भाषा विवादः ‘एक धोखे से दूसरे धोखे की कहानी’

भारत के केंद्रीय विद्यालयों (केवी) में तीसरी भाषा के रूप में किसे पढ़ाया जाए, इसे लेकर विवाद छिड़ गया है.

कुछ ख़बरों के अनुसार भारत सरकार चाहती है कि केवी में जर्मन को हटाकर संस्कृत पढ़ाई जाए.

लेकिन इसकी तह में जाने की कोशिश नहीं हो रही कि आख़िर जर्मन को क्यों शामिल किया गया और अब संस्कृत क्यों शामिल की जानी चाहिए.

शिक्षा में केंद्र सरकार की भाषा की नीति शुरू से विडंबना वाली रही है. तीसरी भाषा के रूप में क्षेत्रीय भाषाओं को जगह देने की समय-समय पर मांग होती रही है पर इसे समझने की कोशिश नहीं की गई.

आख़िर कौन सी वह भाषा नीति है जो केवी में जर्मन पढ़ाने की इजाजत देती है, इस पर बहस करने के बजाय संस्कृत पढ़ाने की बात उछाल दी गई.

क्या यह एक धोखे से दूसरे धोखे की कहानी है?

संस्कृत और जर्मन को लेकर हो रही बहस के शोर में उस आवाज़ को याद करने की कोशिश करता हूँ जो रामावत चंदू के सिर के दीवार से टकराने से हुई थी.

वह तेलंगाना है या आंध्र प्रदेश जहां नालगोंडा है और उसमें तिरुमालागिरी गांव का वह निजी स्कूल जिसमें पहली क्लास में चंदू पढ़ने आया करता था.

वह किस जनजाति का बच्चा था? छह साल का चंदू क्या अपने परिवार से स्कूल जाने वाले पहले बच्चों में था? क्यों टकराया उसका सिर अपनी क्लास की दीवार से?

चंदू संस्कृत और जर्मन से बहुत दूर भारत की एक मात्र ‘राष्ट्रभाषा’ अंग्रेज़ी न बोल पाने के कारण मारा गया. उसकी अध्यापिका सुमति ने उससे सवाल पूछा, जिसका जवाब उसे अंग्रेज़ी में देना था.

उसकी जगह वह तेलुगु बोलने लगा. बाकी बच्चे उसका मज़ाक उड़ाने लगे और वह चिढ़कर तेलुगु में ही चीखने लगा.

झल्लाई सुमति ने उसे मारने को हाथ उठाया और वह बचने को दीवार से जा टकराया और फिर वह मर गया. आखिर वह छह साल के बच्चे का कोमल सर था!

लेकिन संस्कृत के ज़रिए भारत के स्वर्णिम अतीत का भार उठाने के लिए सख़्त गर्दन और सिर खोजने वालों या जर्मन के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय क्षितिज में उड़ान भरने की तैयारी में लगे नीतिज्ञों को चंदू पर बात करने की मोहलत कहां?

मीडिया के लिए काफ़ी था कि सुमति और उस स्कूल की प्रमुख की गिरफ़्तारी हो गई. अब चंदू का नाम गूगल में कहीं नहीं है.

और यह मसला मात्र बाल अधिकार आयोग का होकर रह गया लगता है जबकि इस पर स्कूली शिक्षा से जुड़े सारे विभागों को तलब करके उनसे चंदू की मौत का हिसाब मांगा जाना चाहिए था.

जब बात एक देवभाषा की और एक अंतरराष्ट्रीय भाषा की हो रही हो तो तेलुगु को कौन पूछता है? और यहीं भारत की स्कूली शिक्षा की भाषा संबंधी बहस का नकलीपन और उसकी मूर्खता प्रकट होती है. इसमें जो बेईमानी और धोखाधड़ी है, उसकी कोई बात नहीं करना चाहता.

चंदू की मौत क्यों हुई? पहली क्लास से बच्चे की घर-पड़ोस की भाषा छोड़ अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाई का रिवाज़ जिन्होंने चलाया और प्रचलित किया, उनके सिर चंदू का ख़ून है.

सुमति जैसी अध्यापिकाएं आखिर क्यों बदहवास हो उठती हैं कि उनके छात्र अंग्रेज़ी क्यों नहीं बोल पा रहे! यह दबाव उन पर कौन डालता रहा है?

केंद्रीय विद्यालय संगठन ने जब छठी क्लास से जर्मन की पढ़ाई का प्रावधान किया तो उसने दुनिया भर में भाषा की शिक्षा के सारे मान्य सिद्धांतों का उल्लंघन किया.

कोई भी भाषा, जो बच्चे के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल में नहीं है और जिसके प्रयोग के ढेर सारे अर्थपूर्ण अवसर उसके पास नहीं हैं, सिर्फ़ क्लास में पढ़कर सीखी-सहेजी नहीं जा सकती.

साथ ही यह सवाल भी करना होगा कि किस तर्क से तृतीय आधुनिक भारतीय भाषा के रूप में संस्कृत का दावा पेश किया जा रहा है?

वह भाषा न तो हमारे वातावरण में है, न उसके सार्थक प्रयोग के अवसर बच्चों के पास हैं.

तो शब्दरूप, धातुरूप रटाकर मात्र व्याकरण आधारित प्रश्नों के सहारे ऊंचे अंक बटोर लेने के प्रलोभन के अलावा इसमें और क्या है?

यह भी सोचें कि संस्कृत पढ़ाने के पीछे कहीं भारतीय संस्कृति और हिंदू धार्मिक मूल्यों का आचमन कराने भर का उद्देश्य तो नहीं.

दरअसल यह मौक़ा है कि भाषा और शिक्षा के रिश्ते पर हम ईमानदारी से खुलकर बात की शुरुआत करें.

सारे शोध बताते हैं कि शुरुआती कक्षाओं में घर-पड़ोस की भाषा में शिक्षा से बच्चे को सीखने में आसानी होती है. इससे उसमें भाषाई लचीलापन भी आता है जिसके सहारे वह आगे दूसरी भाषाएं सीख जाता है.

फिर हमारे देश में पहली क्लास से ही मार-मारकर अंग्रेज़ी में पढ़ाने की वकालत जो मां-बाप भी करते हैं, वे अपने बच्चों के प्रति कितने संवेदनशील हैं, यह सवाल भी करने की ज़रूरत है.

संपन्न और पढ़े-लिखे माता-पिताओं ने, जिन्होंने सरकारी स्कूल छोड़कर अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में अपने बच्चों को भेजना शुरू किया, कभी सोचा न होगा कि वे कितने बच्चों की पढ़ाई का रास्ता बंद कर रहे हैं.

इसका कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ है कि अपनी भाषा में शिक्षा न मिलने और अंग्रेज़ी के दबाव के कारण कितने बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं.

इस अपराध का जिम्मा उन्हें भी लेना होगा, जिन्होंने शिक्षा के बुनियादी अधिकार के क़ानून में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या घर पड़ोस की भाषा संबंधी विनोद रैना का प्रस्ताव पारित नहीं होने दिया.

मुझे बैठकों में बड़े अधिकारियों और राजनेताओं से जूझते हुए उनकी बेहिसी और अहमकपन पर विनोद की खीझ की याद है.

जो त्रिभाषा सूत्र का रोना रहे हैं, वे पहले शिक्षा के माध्यम पर बात करें. फिर त्रिभाषा सूत्र की आत्मा की. पहले यह कि यह कोई संविधान की धारा नहीं. दूसरे, यह कि भारत जैसे देश में बच्चे को कम से कम तीन अलग-अलग भाषाओं से परिचित कराने की युक्ति है.

तीसरे, इस सूत्र को उत्तर भारत के, खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश आदि ने पहले ही ध्वस्त कर दिया हिंदी, अंग्रेज़ी और संस्कृत पढ़ाकर.

नतीजा, इन प्रदेशों के बच्चे कोई दूसरी भारतीय भाषा नहीं जानते. संस्कृत जानने का सवाल नहीं.

जबकि दक्षिण भारत या उत्तर पूर्व के बच्चे एक साथ तीन-चार भाषाएं जानते हैं. केन्द्रीय विद्यालय भी यही करता आ रहा था. जब तक उसने तीसरी आधुनिक भारतीय भाषा की जगह जर्मन की व्यवस्था न कर दी.

इस तरह एक धोखे से दूसरे धोखे की कहानी है यह.

वक़्त आ गया है कि चंदू जैसी और मौतें न हों, इसका इंतजाम किया जाए. ऐसा न हो कि सुमति जैसी अध्यापक भाषा के दबाव में बच्चे को ही भूल जाएं.

सुमति को तो पकड़ लिया गया, लेकिन उन बच्चों को भला कैसे सज़ा दें जो अपने सहपाठी के अंग्रेज़ी न बोल पाने पर ज़ोर-ज़ोर से उसका मज़ाक उड़ा रहे थे?

क्यों अपनी भाषा बोलना ही शर्म की बात हो गई है भारत के स्कूलों में?

असल बहस शिक्षा में भाषा की नीति पर फिर से विचार करने का होना चाहिए.

संस्कृत और जर्मन की बहस, इसीलिए एक नकली बहस है. लेकिन यह अवसर है, पहले की ग़लती को सुधारने का.

शिक्षा में भाषा की नीति पर फिर से विचार करने का. आरंभिक कक्षाओं में माध्यम के रूप में घर-पड़ोस की भाषा को अनिवार्य करने का.

इसमें अलग से पैसा ख़र्च न होगा. न नए शिक्षक बहाल करने होंगे. बल्कि अभी आठ-आठ क्लास तक अंग्रेज़ी में बोलने को मज़बूर शिक्षक राहत की सांस लेंगे.

यह स्कूलों की दुनिया की असमानता ख़त्म करने का सबसे सस्ता और कारगर तरीका है. यह चंदू की मौत का प्रायश्चित होगा जिसके ज़िम्मेदार हम सब हैं.

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