फासिज़्म और अज्ञेय

अज्ञेय का जन्मदिन था…और मैं भूल ही चुका था. वर्तमान का आधिक्य यदि पूर्व की स्मृति को ढँक ले तो इसमें दोष किसका माना जाए? एक ऐसा वर्तमान जो ज़रा भी राहत नहीं देता, समस्या की तरह आपके गले में पड़ा रहता है कि आप इधर उधर देख भी नहीं सकते.पीछे देखने की बात तो अलग.

अज्ञेय को कैसे याद करें आज? क्रांतिकारी अज्ञेय को जो उन्नीस सौ बयालीस के भारत छोड़ो आन्दोलन में न थे, अंग्रेज़ सेना में शामिल हुए जो तब भारतीय सेना ही थी. रघुवीर सहाय को उन्होंने अपने इस निर्णय के बारे में बताया कि बयालीस में न इधर न उधर की उलझन में वे नहीं पड़े. भारत की सीमा पर संकट  था और उनके लिए यह सोचना संभव न था कि उसकी रक्षा कोई और करे. अंग्रेज़ सेना में शामिल होने का निर्णय लोकप्रिय नहीं होना था और उसे लेकर सवाल अब तक हैं.

अज्ञेय के उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ मेंअज्ञेय के उस फैसले का तर्क और स्पष्ट होता है. भुवन द्वारा गौरा को लिखे पत्र में. ज़रा लंबा है, लेकिन बात समझ में आए इसलिए धीरज से पढ़ना ही पड़ेगा : “खबर तुमने सुनी? बड़े धड़ल्ले के साथ जापान युद्ध में कूद आया…..देश में बहुत होंगे, जो इसपर खुश हो रहे होंगे….”  भुवन चालीस साल पहले के छोटे से एशियाई देश जापान के उदय से द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के जापान की तुलना करते हुए कहता है, “अब जापान भी एक उत्पीड़क शक्ति है, साम्राज्य भी और साम्राज्यवादी भी –और आज उसको बढ़ावा देना, एक नई दासता का अभिनंदन इस आधार पर करना है कि वह दासता यूरोपीय नहीं, एशियायी प्रभु की होगी. कितना घातक हो सकता है यह तर्क! परदेशी गुलामी से स्वदेशी अत्याचार अच्छा है, यह एक बात है …पर क्या एशियाई नाम जापान को यूरोप की अपेक्षा भारत के अधिक निकट ले आता है…?” भुवन अपनी बात और स्पष्ट करता है, “जाति की भावना गलत है, श्रेष्ठत्व-भावना हो तो और भी गलत-हिटलर का आर्यत्व का दावा दंभ ही नहीं, मानवता के साथ विश्वासघात है; पर अपनापे या संपर्क की बात कहनी हो तो मानना होगा कि यूरोप ही हमारे अधिक निकट है, आर्यत्व के कारण नहीं , सांस्कृतिक परम्परा और विनिमय के कारण, आचार-विचार, आदर्श साधना और जीवन परिपाटी की आधारभूत एकता के कारण …”

भुवन, (और क्या यह सिर्फ भुवन है,अज्ञेय नहीं?) आगे कहता है, “… भारत के एक स्थानीय प्रश्न ( विश्व की भूमिका में हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न को स्थानीय ही मानना होगा) से उत्पन्न कटुता के कारण ही हम नहीं देख सकते कि न केवल यूरोप के, बल्कि निकटतर मुस्लिम देशों के–‘मध्यपूर्व’ के साथ हमारा कितना घनिष्ठ सांस्कृतिक सम्बन्ध न केवल रहा है, बल्कि आज भी है…”

“…एशियाई नाम को लेकर जापानी साम्राज्य सत्ता का अनुमोदन करना या उसके प्रसार को उदासीन भाव से देखना, खंड के नाम पर सम्पूर्ण को डुबा देना है …मानवता के साथ उतना ही बड़ा विश्वासघात करना है, जितना उन्होंने किया था,जो मुसोलिनी द्वारा अबीसीनिया या हिटलर द्वारा चेकोस्लावाकिया के ग्रास के प्रति उदासीन थे….”

जो मुक्तिबोध की इसलिए आलोचना करते हैं कि वे अपनी कविता या कहानी में लम्बे लम्बे विचारात्मक अंश ले आते है उन्हें दो स्नेहियों के बीच के पत्राचार में इस विश्व चिंता पर गौर करना चाहिए. जाहिर है, भुवन जापान की आक्रामकता से अत्यंत विचलित है और अपना कर्तव्य निर्धारण कर रहा है.

दूसरे पत्र में भुवन गौरा को सूचित करता है कि भारतीय भूमि पर जापानी बम पड़ने के बाद वह अपना कर्तव्य स्पष्ट देख रहा है: वह सेना में भर्ती हो रहा है युद्ध घृण्य है और कोरी देशभक्ति भी उसके लिए कोई मायने नहीं रखती, बल्कि घृणा और युद्ध की जननी है, पर इस संकट से भारत की रक्षा करना देश-भक्ति से बड़े कर्तव्य की माँग है-वह मानवता की बर्बरता से मानव के विवेक की रक्षा की मांग है…..

अज्ञेय ने रघुवीर सहाय को अपने सेना में भर्ती होने का कारण बताया था देश पर आए खतरे से उसे बचाने का कर्तव्य, वह देश भक्ति की सीमा में बंध जाता है. लेकिन भुवन का तर्क अधिक व्यापक है, वह देश की रक्षा की जगह वस्तुतः मानव के विवेक की रक्षा का प्रश्न है.

इस पत्राचार से एक और बात की ओर ध्यान जाता है, वह है अज्ञेय की राजनीतिक सजगता. हिंदी में प्रायः यही माना जाता रहा है कि राजनीतिक चेतनासंपन्न लेखक तो प्रायः वे ही हैं जो मार्क्सवादी हैं, लेकिन अज्ञेय की राजनीति यहाँ निर्भ्रांत है. उनका पक्ष भी स्पष्ट है. और यह परोक्ष आलोचना भी है सुभाष बाबू की राष्ट्रवाद की, वह राष्ट्रवाद जो उन्हें यूरोप-विरोधी जापान की ओर ले गया. अज्ञेय और उनका पात्र भुवन उसी जापान के खिलाफ मोर्चे पर है जिसकी सेना के साथ भारत में प्रवेश करने की हिकमत सुभाष चन्द्र बोस लगा रहे थे. क्या यह आश्चर्य की बात है कि यह सब लिखे जाने के बहुत पहले क्रांतिकारी दल में अज्ञेय के साथी भगत सिंह ने सुभाष बाबू के भावुकतावादी, बल्कि जुनूनी राष्ट्रवाद की जगह नेहरू के वैज्ञानिक चेतना संपन्न अंतर्राष्ट्रीयतावाद को वरेण्य माना था ?

अज्ञेय और भुवन के अंग्रेज़ फौज में शामिल होने की वजह थी फासिज़्म के खतरे की उनकी पहचान. नेहरू भी इस दौर में दो प्रकार की आक्रामाकताओं के बारे में लिख रहे थे, एक साम्राज्यवादी और दूसरी, फासीवादी. कांग्रेस का रुख साफ़ था, वह फासीवादी खतरे की गंभीरता को समझती थी और भारत के कर्तव्य को भी जो उस खतरे का सामना करने का था लेकिन ऐसा वह आज़ाद मुल्क के तौर पर करना चाहती थी. भुवन का निर्णय कांग्रेस के फैसले से अलग है लेकिन उससे भी ज्यादा वह सुभाष बाबू के फैसले के खिलाफ है.

फासिज़्म की अज्ञेय की समझ का एक सशक्त उदाहरण उनकी यूरोप यात्रा के संस्मरण, “एक बूँद सहसा उछली’ का दूसरा ही अध्याय है, जिसका शीर्षक है , ‘विद्रोह की परम्परा में’. यह  इटली के कवि, जिसके बारे में हम अब भी बहुत कम जानते हैं, लाउरो ड बोसिस के बारे में है. वह मुसोलिनी के वक्त की इटली है. अध्याय की शुरुआत नाटकीय है: एक छोटा हवाई जहाज रोम के ऊपर चक्कर लगा रहा है, पहले वह एक मकान के ऊपर मंडलाकार घूमता है, जो एक कवि का है, फिर पियात्सा दी स्पान्या के चौक के ऊपर जिसके कोने के छोटे मकान में रहते हुए शेली ने मानव मात्र की स्वतंत्रता का स्वप्न देखा था. आधे घंटे तक वह जहाज रोम के ऊपर चक्कर लगाता रहता है. जो उसे कहना है रोम वासियों को, वह एक पर्चे की शक्ल में है जो जहाज से बरसाया जा रहा है.

चार लाख पर्चियाँ आसमान से नीचे इटली के राजा और प्रजा दोनों का आह्वान करती हैं, अभिनव दासता की श्रृंखला में जकड़ी जनता को स्वाधीनता का सन्देश देते हुए. क्या यह सुना जाएगा, क्या वह विद्रोह का बीजारोपण कर पाएगा या एक नाटकीय आह्वान भर रह जाएगा ? इससे उस अनासक्त व्यक्ति को कोई प्रयोजन नहीं मानो जिसने इस सन्देश को लिखा, छपाया और अब विमान उड़ाते हुए रोम भर की जनता को बाँट रहा है. यह तो उसका मानवीय कर्तव्य है .

जो वह कर रहा है, वह फलीभूत होगा भी कि नहीं इसकी आकांक्षा से परे है वह जैसे सूर्य की ओर उड़ते हर इकारस होते हैं.

अज्ञेय लाउरो के इस दुस्साहसी अभियान से अभिभूत हैं, यह तो वर्णन की भाषा से ही समझा जा सकता है. वे उसके अंतिम पात्र, “मेरी मृत्यु का इतिहास’ का जिक्र करते हैं और उसी से लेख समाप्त करते हैं. वह अंश लिखे जाने और अज्ञेय के द्वारा उसे उद्धृत किए जाने के इतने वर्षों बाद भी कितना ताज़ा लगता है, मानो हमारे लिए ही हो,हमें सावधान करने के लिए: “मेरी पक्की धारणा है कि फासिज़्म तबतक परास्त नहीं होगा जबतक कि बीसियों युवक इटालीय जनता की मनःशुद्धि के लिए अपने प्राणों का बलिदान नहीं करेंगे….आज ऐसे व्यक्ति बहुत कम हैं. क्यों? ऐसा नहीं है कि उनमें अपने पुरखों की अपेक्षा कम साहस हो या कम विशवास हो, कारण यह है की अभी तक किसी ने फासिज्म को गंभीर महत्त्व नहीं दिया है.क्या नेता और क्या साधारण युवक, सभी समझते हैं कि फासिज्म अधिक दिन नहीं चल सकता और उन्हें ऐसा लगता है कि जो अपने आप मिट जाने वाला है. उसके लिए प्राण देना व्यर्थ है. लेकिन यह भूल है. हमें बलिदान देना ही होगा.”

यह यूरोप यात्रा फासिज़्म की पराजय के बाद के यूरोप की है.बड़ी कीमत मानवता ने चुकाई, फासिज्म को गंभीर महत्त्व न देकर.आज सत्तर साल बाद क्या फिर यूरोप फिर उसी मोड़ पर आ खड़ा हुआ है?और भारत भी, जो तब यूरोप को सावधान कर रहा था. अज्ञेय की वर्षगाँठ के इस हफ्ते उनकी चेतावनी को फिर सुनें और अपना कर्तव्य भी तय करें.

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