ज़िन्दाबाद ! बाहोश नौजवानी !!

फिर चले हम. वही बाराखम्बा रोड का मुहाना. नेपाल दूतावास. मंडी हाउस का  एक कोना. पहचाने चेहरे. शुरुआती मार्च की धूप जो गर्म भी है और नर्म भी. और वही पत्तियाँ बिखेरता नीम. वसंत या पतझड़? और मुझे हजारी प्रसाद द्विवेदी याद आ जाते हैं, वसंत इस देश में एकबारगी हर किसी पर नहीं आता. दो पेड़ों को देखो, एक पर बहार आयी है तो दूसरा पत्तियों की पोशाक उतार रहा है, कोई तनाव नहीं, बगल के टूसे फेंकते पड़ोसी से कोई ईर्ष्या नहीं. उसे अपना वक्त मालूम हो जैसे!

नारे उठ रहे हैं और हवा पर तैर रहे हैं. एक धुन सी है, जिद्दी आज़ादी की जो बजे ही जा रही है. डफली है, और गिटार भी, नौजवान मुस्कुराहटें है और गले की तनी हुई नाजुक नसें: और छोटे-छोटे पोस्टर हैं: हिंसा नहीं, वाद-विवाद और विचार की मांग करते हुए. कौन पढ़ता हैं इन्हें? और एक ललाट दमक जाता है, हरे रंग से आज़ादी की सुर्खी के साथ. ओंठ एक निश्चय में भिंचे हुए.

कैमरे हैं, कैमरे ही कैमरे, ओ बी वैन और उत्तेजित रिपोर्टर हालाँकि कुछ घटित नहीं हो रहा यहाँ. बरसों से इसी तरह के जुलूस में मिलने वाले बगलगीर हो रहे हैं. और एक नौजवान आता है. “आपसे कुछ बात कर लें, सर?” हम आई आई एम सी से हैं, एसाईनमेंट है. “जो हिंसा हुई, उसका जिम्मा एक ही पक्ष का तो नहीं होगा न? यह तो दो पक्षों में मार पीट थी, वर्चस्व की लड़ाई.” और मैं सोचता हूँ, :हिंसा में दो पक्ष ज़रूर होते हैं, लेकिन बराबर नहीं. हिटलर की जर्मनी में भी दो पक्ष थे और गुजरात में भी दो पक्ष थे. जे एन यू में भी दो पक्ष थे और रामजस कॉलेज में भी दो पक्ष हैं. उनमें से एक हमलावर है, और दूसरा जिसपर हमला हुआ, यह कहने में हमारी संतुलनवादी ज़बान लड़खड़ा जाती है.

अचानक एक तरह एक छोटा सा झुण्ड आता हैऔर हमारे एक मित्र सतर्क हो जाते हैं. कहीं फिर ‘वे’ तो नहीं घुसपैठ कर रहे जुलूस को डिस्टर्ब करने? थोड़ी भाग-दौड़ के बाद मालूम होता है, आम आदमी पार्टी के छात्र संगठन के सदस्य हैं और तनाव ढीला होता है.

“यह सब जो हो रहा है, इससे पढ़ाई का हर्ज तो हो रहा है न?” “उसी वजह से तो आना पड़ा यहाँ. हमारी क्लास, सेमिनार हाल बंद किए जा रहे हैं, वे ही तो हमारी जगहें हैं.” “कौन है जो उदयपुर, जोधपुर, हरियाणा, झारखण्ड, पुणे, हर जगह सेमिनारों पर हमले कर रहा है? “कब बंद होगा यह सिलसिला?” “जब हमले बंद हो जाएँगे.” जवाब सीधा है, विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक जुल्म जारी है. बंद करने का जिम्मा जालिम पर है जिसपर हमला हो रहा है, उससे यह कहना कि तुम खामोश हो रहो कि यह बेकार का सिलसिला बंद हो जाए, उलटबाँसी है, लेकिन कबीर की नहीं. जो ऊब गए हैं इससे उन्हें आगे बढ़कर गालियाँ देनेवालों और पत्थर चलानेवालों से कहना होगा, कि वे अपने हाथ पत्थर की जगह किताब और कलम लें.

परसों भी नौजवानों को देखा था, पट्टे बांधे, जूते, चप्पल लहराते हुए, उँगली और ज़बान काट लेने की धमकी देते हुए. यहाँ समां कुछ और है: गाने हैं और तालियाँ हैं, आखिरकार कामयाब होने के यकीन का हमेशा ताज़ा रहने वाला गीत है.

और जुलूस चल पड़ता है. सड़क पर हिंदी और उर्दू में इबारतें दर्ज करते एक दोस्त चल रहे हैं. उर्दू जो ग़ालिब और मीर की और प्रेमचंद और रतन नाथ सरशार की जुबान है   लेकिन अब जिसे देशद्रोह की भाषा बताया जा रहा है, कहा जा रहा है कि उर्दू में बैनर लेकर नारा लगाने वालों से होशियार रहने की ज़रूरत है. यह उसका जवाब है. खुशखत, यह लफ्ज़ उर्दू का है और उस सड़क पर पाँव बचाकर चलें, कहने को जी करता है, जिसपर इकबाल दर्ज हैं, और फैज़ भी, ‘निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन, के चली है रस्म जहां कि कोई न सर उठा के चले.’

‘आज बाज़ार में पा बजौला चलो’, यह भी फैज़ हैं और ; वो इन्तजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं, यह भी फैज़ हैं. लेकिन अब हम उर्दू से इतनी दूर चले गए हैं कि अगली सुबह अखबारों में इस सहर को शहर लिखा देख ताज्जुब नहीं होता, हालाँकि सहर अब भी लड़कियों का एक लोकप्रिय नाम है.

बांग्ला भी है सड़क पर और पोस्टरों में. यह भाषा की संस्कृति है, भाषा ही भाषा, यह नफरत नहीं है, सब कुछ को समेट लेने की ख़ुशी है.

और दो छात्र आते हैं,”सर, भारतीय भाषाओं के छात्रों को उच्च शिक्षा संस्थानों में जिस चुनौती का सामना करना पड़ रहा है,उसे लेकर हम एक गोष्ठी कर रहे हैं. जो सर्वे किया था, फिर भेज देंगे आपको.”

चिंता शैक्षणिक है जो इस जुलूस में भी सक्रिय है. भी या ही? शैक्षणिक चिंता ही!

यहाँ विरोध है, लेकिन नफरत नहीं. पाँव चले जा रहे हैं, पहचाने रास्तों पर और तोल्स्तोय मार्ग से होते हुए जन्तर मंतर की सड़क पार कर संसद मार्ग. संसद खामोश है. सड़क पर नारे हैं और उमर खालिद कहता है, पिछले साल जे ने यू पर हमला था लेकिन बहार आई और इस साल डी यू पर हमला है लेकिन देखिए फिर क्या बहार आई है!

और नजीब की अम्माँ आती हैं जो पिछले पाँच महीने से इस राष्ट्र में लापता हो गया है.

शेहला राशिद स्टेज पर आती है और गाती है. जी हाँ! इन छात्रों के गले में और होठों पर गीत पहले हैं. आप क्यों नारा लगवाने पर मजबूर करते हैं?

और एक युवती मुस्कुरा कर अंग्रेज़ी में पूछती है, क्या आप इस जुलूस में हैं? किसी फ्रेंच टी वी चैनेल से है. “कितनी बार साल में इस तरह जुलूस निकलते हैं?” हैरानी से पूछती है. “क्या भारत में इसका रिवाज है?” और मैं सोचता हूँ, क्या जवाब दूँ कि भारत की छवि खराब न हो! रिवाज तो लेखों, किताबों पर हमलों का है, सेमिनारों पर पत्थरबाजी का है, लेखकों, छात्रों, शिक्षकों पर मुक़दमेबाजी का, उनकी बर्खास्तगी का है. और मैं कहता हूँ, हाँ! हमारी परम्परा है क्लास से निकलने की, सड़क पर आने की, कुछ पुरानी ही है. लेकिन यह जो सड़क है, वह भी एक किस्म की क्लास है, भले ही सिलेबस के बाहर हो.

सब खुश हैं. यह साथ की खुशी है. सब अलग हैं, फिर भी सब साथ हैं. जामिया के छात्र हैं जिसे दहशतगर्दों की पनाहगाह बताया जाता है और जे एन यू के छात्र और शिक्षक भी हैं जिसे देश तोड्नेवालों का गढ़ बताया जा रहा है, दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के माँ-पिता हैं. अंबेडकर यूनिवर्सिटी के छात्र और शिक्षक हैं.

कितने लोग होंगे? पाँच सौ? मैं पूछने के अंदाज में कहता हूँ. अरे! प्रेसवाले तो हजार से ऊपर बता रहे हैं! मैं सर हिला देता हूँ, हो सकता है! लेकिन जमावड़ा उससे कम है जो दो रोज़ पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी में थे. आ सकते थे और लोग, आएँगे! अभी तो कई कई बार आना होगा यहाँ!

शाम ढल गई है. लोग विदा हो रहे हैं. पूर्वा भी आ गई हैं. क्या कुछ थकान सी नहीं हो गई है? कुछ कॉफ़ी क्यों न हो जाए? नए चेहरे गहराती शाम के बीच चमकते जाते हैं. और मैं कहना चाहता हूँ, शुक्रिया, नौजवान दोस्तो ! ज़िन्दाबाद ! बाहोश नौजवानी !!

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One thought on “ज़िन्दाबाद ! बाहोश नौजवानी !!

  1. Goldi Rai says:

    Janstta mein Sir ke Aprasangik colam ko nahin aane se bhut nirash thi ,lekin ab ise phadhne ka saubhagy prapt hone lga

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