दौरे से लौटकर आधी रात को पद्मजा नायडू को वह खत लिखते हैं कि यह हैरानी की बात है लेकिन जब उन्हें यह मालूम हुआ कि पुलिस ने सैकड़ों दंगाइयों को मार डाला है तो उन्हें संतोष हुआ. किसी की जान लेना नेहरु के लिए अकल्पनीय निर्णय था लेकिन कुछ ऐसे मत जहाँ इस तरह के फैसले लेने में उन्हें दुविधा नहीं हुई. इस तरह नरसिंह राव के बाबरी मस्जिद ध्वंस के समय के निर्णय से नितांत भिन्न थी.

अगर आप बहनों को, बेटी को, पत्नी को या दोस्तों को लिखे नेहरू के ख़त  देखें तो हर जगह प्रायः  वे सबसे अपने जीवन के लिए एक उदात्त लक्ष्य तय करने का अनुरोध करते दिखाई पड़ते हैं. अक्सर वह क्षुद्रताओं से ऊपर उठने और अपनी जिंदगी को तुच्छ पचड़ों में ज़ाया न करने की अपील करते दिखाई देते हैं. अपनी बहन कृष्णा को जेल से लिखे खत में भी लिखते हैं कि वह अपने जन्मदिन पर जाकर किताबें खरीदे और किताबों की जादुई दुनिया की सैर करें जो हमारे रोजमर्रा की चिताओं से आजाद है और फिर फैंटेसी के किलों की तामीर करें. शायराना अंदाज में नेहरू अपनी बहन को किसी सितारे के पीछे अपना रथ बांधकर लंबी उड़ान पर निकल जाने का मशवरा देते हैं.
पिछले पचीस साल हिंदुस्तान के यौवन की निर्दोषिता खोने के साल रहे हैं. किसी भी असंभव स्वप्न की उदात्त  कल्पना के तारे के पीछे रथ बांध लेना अब नितांत अव्यवहारिक और बचकाना काम मालूम पड़ता है. हमारी पीढ़ी पर भी फैसला किया जाएगा, उसके लिए वक्त है. नेहरु पर फैसला कैसे किया जाएगा? क्या हम उनके इन शब्दों को याद रखेंगे, ‘मेरी पीढ़ी भारत और विश्व में परेशानियों से घिरी रही है… हमने जो गलतियां की हैं उनके बावजूद हमने अपने आपको तुच्छता और कायरता से बचाया है ‘

  • जनसत्ता, नवम्बर, 2004
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