क्या राष्ट्र राष्ट्रवाद के बिना टिका रह सकता है?

कोई पन्द्रह साल पहले की घटना है. महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के दिल्ली केंद्र में एक भद्र महिला आईं. बताया गया कि वे अमरीका से आई हैं. बैठते ही उन्होंने शिकायत की कि हालाँकि हम अंतरराष्ट्रीय कहते हैं खुद को लेकिन बाहर बसे भारतीयों के लिए कुछ नहीं करते. वे इससे बहुत चिंतित थीं कि अमरीका जैसी जगह में रहनेवाले भारतीयों के बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के साधन इतने कम हैं! उनका कहना था कि यह हमारा दायित्व है कि हम परदेसी भारतीयों के लिए हम कुछ करें. उनका ठोस प्रस्ताव था कि त्योहारों से जुड़ी कहानियाँ, गीत, आदि की किताबें हम छापें. मैंने कुछ निष्ठुरता से उत्तर दिया था, यह कहते हुए कि यह संस्था भारत के करदाताओं के पैसे से चलती है और जो यहाँ कर न देता हो, उसके लिए अपने संसाधनों का इस्तेमाल करना कुछ तर्कसंगत नहीं लगता.फिर मैंने उनसे कहा कि ऐसा नहीं कि परदेसी भारत में कुछ प्रयासों को पैसे नहीं भेजते. उग्र राष्ट्रवादी संगठनों को खासी मदद उनसे मिलती है. फिर वे विश्वविद्यालय जैसी संस्था को क्यों न मदद करें जिसके सहारे हम शायद वह भी कर सकें जो वे चाहती हैं! उन्हें मेरी बात बेतुकी लगी और फिर मैंने उनसे कुछ सुना नहीं.

उन भारतीय-अमरीकी महिला की चिंता अपने आप में अतार्किक न थी. आम तौर पर हम कह दिया करते हैं कि अगर आप अपना मुल्क छोड़ किसी दूसरे देश में स्थायी या अस्थायी तौर पर बस गए हैं तो आपकी वफादारी उस मुल्क से होनी चाहिए. खामख्वाह जिस देश को छोड़ने का फैसला कर लिया, उसे लेकर परेशान क्यों हों या उसे परेशान क्यों करें. लेकिन मनुष्य का कहीं बसना इतनी सरल परिघटना नहीं है. लोग कई कारणों से देश छोड़ने का फैसला करते हैं: अक्सर यह किसी-न-किसी प्रकार की साधनहीनता से बाध्य होकर लिया गया निर्णय होता है.संपन्नता के विरुद्ध ईर्ष्या को छोड़ दें, तो कह सकते हैं कि समृद्ध घरों के बच्चे-बच्चियां अगर शिक्षा के लिए इंग्लैंड या अमरीका अगर जा रहे हैं तो उनमें से कई वैसे शैक्षणिक अनुभवों के लिए जाते हैं, जो यहाँ उपलब्ध नहीं.जिन्होंने साधन रहने के बावजूद ऐसा न किया या जो एकबार बाहर के बेहतर मौके छोड़ देश लौट आए उन्हें त्यागी ही कहा जाता है!

प्रायः देशों का भाग्य ऐसे प्रवासी तय करते हैं: वे लोग जिन्होंने देश छोड़ने का निर्णय किया. भारतीय राष्ट्रवाद की कल्पना दादा भाई नौरोजी, श्यामजीकृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, भीकाजी कामा, सरदार सिंह रेवाभाई राणा, जैसे नामों के बिना करना असंभव है. मोहनदास करमचंद गांधी के नाम का जिक्र करने की तो ज़रूरत ही नहीं. अपने सक्रिय राजनीतिक या सामजिक जीवन का  लगभग एक चौथाई हिस्सा उन्होंने भारत से बाहर गुजारा. इन सबके उलट जवाहरलाल नेहरू को तो आजतक इसके माफ़ नहीं किया गया कि वे शिक्षा के लिए इंग्लैंड क्यों चले गए. अन्य सभी प्रवासी तो भारतीय बने रहे, नेहरू को अब तक एक बड़े शिक्षित समुदाय ने पूरा भारतीय नहीं माना है. लेकिन यह अलग बहस है.

यह सब कहने का अर्थ यह है कि प्रवासी हो जाने मात्र से अपने ‘मूल स्थान’के मसलों पर बोलने या उनमें हस्तक्षेप गैरमुनासिब नहीं हो जाता. प्रवासी समूह अक्सर ‘अपने’ देश को लेकर एक तरह के अपराध बोध से ग्रस्त रहते हैं. मानो, वह ज़मीन छोड़कर उन्होंने उसके साथ गद्दारी की हो. इसकी भरपाई की कोशिश कई तरह से की जाती है. कुछ लोग तो पीढ़ियों बाद अपनी जड़ें तलाशने लौटते हैं और ‘मातृभूमि’ का ऋण अदा करने के लिए काफी कुछ करते हैं.

इस मातृभूमि की याद बनाए रखने के लिए काफी जतन किया जाता है. कहानियों, संस्मरणों के माध्यम से उस देश को अपनी अगली पीढ़ी को सुपुर्द किया जाता है. इंग्लैंड में रह रहे बांग्ला देश के प्रवासियों के एक अध्ययन में एक साहब ने बताया कि उनके बच्चे एक निजी स्कूल में जाते हैं जहां उन्हें इतना अधिक गृहकार्य दे दिया जाता है कि उनके पास पिता से बात करने को वक्त नहीं रहता. फिर भी वे हर इक्कीस फरवरी को उन्हें बांग्लादेश की पूरी कहानी बताने का पूरा ख्याल रखते हैं. इससे उनके भीतर एक बांग्लादेशी बनता रहता है जो बाहर से दिखाई नहीं देता. यह उन्हें तब मालूम हुआ जब स्कूल में एक पाकिस्तानी बच्चे ने कहा कि हमने तुमलोगों को आज़ादी दी. इसके जवाब में उन बच्चों ने बताया की दरअसल उसके पाकिस्तान ने किया क्या था.

अगर इस बांग्लादेशी  चेतना का निर्माण गलत नहीं है तो फिर भारतीय चेतना के निर्माण का प्रयास क्योंकर गलत माना जाए! अगर वे भली महिला त्योहारों और पर्वों की कहानियों के जरिए एक भारत को जीवित करने या रखने की कोशिश कर रही थीं तो इसका तर्क तो था ही! सवाल सिर्फ यह है कि वे पर्व-त्यौहार कौन से हैं! क्या उनमें दीवाली, होली, दुर्गापूजा के साथ ईद, बकरीद, नवरोज़, पोंगल, बिहू शामिल हैं? ऐसा न होने पर कुछ समस्या हो सकती है. इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख में इंग्लैंड में रह रहे रमेश वेंकटरमन ने लिखा है कि उनके उत्तर भारतीय मित्र जब दीवाली पर उन्हें नए साल की बधाई देते हैं तो उनकी सांस्कृतिक लापरवाही  का पता चलता है क्योंकि  तमिल होने के नाते वे तो अप्रैल के महीने में नया साल शुरू करते हैं और उनकी दीवाली भी उत्तर भारत से अलग तारीख पर पड़ती है और उसकी कहानी भी अलग है.

रमेश की कहानी सिर्फ यही समझाती है कि भारतीयता को संप्रेषित करना इतना आसान नहीं. वह एक अत्यंत जटिल कल्पना है.

राष्ट्र आखिरकार कल्पना से बनी एक हकीकत है, यह बताने वाले बेनेडिक्ट एंडरसन पिछले साल गुजर गए. बीसवीं सदी के कुछ सबसे ताकतवर और प्रभावशाली सिद्धांतों में एक यह था जिसने राष्ट्र के बारे में हमारे नज़रिए को बदल कर रख दिया. राष्ट्र से जुड़ा एक शब्द है, राष्ट्रवाद. एंडरसन के साथ राष्ट्र के सिद्धांत को समृद्ध करने वाले अर्नेस्ट गेल्नर का कहना था कि राष्ट्र से राष्ट्रवाद नहीं, राष्ट्रवाद से राष्ट्र का जन्म होता है.

राष्ट्रवाद को रवींद्रनाथ टैगोर और एक तरह से उनके प्रशंसक नेहरू संकुचित मानसिकता से जोड़कर देखते थे. लेकिन दोनों के लिए भारत महत्त्वपूर्ण था और उसकी स्वायत्त सत्ता का संघर्ष उतना ही ज़रूरी था. वह संघर्ष बिना भारतीय राष्ट्रवाद के संभव नहीं था. यह बात फिर दीगर है कि यह राष्ट्रवाद, जो उतना ही गाँधी का भी था, कितना व्यापक हो सकता था, कितना समावेशी और कितना यह दूसरे देशों के प्रति, यहाँ तक कि उसे गुलाम बनाने वाले इंग्लैंड और अन्य योरोपीय देशों, द्वेष या घृणा से मुक्त हो सकता था!

राष्ट्रवाद के बारे में भारत के कवि रवींद्रनाथ टैगोर की, जिन्हें राष्ट्रकवि नहीं विश्वकवि ही कहा जाता है, अच्छी राय न थी. लेकिन क्या राष्ट्र राष्ट्रवाद के बिना टिका रह सकता है? और उस राष्ट्रवाद की शक्ल क्या होगी?

बिना अन्य का तिरस्कार किए एक समावेशी राष्ट्रवाद की आकांक्षा राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं की थी. भगत सिंह ने ऐसे ही अन्तर्राष्ट्रीयतावादी राष्ट्रवाद के लिए नेहरू को अनुकरणीय माना, सुभाषचंद्र बोस  को उन्होंने संकीर्ण श्रेष्ठतावाद का शिकार माना और इसलिए कुछ खतरनाक भी.

राष्ट्रवाद की भी कई अवस्थाएँ हो सकती हैं. अगर भारत का ही संदर्भ लें या अन्य देशों का भी, तो राष्ट्रवाद की एक अवस्था को उसकी संघर्षशील अवस्था कहा जा सकता है. इस अवस्था में वह व्यापक  वैधता हासिल करने की कोशिश करता है. बिना अन्य राष्ट्रवादों से मान्यता मिले कोई नया राष्ट्रवाद स्थापित नहीं हो सकता. संघर्षशील अवस्था से आगे बढ़ने पर जब वह निश्चिंत हो जाता है, तब एक प्रतियोगी या प्रतिद्वंद्वी अवस्था में पहुँच जाता है.

हर राष्ट्र एक भौगोलिक सीमाबद्धता का अतिक्रमण करके एक ऐसे विचार में परिवर्तित होना चाहता है जिसकी सार्वभौम स्वीकृति हो. इसीलिए सांस्कृतिकता पर इतना बल दिया जाता है. लेकिन जैसा हमने पहले कहा, यह बहुत जटिल और जोखिम का काम है. उदाहरण के लिए, जब मेडिसन चौक पर प्रवासी भारतीयों ने  भारत के प्रधान मंत्री की जयजयकार की तो, हो सकता है, भारत में एक विशेष राष्ट्रवादी अभियान में वे शिरकत कर रहे हों, लेकिन साथ ही वे अमरीका में भारतीय राष्ट्रीय समुदाय को खंडित कर रहे थे क्योंकि अमरीका के भारतीय मुसलमान इस उत्साह के साथ कतई न थे.

राष्ट्र आज के दौर में अनियार्यतः भौगोलिक सीमा के पार चला जाता है. इसका एक माध्यम इन्टरनेट है. उसके पहले इसके संचरण की गति धीमी थी. मुझे याद है, बरसों पहले पटना में गणेश को दूध तब पिलाना शुरू किया गया जब न्यू जर्सी से खबर आई कि गणेशजी दूध पी रहे हैं. तो राष्ट्र उल्टी दिशा से भी आ सकता है. इन्टरनेट ने दूरस्थ राष्ट्रवाद की परिघटना को वास्तविक बना दिया है. इस बात की संभावना या आशंका बढ़ गई है कि अधिक आर्थिक समृद्धि वाले देशों में रहने भर की योग्यता के सहारे अब प्रवासी भारतीय यहाँ की राजनीति में बिना किसी कीमत और जिम्मेदारी के दखल दें. पिछले कुछ बरसों में या प्रवृत्ति बढ़ती हुई देखी गई है. भारत के चुनावों में धन से और जनबल से प्रवासियों की हिस्सेदारी या दखलंदाजी बढी है. क्या यह भारत की संप्रभुता के लिए अच्छा होगा? अभी ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता. लेकिन प्रवासी भारतीयों को बी भारत से बाहर रहने के चलते पैदा हुए अपराध बोध से मुक्त होने में हड़बड़ी भी नहीं करनी चाहिए. उन्हें यह समझना ज़रूरी है कि अभी भारतीय राष्ट्र्वाद ही पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है. वह जिनके नाम पर दावेदारी पेश करता है, अभी उसका यकीन भी उसे नहीं मिला है. व्यक्तियों के समूह से सारे समूहों की एक वैयक्तिकता की सीढ़ी चढ़ना अभी उसे बाकी है. इसलिए भारत  से बाहर रहने वाले हर प्रकार के भारतीयों को अत्यंत संवेदनशीलता तरीके से उसकेसाथ रिश्ता बनाना है, अपने आग्रहों से इस प्रक्रिया को और दुष्कर नहीं कर देना है.

  • जनसत्ता, दिसंबर, 2015
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