अटाली का आईना

‘59.2 किलोमीटर’, माशूक अली ने इंजिन बंद करते हुए कहा. यह दिल्ली विश्वविद्यालय के मॉरिस नगर और अटाली के बीच की दूरी है. अटाली,हरियाणा का गाँव, वल्लभगढ़ प्रखंड और फरीदाबाद जिले की एक इकाई. फरीदाबाद तो दिल्ली ही है. दिल्ली मेट्रो खिंचती हुई वल्लभगढ़ तक तो आ ही पहुँची है. तो अटाली को भी बृहत्तर दिल्ली का हिस्सा ही क्यों न मान लें!

हम अटाली के मुहाने पर खड़े हैं. पुलिस ने बैरीकेड लगा रखा है. हम तीन ज़रा बेपरवाह दीखने की कोशिश करते हुए उसके बीच से गाँव में घुसने की कोशिश करते हैं कि एक पुलिस का जवान हमारे पास आ पहुँचता है. ‘क्या आप यहीं के हैं? उसके सवाल में ही जवाब है. ‘हम दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं.’ ‘क्यों आए हैं? ‘अभी बाहर वालों को इजाजत नहीं.’ ‘लेकिन हम तो बस, यों ही देखने आए हैं, हम किसी अखबार से नहीं.’ वह लाचारी से अपने ऊपर वाले अफसर की ओर इशारा करता है. गाड़ी का शीशा ज़रा नीचे सरकता है और वह अपनी ऊबी हुई आँखों से हमें ताड़ता है. मैं अपना पहचान पत्र खिड़की के भीतर करता हूँ.’ अरे, इसकी क्या ज़रूरत! प्रोफेसर लोग हो, झूठ क्यों बोलोगे! लेकिन अभी कोई बाहरी आदमी अन्दर जा नहीं सकता.’ हमारी जिद से परेशान होकर वह अपने ऊपरवाले का टेलीफोन नंबर दे देता है.

‘देखिए, अभी हमारी प्राथमिकता गाँव में शांति स्थापित करने की है. आप प्लीज एक हफ्ते बाद आइए.’ लेकिन हम तो अकेडमिक मकसद से आए हैं. हम कोई रिपोर्ट करने थोड़े ही आए हैं.’ ‘बड़ी मुश्किल से शान्ति हुई है.हालत नाजुक है.अभी हमारा पूरा ध्यान उसी को संभालनेपर है. बाहरी लोगों से मामला बिगड़ जाता है. आप एक हफ्ते बाद आइए. हम आपकी खुद मदद करेंगे.’ काबू रखने की कोशिश के बावजूद आवाज़ की खीझ छिपती नहीं. बात कितनी खींची जाए, तौल रहा हूँ कि फोन कट जाता है और फिर लगता नहीं.

वही तो हम समझना चाहते हैं. हिंसा के दस दिन बाद ही शांति कैसे स्थापित हो रही है! अभी पचीस मई की शाम को ही तो मुसलमानों पर हमला हुआ था और वे सब कुछ छोड़-छाड़ कर भागे थे. बच्चे, औरतें, मर्द, जवान और बूढ़े, सब! बगल के थाने में पनाह ली थी. फिर वे कैसे वापस आ गए, उसी गाँव में जहाँ से जान बचाकर निकल आना चमत्कार से कम न था!

ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ! पीटे गए मुसलमानों को वापस बुला लिया जा सका हो, यह तो मुज़फ्फरनगर में नहीं हुआ, न बोडोलैंड में और न गुजरात में. अपने आप में यह अनहोनी थी जो हो सकी. हम उसी अटाली को समझना चाहते हैं जो अपने मुसलमानों को वापस लाना चाहता था और ला सका है.

पुलिस वालों की निगाह हमारा पीछा ही कर रही हो, ऐसा नहीं.कुदरत उनकी मुश्किल जिम्मेदारी से गाफिल, गर्मी में कोई राहत देने के मूड में नहीं. वीटा का बूथ है, एक चाय की दूकान जिसमें समोसा छन-छन कर निकल रहा है. हम तीनों निरुपाय बेंच पर बैठ जाते हैं और चाय पीते हुए भीतर जान की जुगत तलाशते हैं. अली जावेद के लिए काली चाय तो यहाँ हो नहीं सकती. क्या शबनम हाशमी या कविता श्रीवास्तव के साथ आते तो यों ही बैठे रहते! मुझे हमेशा इन दोनों से ईर्ष्या होती रही है जिस तरह ये पुलिस या अधिकारियों से निबटती हैं. फोन पर फोन करता हूँ: कोई रास्ता मिले. हर जगह से जवाब आता है, अभी मुश्किल है!

गोइठों से भरा एक छकड़ा सामने से निकलता है. उन पर टिकी,पूरे मुँह घूंघट लिए एक औरत उसे हांकती जा रही है. गाँव से आया एक शख्स दस का नोट निकालता है और छाछ माँगता है: घर में दही नहीं जम सका है आज. एक टेम्पो आता है घर बनाने के सामान के साथ.

हम गाँव में उतरने का फैसला करते हैं: गर्मी से बदहाल पुलिसवालों को हमें  रोकने में ख़ास दिलचस्पी नहीं. स्कूल, मंदिर, टायर ले कर घूमते बच्चे और धूपिया वीरानी. बच्चों से मस्जिद का पता पूछते हैं  हिचकते हुए, वे बिना संकोच बताते हैं. गली-गली घूमते हुए एक खाली जगह आ निकलते हैं. ओह! यहाँ तो दिल्ली के चेहरे दिखलाई दे गए. एक समूह खड़ा है:झोले, नोटबुक समेत: तथ्य संग्रह दल की पहचान! सामने पेड़ के नीचे कुछ नौजान प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे हैं: यह दल उन्हीं से कुछ पूछ रहा है, बीच में एक नीची दीवार है. नौजवानों की देह भंगिमा से जाहिर है, उनकी सवालों में दिलचस्पी नहीं.दल का गाँव में स्वागत नहीं है.

मौशुमी बेचारगी से मुस्कराती हैं: सरपंच का मोबाइल नंबर खोज रही हैं, गाँव में कोई देने को तैयार नहीं. कुर्सी पर बैठे-बैठे गर्दन टेढ़ी करके एक जवाब देता है: ‘सरपंच यहाँ नहीं,बिज़नेस के लिए हांगकांग गए हैं.’ जाँच-दल अविश्वास से सर हिलाता है. मैं एक नन्हीं-सी किराने की दूकान पर बढ़ जाता हूँ, दल से परिचय प्रदर्शित नहीं करना चाहता. ‘लस्सी मिलेगी?’, दूकानवाली इनकार में सर हिलाती है, ‘पानी चाहिए?’ और पानी की बड़ी, ठंडी बोतल बढ़ा देती है.‘गाँव का क्या हाल है,’ मैं यों-ही-सा सवाल करता हूँ.‘हाल क्या, पुलिस भरी पड़ी है, अच्छा नहीं लगता. चली जाए तो शान्ति हो.’

हमारे इर्द-गिर्द छोटी सी भीड़ जमा होने लगती है. एक बूढ़ी औरत, कुछ नौजवान, एक अधेड़. सरपंच का नंबर किसी के पास नहीं, घर बगल की गली में है लेकिन अभी तो वहाँ सिर्फ उसकी घरवाली और बूढ़ी माँ  होगी. साफ़ है, गाँव के लोग नहीं चाहते कि सरपंच से कोई बाहरी मिले.

‘ओ, पहले ये बता, तुम मुल्ला में से हो कि हमारे में से? ’बूढ़ी औरत पूछती है. हम हँसकर आशंका भरे सवाल का मुकाबला करते हैं.‘आओ, रोट खा लो, पाण पी लो,’ बूढ़ी औरत फोन नंबर का विकल्प देती है. हँसी के बीच हम इस न्योते के तिनके के सहारे अपरिचय के सागर को पारकर सामने के घर में प्रवेश कर जाते हैं. चौकी, मोढ़े, कुर्सी पर हम खुद को जमा लेते हैं. ठंडा पानी आता है.

बात शुरू करना क्या इतना आसान है? ‘क्या हाल है गाँव का?’ ‘प्रशासन भरा पड़ा है, आने-जानेवालों पर रोक-टोक हो रही है. काम रुका पड़ा है, मीडिया आता रहता है. यह कोई अच्छी बात थोड़े ही है? हमारा गाँव आदर्श गाँव है, जी.कभी लड़ाई-झगड़ा किसी ने सुना नहीं. अब देखो, आप जैसे लोग तो रोज़ ही आ रहे हैं. रोज़ कुछ छप रहा है, टी.वी.वाले दिखा रहे हैं, गाँव की बदनामी हो रही है.” पूरी दुनिया के आगे गाँव का इस तरह उघड़ जाना अहाते में बैठे लोगों को नागवार गुजर रहा है.

‘इसके लिए आखिर जिम्मेवार कौन है?’, पूछने से खुद को रोक लेते हैं. पूछते हैं, ‘तो क्या सोच रहे हैं आप लोग?’

वह मुसलमानों के बर्ताव से दुखी है. आखिर इनके बाप-दादों को हमारे पुरखों ने ही तो बसाया यहाँ! ये सब फ़कीर हैं, इन्हें ज़मीन दी, अपने यहाँ काम दिया. कल तक ये हमारी थाली में खाते थे, हम अपनी औरतों को इनके साथ भेज देते थे स्नान को.कोई भी काम हो, हमैं से ये पैसे लेते हैं, अभी भी इन पर हमारा लाखों रुपया है. अभी भी इनके कुछ परिवार ऐसी एक ज़मीन पर हैं जो सरकारी है, हमने तो शिकायत न की, कर दें तो आज उजड़ जावें. जब सरकारी स्कीम निकली, हमने ही तो इन्हें प्लाट दिए.

फिर क्या हो गया? जब 1947 में भी न निकलने दिया गाँव से हिंदुओं ने मुसलमानों को तो अब क्या हुआ? मुसलमानों की जिद. हम उन्हें ज़मीन दे रहे हैं, पैसा भी दे रहे हैं, कह रहे हैं, मस्जिद यहाँ न बनाओ, लेकिन वे अड़े हुए हैं. हमारा देवी स्थान पास है. औरतें जाती हैं. ये ईंट-पत्थर मारते हैं उन्हें. वहाँ मस्जिद कैसे बन सकती है? फिर, वहाँ मस्जिद तो कभी न थी. एक चबूतरा था, उस पर ये इबादत करते थे, अब उसे घेर कर मस्जिद बना रहे हैं. यह कैसे होने दें?

लेकिन वह जमीन तो वक्फ बोर्ड की है न? अभी तो अदालत ने साफ़-साफ़ कहा है कि ज़मीन वक्फ़ की है, इस पर हिंदू अपनी मिल्कियत साबित नहीं कर पाए हैं. और मुसलमान तो बरसों से उस जगह का इस्तेमाल इबादत के लिए करते रहे हैं. इसका भी जवाब है: मुकदमा ठीक से लड़ा न गया. गाँव के हिंदुओं ने उस पर ध्यान नहीं दिया इसलिए हार गए और ज़मीन इनकी कैसी? सारी ज़मीन तो हमारी ही है. इनके खेत नहीं, घर के अलावा एक इंच ज़मीन नहीं. सुबह काम न करें तो शाम को घर में खाना न हो बेचारों के!

जिनके साथ जमाने से मोहब्बत से रहते आए, मस्जिद को लेकर उन मुसलमानों का अड़ियल रवैया हिन्दुओं को बहुत नागवार गुजरा है. सिर्फ दो मुस्लिम परिवारों की वजह से इनका सर चढ़ गया है, उन्हें ज़रा पैसे हो गए हैं और बड़ी मस्जिद बनाने का आइडिया उन्हीं का है. उनकी वजह से बेचारे बाकी मुसलमान कुछ बोल नहीं पा रहे. उन्हें तो रोज़ काम करके खाना जुटाना है. इन दो परिवारों के चक्कर में वे परेशान हो रहे हैं.

यह मुझे दिलचस्प लगता है. मुसलमानों की इबादतगाह एक अतिरिक्त चीज़ है, उनकी ज़िंदगी उनकी रोजी-रोटी तक सीमित करके बाकी गतिविधि के बारे में कह दिया जाता है उसके बिना उनका काम चल सकता है. तर्क साफ़ है और बोलने वाले एक अलावा वहां बैठे सब सहमत हैं कि जब गाँव हिन्दुओं का है, उनी आबादी ही सबसे अधिक है तो यहाँ मस्जिद बनाने का ख़याल  ही बेतुका है!

और परिष्कृत तर्क पेश किया जाता है: समझदार मुसलमानों ने बताया है कि झगड़े की जगह पर मस्जिद बन ही नहीं सकती. फिर इस जगह पर जिद क्यों! मैं चौंकता हूँ: यह तर्क राष्ट्रीय स्तर पर 1992 से बाबरी मस्जिद के ली सुन आरहा हूँ. झगड़े की जगह पर मस्जिद हो नहीं सकती, जो है वह मस्जिद का ढाँचा हो मस्जिद नहीं.

तो गाँव में क्या सिर्फ हिंदू हैं? नहीं, जाट ज़्यादा हैं,कुछ वाल्मीकि और हरिजन हैं. वे गाँव के दूसरे किनारे पर हैं, कुछ थे बीच में लेकिन दारू पीते थे, बकरा काटते थे, सबको किनारे कर दिया. यह बात बस कह दी जाती है.

आगे क्या? वे जिद छोड़ दें, बस. ‘क्या अच्छा न हो अगर हिन्दू मुसलमानों के जले, बर्बाद घरों को बनाने में हाथ बटाएं?’ ‘क्यों नहीं, बस एक बार वे मस्जिद की जिद छोड़ दें. आखिर हमने ही तो उन्हें मनाकर वापस गाँव बुलाया है, हमारे बुजुर्ग बिना खाए-पीए दिन-दिन भर थाणे पर उन्हें मनाने-समझाने को भूखे-प्यासे लगे रहे.’

‘हमें भी डाँटो, उन्हें भी दबाओं, हमसे भी गलती हुई, हमें बताओ, उन्हें समझाओ’ लेकिन पचीस मई की शाम को क्या हुआ? मुसलमानों पर हमला कैसे हुआ? इस सवाल पर एक चुप्पी-सी छा जाती है: किसी को मालूम नहीं, कोई काम पर था, कोई खेत पर, कोई खेत से बाहर, कैसे बताएँ क्या हुआ!

हिंसा के प्रसंग को छेड़ना हिंदुओं को बुरा लगता है: वे उसे भुला देना चाहते हैं. उस पर चर्चा की हर कोशिश उन्हें गाँव की शांति के लिए ख़तरा लगती है.

जाने क्यों मुझे यह घरेलू हिंसा की याद दिलाता है. बीवी को पीटने के बाद पति उसे घर वापस चाहता है, लेकिन पीटने की याद दिलाना उसे बीवी का झगड़ालूपन जान पड़ता है जो घर में शान्ति रहने नहीं देती.

मुसलमान लेकिन इस हिंसा को भूलना नहीं चाहते, या भूल सकते नहीं. हिन्दुओं के घर घुसते आपको संकोच होता है, मुसलमानों के घर कोई आड़ रह ही नहीं गई है. हर कोई जहां चाहे जा सकता है, वे आपको गाइड की तरह अपना घर दिखाते हैं और अपने ज़ख्म भी. ये घर हैं या थे!  मानो भूकंप उनपर गुजर गया  हो या वे बमबारी के बाद की सुबह देख रहे हों.

हिंदू अकसर मुसलमानों को एक बंद समाज मानते हैं. तो क्या यह हिंसा उन्हें खोलने का एक तरीका है? अचानक सामने एक अधबना ढाँचा दीख पड़ता है: यही मस्जिद है. बगल में छोटा-सा हिन्दुओं का देवस्थान.

दसियों सालों से हम यहीं नमाज पढ़ते आए हैं. हमारी कब्रगाह है यहाँ, हिन्दुओं को हमने देवस्थान बनाने को जगह दी, आप खुदाई कर लीजिए, कब्र निकल आएगी उसके नीचे. फिर उनकी जगह कैसे हो गई? यहाँ टिन का शेड था, वही हमारी मस्जिद थी, हम तो गर्मी, बरसात से बचने को सिर्फ छत डाल रहे थे, हमने कहा था कि इसमें बाकी मस्जिदों की तरह गुंबद भी न होगा. उन्हें यह भी मंजूर नहीं.

हम एक अधजले घर के भीतर बैठे हैं. चौकी पर बठने का इशारा करनेवाला शख्स उसपर बीचे कम्बल को गुस्से में नीचे फेंकता है. ‘उसे क्यों फ़ेंक रहे हैं?’ ‘क्या है वह? जली है, सब जला दिया है. कुछ ओढने-बिछाने को बचा नहीं’ एक बच्ची गोद में चुपचाप सब देख रही है. ‘पहले पूरे गाँव में चक्कर लगाती थी, अब गोद छोड़ती नहीं. जला देंगे, जला देंगे, यही कहती है.’

बगल में तीन बोरे पड़े हैं. अनाज के: सब जला दिया, वह मुट्ठी में जले दाने निकालकर बिखेर देता है,‘यही था, अब क्या खाएँ? ’सामने कद्दू कटा धूप में सूख रहा है, कुछ परवल भी. ‘मिलनेवाले जो लाए, खा रहे हैं.’ एक तरफ कुछ रोटियाँ टटा गई हैं.

‘हम बना रहे थे न मस्जिद, हमें जलाते, इस टेम्पो ने क्या किया था जो इसे जला दिया? आठ का परिवार  पालता था. अब क्या करें, क्या खाएँ?’

क्या करें? कहाँ जाएँ? जून की दोपहरी में जुमे की नमाज के वक्त जलता हुआ यह सवाल हमारे सामने खड़ा है. खामोशी से नमाज अता कर बूढ़े-नौजवान निकल रहे हैं. ‘क्या आपके दोस्त गाँव में नहीं? आप उनसे बात नहीं करते?’ एक नौजवान हैरानी से इस सवाल को देखता है, ‘वही तो थे जिन्होंने हमला  किया. बात किससे करें?’

हमला करने वालों में जानने वाले थे, औरतें थीं. पेट्रोल फेंकने में मदद करनेवाली, हमले के लिए मर्दों को बढ़ावा देने वाली, सब जानने वाले थे, अब किससे बात करें!

अब भी रास्ते में आवाज़ कसी जाती है, ‘कटुल्ले. आखिर लौट आए न!’ दूकान में सामान देने से मना कर देते हैं.

एक ही गांव में दो संवेदना-क्षेत्र हैं. दोनों एक-दूसरे से होकर कभी गुजरते नहीं. मुसलमान पूछते हैं: हम यहाँ  हैं, तो हमारी मस्जिद गाँव से बाहर क्यों? क्या कोई मंदिर गाँव के बाहर है?  पांच-पांच मंदिर हैं गाँव में, एक मस्जिद से क्या परेशानी है! हम तो उनसे मस्जिद के लिए जमीन नहीं मांग रहे, न पैसा. हिन्दुओं को यह मांग ही अजीब लगती है, कहाँ डेढ़ हजार हिंदू घर, कहाँ सौ मुसलमान घर. दोनों की बराबरी कैसे हो सकती है, गाँव तो हिंदुओं का हुआ न? मुसलमानों को उन्होंने क्या इज्जत से रखा नहीं अब तक, काम नहीं दिया? क्या वे जी-खा नहीं रहे?

हम दूसरे घर की और बढ़ते हैं. बैठक की जगह अब राख है, कालिख पुती दीवार. एक लंबोतरे कमरे  में बैठते हैं. अचानक ठंडक मालूम पड़ती है. एयरकंडीशनर चल रहा है. हम हैरान होते हैं और फिर खुद को डाँटते हैं!

‘ऊपरलेवाले ने बचा लिया, बस. उसे जो कहो, अल्लाह, खुदा , भगवान, वरना मरने में क्या कसर थी!’ ‘ऊपरवाला क्यों, तुम्हारी बाजुओं ने बचाया’, अली जावेद उसकी हौसलाअफजाई करते हैं. वह श्री लेने को तैयार नहीं. ऊपरवाले को छोड़कर किसी में कूवत नहीं कि दो हजार की भीड़ से ज़िंदा निकाल ले जाए!

किसका ऊपरवाला होगा वह! हिन्दुओं का कि मुसलमानों का? थोड़ी देर में चाय आती है. अली जावेद के लिए काली चाय. बिस्किट और चना भी. बुजुर्ग चुपचाप बैठे हैं. सर नीचे किए. एक तरुण मोबाइल पर खेल रहा है. लूट-पाट, जलाने-बर्बाद करने के किस्से किस्से की तरह सुनाए जा रहे हैं; पुलिस ऐन हमले के वक्त कैसे गायब हो गई, हमले के बाद कैसे उसने बच्चों, औरतों को हिफाजत से निकाला. कैसे बिना चप्पल-जूते के वे भागे, सब चमत्कार लगता है!

गाँव के लोग थे, अगल-बगल के गाँवों के भी थे. अगर वह एक बार का था, तो अभी क्यों पंचायतें हो रही हैं पास के गाँवों में. हमें थाने से बुलाकर लाए कि मस्जिद बनेगी, मुआवजा मिलेगा, हमलावरों पर कार्रवाई होगी. हमारे आते ही सब गायब हो गए.

धोखा खा गए हैं मुसलमान! उन्हें बहला-फुसलाकर वापस ले आया गया और फिर अपने हाल पर छोड़ दिया गया.मारने वालों को पता है: बचे रहना सबसे बड़ी इंसानी फितरत है. तो मुसलमान भी पहले बचे रहना चाहेंगे .कई गाँव छोड़कर रिश्तेदारों के यहाँ चले गए हैं.

‘अब तो स्कूल खुलेंगे. बच्चों को लौटना होगा. कैसे चलेगा?’, सतीश चिंतित स्वर में पूछते हैं. कैसे क्या होगा का जवाब नहीं. मुस्लिम बच्चों ने पड़ोसियों को वार करते देखा है, जलाने की धमकी देते, पेट्रोल फेंकते, घर जलाते. अब वे फब्ती कस रहे हैं: बच गए तो इसलिए कि छोड़ दिया.

लेकिन वे गाँव छोड़कर नहीं जाएँगे. चुनाव में उनके चार सौ वोट जिधर पड़ जाएं उधर पलड़ा झुकेगा, उनका यकीन है. गाँव में कोई राजनीतिक दल मिलने नहीं आया, वजह वे समझते हैं. हिन्दुओं को कोइ नाराज़ नहीं करना चाहता. लेकिन पंचायत चुनाव तो होंगे अभी.

माशूक का फोन आ रहा है. हाँ  लौटते हैं. मैं अटाली का मतलब समझने की कोशिश कर रहा हूँ. मुज़फ्फरनगर के बाद के नए प्रयोगवादी सम्प्रदायवाद का एक नमूना है यह! कम कीमतवाला सम्प्रदायवाद. मुंदी या गुम चोट की तरह का गुम-सम्प्रदायवाद. ऊपर से कोइ निशान नहीं लेकिन भीतर गहरी चोट . खून कम से कम. मौत न हो क्योंकि उससे शोर काफी मचता है. लूटपाट, तोड़फोड़. पिटाई: सब कुदरती हादसे की तरह है.रोजी-रोटी के साधनों पर निशाना. उसी बर्बादी में लौटने के लिए ज़िंदा बच जाने की जिल्लत का अहसास, एक अहसान कि हमलावरों ने जान बख्श दी.फिर उन्हीं के बीच बाकी ज़िंदगी बिताने की जनतांत्रिक मजबूरी. मार खाकर भी समाज में अमन वापस लाने की जिम्मेदारी. बार-बार की अपील कि कुछ भी हो, इसका जवाब प्रतिहिंसा नहीं, दहशतगर्दी तो कतई नहीं.

याद आया जो उस युवा ने कहा था: अगर हमारे पास हथियार होते तो यों पिट जाते हम! गाँव में दाढीवाले आ जाएँ तो पुलिस आने नहीं देती, शिकायत है कि हमें पैसे और हथियार की सप्लाई की जा रही है और एक उपहास की हँसी.

तो क्या भारत में मुसलमानों की नाकेबंदी की जा रही है? क्या एक मुस्लिम आबादी और दूसरी आबादी के बीच एक अलंघ्य हिंदू अंतराल पैदा किया जा रहा है? क्या वे अब हिंदू रहम पर ज़िंदा रहेंगे? क्या उन्हें हिन्दुतान में रहने देने के हिंदू अहसान को याद रखने का सबक धीरे-धीरे पढ़ाया जा रहा है?

क्या साम्प्रदायिक संगठनों ने जाति आधारित राजनीति से सीख लिया है कि अप्रदूषित शुद्ध हिंदू बनाने की कवायद बहुत महंगी है इसलिए जाति प्रदूषित हिंदू से ही काम चलाना चाहिए? क्या हिंदू शक्ति संरचना में अब ‘निचली’, ‘पिछड़ी’ जातियों को सम्मानजनक स्थान देकर, हिंसा के नेतृत्व और संगठन का अधिकार उन्हें देकर पुराने ब्राह्मणवादी आग्रह को ढीला किया  गया है? क्या यह समझ लिया गया है कि पारम्परिक जाति-संजाल को सक्रिय कर दिया जाए, उनके हिंदूपन को जगा दिया जाए, पारम्परिक पवित्रता, प्रतिष्ठा, श्रेष्ठता के उनके आग्रहों को सुलगा दिया जाए तो फिर और निवेश करने की आवश्यकता नहीं रह जाती? क्या यह कम निवेश पर अधिक मुनाफे का कारोबार है? सतीश देशपांडे के शब्दों में ‘टिकाऊ सम्प्रदायवाद’

इस अलक्ष्य, धीमी आँच वाले, रोजमर्रा के समाजिक न्यायवादी सम्प्रदायवाद की खासियत यह है कि सम्प्रदायवाद को पहचानने वाले सारे रडार से यह छिपा रहता है. इसमें बड़े पैमाने पर जान-माल का मुक्सान नहीं  होता है, इसलिए मीडिया एकाध बार के बाद इस पर वक्त और पैसा लगाना हिंसा के गैर आनुपातिक समझता है. संख्या बढ़ा दी जाती है और यह इतनी ज़्यादा हो जाती है कि कोई ऐसा नयापन नहीं रहता कि किसी का ध्यान जाए. खबर एकाध रोज़ के बाद उतर जाती है. इसका दूसरा लाभ यह है कि इससे साम्प्रदायिकता का दायरा बढ़ता है, विभिन्न सामाजिक समुदायों की भागीदारी इसमें होती है, उन्हें एक किस्म की सांस्कृतिक भूमिका निभाने का संतोष प्राप्त होता है और अपने अस्तित्व की राष्ट्रवादी सार्थकता का अहसास भी.

नए हिंदू प्रतीकों की जगह अब पुराने जाति नायकों का उद्धार या आविष्कार हिंदू देवमाला के सदयों के रूप में किया जा रहा है. बौद्ध अशोक को कुशवाहासमाज का गौरव बनाकर वापस उसका हिंदूकरण सिर्फ एक उदाहरण है. स्थानीयता को आदर देकर साम्प्रदायिकता की परियोजना उन्हें राष्ट्रीय सार्वभौमिक के अनिवार्य घटक के रूप में प्रस्तुत कर रही है .इससे साम्प्रदायिकता में एक नई स्फूर्ति भी आ रही है.

निरंतर हिंसा के शिकार मुसलमानों की तस्वीर ऐसे समुदाय की बन जाती है जो हमेशा शिकायत ही करते हैं और जिनकी सहन शक्ति कम हो गई है. वे छोटी-छोटी चीज़ों को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते. मसलन, यह हिन्दुओं की समझ के बाहर है कि कटुआ, कटुल्ले, पाकिस्तानी कह देने भर से वे क्यों भड़क उठते हैं? अगर कुछ मनचले टोपी उछाल दें या दाढ़ी खींच डालें तो उसे नज़रअंदाज क्यों नहीं किया जा सकता! इस तरह मुसलमान छुई-मुई, तुनकमिजाज मालूम पड़ते हैं जो किसी और के साथ हँसी-खुशी नहीं रह सकते.

मुसलमानों की स्थानीयता से इनकार किया जाता है और उनसे एक विश्वव्यापी इस्लामी योजना को लागू करने वाले तत्त्वों के रूप में सावधान रहने को कहा जाता है, जबकि प्रत्येक हिंदू प्रयास एक ही साथ स्थानीय और राष्ट्रीय भी होता है. चूँकि मुसलमान रहस्यमय होते हैं और उनके घरों में हथियार होते हैं, उन्हें निरंतर अस्थिर रखना आवश्यक है ताकि वे एक जमात न बना सकें. मुसलमानों को आर्थिक तौर पर भी कमजोर रखना ज़रूरी है. उनका टेक्नोलॉजी से परिचय भी घातक हो सकता है, इसलिए उन पर नज़र रखना आवश्यक है.

साम्प्रादायिक हिंसा की कीमत घटाकर और उसका जनतंत्रीकरण करके एक अदृश्य राजनीतिक हिन्दूपन का निर्माण किया जा रहा है जो चुनाव आधारित संसदीय जनतंत्र में सभी दलों में लोभ पैदा करता है कि वे इस हिंदूपन को न छेड़ें . इस तरह मुसलमान चुनावी प्रतियोगिता में नगण्य सिद्ध होते हैं. आज तक जिस चुनावी प्रतियोगिता ने उन्हें सुरक्षा का आश्वासन दिया था अब वही उनसे मुँह मोड़ रही है. ‘धर्मनिरपेक्ष’ राजनीतिक दल चुपके से उन्हें अपनी हिंदू-विवशता बताते हैं और सर झुका कर रहने की सलाह देते हैं. वे उन्हें अपने पक्ष में मुखर भी नहीं देखना चाहते. फिर वे क्या करें? इसके नतीजे क्या होंगे?

‘माशूक अली, तुम्हें अपने नाम के मायने मालूम हैं?’ अली जावेद हंसकर पूछते हैं. सड़क पर नज़र टिकाए, माशूक मुस्कराता है, ‘कुछ, कुछ.’ माशूक अली का मतलब अली का माशूक. अगर आप आशिक अली होते तो अली के आशिक होते.’ अली का आशिक, आशिक का अली, अली, आशिक, आशिक, अली. मुझे पटना इप्टा का आशिक याद आ जाता है, झूम झूम कर गाता हुआ: “हम हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या?” पंडित कहते हैं, यह प्रामाणिक कबीर नहीं. कितनी दूर निकल आया हूँ 1992 से, गाड़ी अटाली से दूर भागी जा रही है. दिल्ली दूर नहीं.

 

  • जनसत्ता, जून, 2015

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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