भगत सिंह : तिरछे हैट वाला मुखड़ा

भगत सिंह का शहादत का दिन अभी अभी गुजरा है.तेईस साल के इस नौजवान की ज़िंदगी में आखिर वह क्या बात थी कि मारे जाने के पचासी साल गुजर जाने के बाद भी उसे उसी शिद्दत से याद किया जाता है जो तब थी जब वह लोगों की याद में कुछ अधिक करीब रहा होगा? भगत सिंह को शहीदे आज़म कहा जाता है: शहीदों का सरताज. यह कोई राय बहादुर या सर या भारत रत्न जैसा कोई खिताब नहीं,जो सत्ता देती है, बल्कि जनता के द्वारा प्यार और श्रद्धा से दी गई उपाधि है.

भगत सिंह की अभूतपूर्व लोकप्रियता उनके बाद तत्कालीन नेताओं के लिए भी विचारणीय थी. जवाहरलाल नेहरू ने लिखा:”भगत सिंह … एक प्रतीक में बदल गए, ( हिंसा का) कृत्य भुला दिया गया, प्रतीक शेष रहा, और कुछ ही महीनों में पंजाब और बहुत कुछ बाकी उत्तर भारत के हर शहर और गाँव में उनका नाम गूँजने लगा.उनके इर्द-गिर्द अनेकानेक गीत बन गए और उस शख्स ने जो शोहरत हासिल कि वह हैरतंगेज़ थी,”

भगत सिंह लेकिन एक ख़ास रूप में लोगों के बीच फैल गए थे. गाँधी, नेहरू, सुभाष या अन्य नेताओं को तो वह पहचानती थी लेकिन भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु की फाँसी के पहले उन्हें वह सूरत से जान पाए इसका मौक़ा इस वजह से न था कि वे सब अपने दूसरे क्रांतिकारी साथियों की तरह ही प्रायः गोपनीय, भूमिगत जीवन बिताते थे.

पहले यह देखें कि आखिर भगत सिंह की कौन सी छवि है जिसे भारत ने अपने दिल में बसा रखा है? बिना दाढ़ी का सफाचट चेहरा,मूंछें जो कायदे से तराशी हुई हैं, दोनों कोने हलके ऊपर की ओर उठे हुए जिनसे रुआब नहीं सिर्फ जवानी के तनाव का तकाजा झलकता है,सामने को तकती स्थिर निगाह और सर पर हल्का सा तिरछा हैट. इसी तस्वीर की अनुकृतियों को पीढ़ी दर पीढ़ी भारतीय जनता ने घरों में, चाय और पान की दूकान पर लगाया है. उन्होंने एक कमीज पहन रखी है जिसके बटन ऊपर तक बंद हैं. इसमें कोई लापरवाही नहीं, एक औपचारिक लेकिन इत्मीनान की मुद्रा है.

“अ रिवोल्युशनरी हिस्ट्री ऑफ़ इंटर वार इंडिया:वायलेंस, इमेज, वॉयस एंड टेक्स्ट” नामक अपनी दिलचस्प किताब में कामा मैक्लीन ने इस तस्वीर की कहानी कही है, इसके सफ़र की भी. भगत सिंह सिख थे लेकिन  यहाँ उनके केश नहीं हैं.अपने केश उन्होंने ब्रिटिश पुलिस को झाँसा देने के लिए पहले ही कटा लिए थे. ऐसा नहीं कि उनकी मित्र मंडली में उनके सिख होने को तस्लीम न किया जाता हो, लकिन इस धार्मिक पहचान पर कोई जोर न था. उन्हें सरदार कहकर पुकारा जाता था, लेकिन जैसा उनके समकालीन और दोस्त बताते हैं, यह मजहब से कहीं ज्यादा प्यार और अपनापे के चलते था.

भगत सिंह की इस तस्वीर की अनुकृतियाँ लोगों ने खूब बनाईं और वह फोटोग्राफ न रह कर पेंटिंग और दूसरे रूपों में भी प्रचलित हुई.इस तस्वीर के मकसद और इसके प्रभाव या संदेश को समझने का प्रयास विद्वानों ने किया है.इस तस्वीर ने ब्रिटिश हुकूमत के इस प्रयास को नाकामयाब करने में सफलता पाई कि भगत सिंह और उनके साथी जुनूनी हिंसक युवकों के तौर पर बदनाम हों. कैमरे को सीधी देखती आँखें जैसे ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दे रही हैं और उसके इकबाल के रुआब में आने से इनकार कर रही हैं. लकिन जो चीज़ इस तस्वीर को ख़ास बना देती है,वह है यूरोपीय पोशाक और सर पर रखा हैट का तिरछापन. यह इसे रूमानी रंगत दे देता है.

यह तस्वीर बाकायदा स्टूडियो में खिंचवाई गई थी और एक योजना के तहत. असेम्बली में बम फेंके जाने के बाद गिरफ्तारी तय थी,बल्कि भगत सिंह का यह फैसला था. उसके बाद इस तस्वीर को तेजी से लोगों के बीच फैला देने का मकसद था. इस वजह से बटुकेश्वर दत्त की तस्वीर भी उसी स्टूडियो में खिंचाई गई.

इस तस्वीर से भगत सिंह की उस खासियत का कुछ पता चलता है जो उन्हें बाकी क्रांतिकारियों से लगा कर देती है. भगत सिंह लेखक भी थे और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे सम्पादक के साथ काम भी कर चुके थे. पंजाब केसरी के सम्पादक से उनका लगाव था. लेकिन निरक्षर लोगों की बहुतायतवाले मुल्क में जनता से संवाद कायम करने के लिए अक्षर से कहीं अधिक तस्वीर कारगर हो सकती थी. जिस तरह  गिरफ्तारी के बाद अपने मुकदमे को भगत सिंह ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मुक़दमे में बदल दिया,उसी तरह इन तस्वीरों का इस्तेमाल क्रांतिकारी आन्दोलन की इस छवि का काट करने के लिए किया गया कि वह सिर्फ बम,पिस्तौल और खून खराबा पसंद करने वाले जुनूनी नौजवानों का जमावड़ा है.यह एक संयत,सधी हुई मुद्रा है जिसमें हिंसा का आभास भी नहीं है.आक्रामकता का लेश इसमें नहीं.

हमारे मित्र मनोज कुमार ने दो साल पहले इसी दिन इस ओर ध्यान दिलाया था कि भगत सिंह का मिजाज समझने की आवश्यकता है. उदाहरण उन्होंने नहीं दिया लेकिन जिक्र उनके गद्य का किया. जो भंगिमा भगत सिंह की इस तस्वीर में है वही उनके गद्य की भी है. वह न तो आक्रामक है न भावुकतावादी. उसमें तर्क की दृढ़ता है लेकिन एक निजी स्वर भी है,कोई मिशनरी निर्वैयक्तिकता नहीं.

भगत सिंह के इस स्वभाव का एक नमूना उनका “मैं नास्तिक क्यों हूँ” लेख है.यह एक कठिन विषय पर लिखा गया निबंध है. कतई मुमकिन था कि इसमें वे ईश्वर माननेवालों की अतार्किकता पर हमला करें,अपनी वैज्ञानिक वस्तुपरकता को गौरवान्वित करें.लेकिन वे ऐसा न करके इसमें बातचीत और अपने भीतर की उथल पुथल का जिक्र करते हैं जो नास्तिकता के निर्णय में थी.

क्या ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार वे इसलिए करते हैं कि उनमें अहंकार आ गया है? क्या यह अहंकार एक उच्च ध्येय में लगे क्रांतिकारी दल के सदस्य के रूप में प्रसिद्धि के कारण है? भगत सिंह लिखते हैं कि जब वे कॉलेज में थे, और प्रसिद्ध होने का कोई सवाल न था तभी से वे इस ख़याल के हो गए, इसलिए अहंकार से इसे जोड़ना मुनासिब न होगा.वे अपनी विचार यात्रा का वर्णन आत्मीय शैली में करते हैं.

जीवन के एक निर्णायक मोड़ पर(ज़रा सोचिए,यह जीवन ही कितना लंबा था!), जब क्रांतिकारी दल का अस्तित्व भी असंभव लग रहा था,“ अध्ययन की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी- विरोधियों द्वारा रखे गए तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिए अध्ययन करो.अपने मत के समर्थन में तर्क दने के लिए सक्षम होने के वास्ते पढ़ो.मैंने पढ़ना शुरू कर दिया. इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए. हिंसात्मक तरीकों को अपनाने के रोमांस की जगह,जो हमारे पुराने साथियों में अत्यधिक व्याप्त था,गंभीर विचारों ने ले ली.यथार्थवाद हमारा आधार बना.हिंसा तभी न्यायोचित है जब किसी विकत आवश्यकता में उसका सहारा लिया जाए. अहिंसा सभी जनांदोलनों का अनिवार्य सिद्धांत होना चाहिए.”

अहिंसा की अनिवार्यता और जन आन्दोलन पर जोर ध्यातव्य है.इस नतीजे और नास्तिकता के विचार में एक गहरा रिश्ता है. गांधी से बड़ा अहिंसा का पैरोकार कौन होगा? लेकिन वे नास्तिक न थे.अहिंसा एक तरह से व्यक्ति को निष्कवच बना देती है. सार्वजनिक या व्यक्तिगत प्रसंग में उसके निर्णय की कठिनता का सिर्फ अंदाज किया जा सकता है.

भगत सिंह उस अकेलेपन और निष्कवचता का जिक्र करते हैं जो नास्तिकता से अनिवार्यतः जुड़ी है: “ईश्वर से मनुष्य को अत्यधिक सांत्वना देनेवाला एक आधार मिल सकता है. ‘उसके’ बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर होना पड़ता है…परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार,यदि है,तो भाप बन कर उड़ जाता है.”

आगे भगत सिंह लिखते हैं, “ मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फंदा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख्ता हटेगा,वही पूर्ण विराम होगा, वही अंतिम क्षण होगा. मैं, या संक्षेप में, आध्यात्मिक शब्दावली की व्याख्या के अनुसार, मेरी आत्मा, सब वहीं समाप्त हो जाएगी.”

“एक छोटी सी जूझती हुई ज़िंदगी,जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने आप में पुरस्कार होगी, यदि मुझमें उसे इस दृष्टि से देखने का साहस हो.यहीं सब कुछ है.”

इन शब्दों को पढ़िए और फिर उस तिरछे हैट वाले मुखड़े को देखिए.उस दृष्टि की विनम्रता का साहस महसूस कीजिए.

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