हत्या पर कुछ विचार

हत्या के प्रति किसी समाज के नज़रिए से उसके स्वास्थ्य और नैतिकता के स्तर का पता चलता है. पहला प्रश्न तो यही है कि  वह हत्या के प्रश्न को पर्याप्त गंभीरता के साथ विचारणीय मानता है या नहीं. जो यह मानते हैं कि प्रत्येक हत्या हत्या है, वे किसी भी प्रकार की हत्या के साथ समझौता नहीं कर सकते. लेकिन इसके समानान्तर एक लोकप्रिय मत यह है हत्या और हत्या के पीछे के इरादे का रिश्ता महत्वपूर्ण है. यहाँ समस्या यह है कि हत्या के प्रेरक इरादे की नैतिक वरीयता कैसे तय होगी ? हत्या का निर्णय करने वाला भी मनुष्य है और उसका इन्साफ करने वाला भी. दोनों की नैतिक व्यवस्थाओं में टकराहट की स्थिति में फैसला कैसे होगा और कौन करेगा ?

गांधी के अनुसार हर हत्या बुरी है और अस्वीकार्य है . भगत सिंह ने मनुष्य के रक्त को सबसे पवित्र कहा लेकिन साथ ही यह भी कहा कभी-कभी  दूषित रक्त को बहाना अनिवार्य हो जाता है. इस तरह वे ‘किसी भी कीमत पर हत्या की जाए’ के सिद्धांत से उत्पन्न हुई दुविधा का उत्तर देने की कोशिश कर रहे थे. उनके इस उत्तर का उपयोग विशेषकर वामपंथी क्रांतिकारियों ने किया है. मसलन, भारत के माओवादी क्रांतिकारी साम्यवादी समाज की स्थापना के लिए किए जाने वाले संघर्ष में किसी भी तरह से बाधक  व्यक्ति या समूह की हत्या को उचित और वैध मानते हैं. उनके मुताबिक़  इस प्रकार की हत्या को  इन्साफ के दायरे से बाहर रखा जाना होगा, बल्कि इसमें शामिल व्यक्ति को हत्यारा कहना भी गलत होगा. इसी तरह एक पवित्र इस्लामी राज्य की स्थापना या हिन्दू राष्ट्र की रक्षा के क्रम में द्रोहियों की हत्या को आपराधिक कृत्य की श्रेणी में रखे जाने पर इन विचारों के माननेवाले हैरान रह जाते हैं.

पश्चिम बंगाल में पिछले दिनों सी.पी.एम. के छात्र संगठन के विरोध प्रदर्शन के बाद हुई एक छात्र की मृत्यु(!) से सी.पी.एम. समर्थक क्षुब्ध और क्रुद्ध हैं. उससे जुड़े बौद्धिक भी इस हत्या से आहत हैं. लेकिन इस संगठन और इस बौद्धिक समाज ने कुछ समय पहले ही बंगाल में सिंगूर, नंदीग्राम और अन्य स्थानों पर की गई हत्याओं को प्रायः करणीय  ही माना था. वे इस हत्या से तो न्याय चाहते हैं लेकिन पहले की हत्याओं को उसके दायरे से बाहर रखना चाहते हैं. पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में माओवादियों की हत्या की तो वे जांच चाहते हैं, लेकिन स्वयं उनके द्वारा की गई हत्याओं को किसी भी जांच से परे मानते है. इस तरह यह समझा जा सकता है कि हत्या वर्गीकरण का एक लोकप्रिय  आधार यह है कि कौन सी हत्या पहले ही न्यायपूर्ण मान ली जाती है और इसलिए न्याय-व्यवस्था के लिए विचारणीय नहीं रह जाती और कौन सी हत्या न्यायिक दृष्टि से विचार योग्य ठहरती है. इस आधार या सिद्धांत को हम चाहें तो विचारधारा निरपेक्ष कह सकते हैं.

हत्या के पीछे यदि कोई  पवित्र उद्धेश्य सक्रिय हो तो क्या हत्या को संपन्न करने वाला उसके दायित्व  से मुक्त हो जाता है? यानी क्या वह उस हत्या अपनी भागीदारी को अपने कर्तृत्व का प्रमाण नहीं मानता और यह कहना चाहता है कि वह उसका माध्यम मात्र था? या यह कि उस वक्त वह स्वाधीन, स्वायत्त सत्ता नहीं था और किसी पवित्र  विचार या व्यक्ति के अधीन था? इस प्रश्न को आगे बढ़ाकर कर यह भी कहा जा सकता है कि इस प्रकार की गई  हत्या उसके द्वारा न तो विचारित थी और न ही उसने इसके अभिप्राय और परिणाम पर गंभीरता से सोचा था. हत्या के कृत्य के समय उसके चिंतन की शक्ति सुप्तावस्था में थी या उस पर अधिक प्रभावशाली शक्तियों ने नियंत्रण कर लिया था. फिर उसे कैसे कसूरवार माना जा सकता है?

भारतवर्ष में  सामूहिक हत्याकांडों के संदर्भ  में उपर्युक्त विचार प्रासंगिक हो उठता है. ऐसे हत्याकांडों के लंबे सिलसिले के बावजूद किसी भी एक हत्याकांड के प्रसंग में हम यह नहीं जान  पाए हैं कि उसमें शामिल लोग उस हत्याकांड में अपनी  भागीदारी के विषय में क्या सोचते हैं. पहले तो यही दिखाई पड़ता है कि प्रायः हर किसी ने उनमें अपनी हिस्सेदारी से ही इनकार किया. ऐसे  सामूहिक हत्याकांड में प्रमाणित करना कठिन होता है कि किस व्यक्ति की किसने हत्या  की. एक सवाल साक्ष्य या गवाह का भी है. हत्याकांड में जो सीधे शामिल नहीं है और किसी तरह उसके गवाह रहे हैं, उनकी चुप्पी इस प्रकार की हत्या को और रहस्यमय बना देती है. फिर ऐसा ही लगता है ये हत्याएं बस हो गईं, मानो वे किसी  प्राकृतिक आपदा का ही नतीजा हों !

दहशतगर्द हमलों की प्रायः  जिम्मेवारी ली जाती है और इस तरह कभी उनका इन्साफ होने की उम्मीद बची रहती है. लेकिन हमारे देश में सांप्रदायिक दंगों में इन्साफ का रिकॉर्ड बहुत बुरा है. अभी हाल में उन्नीस सौ चौरासी के दिल्ली में हुए सिख विरोधी हमलों में से कुछ पर फिर से सुनवाई शुरू हो रही है. २००२ में गुजरात में मुसलमानों पर हुए हमलों में कुछ की सुनवाई हुई और कुछ मामलों में सजा भी हुई. फिर भी जिन्हें सजा हुई है, उनसे या उनके परिजनों से बात करने पर मालूम होता है कि वे खुद को जिम्मेवार नहीं मानते और सजा को अपने साथ नाइंसाफी मानते हैं.

ऐसा नहीं कि आधुनिक काल में सामूहिक हत्याकांड सिर्फ भारत में ही हुए हैं. बल्कि ‘जेनोसाइड’ शब्द का आविष्कार यूरोप में ही हुआ है, ऐसा ह्त्याकांड जो किसी एक समुदाय को ख़त्म  कर देने की नीयत से किया गया हो. फिर भी हिटलर या पोल पॉट या स्टालिन द्वारा  कराए गए हत्याकांड और भारत में हुए हत्याकांड बुनियादी तौर पर अलग हैं. पहले मामलों में राज्यसत्ता अपने उपकरणों, यानी अपने पुलिस या सेना के माध्यम से इन्हें अंजाम दे रही थी जबकि हमारे देश के प्रसंग में हत्याओं  में सीधी भागीदारी साधारण जनता की रही है. भागलपुर में हजारों मुसलमानों को मारने में हजारों हिन्दुओं ने हिस्सा लिया होगा, नेल्ली  में तीन हजार मुसलमान पुलिस या सेना के द्वारा नहीं साधारण असमी जनता के द्वारा मारे गए. यही बात दिल्ली के सिखों के कत्लेआम या गुजरात में मुसलमानों के संहार के बारे में कही जा सकती है.

इस तरह सोचें तो यह समझ में आता है कि अलग-अलग पीढ़ियों के हजारों हजार हत्यारे हमारे बीच साधारण जीवन बिता रहे हैं. उन्होंने जो हत्याएं की हैं , उनमें अपनी भागीदारी को क्या उन्होंने एकदम भुला दिया है? क्या ये हत्याएं दु:स्वप्न की तरह उनकी नींद उड़ा पाती हैं?  क्या उनमें अपने  किए की जिम्मेदारी का कोई अहसास है?

प्रत्येक समाज खुद से ये सवाल करता है. खुद से पूछने की यह प्रक्रिया व्यक्ति और समाज, दोनों  ही स्तरों पर चलती है. इस प्रक्रिया के चलते रहने भर से समाज में नैतिकता के जीवित रहने की संभावना रहती है लेकिन जो समाज या समुदाय अपने किए को लेकर बिलकुल गाफिल हो जाए या सजा के डर से जिम्मेवारी लेने से इनकार कर दे, वह नैतिक  रूप से लापरवाह और कायर समाज में बदल जाता है.भविष्य में उसके और खूंखार होने  की आशंका बढ़ जाती है. हत्या नहीं की जाएगी, या ऐसा कुछ भी जो हत्या को प्रवृत्त करे, वर्जनीय होगा, इस प्रकार का संकल्प  समाज कर पाने में यह समाज  अक्षम होता है. फिर वह किस प्रकार का नैतिक समाज है?

बीसवीं सदी के जनसंहारों के बाद यूरोप ने बड़ी सख्ती से खुद को कठघरे में खड़ा किया और इन सवालों के  जवाब खोजने की कोशिश की. ‘औश्वित्ज़ और नहीं’, यह संकल्प सिर्फ राजनीतिक स्तर पर ही नहीं  लिया गया, शैक्षणिक, सांस्कृतिक , सामाजिक, हर स्तर पर पहली प्राथमिकता इस संकल्प के निर्वाह को दी गई. १९४५ के बाद जर्मनी, पोलैंड या अन्य देशों में जनसंहार  दुहराए नहीं गए हैं. भारत में , इसके उलट जनसंहारों  की संख्या न सिर्फ बढ़ी  है, उनके प्रति सामाजिक स्वीकृति अधिक क्रूरतापूर्ण रूप से परिष्कृत हुई है.

जनसंहारों की बारंबारता के कारण हत्यामात्र हमारे समाज के लिए हन्ना आरेंत के शब्दों में तुच्छ कृत्य बन गई है. समाज में कोई भी उसके प्रति जवाबदेह महसूस नहीं करता. इसलिए जब वामपंथी क्रांतिकारी  गुजरात जनसंहार का विरोध करते हैं, या हिन्दू राष्ट्रवादी आतंकवादी हमलों में हुई हत्याओं पर रोष प्रकट करते हैं, या राज्य किसी भी समूह द्वारा की गई  सुरक्षाकर्मियों की हत्या पर नाराजगी जाता है तो हमें यह मालूम होता है कि यह हत्या के प्रति इनकी अवसरवादी प्रतिक्रिया है. इसी कारण हमारे भीतर यह संकल्प लेने की शक्ति नहीं रह गई  है कि १९८४ और नहीं,या २००२ और नहीं. इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि हम ऐसा संकल्प ले ही नहीं सकते. वह क्षमता हम तभी  हासिल कर सकते हैं जब हत्या मात्र पर गंभीरता से विचार आरंभ करें.

  • जनसत्ता, जून, 2013
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