साहित्य, सत्ता और बिहार

श्री असगर वजाहत बिहार से लौटे हैं और जैसी उम्मीद थी, वे भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के रंग में रंगे बिना रह नहीं पाए हैं !पटना में मार्च के आख़िरी दिनों में हुए ‘पटना लिटरेचर फेस्टिवल’ में  अतिथि  असगर वजाहत ने उत्सव के दूसरे दिन मुख्यमंत्री का भाषण सुना, उन्हें शायर कलीम आजिज के कलाम का आनंद उठाते देखा.  उन्हें यह देख विस्मय हुआ कि मुख्यमंत्री ने फरमाइश करके कलीम साहब से शेर सुने, अपने भाषण में उनके गाँव के नाम तक का जिक्र किया. आलोक धन्वा ने उन्हें बताया कि नीतीश उनके पुराने मित्रहैं, हालांकि अब व्यस्त होने के चलते बेचारे मुख्यमंत्री कवि-मित्र से मिल नहीं पाते(यह अलग बात है कि बिहार में कौन उनका पुराना मित्र नहीं है! आखिर खुद पुराने हो जाने के कुछ फायदे तो होने ही चाहिए!) लेकिन इससे भी बड़ी बात यह थी कि गुलजार का नाटक देख कर निकलते हुए नीतीशजी आलोक धन्वा से बड़ी गर्मजोशी से मिले और उनका हाल चाल पूछते हुए उन्होंने भी कवि से अपनी मित्रता का हवाला दिया . यह सब देख कर असगर वजाहत को यह प्रेरणा मिली कि पटना के साहित्य समारोह ने राजनीति और साहित्य के जटिल लेकिन महत्वपूर्ण पक्ष की ओर जो इशारे किए हैं, उनपर चर्चा के लिए अपने पाठकों को उत्साहित करें.

असगर वजाहत को ये प्रसंग सारगर्भित लगे , तभी उन्होंने इनका जिक्र ज़रूरी समझा. लेकिन प्रसंग का सार क्या था, यह उनकी टिप्पणी से समझ पाना ज़रा मुश्किल ही है.  लेखक वह है जो सतह पर जो हो रहा है, उसके पीछे जाकर देख पाए , वरना हर घटना का वर्णन ही साहित्य  हो जाएगा. यथार्थ भी दरअसल वह नहीं जो नंगी आखों से सबको दीख जाए, बल्कि वह है जो चतुराई से छिपा लिया जाता है. यथार्थवादी लेखक  उसी यथार्थ का उद्घाटन करता है.

असगर वजाहत को पटना के कार्यक्रम में परम्पराएं टूटती दिखाई पडीं. अगर  थोड़ा गौर करते तो वे  यह पूछे बिना नहीं रह सकते थे कि जब साहित्य उत्सव बाईस तारीख की शाम को शुरू हो गया था , तो तेईस तारीख को उसका उदघाटन करने मुख्यमंत्री कैसे और क्यों आए! और वह भी उस दिन के एक सत्र के बाद! मुख्यमंत्री की बेतकल्लुफी और खुशमिजाजी ने हमारे लेखक को सम्मोहित कर लिया, यहाँ तक कि उन्हें नेहरू तक की याद आ गई. इस सम्मोहन पाश से मुक्त होने पर यह प्रश्न भी किया जा सकता था कि यह साहित्योत्सव सरकारी, जो एक निजी पहल था,  बिहार दिवस समारोह का भाग क्यों बन गया! यह भी कि अगर मुख्यमंत्री इसे स्वायत्त रखने को प्रतिबद्ध हैं, जैसा अपने भाषण में कृपापूर्वक उन्होंने कहा, तो यह क्यों कह दिया गया  कि हर वर्ष इसे बिहार दिवस समारोह के अंग के रूप में होना चाहिए! और इस पर उनकी भौ थोड़ी तो उठनी ही चाहिए थी कि कार्यक्रम के मुख्य आयोजक , जिन्होंने सबको निमंत्रित  किया था, क्यों इस ‘उदघाटन सत्र’ में कुछ न बोल पाए और क्यों पवन वर्मा को मुख्यमंत्री ने इस आयोजन का श्रेय दे डाला!

पवन वर्मा की पटना में मौजूदगी पर भी कुछ सोचना ही चाहिए! अगर वे इस कार्यक्रम के सलाहकार थे, तो तीन-तीन सत्रों में उनका होना कुछ शोभनीय न था और न अपनी  ही रचना पर गुलजार के नाटक का प्रदर्शन होने देना! पवन वर्मा को  नीतीश कुमार ने अपना सांस्कृतिक सलाहकार बना कर पटना बुलाया है, इस खबर पर भी किंचित विस्मय होना चाहिए! इस कारण नहीं  कि पवन वर्मा की बिहार और उसके सांस्कृतिक जीवन से संलग्नता रहस्यमय है, बल्कि इसलिए कि किसी मुख्यमंत्री को सांस्कृतिक सलाहकार की ज़रूरत ही  क्यों हो, जब उसके पास एक पूरा का पूरा संस्कृति  मंत्रालय और विभाग है!

इन प्रश्नों पर सारपूर्ण विचार के लिए हमारे लेखक को और सामग्री मिलती यदि वे अतिथिशाला से बाहर निकल कर रात में अगल-बगल चहलकदमी कर लेते. फिर वे एक दिलचस्प नज़ारा देखते- जिस होटल में वे ठहराए गए थे, वह नीले रंग की बिजली से जलने वाली झालरों से ढंका था. वही नहीं,सारी बड़ी इमारते नीले रंग में झिलमिला रही थीं, सरकारी भी और गैर-सरकारी भी! नीले रंग के प्रति पटनावासियों के  आकर्षण  का कारण उन्हें कोई सड़क चलता भी बता देता; नीतीश बाबू का हुक्म हुआ था, पिछले ही साल कि बिहार-दिवस के उल्लास का राजकीय रंग नीला होगा! देखते ही देखते पटना की सारी दुकानों से नीले रंग की बिजली के नन्हें बल्बों वाली झालरें गायब हो गईं! जो देर से जगे, पछताते हुए मुजफ्फरपुर और आरा  तक दौड़े! लेकिन बिहार भर में इतनी नील विद्युतावलियाँ कहाँ कि पटना की सभी इमारतों को नीलोत्पल में बदल डालें. सो कुछ अभागी अपने असली रंग मेंही रह गईं!

‘वाइब्रेंट गुजरात’ या ‘प्रकम्पित गुजरात’ के तर्ज पर बिहार-दिवस उत्सव के राजकीय आयोजन का संदेश क्या है, यह  यथार्थवादी लेखक नहीं तो और कौन बताएगा! लेकिन इसके लिए बिहार की सत्ता और सिर्फ बिहार की नहीं, सत्ता मात्र के नए चरित्र को थोड़ा समझना होगा. यह भी समझना होगा कि संस्कृति मात्र साहित्य, संगीत, नाटक और कलाओं से नहीं बनती.यह भी कि कब सत्ता संस्कृति में आवश्यकता से अधिक दिलचस्पी लेने लगती है!

यह जानने के लिए आयोजन स्थल से कुछ बाहर भटकना पड़ता, फिर यह मालूम पड़ता कि यह ऐसी  सत्ता है जिसकी पिछले आठ साल से किसी अखबार ने आलोचना की आवश्यकता ही महसूस नहीं की! सहमति के अलावा और किसी अभिव्यक्ति से मुख्यमंत्री की वह खुशमिजाजी हवा हो जाती है जिसने इस साहित्योत्सव को गिरफ्तार कर लिया. दबी जुबान आपको पत्रकार बताएँगे, ‘सर, यहाँ तो इमरजेंसी है!’ मुख्यमंत्री की तस्वीर अखबारों में  किस पोज में छपे , इसे लेकर उनका दफ्तर चौकन्ना रहता है. और अब तो अखबारों को इसके बारे में कुछ बताने की ज़रूरत ही नहीं रह गई है. जब समाज में सत्ता का विरोधी पक्ष गायब हो जाए तो साहित्य को ही यह भूमिका निभानी पड़ती है.

सर्वत्र सहमति और सर्वांग–सराहना से ही लेखक के कान खड़े हो जाने चाहिए ! यह दृश्य भारत में और संसार मे इतनी बार दुहराया जा चुका है और इतनी इंसानी कीमत पर ! स्टालिन, हिटलर और माओ के नाम संभवतः अतिरंजना प्रतीत हों भारतीय सन्दर्भ में. अभी कुछ बरस पहले ही एक ‘कवि’ प्रधानमंत्री की शालीनता ने भी उनकी राजनीति को ढँक ही लिया था. और बाबरी मस्जिद ध्वंस के नायक भी कालक्रम में लोकतांत्रिक स्वीकृति हासिल कर ही चुके हैं! अभी हाल में साहित्य-वत्सल नीतीश कुमार ने उन्हें सबसे सम्मानित नेता बताया है और इशारा किया है कि उनके नेतृत्व में काम करने में उन्हें गुरेज नहीं.

असगर वजाहत लेकिन अकेले नहीं हैं! समाज-वैज्ञानिक शिव विश्वनाथन भी एक ‘डिबेट’ में पटना जा कर कह आए है कि गुजरात नमूने के मुकाबले बिहार नमूना बेहतर है! बिहार की किन प्रक्रियाओं के किस अध्ययन के आधार पर वे ऐसा कह पाए, यह पूछने पर वे शायद कुछ अखबारी आंकड़े पेश करें! लेकिन  उनसे तो उम्मीद  है कि आंकड़ों के पीछे छिपी सचाई का वे वर्णन और विश्लेषण करेंगे. उसी तरह अमर्त्य सेन महाशय भी गत तीन-चार बरसों से मौके –बेमौके  अंतरराष्ट्रीय नालंदा विश्वविद्यालय की बैठकों में पटना जाकर नीतीशजी को चरित्र-प्रमाणपत्र दे आते रहे हैं. इनमें से किसी ने   बिहार में अपने बौद्धिक श्रम के शायद ही कोई अंश लगाया हो लेकिन बिहार के मामले में निश्चयात्मक टिप्पणी करने में उन्हें संकोच नहीं होता.

सत्ता और साहित्य का सम्बन्ध सचमुच जटिल है , इतना जटिल कि कई बार साहित्य को स्वयं सत्तासीन हो जाने का भ्रम हो जाता है. यह तब होता है जब वह सत्ता उसे अपने पहलू में बिठाने को तैयार हो जाती है और साहित्य भी भूलने लगता है कि उसका काम तो सत्ता  के आमने -सामने रहने का है.

 

  • जनसत्ता, अप्रैल, 2013
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