शिक्षा के सवालों की खोज

साल भर पहले तक के अखबार देखें तो शिक्षा के सवाल पर बड़ी उत्तेजना भरी बहस चलती दिखाई देती है. भारतीय जनता पार्टी के सत्ताच्युत होने के कुछ दिन बाद तक इस बहस का ताप महसूस  होता है, लेकिन फिर धीरे-धीरे शिक्षा को लेकर समाज की चिर-परिचित उदासीनता छाने लगती है. कुछ समय तक नई कांग्रेसी सरकार पर इन आरोपों की शक्ल में इस बहस को जिंदा रखा जाता है कि वह आते ही अपनी विचारधारा को ठोपने की जुगत कर रही है. फिर जैसे यह सारा विवाद ठंडा पड़ जाता है. अगर इस घटनाक्रम पर गौर करें तो लगता है कि बहस जितनी शिक्षा पर थी उससे कहीं ज्यादा राजनीति की थी. सार्थक वह फिर भी हो सकती थी अगर धीरज के साथ शिक्षा और राजनीति या शिक्षा और विचारधारा के रिश्तो की कुछ और गहराई से पड़ताल की जाती. यह सवाल भी अप्रासंगिक न होता कि शिक्षा क्या हमेशा विचारधारा की संवाहिका का ही काम करते हुए उपयोगी मानी जाएगी या खुद शिक्षा की भी अपनी कोई विचारधारा हो सकती है. यह प्रश्न भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि क्या शिक्षा की सारी बहस पाठ्यपुस्तकों में शामिल की जा रही या बाहर रखी जा रही पाठ्य सामग्री तक ही सीमित है या उसकी समस्या का केंद्र कहीं और है.

इन सारे सवालों पर बिना फौरी तौर पक्ष घोषित करने के दबाव के, विचार करने का सबसे उपयुक्त अवसर शायद अभी ही है . यह संयोग ही है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या पर पुनर्विचार पिछले साल के अंत में सरकार की तरफ से शुरू किया गया. इस पर कम ध्यान दिया गया है कि इक्कीसवीं सदी के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या का यह पहला दस्तावेज होगा. एक तरह से नई शताब्दी के लिए शिक्षा का भारतीय घोषणा पत्र तैयार करने का अवसर हमारे पास है. यह भी एक संयोग ही है कि इस प्रक्रिया का संयोजन करने वाली संस्था एनसीईआरटी का नेतृत्व अभी तक एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में है, पेशेवर शिक्षाशास्त्री कम से कम जिनकी दक्षता में संदेह नहीं करते.
एनसीईआरटी ने पाठ्यचर्या पर पुनर्विचार, समीक्षा और उसकी रोशनी में नई पाठ्यचर्या के निर्माण के लिए इस सब की याद में पहली बार एक अधिक पारदर्शी, अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई और यथासंभव इस प्रक्रिया को पहले से निर्धारित ऐजेंडे के दबाव से मुक्त रखने की कोशिश की. फिर भी यह देख कर कुछ निराशा होती है कि इस खुलेपन का इस्तेमाल वे राजनीतिक दल और दूसरे संगठन नहीं कर पाए या उनकी दिलचस्पी ही इनमें न थी, जो शिक्षा पर एक विशेष विचारधारात्मक आग्रह लाने के लिए भारतीय जनता पार्टी की सरकार की आलोचना करते रहे थे.
शिक्षा पर होनेवाली बहस प्रायः यहां तक सीमित रह जाती है कि पाठ्यपुस्तकों में क्या पढ़ाया जा रहा है. पिछले दिनों यह भी सिर्फ सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष पदों में सिमट कर रह गई. इस समस्या पर गंभीरतापूर्वक अभी भी विचार किए जाने की जरूरत है कि राजनीतिक रूप से एकदम दुरुस्त पाठों वाली पुस्तकों के होते हुए भी क्या एक असहिष्णु समाज की जमीन तैयार नहीं होती जा सकती है. ‘गलत’ पाठ की जगह ‘सही’ तरीके से पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित कर देने में ही जो कर्तव्य शेष हुआ समझते हैं, वह अंततः बच्ची या  शिक्षार्थी के प्रति कोई अलग शिक्षाशास्त्रीय नजरिया नहीं रखते. स्कूल में आने वाली बच्ची एक ऐसा पात्र है जिसे उपयोगी, और मानवीय सामग्री से भर देना ही काफी है. इस समझ के मुताबिक पाठ्यचर्या निर्माण और पाठ्यपुस्तक लेखन के लिए सही व्यक्तियों का चुनाव भर कर लेना है और बाकी काम भी कर लेंगे क्योंकि उनकी विचारधारा दुरुस्त है.

इस बार लेकिन पाठ्यचर्या पर नए सिरे से विचार के लिए प्रस्थान बिंदु के तौर पर आज से बारह साल पहले तैयार की गई यशपाल समिति की रिपोर्ट को सामने रखा गया है जो बच्ची को ज्ञान की रचना करने वाली के रूप में देखने की सिफारिश करती है. इसके साथ वह पाठ्यपुस्तक को पवित्र पुस्तक का दर्जा दिए जाने का लगभग विरोध करती दिखाई देती है क्योंकि वह पाठ्यचर्या निर्माण के काम को अधिक से अधिक विकेंद्रित करने की बात करती है. साथ ही वह शिक्षा को बोझ से आजाद करने की वकालत करती है.
बिना बोझ के शिक्षा का अर्थ भी क्या सिर्फ हल्के बस्ते तक  सीमित है? यशपाल समिति ने सभी विषयों में पाठ्यक्रम की अतिरिक्त सघनता की शिकायत की थी. वह उस प्रवृत्ति को ठीक से समझने का अनुरोध करती है जो ‘पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों के आयोजकों की विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों की पढ़ने की क्षमता और एक औसत स्कूल में संबंधित विषय के शिक्षण के लिए उपलब्ध समय पर ध्यान दिए बिना अधिकाधिक विषयवस्तु शामिल करने के लिए प्रेरित करती है.’ हाल में न्यायालय के फैसले से पर्यावरण को एक अलग विषय के रूप में पढ़ाए जाने को लेकर जो मौन स्वीकृति सुनाई पड़ी, यशपाल समिति के ऊपर व्यक्त की गई चिंता पर कोई ध्यान नहीं दिए जाने का ही नतीजा है.
पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम या पाठ्यपुस्तकों के साथ समस्या, इस तरह, सिर्फ एक या दूसरी विचारधारा को विशेष स्थान देने की नहीं है. वह इससे कहीं अलग एक शिक्षाशास्त्रीय समस्या है मतलब, इतिहास हमारे शिक्षा जगत के लिए सबसे समस्याग्रस्त क्षेत्र रहा है. यशपाल समिति 1992-93 में कह रही थी की ‘इतिहास का पाठ्यक्रम बच्चों के लिए संतोषप्रद और निरर्थक बना हुआ है. इससे इतिहास शिक्षण का उद्देश्य पूरा नहीं होता क्योंकि बच्चे इतिहास को अपनी विरासत से जोड़ने में असमर्थ रहे हैं. अपेक्षा यह की जाती है कि कक्षा छह से आठ के दौरान बच्चे प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के संपूर्ण ज्ञात इतिहास का अपने मस्तिष्क में पूर्ण चित्र बना पाएंगे… इसमें विषय वस्तु की सघनता अधिक होती है. कुछ ही वाक्यों में अनेक वर्षों के इतिहास का वर्णन कर दिया जाता है. यह संक्षिप्त शैली बच्चों को ‘जैसा भी वर्णन किया है उसे वैसा ही स्वीकार’ करने के लिए बाध्य करती है. पाठ्यपुस्तकों में विस्तारपूर्वक विषय सामग्री को प्रस्तुत नहीं किया जाता ताकि वह बच्चा तर्क अथवा चिंतन  के लिए उसे आधार बना सके…’
बदनसीबी की बात यह है कि यशपाल समिति ने तेरह साल पहले जिन समस्याओं को चिन्हित किया था वह कमोबेश वैसे ही आज भी हमारे सामने है. शिक्षक को अभी भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित ज्ञान के व्याख्याकार के तौर पर देखा जाता है. उसी तरह ‘सूचना समाज’ या ‘ज्ञान समाज’ बनाने की हड़बड़ी में रविंद्रनाथ के तोते के साथ जो किया गया था, वह हम अपने बच्चों के साथ करते ही चले जा रहे हैं. बच्ची  ज्ञान अर्जित करती है और सीखती है, लेकिन वह कुछ रचती और बनाती भी है और इसके लिए उसे तर्क और चिंतन का अवकाश मिलना चाहिए.
अभी एनसीईआरटी ने नई पाठ्यचर्या के लिए पूर्व आधार के तौर पर यशपाल समिति की चिंताओं को चुना है. जिन पर सार्वजनिक तौर पर विचार-विमर्श स्थगित पड़ा है. अभी भी अगर नई पाठ्यचर्या की इस बहस को और व्यापक बनाने में शिक्षाविदों के साथ-साथ लेखकों, वैज्ञानिकों, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पेशकदमी नहीं ली और सिर्फ एनसीईआरटी के सुपुर्द यह काम कर दिया तो शिक्षा को वास्तविक तौर पर लोकतांत्रिक बनाने का काम और पीछे पड़ जाएगा. आखिर लोकतंत्र का सत्य तो अधिक से अधिक भागीदारी में ही छिपा हुआ है.

  • जनसत्ता, मार्च, 2005
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