संघर्ष का दायित्वबोध

इस साल ग्यारह सितम्बर को मुक्तिबोध को गुजरे पचास साल हो गए.1964 की गर्मी में अचेत मुक्तिबोध को छत्तीसगढ़ के कस्बे से ट्रेन में लेकर हरिशंकर परसाई और अन्य युवा लेखक दिल्ली पहुँचे. उम्मीद थी कि नौजवान लेखकों का प्यारा यह लेखक, जो तब सैतालीस साल का भी नहीं हुआ था,आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के माहिर डॉक्टरों के चमत्कार से बचा लिया जाएगा. वह नहीं होने को था. मुक्तिबोध ई मृत्यु जब हुई, वे सैंतालीस के भी नहीं हुए थे.

शमशेर बहादुर सिंह ने कहा कि मुक्तिबोध एक घटना हो गए हैं. अतिशयोक्ति नहीं की थी उन्होंने और यह भी सही है कि आज तक उनसे बड़ी घटना हिंदी कविता में घटी नहीं.घटना वह त्रासद थी. अब तक उसका पूरा अर्थ हम कर  नहीं पाए हैं. श्रीकांत वर्मा ने, जो मध्य प्रदेश के उन नौजवान कवियों में थे, जो मुक्तिबोध को प्रिय थे और मुक्तिबोध को भूलना जिनके लिए मुश्किल था, ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ के पहले संस्करण में क्षोभपूर्वक लिखा कि मक्तिबोध का पहला संग्रह उनकी अंतिम कविताओं का हो-हमारे समाज में कविता को क्या स्थान हासिल है, इसका इससे अच्छा परिचय और क्या हो सकता है. इसके आगे वे लिखते है कि अपनी मृत्यु के लिए कवि भले जिम्मेदार हो, समाज की मृत्यु के लिए वह कतई जिम्मेदार नहीं.

गजानन माधव मुक्तिबोध,एक निम्न मध्यवर्ग का पारिवारिक व्यक्ति, नौकरी और शहर बदलता रहा. थोड़े चैन और सुकून की तलाश में,जिससे वह उन कविताओं को वह वक्त दे सके जो वे उससे चाहती थीं, जो उसके साथ बरसों-बरस रहती थीं,बक्से में बंद और अपने कवि को लगातार पुकारती हुई. वह उसे मिला अपने अंतिम सालों में,जब उसे राजनादगाँव के कॉलेज में लेक्चररी मिल गई.

मुक्तिबोध स्वतंत्र भारत की उषाकाल के कवि थे. लेकिन उनकी कविता में सुकून नहीं है,कहीं पहुँच जाने की तसल्ली नहीं है.वे मानव सभ्यता की ट्रेन को तेजी से भागते हुए देखकर चिंतित थे,ऐसी दुर्घटना की आशंका से ग्रस्त जो उसके साथ होने ही वाली थी.क्या इस दुर्घटना को रोका जा सकता है? या यह ऐसी ट्रेन है जिसके सारे डब्बे बंद हैं और जिनमें एक से दूसरे में नहीं पहुँचा जा सकता और जिसकी सवारियां सो चुकी हैं और कोई वाज़ उनतक नहीं पहुँच सकती.

कविता तब दुर्निवार हादसे की चेतावनी के साथ उसकी प्रत्याशा में बचाव अभियान, दोनों की तैयारी है. कवि को चेतावनी सुने जाने का आश्वासन नहीं है फिर भी खतरे की लाल झंडी दिखाते ही रहना है.

मुक्तिबोध मार्क्सवादी थे.लेकिन अस्तित्ववादी अतीत के कारण  उनमें स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के बीच के रिश्ते का बोध इतना तीव्र था कि मार्क्सवाद उपलब्ध हो जाने के बाद वे निश्चिन्त नहीं हो पाए. यह देखना दिलचस्प है कि किस तरह मार्क्सवाद जैसी परिवर्तनकारी विचार पद्धति या दर्शन की प्राप्ति के बाद किस कैसे परिवर्तन न होने की आसान व्याख्याएं करके अपनी जिम्मेदारी से बचने का रास्ता निकाल लिया जाता है. इस प्रकार मार्क्सवाद सक्रियता की जगह वस्तुगत परिस्थितियों के निर्माण की अंतहीन प्रतीक्षा के लिए खूबसूरत आवरण बन जाता है. मुक्तिबोध विचारधारा के हामी होते हुए भी उसके  इत्मीनान का लाभ नहीं लेते.उनकी बेचैनी और छटपटाहट का कारण यही है.

मुक्तिबोध के काव्य जीवन की शुरुआत रोमांटिक जमीन पर हुई. लेकिन बीसवीं सदी के छठे पांचवे दशक  तक आते-आते उनका अपना कंठ फूटने लगा और छायावादी शब्दावली और मुद्राओं से वे मुक्त होने लगे. वाग्मिता उनमें थी और तरानेबाजी की प्रवृत्ति भी आरंभ में दिखलाई पड़ती है लेकिन समय गुजरने के साथ वे इरादों का बयान करने की जगह अंतर्कथाओं को सुनने और सुनाने में दिलचस्पी लेने लगते हैं.

मुक्तिबोध का काव्य संसार घटनापूर्ण है लेकिन वे बाहरी दुनिया में, ऐतिहासिक अवकाश में नहीं घटतीं. वे मनुष्य की आत्मा के भीतर यात्रा करते हैं और उसके ज़ख़्मी होने या ध्वंस की खबर लाते हैं. उनका सबसे बड़ा दुःख है मनुष्य का स्वयं अपनी संभावनाओं की ओर से उदासीन हो जाना. ‘एक अंतर्कथा’ नामक कविता में माँ-बेटे की जंगल में अग्नि-काष्ठ’ चुनने की कथा है ,

“ मैं हर टहनी में डंठल में

एक-एक स्वप्न देखता हुआ

पहचान रहा प्रत्येक..”

हम अपनी सर्जनात्मक क्षमताओं को इस वजह से नज़रन्दाज कर देते हैं कि वे हमें हमारे सुरक्षित आराम के दायरे से खींच निकालती हैं और जीवन की गाड़ी में जोत देती हैं.अपनी आज़ादी के लिए ज़रूरी अपनी  जिम्मेदारी से बचने के कारण हम अपने ‘अंतर्जीवन के मूल्यवान संवेदन’ को कचरे पर फ़ेंक देते हैं. दूसरी कविताओं में मुक्तिबोध इस वजह से इस आलसी और सुविधावादी शिक्षित वर्ग की भर्त्सना करते हैं कि वह भयवश इन कोमल संवेदनाओं को तलघर में डाल देता है.

मुक्तिबोध की कविताओं में जहाँ आत्मध्वंस की खबर है तो दूसरी ओर मानवीय संभावनाओं की गर्म्हाहत से भरी जागरुकता भी है. इसलिए दूसरी बड़ी बेचैनी है दोस्तों की तलाश, सहचर मित्र की खोज अ, अपने अंतःकरण की यत्न का विस्तार करने का यत्न.यह सारा काम फौरी है, कल पर नहीं टाला जा सकता. इसलिए मुक्तिबोध अपनी कविताओं को इस असंभव संधान के काम पर लगा देते हैं. और चूँकि यह खोज अंतहीन है, कभी पूरी तरह से पूरी नहीं होगी, कविता का समाप्त होना भी कठिन होता जाता है.

मुक्तिबोध की कविता इस तरह एक अजीबोगरीब तरीके से खत्म होने से इंकार करने लगती है. वह शिल्प और रूप के दायरे से निकल जाती है. बालचंद्र राजन, यूरोपीय कविता के संदर्भ में असमाप्य के रूप पर विचार करने का प्रस्ताव करते हैं.जो सामाजिक और राजनीतिक तनाव कविता को समाप्ति के इत्मीनान से  वंचित करते हैं, उनका शमन करके कविता से सौंदर्य की कोई पूर्ण अनुभूति प्राप्त करने की कोशिश उसकी राजनीति से साथ एक तरह का धोखा है.

मुक्तिबोध अपनी छाँह को सर्वगामी कहते हैं. ‘अँधेरे में’ नामक  कविता में वे हर नुक्कड़-चौराहे पर मौजूद रहते हैं, हर संघर्ष में भागीदारी करते हुए. और यह अंतहीन है क्योंकि अंत में जब ऐसा लगता है कि अभीष्ट मिल गया , वह खो जाता है और उठी हुई बांह , उठी ही रह जाती है.

वृद्ध मार्क्स से इंटरव्यू लेने गए एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि ‘(असल में) क्या है?…’ समंदर के गर्जन ने उसके सवाल को डुबा दिया.मार्क्स को सुनाई पड़ा, क्या है….. समंदर घहराता रहा. कुछ खामोशी के बाद पत्रकार को सुनाई पड़ा , संघर्ष.

संघर्ष ही है और कवि के पास इस संघर्ष में भाग लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं और उससे सुखकर काम भी नहीं क्योंकि इसी के दौरान वह खुद को भी हासिल करता है.मुक्तिबोध संघर्ष में निजी भागीदारी के दायित्व बोध के कवि हैं,संघर्ष के इस गहरे और तीखे दायित्व बोध के कवि.

 

 

 

 

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s