चारवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम

दिल्ली  विश्वविद्यालय के चारवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बीच जो गतिरोध पैदा हुआ है, उस पर गौर करने से मालूम पड़ेगा कि क्यों हमारे उच्च शिक्षा के संस्थान विश्वस्तरीय नहीं हैं. पाठ्यक्रम निर्माण से लेकर उसके संचालन, विश्विद्यालय की आतंरिक प्रक्रिया, संस्था के रूप में उसकी स्वायत्तता, किसी नियामक संस्था की भूमिका और अन्य संस्थाओं के साथ उसके संबंध, राजनीतिक दलों की शिक्षा और शैक्षिक संस्थानों के बारे में समझ: ये वे मुद्दे हैं जिन पर बहस या विचार विमर्श अब तक नहीं हुआ है और यह मौक़ा है कि इस स्थगित बहस को हम शुरू करें.

पिछले वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय ने बहुत धूम धाम के साथ चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम आरंभ किया. इसने दशकों से चले आ रहे तीन वर्षीय पाठ्यक्रम की जगह ली. यानी दिल्ली विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम के हर पहलू को इसने आमूलचूल बदल डाला. इतना बड़ा परिवर्तन मात्र तीन महीनों में कर डाला गया. यह कोई पाठ्यक्रम के भीतर की सामग्री की तब्दीली नहीं थी, यह मौलिक संरच्रात्मक परिवर्तन था. बाहर का कोई भी विश्वविद्यालय जब ऐसे परिवर्तन करता है तो उसे पहले बड़ी तैयारी करनी पड़ती है और वह इसके लिए पर्याप्त समय भी लेता है. इस काम में तीन से पांच साल तक लग सकते हैं और कोई विश्वविद्यालय प्रमुख इसे लेकर परेशान नहीं होता. दूसरे, ऐसा परिवर्तन हमेशा अध्यापक समुदाय के प्रत्येक स्तर पर बड़ी गहराई से कड़ी बहस के बाद ही संभव होता है और इसमें छात्र समुदाय की भी भागीदारी निश्चित की जाती है. कोई भी परिवर्तन पहले से चले आ रहे कार्यक्रम  की लंबी समीक्षा, सर्वेक्षण के आधार के बाद ही प्रस्तावित किया जाता है. पाठ्यक्रम परिवर्तन को संस्था का प्रमुख अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय में ठीक इसके उलट हुआ. तीन वर्ष के स्नातक पाठ्यक्रम की जगह चार वर्ष का पाठ्यक्रम लाने के प्रस्ताव पर ये सवाल अनुचित नहीं थे – आखिर यह कैसे मालूम हुआ कि तीन वर्ष का पाठ्यक्रम अब उपयोगी नहीं रह गया है? उसमें क्या कमी आ गई है? इन प्रश्नों का कोई उत्तर विश्वविद्यालय प्रशासन के पास न था. उसने कहना शुरू किया कि तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम से छात्र में कारोबारी योग्यता (एम्प्लायबिलिटी) नहीं आ पाती है. लेकिन यह कारोबारी योग्यता क्या वस्तु है और इसे कैसे परिभाषित करते हैं? आखिर वे कौन से तत्त्व हैं जिनसे मिल कर यह बनती है? इसका कोई उत्तर दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिकारियों के पास न था.

क्या सामान्य स्नातक शिक्षा का उद्देश्य सीमित अर्थों में यह कारोबारी योग्यता पैदा करना है? इसमें कोई शक नहीं कि हर युवक यह अपेक्षा करके ही विश्विद्यालय में प्रवेश करता है कि यहाँ की शिक्षा के बाद संस्था के द्वारा किए गए प्रमाणन की बाजार में कदर होगी. लेकिन प्रमाणन की कद्र कैसे और क्यों होती है? क्यों हार्वर्ड विश्विद्यालय या प्रिंसटन के स्नातक को आम तौर पर कहीं भी काम देने में किसी को भी दुविधा नहीं होती है? वह तो किसी पेशे के लिए ख़ास योग्यता लेकर बाहर नहीं आता?

सामान्य स्नातक शिक्षा से यह अपेक्षा की जाती है कि वह छात्र में समस्याओं की पहचान करने, उनके समाधन के लिए हर नुक्ते पर गौर करने और उनके प्रति अपना विशिष्ट निजी रवैया विकसित करने में उसकी सहायता करेगी. वह उसकी दृष्टि में विस्तार लाकर किसी भी वस्तु को उसके व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का अभ्यास करने की आदत डालती है. पहले से मौजूद ज्ञान को आयत्त करने और उसकी आलोचनात्मक परख के माध्यम से नया ज्ञान विकसित करने की क्षमता उसमें आ सके, यह लक्ष्य किसी भी स्नातक पाठ्यक्रम का होता है. संक्षेप में वह एक स्वतंत्र, आलोचनात्मक, मत-विभिन्नता के प्रति संवेदनशील, मानवीय और आत्मविश्वासपूर्ण मेधा की रचना करती है. इस मेधा के कारण किसी भी व्यक्ति में यह क्षमता पैदा हो जाती है कि वह नई से नई और अप्रत्याशित परिस्थिति का बिना आपा खोए सामना कर सके और उसमें अपनी भूमिका निश्चित करने के साथ निभा भी सके.

ज्ञान के किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए अन्य अनुशासनों के साथ उसके संबंध की समझ भी छात्र में होनी चाहिए. इसी कारण विश्वविद्यालय ऐसे परिसर होते हैं जहाँ ज्ञान के सभी अनुशासन साथ-साथ होते हैं. श्रेष्ठ विश्वविद्यालय यह उम्मीद करते हैं कि उनके वैज्ञानिक दार्शनिक रूप से समृद्ध होंगे और उनका सौन्दर्यबोध भी परिष्कृत होगा. यह सब कुछ निश्चित करने के लिए इस परिसार को समाज की फौरी ज़रूरतों के दबाव से सापेक्षिक स्वतंत्रता की दरकार होती है. आम तौर पर अच्छी सरकारें अपने विश्विद्यालयों को यह नहीं बतातीं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं. इससे स्वायत्तता का वह कवच बनता है जो विश्वविद्यालय की न सिर्फ राजनीतिक, बल्कि बाजार की सत्ता से भी रक्षा करता है. स्वायत्ता इस तरह श्रेष्ठता की पहली शर्त है.

किसी भी संस्था की स्वायत्तता उसकी हर इकाई की स्वायत्तता से मिल कर बनती है. विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का अर्थ है उसकी हर इकाई की स्वायत्ता, यानी शिक्षकों, विभागों, संकायों की स्वायत्तता. कोई भी अकादमिक प्रस्ताव बिना इन सभी चरणों से गुजरे और उनसे स्वीकृति लिए सबसे आख़िरी वैधानिक निकाय यानी विद्वत् परिषद् (एकेडमिक कॉन्सिल) या कार्य परिषद् (एक्ज्यूकिटिव कॉन्सिल) में नहीं ले जाया जा सकता. उसी तरह कोई प्रस्ताव सीधे इन अंतिम निकायों से पारित कर पूर्ववर्ती निकायों को लागू करने के आदेश के साथ नहीं भेजा जा सकता. विश्वविद्यालय का प्रशासन इस स्वायत्तता का संरक्षक होता है.

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के चारवर्षीय पाठ्यक्रम के पूरे घटनाक्रम पर नज़र डालने से मालूम होता है कि उसे लागू करने के दौरान इन सारी अपेक्षाओं और पालन नहीं किया गया. पद ग्रहण करने के साथ ही कुलपति ने अध्यापकों के साथ एक अलंघ्य दूरी बना ली. उन्होंने यह तय किया कि विश्वविद्यालय किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त है और उनका यानी कुलपति का चयन इसलिए किया गया है कि वे डॉक्टर की तरह इस बीमारी का इलाज करें. इलाज में चूँकि मरीज की राय लेने की ज़रूरत नहीं होती, उन्होंने अपनी चिकित्सा में शामिल करना आवश्यक नहीं समझा.

विवाद तीन बनाम चार वर्ष के बीच लगता है. लेकिन मसला इतना सीधा नहीं है. यह ठीक है कि अभी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंग्लैण्ड को छोड़ कर चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम ही प्रचलित है. भारत में भी ऐसे संस्थान हैं जहाँ चार वर्षीय पाठ्यक्रम हैं. लेकिन वे एक लंबी परम्परा और विशेष संस्कृति में विकसित हुए हैं. जब हम पाठ्क्रम की बात करते हैं तो समझना ज़रूरी है कि पाठ्यक्रम का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि क्या और कितना पढ़ाया जाना है. वह शिक्षा के दर्शन और ज्ञान को लेकर संस्थान विशेष के नजरिए की अभिव्यक्ति है.

यह पूछना गलत न होगा कि दिल्ली विश्वविद्यालय का अपना शिक्षा का दर्शन क्या है. उसका पता उसके पाठ्यक्रम से नहीं चलता. “तीन साल बुरा, चार साल अच्छा” जॉर्ज ऑरवेल के एनिमल फार्म के शासकों के इस नारे की याद दिलाता है: दो टांगें बुरी, चार टांगें अच्छी. कोई विश्वविद्यालय जब नारेबाजी करने लगे तो मान लेना चाहिए कि वह ज्ञान निर्माण के अपने दायित्व का बोध खो बैठा है.

इसका मौक़ा यहाँ नहीं, लेकिन इसकी पड़ताल दिलचस्प होगी कि आखिर दिल्ली विश्वविद्यालय ने इतना तर्कहीन कार्यक्रम जिसकी बुनियाद इतनी पोली है, कैसे कबूल कर लिया. इस पड़ताल में पता चलेगा कि विश्वविद्यालय के पूरे आतंरिक जीवन को प्रशासन ने बुरी तरह ध्वस्त कर डाला है. धमकी, प्रलोभन, दंड, विचार-विमर्श पर पाबंदी, किसी भी प्रकार की विरोधात्मक गतिविधि में हिस्सा लेने पर तनख्वाह में कटौती, पदोन्नति से वंचित किया जाना दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए आम बात है. धरने या प्रशासन के विरोध में आयोजित कार्यक्रम की विडियोग्राफी करके उसमें शामिल शिक्षकों को दण्डित किया जाना रिवाज बन गया है.

कुलपति ने अपने समुदाय से रिश्ता तोड़कर राजनीतिक समुदाय से रिश्ते पक्के किए. यह भी अलग विवेचन का विषय है कि क्या वे सेंट् स्टीफेंस के ओल्ड बॉयज़ क्लब के अपने दोस्तों कपिल सिब्बल   और शशि थरूर को लेकर इतने निश्चिन्त थे कि उन्होंने अपने विश्वविद्यालय ही नहीं, बाहर के भी मान्य विद्वानों की, जिनमें रोमिला थापर, नामवर सिंह, अनंतमूर्ति के साथ साथ प्रताप भानु मेहता, रामचंद्र गुहा शामिल थे, चेतावनी की भी खिल्ली उड़ाई?यह भी हमरे बौद्धिक जगत की विशेषता है कि कुलपति ने अपने हर आलोचक को वामपंथी घोषित कर दिया. ऐसा करते ही यह आसान हो गया कि उनकी आलोचना को उस वक्त की वाम विरोधी राजनीतिक सत्ता की निगाह में संदिग्ध बना दिया जाए. आज भी एक दक्षिणपंथी सरकार को यह बताने की हरचंद कोशिश कुलपति ने की कि चार वर्षीय पाठ्यक्रम का विरोध और कुछ नहीं, कुछ चिढ़े हुए वामपंथियों का षड्यंत्र है जिसमें उसके लोग भी फँस गए हैं.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़े अपराधी की तरह उभरा है. डेढ़ साल पहले जब उसे यह बताया गया कि भारत की उच्च शिक्षा के सर्वोच्च नियामक होने के नाते उसे दिल्ली विश्वविद्यालय के तीन वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को हटा कर चार वर्षीय कार्यक्रम लाने की प्रक्रियागत गड़बड़ियों की जाँच करनी चाहिए तो आयोग के प्रमुख ने यह ताड़ कर कि तत्कालीन राजनीतिक सत्ता का रुख क्या है, दिल्ली विश्वविद्यालय के इस कदम को सार्वजनिक तौर पर उचित ठहराया. आयोग के सदस्यों, योगेन्द्र यादव और एम.एम. अंसारी के बार बार कहने पर भी आयोग के अध्यक्ष ने इस पर आयोग की बैठक में विचार करने से इनकार कर दिया. वे अगर उस वक्त उनको दिए गए ज्ञापनों पर विचार करते तो उस दुर्घटना को टाला जा सकता था जो दिल्ली विश्विद्यालय के साथ हुई.

आयोग की गत वर्ष की निष्क्रियता या दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रति उसके सक्रिय समर्थन ने आज के उसके निर्देश की विश्वसनीयता को संदिग्ध बना दिया है. अब वह कह रहा है कि चार वर्षीय पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विरुद्ध है और गैर कानूनी है और दिल्ली विश्वविद्यालय को पुराने तीन वर्षीय पाठ्यक्रम में ही नए छात्रों का दाखिला करना है. साल भर में बाकी सारी स्थितियां तो वहीं हैं सिर्फ केंद्र में सत्ता बदल गई है. अब कुलपति के संरक्षक मित्र सत्ताच्युत है और वे राजनीतिक रूप से शक्तिहीन  हैं. आयोग ने इस बार भी वही किया जो पिछले साल उसने किया था. सत्ता के संकेत पर उसने पिछले साल के अपने निर्णय को पूरी तरह उलट दिया है और इसकी वजह भी नहीं बताई कि उसके रुख में परिवर्तन क्यों आया. इस कदम ने आयोग को पूरी तरह प्रासंगिक बना दिया है.

आयोग की साख समाप्त हो चुकी है, इस एक घटना से छह साल पहले यशपाल समिति के इस निष्कर्ष की याद आना लाजिमी है कि इस रूप में आयोग को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है और उसे  भंग कर देना चाहिए. लेकिन इससे आज के असल मुद्दे से ध्यान नहीं हटना चाहिए: वह है दिल्ली विश्वविद्यालय के गैर अकादमिक तरीके से अकादमिक निर्णय लेने का मुद्दा. वह आज तक यह नहीं बता पाया है कि इस चार वर्ष के पाठ्यक्रम का तर्क क्या है.

चार वर्ष में तीन निकास हैं: दो वर्ष में डिप्लोमा, तीन वर्ष में सामान्य स्नातक और चार वर्ष में स्नातक( प्रतिष्ठा). इस तरह तीन शैक्षिक उद्देश्य हैं. लेकिन इनके लिए कार्यक्रम एक ही है: प्रतिष्ठा का कार्यक्रम. डिप्लोमा और कुछ नहीं, खंडित प्रतिष्ठा है. संसार में कहीं भी एक ही स्नातक कार्यक्रम से तीन भिन्न प्रकार के उद्देश्य नहीं हासिल किए जा सकते. कायदे से डिप्लोमा, स्नातक और स्नातक (प्रतिष्ठा) के तीन  भिन्न कार्यक्रम बनने चाहिए. वरना तीनों तरह के छात्रों के साथ नाइंसाफी होगी.

आयोग के दबाव डालने पर अड़ने के बाद जिस तरह कुलपति ने बीच का रास्ता निकालते हुए तीन वर्ष में प्रतिष्ठा का प्रस्ताव पेश कर दिया, उससे भी जाहिर है कि वे अपने चार वर्षीय पाठ्यक्रम को लेकर गंभीर नहीं हैं. अगर यह परिवर्तन सुचिंतित और तार्किक था तो इस पर समझौता क्यों? क्या शिक्षा के कार्यक्रम मोल-तोल और जोड़ तोड़ की चीज़ हैं?

कुछ भी हो, इस पूरे प्रकरण ने छात्रों और अभिभावकों को पहली बार पाठ्यक्रम जैसी किसी चीज़ के अस्तित्व के प्रति जागरूक कर दिया है. विश्वविद्यालय में भी अलग-अलग विचारधाराओं के अध्यापक समूह और छात्र दल इसके इतिहास में पहली बार पाठ्यक्रम को लेकर आन्दोलन कर रहे हैं. वे सब विश्वविद्यालय के अर्थ और उद्देश्य, आयोग जैसी संस्था के कर्तव्य, राजनीति, सत्ता के साथ इन सबके रिश्ते पर भी विचार कर रहे हैं. इस पूरे विवाद का कुल हासिल यही है. यह अवसर है देश में उच्च शिक्षा की भूमिका, विश्वविद्यालय की आतंरिक संरचना, सत्ता के साथ उसके सम्बन्ध, जैसे विषयों पर विचार-विमर्श की शुरुआत हो.

 

– जनसत्ता, जून, 2014

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