‘तरल भय’ का समय

हम तरल भय के समय में रह रहे हैं.हमें इसकी खबर नहीं कि हम पर वार किस कोने से और कब किया जाएगा.यह भय फैलकर हमारी पूरी ज़िंदगी के हर हिस्से में रिस गया है.असुरक्षा और अपने अगले क्षण के बारे में अनिश्चितता प्रत्येक समाज का स्थायी भाव बन गया है.इस भय से दुनिया का कोई देश या कोई आबादी खाली नहीं है.

जिग्मन बौमेन, प्रख्यात पोलिश समाजशास्त्री और दार्शनिक अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले अपने वक्त के बारे में अपनी आशंका और आशा,दोनों ही अल-जज़ीरा को दिए इंटरव्यू में व्यक्त कर रहे थे.नब्बे साल के लम्बे जीवन में कई मानवीय आपदाओं को देख और झेल चुके बौमेन के स्वर में उत्तेजना न थी,समझदारी का ठहराव था ज़रूर.

भय से कोई भी मुक्त नहीं है.इससे सिर्फ मजदूर,गरीब ग्रस्त नहीं होंगे.सफेदपोश लोग,जो बड़ी कंपनियों में हैं या ऊपर के दर्जे वाले कामों में,अब किसी को यह निश्चिन्तता नहीं कि कल सुबह उसका काम उसके पास रहेगा ही.हो सकता है कि नींद खुलने के साथ आपका ओहदा और आर्थिक सुरक्षा,दोनों ही जाते रहें.इस वजह से एक बड़े वर्ग का जन्म होता है जिसे बौमन ‘प्रेकातारियत’ कहते हैं.इस शब्द का ध्वनिसाम्य हमारे परिचित शब्द ‘प्रोलेतारियत’ से है.‘प्रोलातारियत’ सर्वहारा है.लेकिन ‘प्रेकातारियत’हर कोई है,सर्वहारा के अलावा अन्य सामाजिक समूह भी.

यह जिस मूल शब्द से बना है,उसका अर्थ है बालू पर चलना,जो ठोस नहीं है.अनिश्चिय और कहीं भी धँस जाने का डर.बौमन रेत पर चलने से भी ज़्यादा एक दूसरे रूपक का जिक्र करते हैं,हम ऐसी ज़मीन पर चल रहे हैं जिसमें बारूदी सुरंगें भरी हुई हैं.इसका पता हमें है.लेकिन यह नहीं कि किस कदम पर बारूदी सुरंग फटेगी.इसके साथ दूसरी स्थिति यह है कि बचने या सहारा लेने के लिए हमारे पास कोई स्तम्भ या ढाँचा नहीं.

‘प्रेकातारियत’ को साधारण जीवन पर अपना काबू न रहने का अहसास और उसकी बेचैनी हमेशा अपनी गिरफ्त में लिए रहती है.यह भावना सर्वव्याप्त है.

ऐसी स्थितियाँ हो सकती हैं जिन्हें आप अति के छोर पर रखें.लीबिया,इराक,यमन के लोग इस अतिवादी स्थिति में हैं.वे सब जिनके अच्छे घर और इज्जतदार सामाजिक स्थिति थी,आज सिर्फ शरणार्थी रह गए हैं. पनाह देने वाले मुल्कों के लोगों के रहमो करम पर निर्भर.वे खुद जो अन्याय और दुर्भाग्य के शिकार हैं,और जिन्हें सहानुभूति चाहिए,उनसे उन्हें पनाह देने वाले डरने लगते हैं.इस वजह से कि यह लगता है कि उनकी वजह से उनका चैन छिन सकता है,उनका हिस्सा बँट सकता है.वे भय और घृणा के पात्र बन जाते हैं, जिनका कोई स्वागत नहीं है,सिर्फ उन्हें बर्दाश्त किया जा रहा है. इस वजह से खुद उनके भीतर एक गुस्सा पैदा होने लगता है.यह खुद से होता है,और उनसे जो उन्हें पनाह तो दे रहे हैं लेकिन इज्जत नहीं जिसके बिना इंसानी अहसास जाता रहता है.

क्या वे अपनी जगहों पर लौट पाएँगे? और क्या स्थिति कभी भी पहले जैसी हो सकेगी? वैसा अगर किसी मायने में हो जाए तो भी क्या वे खुद वहाँ लौटना चाहेंगे? इस तरह जाती और समाजी वजूद एक बालू की जमीन या किला बन जाता है.

ख़तरा कहाँ है,पहले जाना जा सकता था.किस ओर न जाने से आप बच सकते हैं,बताया जा सकता था.अब वह वहाँ भी आपकी ताक में हो सकता है जिसे आप सबसे अधिक इत्मीनान की जगह मानते हैं.कॉफ़ी हॉउस या पिकनिक की जगह भी आप मारे जा सकते हैं.निरंतर भय की यह अवस्था के कारण हम अपने अलावा हर किसी को इसका स्रोत मानते हैं.खासकर उनको जो हमें किसी न किसी वजह से अजनबी जान पड़ते हैं.इस कारण शरणार्थी सबसे अधिक नफरत के शिकार हो सकते हैं.

शरणार्थी कौन है और कब वह वाजिब शहरी बन जाता है, कैसे बताया जा सकता है? क्या अपने मुल्कों से खदेड़ दिए गए इस्राइली इसी दुविधाग्रस्त कुंठा के शिकार हैं और अब उन्होंने फिलिस्तीनियों को वतन बदर करके अपना बदला लिया है? वे निकाल बाहर किए गए यूरोप से, लेकिन वह यूरोप अपना अपराध कबूल करने की जगह इस्राईल के इस भ्रम को मजबूत करने में लगा है कि वे अपनी पवित्र भूमि पर लौट आए हैं.

राष्ट्रपति ने जब मुस्लिम बहुल देशों के लोगों को अमरीका के लिए निषिद्ध ठहराया तो कनाडा ने कहा कि उन सबका खुले बाहों स्वागत है. यह कहने के कुछ ही समय बाद क्यूबेक की मस्जिद पर खूनी हमला हुआ. जिसने हमला किया वह शरणार्थी और मुसलमान, दोनों को ही खतरनाक मानता है.

तो फिर वह उदारता और सहानुभूति तो प्रधान मंत्री त्रुदो में है, क्या कनाडियन स्वभाव नहीं है? बौमन का कहना है कि समझदारी और सहानुभूति एक दीर्घ अभ्यास का मामला है.यह एक पीढ़ी में  हो जाए, ज़रूरी नहीं. जिसे कॉस्मोपॉलिटन चेतना कहते हैं,वह कैसे विकसित होगी? क्या सांस्कृतिक बहुलतावाद इसका उपाय है? बौमन के मुताबिक़ हम सब सांस्कृतिक बहुलता के परिवेश की पैदाईश हैं.लेकिन यह चेतना स्वाभाविक और स्वतः उत्पन्न नहीं होती.

सामान्य मानवीय प्रवृत्ति खतरे की आशंका में अपने खोल में सिकुड़ जाने की है. अगर हमें यह समझ आ सके कि अपने खोल में बंद होने की सुविधा हमें है ही नहीं क्योंकि किसी भी समय के मुकाबले हम अब कहीं अधिक अन्तरनिर्भर हैं.यह आर्थिक और सांस्कृतिक , दोनों ही प्रसंगों में सच है.

ऐसे मौकों पर हमेशा ही सरल उपाय की और भागने का लोभ होता है. ऐसा नेता जो यकीन दिलाए कि वह सब कुछ ठीक कर देगा और हर विजातीय तत्त्व पर नियंत्रण कर लेगा, आकर्षित करता है. दूसरा प्रस्ताव, जो प्रधान मंत्री त्रुदो या जर्मनी की राष्ट्रपति मर्कल का है, कठिन और दुस्साध्य मालूम पड़ता है. लेकिन इसका अर्थ यही है, जैसा क्यूबेक के हत्याकांड के बाद कनाडा के प्रधान मंत्री और सरकार ने दिया, कि मनुष्य को मनुष्य की तरह स्वीकार करने के सिद्धांत, और पूरी पृथ्वी पर हर किसी के अधिकार को स्वीकार करने के उसूल का व्यवहार जारी रहेगा, इसे दुहराने और इस पर दृढ बने रहने के अलावा और कोइ विकल्प नहीं है.

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