साहित्य मेले बाज़ार का हिस्सा बन गए हैं ?

भारत में साहित्य समारोहों की बहार का मौसम अब ख़त्म होने को है.अमूमन यह नवम्बर में शुरू होता है और फरवरी तक सिमटने लगता है. जयपुर में यह छोटे पैमाने पर शुरू हुआ था.आहिस्ता-आहिस्ता इसने एक बड़े मेले की शकल ले ली. और अब आपकी हैसियत इससे देखी जाती है कि आप उसमें बतौर लेखक बुलाए जाते है या नहीं. लेकिन अब या सिर्फ साहित्य का ही मेला नहीं रह गया है. इसमें फिल्मकार,पत्रकार,राजनेता शिरकत करते दीख जाते हैं. इससे एक शिकायत यह की जाती है कि साहित्य की गरिमा गिरी है. आयोजकों का कहना है कि साहित्य को लोगों की भीड़,शोर-शराबे,धूल-धक्कड़ की आदत पड़नी चाहिए और अपने अभिजात खोल से निकलने का यह एक मौक़ा है.

अब सरकारें भी इसमें दिलचस्पी लेने लगी हैं. इसलिए कई मेलों का में विषयों और लेखकों के चुनाव  फैसला राजनीतिक कारणों से होता है.

साहित्य अकेले में पढ़े जाने की चीज़ माना जाता रहा था. एक लेखक को पसंद करने वाले या उस पर जान छिड़कने वालों का अपना एक समुदाय धीरे-धीरे बन जाता है और वे एक-दूसरे से राय की अदल-बदल करते रहे हैं. लेकिन लेखक प्रायः अदृश्य रहा करता था.

साहित्य समारोहों में लेखक का दीखना तो महत्त्वपूर्ण है ही, उसकी अदाकारी भी महत्त्वपूर्ण है. अब वह किताब की जिल्दों से निकलकर मंच पर एक या डेढ़ घंटे की अदाकारी में शामिल रहता है. लिखना पहले भाषा और शब्दों के इत्मीनान और सावधानी से पेश आने का नाम था, इस तरह के मौकों पर स्मार्टनेस ज़्यादा काम आती है. कह सकते हैं कि लेखक को जुमलेबाजी का हुनर सीखना पड़ता है  क्योंकि आयोजक उसके प्रदर्शन को तौलते रहते हैं और अगली बार उसका बुलाया जाना इसमें कामयाब होने पर निर्भर है.

इससे आगे बढ़कर, जैसा जी.संपत ने मिंट के अपने एक लेख में समझाया है,यह साहित्य के बाज़ार का मामला है.साहित्य को ही नहीं लेखक को भी आप एक प्रोडक्ट की तरह पेश करते हैं और वह खुद को भी इसी तरह सजाता है. हर समारोह में दूसरे समारोहों के आयोजक घूमते रहते हैं और लेखक की कामयाबी इसमें है कि वह आगे कितने समारोहों में बुलाया जाता है.

ऐसे समारोहों में प्रकाशक हिस्सा लेते हैं और लेखक बनने की इच्छा रखने वाले भी. संपत ने ही बताया है कि अब तो ऐसे कवि यशःप्रार्थी अपनी पांडुलिपियों के साथ अलग स्टाल लगाने लगे हैं. एक तरह से यह रचनात्मक श्रम के उजागर होने का एक अवसर भी है. इस रूप में साहित्य मेले साहित्य के बाज़ार का हिस्सा हैं.

साहित्य और बाज़ार का रिश्ता ज़रा पेचीदा है. अफ्ले साहित्य और राज्य-संरक्षण पर काफी बहस होती थी. अब राज्य की जगह बाज़ार ने ले ली है. क्या साहित्य बाज़ार को चुनौती देकर अपने वजूद की आज़ादी का ऐलान करेगा या वह बाज़ार का हिस्सा भर बन कर रह जाएगा? उसका काम क्या सुकून देना है, क्या वह आनंद की अर्थव्यवस्था का अंग है या ऐसा पाठक बनाना चाहता है जो संतुष्ट न रहे, क्या वह प्रेमचंद का वारिस है जो पाठक में बेचैनी भर देना चाहता है?

और पाठक भी अपने बारे में क्या सोचते है? क्या वे अब लेखकों के संग्रहकर्ता होंगे या उनके अभियान के हमसफ़र होंगे? क्या वे उस अभिजात समुदाय के सदस्य भर बनना चाहते हैं जिसकी बैठक में रश्दी, नायपाल, पामुक सजे हों और उसकी परिष्कृत रुचि की घोषणा करें?

जो हो इतना तय है कि लेखक अब एकांत में नहीं रहना चाहता और वह इसे लेकर निश्चिन्त नहीं कि उसके शब्द अपना वक्त लेकर असर पैदा कर लेंगे. साहित्य समारोह उसे लगातार अपन महत्त्व के बारे में सजग करते रहते हैं और उससे बाहर रहने के लिए बड़ा जीवत चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि  अलग रहना ही क्यों!

 

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