मुझे मेरा सलीब बड़ा करने दे

सुनामी की तबाही के बाद भारत के हर कोने से जिस तरह मानवीय संवेदना का ज्वार उठा, उसने किस को द्रवित नहीं किया होगा. क्या यह मेरा कोई बुनियादी चारित्रिक दोष था कि मैं इस भारतीय उदारता और सहानुभूति के स्पर्श से विचलित नहीं हो सका? कई रोज तक इस पर सोचते हुए मैंने अपनी एक मित्र को अपनी परेशानी बताई. वे उस समय तमिलनाडु की उन जगहों पर थी जहाँ प्रकृति के विनाश को अभी ठीक तरह समझा ही जा रहा था.
वह पिछला कौन सा मौका था जब इसी तीव्रता से हमने उनकी तकलीफ महसूस की थी जो हमारे कुछ नहीं लगते थे? लगभग चार साल पहले गुजरात में आया भूकंप था, जिसने पूरे हिंदुस्तान को हिला दिया था. लेकिन इन दोनों प्राकृतिक महा-आपदाओं के बीच भी कुछ हुआ था जिससे विचलित होने में भारतीय समाज को हिचकिचाहट हुई और इनमें से अधिकतर अपने हाथ जेब में डाल कर देखते भर रहे. वह 28 फरवरी, 2002 से गुजरात से शुरू हुआ मुसलमानों का कत्लेआम था, जिसने हजारों लोगों की हत्या के साथ करीब डेढ़ लाख लोगों को बेघरबार कर दिया था.
यह बेघरबार मुसलमान वतनबदर होने को मजबूर हुए क्योंकि उनके गांव वाले, मोहल्ले वाले उनका साथ नहीं चाहते थे. गुजरात में कई जगह शरणार्थी शिविर तन गए. खयाल रहे, यह शिविर कब्रिस्तानों, दरगाह, मजारों और मस्जिदों में खुले. यह भी याद कर लेना भारतीय जनतंत्र को अपना स्वभाव पहचानने के लिए जरूरी होगा कि शिविरों को चलाने का काम प्राय: सिर्फ इस्लामी संगठनों का था. भारत नामक धर्मनिरपेक्ष देश में जहां करोड़ों उदारहृदय धर्मप्राण बसते हैं, ऐसा एक भी गैर इस्लामिक संगठन न था जिसने इन बेघरबार मुसलमानों की देखभाल करने का जिम्मा संभाला हो.
सारे अखबार और टेलीविजन चैनल जो अभी अपने अपने राहत कोष खोलकर अपने पाठकों और दर्शकों से उनके योगदान ले रहे हैं और उसको प्रधानमंत्री और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री की भेंट करते हुए अपनी तस्वीरें खुद दिखा भी रहे हैं. मुझे कुछ तकलीफ के साथ याद आया कि इनमें से किसी की करुणा उन डेढ़ लाख मुसलमानों को भौतिक राहत पहुंचाने के सिलसिले में नहीं जग सकी. अभी भी इन शरणार्थियों में से दस हज़ार परिवार आंतरिक रुप से विस्थापित हैं और अपनी पुरानी जगहों को नहीं लौट सकते हैं.
तकाज़ा उस वक्त इंसाफ का उतना नहीं, जितना इंसानियत का था. हम शायद इस तकाजों को पूरा नहीं कर पाए. मैं, अपने और कई मित्रों की तरह यह सोचता रहा कि फरवरी 2002 के बाद के कत्लेआम के शिकार अपने हमवतन के लिए स्वाभाविक मानवीय स्फूर्ति के साथ हमारे हाथ क्या इस वजह से नहीं बढ़ सके थे कि हम कहीं दिल के अंदर यह मान बैठे थे कि उनका हमारे साथ होना ही एक भूल है जिसको अगर इस तरह भी दुरुस्त कर लिया जाए तो ठीक है.
यह देख कर अच्छा लगा कि कांग्रेस अध्यक्ष सुनामी के बाद विस्थापितों के दुख की साझेदारी करने तमिलनाडु पहुंची. यह देख कर भी संतोष हुआ कि कई राज्य सरकारों ने अपनी-अपनी तरफ से समुद्री तूफान से पीड़ितों के लिए विशेष धनराशि दी. फिर वह कौन सी तकनीकी और राजनीतिक या मानवीय बाधा थी जिसकी वजह से वही कांग्रेस अध्यक्ष 28, फ़रवरी 2002 से शुरू हुए कत्लेआम के बाद मार्च तक गुजरात न जा सकीं. वह क्या था जिसने तब की चौदह कांग्रेसी राज्य सरकारों को यह सोचने से भी रोका कि गुजरात के डेढ़ लाख मुसलमान नागरिकों के लिए अपने राहत कोष के मुंह खोलें. अगर गुजरात कत्लेआम राष्ट्रीय शर्म था तो वह राष्ट्रीय आपदा क्यों नहीं बन सका?

मैं दोहरा रहा हूं कि मैं इंसाफ से अधिक इंसानियत की बात करना चाहता हूं. क्योंकि आज के दिन हम यह दोहराते न थकेंगे कि हम गांधी के देश के हैं, कि वह हमारे लिए अभी भी प्रासंगिक हैं. उस फांक की  व्याख्या हम कैसे करेंगे जो हमारे और गांधी के बीच है और चौड़ी होती जाती है. वह सनातनी हिंदू गांधी थे जिन्होंने तय किया था कि वह 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में नहीं रहेंगे बल्कि तिरंगे झंडे से बहुत दूर नोआखाली में सांप्रदायिक फसादों के बीच मौजूद रहेंगे. गांधी के इस निर्णय के आशय को ठीक से समझा जाना शेष है – वे राष्ट्रीय गौरव की परियोजना से स्वयं को विलग कर मानवीय करुणा की एक बिरादरी का दुस्साहसी प्रयोग कर रहे थे.
क्या था गांधी, और शायद उन के जमाने में. जो हम में कम होता गया है? 1947 के 2 अक्टूबर को, गांधी के अठहत्तरवें जन्मदिन  पर उन्हें मुबारकबाद दी जा रही थी. 8 खंडों के जीवन के दस्तावेज के अंतिम खंड में जी डी तेंदुलकर ने लिखा है कि गांधी ने पूछा -‘ यह सारी बधाइयां कहां से? क्या यह अधिक मुनासिब न था कि मुझे शोक संदेश भेजे जाते.’ गांधी ने कहा कि एक वक्त था जब सारा देश उनका अनुकरण करता था. आज वह आवाज अकेली पड़ गई. वे जो सुन रहे थे वह यह कि मुसलमानों को भारतीय राज्य में रहने की इजाजत नहीं है. ‘अगर आज यह मुसलमानों के खिलाफ है तो कल पारसियों, ईसाईयों और यूरोपीय लोगों का क्या हश्र होगा ‘
तेंदुलकर ने लिखा है कि गांधी को उनके जन्मदिन पर सांत्वना देते हुए एक फ्रांसीसी ने लिखा कि उन्हें हताश नहीं होना चाहिए और एक सौ पच्चीस साल तक जीने की तैयारी करनी चाहिए. गांधी ने कहा कि बदले हुए हालात में वे एक सौ पच्चीस साल तक जीने की अपनी इच्छा छोड़ रहे हैं. वे दरअसल निस्सहायता  अनुभव कर रहे हैं और चाहते हैं कि सर्वशक्तिमान उन्हें ‘आंसुओं की घाटी’ से दूर ले जाए.
सिर्फ तीन महीने बाद मुस्लिम विरोधियों का एक प्रतिनिधि गांधी की यह कामना पूरी करने वाला था., 30 जनवरी 1948 के बाद आंसुओं की घाटी और गहरी, और चौड़ी होती गई है. अगर कुछ नहीं है तो गांधी की वह पश्चाताप की भावना जो उन्हें हम सब से कहीं बड़ा इंसान बनाती थी. क्या यह उचित न होगा कि आज गांधी को याद करते हुए हम उन पंक्तियों को दोहराएं जो उन्होंने ‘ हरिजन ‘ मैं प्रकाशित की थी: ‘ यह मेरी जंजीरे हैं जिनके सहारे में उड़ता हूं/ यह मेरे सुख हैं जिनके सहारे में ऊपर उठता हूं / यह मेरी पराजय है जिनके सहारे में दौड़ता हूं / यह मेरे आंसू हैं जिनके सहारे में सफ़र करता हूं / यह मेरा सलीब है जिसके सहारे में चढ़ता हूं / इंसानियत के दिल तक / मुझे मेरा सलीब बड़ा करने दे, या खुदा,’

  • जनसत्ता, फ़रवरी, 2004
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