संकीर्ण भारतीयता

तिरंगी टोपी पहने याकूब नमाज़ पढ़ रहा है. सफ़ेद और काली टोपी पहने एक दूसरा ‘बदमाश’ मुसलमान उसे पैसे के बदले बम-विस्फोट करने को फुसलाता है. ‘तिरंगी टोपी’वाला अच्छा मुसलमान देशभक्ति की  कसमें खाता है, इस्लाम का सन्देश देता है और उसके उकसावे में आने से इनकार कर देता है. काली- सफेद टोपी पहने ‘बदमाश’ मुसलमान हाथ में बम लिए कैमरे में ताकता रह जाता है. यह आधे मिनट की फिल्म है जो आज कल पी.वी.आर. में असली फिल्म के पहले दिखाई जा रही है, ऐसा अखबारों ने बताया. ‘आतंकवाद’ नामक यह फिल्म मुंबई के बृजभूषण सिंह ने आतंकवाद के खिलाफ सामाजिक जागरूकता पैदा करने के मकसद से बनाई है. उनका कहना है कि भारतीय मुसलमानों को अपनी छवि सुधारने की ज़रूरत है: “लेकिन मैं उनकी सकारात्मक छवि दिखाना चाहता हूँ, यह बता कर कि अब वे अपनी जिम्मेवारी के प्रति सजग हो रहे हैं. मैं गुमराह हो रहे (भारतीय)मुसलमानों को होशियार करना चाहता हूँ और पाकिस्तानी मुसलमानों को चेतावनी देना चाहता हूँ कि वे हमारे नौजवानों को बहकाने से बाज आएँ.”

सेंसर बोर्ड ने यह फिल्म पास कर दी है और पी.वी.आर.के मालिक कहते हैं कि इस फिल्म को 1952 के भारतीय सिनेमेटोग्राफी कानून की खंड 12(4) के अनुपालन में दिखाया जा रहा है. इसके अनुसार हर सिनेमा हाल को सामाजिक हित के संदेश वाली कोई फिल्म दिखाना अनिवार्य है. उन्हें इस फिल्म से  कोई दिक्कत नहीं. लेकिन अगर दर्शकों को भी यह फिल्म परेशान नहीं करती तो मान लेना चाहिए कि हमारी सामाजिक अंतरात्मा बीमार हो गई है और उसे इलाज की ज़रूरत है.

पिछले दिनों एक राष्ट्रीय बयान आया कि भारतीय मुसलमान इस्लामिक स्टेट के इशारे पर नहीं नाचेंगे. यह अलग मसला है कि मुसलमानों को ऐसा चरित्र प्रमाणपत्र देने वालों पर खुद मुसलमानों के कत्लेआम की साजिश का आरोप है. जो कातिल हैं उन्हें अपनी छवि सुधारने की ज़रूरत नहीं. अब वे मारने की जगह अपने शिकारों को गोद लेने पर आमादा हैं और अपने ‘पालित बच्चे’ को सही राह पर रखने की अपनी अभिभावकीय जिम्मेदारी निभाने के राष्ट्रवादी कर्तव्य का निर्वाह करने की राह पर चल पड़े हैं.

देश के एक नागरिक वर्ग को सार्वजनिक रूप से चिह्नित करने और उन्हें पाबन्द करने के लिए तिरंगे के ऐसे इस्तेमाल पर हमारे उन राष्ट्रीय नेताओं को शर्म आती जिन्होंने इस एक समावेशी, सद्भावपूर्ण समाज के प्रतीक के रूप में प्रस्तावित किया था. ध्यान रहे कि सिर्फ एक संगठन था जिसने लंबे अरसे तक तिरंगे को अपना मानने से इनकार किया था. उसका नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. उसने तो आज़ादी के फौरन बाद तिरंगे को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी बताया था. उसके मुताबिक़ तीन रंग चित्त में विकार उत्पन्न करते हैं इसलिए एकरंगा भगवा ही एक मात्र राष्ट्रीय रंग हो सकता है. हाल हाल तक सबसे प्रामाणिक रहे स्वयंसेवक ने, जो अब अपने शिष्य के द्वारा अपदस्थ किए जाने के बाद राह ताकने की भूमिका में डाल दिए गए हैं, कुछ बरस पहले इस तिरंगे से असंतोष जताते हुए कहा था कि इसके केंद्र में जो चक्र है, वह बौद्ध धर्म का एक प्रतीक है और इस तरह यह पर्याप्त रूप से धर्म-निरपेक्ष ध्वज नहीं है.

आपत्ति अपने हिसाब से ठीक जगह की गई थी. आखिर बौद्ध मत हिंदू मत के विकल्प के रूप में ही आया और अपनाया गया था. स्वतंत्र भारत में हिंदू अल्पमत में अगर जा सकते थे तो इस्लाम या ईसाई मजहबों की वजह से नहीं. सिर्फ और सिर्फ बौद्ध धर्म ही उसे चुनौती दे सकता था, जिसे हिंदू धर्म की अनाचारी जातिव्यवस्था के विरुद्ध भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में दलितों ने अपनाना शुरू कर दिया था. यह एक दूसरी विडंबना है कि इस देश में धर्मनिरपेक्षता नामक बीमारी फैलाने का आरोपी गाँधी का चहेता अगर सबसे अधिक प्रभावित किसी से था तो बुद्ध से. धर्म से उसे विराग था लेकिन दुक्खात्मक संघर्षपूर्ण जीवन में बुद्ध जैसी प्रशांति को हासिल करना उसे मानवीय आदर्श मालूम पड़ता था. कटुता नहीं.

तिरंगे के बीच गाँधी के प्रिय चरखे की उपस्थिति के लिए उनके शिष्य ने उसका सबसे अनिवार्य हिस्सा उसके चक्र को माना और उसे प्रतीकित करने के लिए सारनाथ के अशोक स्तंभ के चक्र को चुना. इस तरह श्रम और शांति का संयोग राष्ट्रीय झंडे में किया गया.लेकिन जैसा पहले कहा गया, यह एक संगठन विशेष के कलेजे में फाँस की तरह चुभ गया.

इस तिरंगे का इस्तेमाल किसी को डराने, अपना वर्चस्व स्थापित करने या शर्मिन्दा करने के लिए नहीं किया जाएगा, यह वादा संविधान सभा में तिरंगे को राष्ट्रध्वज के रूप में प्रस्तावित करते हुए किया गया था. लेकिन बार-बार हमने भारत के मुसलमानों से यह माँग की है कि वे इस झंडे के प्रति अपनी वफादारी का सार्वजनिक इजहार करें. यह भी कि वे साबित करें कि वे पाकिस्तान के विरोधी हैं. और यह उन्हें बार-बार साबित करते रहना होता है. इस तरह यह झंडा उनके लिए आश्वासन नहीं, एक धमकी की तरह उनपर लटका रहता है.

फिल्म की बात करें. टोपी सारे मुसलमान नहीं पहनते. मुसलमान औरतें तो नहीं ही. तो फिर राष्ट्र के प्रति वफादारी क्या सिर्फ मुसलमान पुरुषों को साबित करनी है? या उनके राष्ट्रवादी होते ही मुसलमान  औरतें आप ही आप राष्ट्रवादी हो जाएँगी? लेकिन अभी तो बर्धमान में बम विस्फोट के बाद मुसलमान  औरत भी पकड़ी गई है? उसके लिए फिल्म कब बनेगी? फिर, जैसी टोपी भारतीय मुसलमान पहनते हैं, पाकिस्तानी या बांग्लादेशी मुसलमान भी वैसी ही टोपी पहनते हैं. तो क्या तीनों को अपनी-अपनी राष्ट्रीय टोपियाँ बनवानी चाहिए?

रहा सवाल छवि का, तो मुसलमान की छवि का निर्माण तो ‘ग़दर’ जैसी फिल्में करती रही हैं. लेकिन ‘अ वेडनसडे’ जैसी फिल्में कहीं अधिक सूक्ष्म और खतरनाक तरीके से मुसलमानों पर इस राष्ट्रवादी दायित्व का आरोपण करती हैं. फारूख शेख ने बहुत पहले तकलीफ के साथ कहा था कि हिंदी फिल्में मुसलमानों को कभी आम इन्सान की तरह नहीं दिखा पाती हैं. वह मुसलमान जो अपने रोज़मर्रेपन से किसी हिंदू या सिख या आदिवासी की तरह ही जूझता रहता है.

जहाँ तक आतंकवाद का सवाल है तो वह तो शायद राष्ट्र के लिहाज से माओवादी भी कर रहे हैं. उनमें अधिकतर आदिवासी शामिल हैं. तो उन्हें अपनी छवि सुधारने के लिए किस तरह का उपदेश सिंह जैसे फिल्मकारों से लेना होगा?

यह भी ध्यान रहे कि पाकिस्तान बन जाने के बाद भी जिन मुसलमानों ने भारत में टिकने का फैसला किया वे इससे अनजान न थे कि वे बहुसंख्यक हिन्दुओं के बीच रहेंगे. लेकिन भारत ने उनसे यह वादा किया था कि उनके साथ हर स्तर पर बराबरी का व्यवहार किया जाएगा. क्या वह किया गया है? क्या उनसे आम हमवतन की तरह का बर्ताव किया गया है? क्या उन्हें पुलिस, सेना, प्रशासन, शिक्षा में समान अवसर दिए गए हैं? क्या नेहरू को यह नहीं कहना पड़ा था कि उन्हें इन सारी जगहों पर मुसलमानों की घटती जाती संख्या से काफी फ़िक्र है? और क्या उनकी चेतावनी के बावजूद मुसलमानों के साथ भेदभाव नहीं होता रहा? क्या वे हमेशा अपर्याप्त भारतीय नहीं बने रहे?

पर्याप्त भारतीय बनने के क्या तरीके हैं? क्यों एक हिंदू को जन्मना यह पर्याप्तता उपलब्ध हो जाती है और बाकियों को कमानी पड़ती है? क्यों एक हिंदू बेहतर जीवन के लिए पहले मौके पर अमरीका की नागरिकता लेकर भी कट्टर भारतीय बना रहता है और वहीं बैठा-बैठा मुसलमान विरोधी भारतीय राष्ट्रवादी वमन करता रह सकता है और क्यों यहाँ जलील होकर भी टिका हुआ मुसलमान संदिग्ध बना रहता है कि वह यहाँ इसलिए है कि बाहर के इस्लामी राष्ट्वादियों के लिए ज़मीन हमवार कर सके?

मुसलमानों के साथ संदिग्ध और संभावित अपराधियों जैसा व्यवहार करते हुए क्या भारतीय राज्य की संस्थाओं को और हिन्दुओं को कभी हिचक हुई है? जो हिंसा में अनपढ़ों की हिस्सेदारी की बात करते हैं, उन संपन्न और सुशिक्षित लोगों ने क्या अपनी कॉलोनियों में मुसलमानों को घर खरीदने या किराए पर लेने की इजाजत दी है? क्या आज तक की मुसलमान विरोधी सांप्रदायिक हिंसा की आज तक की घटनाओं का इन्साफ हो पाया है? जो मुसलामानों को मार रहे थे या खदेड़ रहे थे, वे तो मुसलमान न थे? लेकिन इसके बावजूद बाइज्जत भारतीय तो वे बने रहे न ?

 

  • जनसत्ता, नवम्बर, 2014
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