वली दकनी को पढ़ने का हक

बाबरी मस्जिद किस तरकीब से विवादित ढांचे में बदल गई?  नवंबर, 1949 की एक रात अयोध्या की उस मस्जिद में सेंध लगाकर हिंदू देवी-देवताओं की कुछ मूर्तियां रख दी गई और अगली सुबह वह मस्जिद न रहकर एक ‘विवादित ढांचा’ बन गई. नवंबर, 1949 की उस रात से 6 दिसंबर, 1992 की दूरी कितनी है? 45 साल लग गए एक मस्जिद को विवादग्रस्त बना कर फिर उसे मिल कर नष्ट कर देने में. अत्यंत ही निर्दोष भाव से कहा गया कि जो हमने ढाह दिया, वह तो हमारा ही मंदिर था; जीर्ण-शीर्ण था, पुनरुद्धार के लिए उसे हमने गिरा दिया. इस से दूसरों को क्यों परेशानी है? भारतीय सार्वजनिक विमर्श में उस मस्जिद के पुनर्निर्माण की बात करना विसंवादी स्वर छेड़ने जैसा अप्रिय प्रतीत होता है और ऐसा कहने वाले को समाज की शांति भंग करने वाला झगड़ालू करार दिया जाता है.
अयोध्या और अमदाबाद में क्या समानता है? 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद का सामूहिक ध्वंस करने के पहले उसे विवादास्पद बनाने की जो पैंतालीस साल की कवायद अयोध्या में की गई, वैसी कवायद 28 फरवरी, 2002 को वली गुजराती के मजार को नेस्तनाबूद करने के लिए जरूरी नहीं मानी गई. फरवरी, 2002 से शुरु हुई कत्लेआम की कई रिपोर्टों में से एक कहती है:’ अहमदाबाद के शाही बाग में मशहूर उर्दू शायर वली गुजराती की दरगाह को मिट्टी में मिला दिया गया. उसके  फौरन बाद हालांकि उसके मलबे पर एक हनुमान मंदिर खड़ा किया गया, लेकिन बाद में रातोंरात उसे हटा दिया गया और उस जगह को कोलतार से बुलडोजर के सहारे बराबर कर सड़क से मिला दिया गया.’
गुजरात के 2002 के हौलनाक वाकयों  का जायजा लेने एडिटर्स गिल्ड का जो दल वहां गया उसने मई, 2002 में अपनी रिपोर्ट जारी की. उसमें ‘सेकुलर मीडिया’ की भूमिका की गुजरात में की गई आलोचना पर एक खंड है.’टाइम्स ऑफ इंडिया’ को लिखे एक खत में कहा गया: ‘दस मार्च हिंदी टाइम्स के पहले पृष्ठ पर ध्वस्त दरगाह…’ की रिपोर्ट को देखें. यही शीर्षक हिंदुओं के विरुद्ध पूर्वाग्रह से ग्रस्त है. शीर्षक के नीचे रिपोर्ट में बताया गया है कि हनुमान मंदिर भी ध्वस्त कर दिया गया था. इसीलिए ज्यादा सही यह था कि शीर्षक ‘ध्वस्त दरगाह और हनुमान मंदिर..’ बनाया जाता.
फरवरी, 2002 के बाद जो भी अमदाबाद गया उसे वली दकनी गुजराती के मजार का कोई भी निशान नहीं मिला. जून, 2002 में जब हम शाहीबाग की सड़क से गुजर रहे थे, हमारे गुजराती दोस्त ने एक जगह इशारा किया – यहां वह मजार था. हमें अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ. वहां तो कुछ भी न था. कोलतार की सड़क, जो जाने कहां से आ रही थी और जाने क्यों कहां को जा रही थी. अगर आंख गड़ा कर देखें तो आपको यह दिखाई देता कि सड़क के एक हिस्से का रंग दूसरे से अलग है. वह  ताजा कोलतार और कंक्रीट का रंग  था. आज जबकि 2002 के बाद तीसरी फरवरी गुजरने को है, मुझे पक्का यकीन है हजारों-हजारों टायरों और जूते चप्पलों से उस वक्त के कोलतार की कह गहरी रंगत धुंधला  गई होगी और यह कहने का कोई आधार नहीं बचा होगा कि नहीं, यह एक प्यारे से शायर की खिली हुई नन्हीं यादगार है जिसे हम रोज-रोज मांग रहे हैं.
या, शायद सिर्फ यह कहना सही नहीं है कि यह एक शायर का मजार था जो धूल में मिला दिया गया और फिर जिस की याद पर कोलतार पोत डाला गया. अधिक सही बात यह है कि यह वली दकनी नाम के मुसलमान शायर का मजार था. अगर गद्य चीजों को उनके सही नाम से पुकारने की कला है तो हमें उस कला को सीखना शुरू करना चाहिए. मैं इस बात पर जोर दे रहा हूं कि वली एक मुसलमान शायर का नाम है? क्योंकि मजार को इसलिए नष्ट किया गया कि वह एक मुसलमान नाम से जुड़ा था, इसलिए नहीं कि वह एक शायर का था.

वली  का मजार हो या उस्ताद फैयाज की दरगाह, उन्हें नष्ट करने की वजह अगर हम याद नहीं रखेंगे तो परिमार्जन भी संभव नहीं होगा. वली को लेकर हमें याद है, पूरे मुल्क में बहुत मातम हुआ. हमने  अपनी अलमारियों के पीछे से वली की शायरी के जिल्दें निकाली और उनका काफी कुछ फिर से छापकर पढ़ा , बांटा और मिलकर रोए. जो हम तीन  साल गुजारने पर भी न कर पाए और मुझे शक है कि ऐसा करने का नैतिक साहस हमारे भीतर है कि हम उस छोटे से मजार को फिर से उसी जगह खड़ा कर सकें.
जून, 2002 में जब यह प्रस्ताव अमदाबाद की गुजराती साहित्य परिषद के सभागार में गुजराती के प्रतिष्ठित लेखकों के समक्ष रखा गया तो मानो  तूफान आ गया. एक अत्यंत प्रतिष्ठित लेखक ने उत्तर दिया कि वह मजार सड़क के बीच में था इसीलिए उसे फिर से वहां बनाने का इरादा ठीक नहीं, उससे ट्रैफिक बाधित होगा. दूसरे ने मजार को फिर बनाने के प्रस्ताव को शरारत भरा आरोप उकसावा माना क्योंकि उनके मुताबिक ऐसा करने से हिंदू भड़क सकते हैं और जो शांति मुश्किल से बहाल हुई है, वह  खतरे में पड़ जाएगी. एक बुजुर्ग ने सदाशयता  के मारे यह कहा कि शायर तो अपनी शायरी में जिंदा रहता है, उसका स्मारक वही है, इसीलिए बजाय वली दकनी के मजार को फिर बनाने के, हमें उनकी शायरी का दूर-दूर तक प्रचार करना चाहिए. उनके अनुसार हम लेखकों को रचनात्मक तरीके अपनाने चाहिए.
जिसे उस दिन रचनात्मक कार्यवाही कहा जा रहा था, क्या वह दरअसल सुरक्षित कार्यवाही नहीं? वली की शायरी का प्रचार करके क्या हम अपराध को ढकने की कोशिश नहीं कर रहे. बाबरी मस्जिद गिरा दिए जाने के बाद क्या बार-बार मुसलमानों को  यह नहीं कहा गया कि किसी विवादग्रस्त जगह पर इबादत जैसा पवित्र काम कैसे किया जा सकता है. क्या यह अतिरंजना पूर्ण प्रश्न है कि क्या एक  दिन ऐसा नहीं आएगा जब इबादतगाहें गिरा दी जाए और सब को कहा जाए कि ईश्वर या अल्लाह तो दिल में है, उसके लिए किसी भौतिक परिसर की क्या जरूरत है.
अडोर्नो ने  यह मशहूर निराशा व्यक्त की थी: आश्वित्ज़ के  बाद कविता संभव नहीं. वली दकनी के मजार के ध्वंस के बाद उनकी शायरी का प्रचार हमारे सामाजिक चरित्र की बुनियादी कायरता को छिपाने की कोशिश है: अपनी भूल को न पहचानने और उसे न सुधारने की कायरता. यह कुछ वैसा ही है जैसा उर्दू के कत्ल के बाद ग़ालिब  और फैज़  को देवनागरी में प्रचारित करना. अगर हम बाबरी मस्जिद और वली के मजार की पुनर्रचना नहीं कर सकते तो कविता की रचना कैसे कर सकते हैं? वली  के मजार के विध्वंस के तीन साल बाद हम खुद से पूछें: क्या हमें वली की शायरी पढ़ने का हक हासिल है?

  • जनसत्ता, फ़रवरी, 2005
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