दो पंक्तियों के बीच : राजेश जोशी

 

[मुझे कहा गया था राजेश जोशी के एक संग्रह, ‘दो पंक्तियों के बीच’ पर लिखने को. पर अब तो उसके बाद भी उनकी और कविताएँ प्रकाशित हो गई हैं, संग्रह भी. ‘दो पंक्तियों के बीच’ को इन सबके साथ ही फिर पढ़ा जा सकता है. राजेश मुझे पसंद रहे हैं. मुझे लगता रहा है कि अपनी पीढ़ी में टिकाऊ कवि होने की क्षमता उन्हीं में है. इस कारण मैंने एक बार फिर यह संग्रह पढ़ना शुरू किया, लेकिन जैसा कहा, उनके अन्य संग्रहों के साथ.]

आप किसे अपना कवि कह सकते हैं? ज़रूरी नहीं कि वह ठीक आपकी पीढ़ी का, आपका समकालीन ही हो. आप इक्कीसवीं सदी के हैं लेकिन कबीर आपके कवि हो सकते हैं. यह भी कतई ज़रूरी नहीं कि वह आपकी भाषा और मुल्क का हो. आप रहने वाले पलामू के हैं लेकिन जुबान पर आपके हमेशा फैज़ अहमद फैज़ हो सकते हैं. फिर भी हर पीढ़ी के खास अपने कवि होते हैं जिनके साथ वह बड़ी होती है. समस्या फिर भी है: एक ही समय में कई काव्य-पीढ़ियाँ साथ-साथ सक्रिय रहती हैं. फिर किसे वह अपना माने?

अपनी ही बात करूँ तो कह सकता हूँ कि गुज़री सदी के अस्सी के दशक में मैं वयस्क हुआ. नागार्जुन की लोकप्रियता के उभार के दिन थे. मुक्तिबोध रचनावली और उसके पहले ‘भूरी-भूरी खाक धूल’ के प्रकाशन से हवा में सनसनी-सी थी. त्रिलोचन और शमशेर खामोशी से लिखे जा रहे थे. केदार नाथ अग्रवाल अपने सरल सौन्दर्य के कारण आसानी से पसंद आते थे. रघुवीर सहाय, विजयदेवनारायण साही और श्रीकांत वर्मा ने समकालीन राजनीति को एक साथ मानवीय अस्तित्व मात्र के प्रश्नों से जोड़ दिया था. केदार नाथ सिंह ने अपनी प्रगीतात्मकता में एक पेचीदगी भर दी थी और पाठक को उलझन में डाल दिया था. विनोद कुमार शुक्ल ने मुक्तिबोध के भरोसे को सही साबित करते हुए पाठकों के समक्ष काव्य-भाषा की नई चुनौती पेश की थी. राजकमल चौधरी और उनकी पीढ़ी के कवि तो कविता मात्र पर आक्रमण कर चुके थे जैसी वह जानी जाती थी . आलोक धन्वा के धमाके की गूँज वातावरण में बनी हुई थी. ये सब थे, लेकिन क्या मैं इनमें से किसी को अपनी पीढ़ी का कवि कह सकता था? शायद नहीं और इसकी क्या वजह हो सकती है? शायद यही कि इन सबने अपनी भाषा पहले ही गढ़ ली थी. उनकी भाषा को रूप देने में मेरी पीढ़ी के वक्त का कोई निर्णायक योगदान न था. दूसरे शब्दों में कहें कि इन सबको बीसवीं सदी के अस्सी के दशक ने परिभाषित नहीं किया था. ये पहले ही शक्ल ले चुके थे. इस लिहाज से, हमारी पीढ़ी के कवि वे हुए जिनके नाक नक्श हमारे ही साथ हमारे वक्त द्वारा गढ़े जा रहे थे. एक-दूसरे ढंग से इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि आपके कवि वे हैं जिनके पहले संग्रह के अंकुर को आप उत्सुकता के साथ दूसरे, तीसरे और बाद के संग्रहों के माध्यम से से जड़ पकड़ते, पनपते और बढ़ते देखते हैं. कभी तसल्ली से, कभी चिंता से, कभी खीझ और गुस्से तो कभी निराशा के साथ. कोई -कोई कवि, ऐसा लगता है, आपको धोखा दे गया या आपके साथ दगा कर गया. कुछ के आलस्य के चलते उनकी प्रतिभा भी उनकी मदद नहीं कर पाती. कुछ की बाढ़ अचानक रुक गई लगती है. कुछ अपने ही वक्त के मुहावरे में कैद हो गए लगते हैं. कुछ की भाषा वक्त के साथ कदम नहीं मिला पाती. कुछ हमेशा पछतावे के साथ मुड़-मुड़ कर देखते और हाथ मलते रह जाते हैं. कुछ अपनी ही सूरत पर फिदा, दीनो-दुनिया से बेखबर एक ही जगह कदमताल करते रहते हैं. कुछ अपनी कविता को सांसारिक महत्वकांक्षाओं की पूर्ति का साधन बनाना चाहते हैं. लेकिन कुछ ऐसे ज़रूर होते हैं जो सधे कदम बढ़ते रहते हैं, छलांगें नहीं मारते, न पिछले वक्त के दबाव में रहते हैं और न अपने बाद आने वाले समय से आतंकित होते हैं. ऐसे कवि फिर सिर्फ अपनी पीढ़ी के दायरे में बंध कर नहीं रहते. वे अपना स्वर नहीं खोते, लेकिन हर पीढ़ी को संबोधित कर पाते हैं और हर पीढ़ी उनसे संवाद करने को उत्सुक रहती है. बड़े कवि का एक लक्षण यह है. मैथिलीशरण गुप्त हों या प्रसाद और निराला, मुक्तिबोध हों या नागार्जुन, अज्ञेय हों या शमशेर, सबमें यह गुण पाया जाता है. यह संवाद सिर्फ स्वीकार की भाषा में नहीं होता. प्रत्येक आने वाली पीढ़ी जब किसी कवि को आलोचनात्मक ढंग से ही सही, अपना संदर्भ बिंदु बनाती है, तो वह उसे किसी न किसी रूप में अपने लिए प्रासंगिक बनाती है.

क्या मैं राजेश जोशी का नाम ऐसे कवि के रूप में ले सकता हूँ? मेरा ख्याल यह रहा है कि वे ‘कंसिस्टेंट’ रहे हैं, अपना मुहावरा बदला नहीं है उन्होंने, कोई नाटकीय मोड़ उनकी काव्य यात्रा में नहीं आया है. राजेश जोशी की पीढ़ी के ही कवियों में से कुछ ने कविता को पर्याप्त न मान कर अपनी जमीन बदल ली. कुछ ने बहुत जल्दी ही दीन-दुनिया के प्रति एक बुजुर्गाना रुख अपना लिया. इन्हें पढ़ते हुए प्रायः लगता है कि इन्हें अपने वक्त से और संसार से शिकायत रह गई है और उससे वे निराश हो गए हैं. दुनिया की जैसी तस्वीर बनानी चाही थी, उसका चेहरा उससे कुछ अलग निकला और अब लगता है इनके पास न साधन हैं, न ऊर्जा कि वे अपने ढंग की दुनिया को तामीर दे सकें. ऐसे उम्मीदज़दा कवियों में कुछ के स्वर में उदासी के साथ कटुता भी घुल गई. दुनिया जो नहीं बदली इनकी आशा के मुताबिक़ तो ये नाराज़ से हो गए मानो इसमें गलती किसी और की थी. और दुखी भी!

उम्र गुज़रने के साथ शरीर थकता है, उसकी प्रतिरोधक क्षमता घटती जाती है और बीमारियाँ आसानी से हमला करके उसमें घर बना सकती हैं. यही हाल मन का है. निराशा और सिनिसिज्म आसानी से उसे कमज़ोर कर सकते हैं. संसार को बदलने का सपना एक वक्त देखा जाता है जो धीरे-धीरे बिखरता जाता है और हमारा कवि हताश होने लगता है. यह भूल जाता है वह कि सत्य सिर्फ संघर्ष है, कि शायद कामयाबी का कोई अंतिम पड़ाव नहीं है जहाँ  मनुष्यता सुस्ता सके और चैन की साँस लेकर कहे कि हाँ, यह मुकाम था जहाँ मुझे पहुँचना था और अब मैं वहाँ हूँ.

राजेश जोशी और उनके समकालीन कवियों में से अधिकतर की आत्मछवि और सार्वजनिक छवि वामपंथी कवियों की रही है. नंदकिशोर नवल तो इनके दौर को नव प्रगतिशीलता का दौर कहते हैं. भारतीय और हिंदी के वामपंथ की शक्ति का स्रोत, दुर्भाग्य से, मार्क्सवाद की वैचारिक उर्वरता और ऊर्जा में जितना न था, उतना मार्क्सवाद को अपना प्रेरणा स्रोत कहने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों की ताकत में था. दुनिया के एक तिहाई हिस्से में लाल झंडा फहरा रहा था और बाकी देशों में देर-सबेर समाजवाद न लाने की गलती दुरुस्त कर ली जानी थी. मुड़कर देखें तो पता लगता है कि अस्सी के दशक के साहित्यिक वामपंथ को किसी वैचारिक या भावनात्मक संघर्ष से गुज़रना नहीं पड़ा. इसके कोई दो दशक पहले मुक्तिबोध ने सोवियत मार्का समाजवाद को लेकर जो शंकाएँ ज़ाहिर की थीं, जिनमें रेजिमेंटेशन एक बहुत बड़ी चिंता थी, उन्हें भुला दिया गया था. बल्कि उन्होंने जो भी सवाल उठाए थे, उनमें से किसी पर वामपंथी दायरों में गंभीर बहस नहीं हुई. अस्सी के दशक में लेखकों के बीच संगठनात्मक तौर पर वामपंथ के पुनर्जागरण ने भी एक उत्साह का वातावरण बनाया. साथ ही यह भी कहना होगा कि इस वामपंथ में एक इत्मीनान था. जल्द ही इसके स्रोत सोवियत संघ में इसके हर पक्ष पर नए सिरे से बहस शुरू होनेवाली थी. पेरेस्त्रोयिका और ग्लास्नोस्त ने सोवियत संघ और साम्यवादी विश्व के अतीत के कई परेशानकुन प्रसंगों पर जड़ा ढक्कन उठा दिया था. हिंदी के वामपंथी हलकों में इसे प्रायः नज़रअंदाज कर दिया गया. साम्यवादी विश्व में हो रही हलचल को समझने की भी कोई कोशिश दिखाई नहीं पड़ती. वामपंथी होते हुए भी राजेश जोशी की पीढ़ी ने खुद को कविता मात्र तक सीमित रखा और राजनीतिक, वैचारिक और सैद्धांतिक प्रश्नों से खुद को प्रायः अलग रखा. रचना और विचार के इस श्रम-विभाजन पर, जो अस्सी के दशक की विशिष्टता है, चर्चा होना बाकी है.

कहा जा सकता है कि राजकमल चौधरी तक तो वैचारिक उलझन और बहस जीवित थी. सब कुछ बहस के दायरे में था: जनतंत्र, संसद, साम्यवाद, पूंजीवाद, सोवियत संघ का वर्चस्व, अमरीका की प्रभुता, तीसरी दुनिया के देशों का संघर्ष, राजनीति और रचना का संबंध. इस दौर के रचनाकार एक गहरी व्याकुलता से गुजरते दिखाई देते हैं. उसके बाद इन प्रश्नों से जूझना रचना के लिए असुविधाजनक मान लिया गया लगता है. व्यक्तिगत तौर पर अपने लिए एक राजनीतिक विचार आयत्त करने का बौद्धिक श्रम हमारे इस दौर के रचनाकारों ने किया हो, इसके प्रमाण नहीं मिलते. अबौद्धिकता का दौर थोड़ा और पीछे से शुरू होता है, उस दौर से जिसमें आलोक धन्वा क्रांतिकारी वाग्मिता के साथ प्रकट होते हैं. राजनीति को विचार के तौर पर उपलब्ध करना एक रचनात्मक आवश्यकता है और साहित्य के क्षेत्र में यह संघर्ष व्यक्तिगत तौर पर ही हो सकता है, सामूहिक नहीं. लेकिन यह दिक्कत सिर्फ रचनाकारों के साथ ही नहीं थी. आलोचकों ने भी इस तरफ कोई विशेष श्रम नहीं किया. हम सब, खासकर हिंदी साहित्य की दुनिया में, अभी भी सोवियत मार्का मार्क्सवाद के प्रभाव में थे. ग्राम्शी कुछ-कुछ लोकप्रिय हो रहे थे, वाल्टर बेंजामिन की एकाध किताब से परिचय हुआ था लेकिन इसने प्रभुत्वशाली सोवियत मार्क्सवादी संस्करण के प्रभाव पर असर नहीं डाला था. इसलिए सिर्फ रचनाकारों की यह सीमा नहीं थी.

अस्सी के दशक के वामपंथ और मार्क्सवाद को इसलिए स्वीकार का वामपंथ कहा जा सकता है, अस्वीकार और संघर्ष का नहीं. इसीलिए जब ग्लासनोस्त की परिणति पूर्वी यूरोप के साम्यवाद के बिखराव और फिर स्वयं सोवियत संघ के विखंडन में हुई तो वामपंथी लेखक ठगे से रह गए. भारतीय वामपंथी दायरों में इस बिखराव को साम्राज्यवादी षड्यंत्र का परिणाम मान कर किसी पुनर्विचार की संभावना ही समाप्त कर दी गई. इसे एक दुर्घटना माना गया. लेकिन इसने हमारे इस दौर में उभरने वाले कवियों, रचनाकारों और आलोचकों को सदमे में ज़रूर डाल दिया जिससे उनका उबरना आज तक मुमकिन नहीं हो पाया है.

समाजवाद या मार्क्सवाद के प्रति प्रचलित रवैया रूमानी था, यह इससे मालूम होता है कि अक्सर साम्यवादी सत्ताओं के विघटन के बारे में कहा जाता रहा कि मानवजाति अपने लिए एक सुंदर सपना देख रही थी जो बीच में ही टूट गया. भारत में भी समाजवादी आंदोलन ढलान पर आ गया था. उदार लोकतंत्र की सीमाएँ भी प्रकट होने लगी थीं. सांप्रदायिक और अस्मिता आधारित राजनीति के उभार ने जनता को भी अजनबी बना दिया. वर्ग आधारित राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि के लिए यह सब विचलन था.

इन सारी घटनाओं या दुर्घटनाओं से एक बड़ी दार्शनिक और नैतिक बहस भी शुरू हो सकती थी, यह अपने आप को पुनराविष्कृत करने का अवसर भी हो सकता था, लेकिन यह चुनौती स्वीकार नहीं की जा सकी. किसी बड़ी, व्यापक दृष्टि की असंभाव्यता को ही अंगीकार कर लिया गया. दुःख के साथ, लेकिन मान लिया गया कि मानवीय प्रयत्न और दृष्टि की सीमा है. इसका प्रभाव लेखकीय व्यक्तित्व पर पड़ना ही था.

द्वंद्व में पड़ने की जगह उससे बच निकलने से जो ऋजुता आ जाती है वह सम्प्रेषण को सरल बना देती है. लेकिन वह वस्तुतः यथार्थ के साथ सुविधावादी व्यवहार है जिसके मूल में विचार के श्रम से कतरा जाने की प्रवृत्ति है, यह पहचानने में देर नहीं लगती. उदाहरण के लिए राजेश जोशी के दूसरे संग्रह ‘मिट्टी का चेहरा’ की यह कविता ही देख लीजिए जिसका शीर्षक है ‘एक बार फिर’ कविता यों शुरू होती है:

पत्नी बैठी होगी थाली परोसकर

और कौर तोड़ने से

पहले

गिर पड़ेगा

न्यूट्रान बम !

जीवन की हलचल के बिना

गुजर जाएँगी

कई शताब्दियाँ

कई शताब्दियाँ गुजर जाएँगी

जीवन की हलचल के बिना

कोई  आएगा

कई शताब्दियों बाद !

एक अत्यंत ही साधारण घटना, जिसके रोज़ दुहराए जाने के चलते वह किसी दूसरी दैनंदिन क्रिया जैसी ही है, थाली परोस कर बैठना और कौर तोड़ना, बाधित होती है एक असाधारण आक्रमण से : न्यूट्रान बम के गिरने से. लेकिन  एक विस्मयादिबोधक चिह्न इन दोनों को एक में समेट देता है और इन दोनों के अगल-बगल होने से जो तनाव और बेचैनी पैदा हो सकती थी, उसका शमन कर देता है. उसी तरह जीवन की हलचल के बिना कई शताब्दियों के गुज़र जाने के बाद किसी के आने की सूचना से पाठक को आश्वस्त किया जाता है. आश्वासन को आगे पुष्ट किया जाता है :

तब भी ज्यों की त्यों धरी होगी

शताब्दियों पहले

परोसी गई थाली

शताब्दियों बाद भी गर्म रहेंगी रोटियाँ

कविता पाठक को और निश्चिंत करना चाहती है :

सारे हत्यारों की इच्छा के बावजूद

नहीं लग पाएगी फफूंद

शताब्दियों पहले

बड़ी मेहनत से जुटाए

अनाज पर शताब्दियों बाद भी

‘शताब्दियों’ की आवृत्ति से भी कोई तनाव नहीं पैदा होता. पुदीने की गंध से एक बार फिर आदमी को बेचैन कर देनेवाली भूख के जिंदा रहने की तसल्ली के साथ कविता ख़त्म हो जाती है. इस कविता से न्यूट्रान बम की भयावहता का कोई अंदाज नहीं मिलता जिसका आविष्कार अस्सी के दशक में ही किया गया था. वह विनाश के मामले में अणु बम की अगली पीढ़ी का था और दावा किया गया था कि वह ‘विनाश’ को स्वच्छ रखेगा. एक समझ यह थी कि वह मनुष्य को तो नष्ट कर देगा, लेकिन इमारतों और चीजों को बचा लेगा. इसे विशेषज्ञों ने गलत बताया. बहरहाल ! राजेश जोशी की कविता से न्यूट्रान बम के रूप में विनाश के नए दर्शन का कोई आभास नहीं  मिलता. हासिल होता है हर सूरत में ज़िंदगी की संभावना के बचे रह जाने का भोला यकीन जो भुलावे के अलावा और कुछ नहीं ! इस कविता के गठन में जो राजनैतिक लापरवाही है, उसे इस नाम पर ढँक दिया जा सकता है कि यह जीवन की अनश्वरता में विश्वास या आस्था की कविता है. लेकिन बम-विरोधी तो जीवन के हमेशा बचे रहने की इसी भोली आस्था पर सवाल उठा रहे थे!

नई कविता की भाषा पर चर्चा करते हुए नामवर सिंह ने पूछा था कि “क्या  बात है कि जनसाधारण तक भाषा को पहुँचाने की कोशिश में अनेक कवि एकदम ‘साधारण-सी’ भाषा में गिरे जा रहे हैं…. .” आगे उन्होंने लिखा, “इन कवियों को अपने उद्देश्य में जितनी ही विफलता दिखाई पड़ती है, वे उतनी ही लगन से भाषा को मीठी, मुलायम , आसान, चलती-फिरती बनाने की कोशिश करते जा रहे हैं.” लेकिन लगभग उसी समय उन्होंने एक-दूसरे लेख में  नई कविता द्वारा अर्जित साधारणता को असाधारणता के आगे हीन समझने की प्रवृत्ति की भी आलोचना की. फिर मुकुटधर पाण्डेय के वाक्य, ‘कविता पार्श्ववर्ती जीवन की पुकार का जवाब है.” के सहारे उन्होंने नई कविता की विषय-वस्तु और भंगिमा के पक्ष में तर्क किया, “ इसमें जीवन पर किसी विचारधारा, सिद्धांत या वाद का आरोप नहीं है. ..पार्श्ववर्ती यानी एकदम बाजू का, बाजू से लगा,पड़ोस का… जिससे हमारा रोज़ का नाता है.” नामवर सिंह ने इसे हाट-बाज़ार की कविता कहा.

आजू-बाजू तो बहुत कुछ है, साहित्य लेकिन वही बन पाएगा जो उसके भीतर ‘महत्वपूर्ण’ की निशानदेही कर सके या अशोक वाजपेयी के शब्दों में, जिसमें किसी प्रकार की महत्व-चेतना हो. साधारणता जब स्वयं अर्जित न की गई हो तो उसमें रचना का ताप भी नहीं होता. जो अगल-बगल है, उसमें किस पर निगाह पड़ती है, इससे निगाह के बारे में भी कुछ पता चलता है. पार्श्ववर्ती जीवन,पड़ोस पर ध्यान जाना एक बात है, लेकिन उसका सौंदर्यीकरण करके संतुष्ट हो जाना दूसरी बात ! रघुवीर सहाय ने संसदीय लोकतंत्र से खीज इसलिए ज़ाहिर की थी कि वह जनता के बहुलांश को रोज़मर्रापन का कैदी बना देता है. राजकमल ने तो ‘लोकतांत्रिक पद्धतियों’ को अस्वीकार तक किया क्योंकि वे धीरे-धीरे आदमी को तोड़ देती हैं और उसकी महत्वाकांक्षा का दम घोंट देती हैं.

एक बड़ा जीवन जीने की ज़िद जिसने मुक्तिबोध, राजकमल, धूमिल या श्रीकांत वर्मा जैसे कवियों को चैन से जीने नहीं दिया, राजेश जोशी और उनकी पीढ़ी की विशेषता नहीं है. उन्होंने ज़्यादा से ज़्यादा अपनेपन और लगाव के कम होते जाने का अफ़सोस जताया और उसी की खोज की. तीन दोस्तों पर लिखी कविता ‘ वे तीन’ की अंतिम पंक्तियाँ हैं:

तीसरा जानता था पर चुप रहता था

वह चाहता था एक छोटी-सी नौकरी

एक छोटी-सी नौकरी

जिसमें बचा रहे दूसरों के लिए

                 अपनापन

राजेश जोशी के आरंभिक दो संग्रहों की कविताओं को रोजमर्रे की रूमानियत की कविताएँ कहा जा सकता है. इनमें प्रेम को लेकर आशा है, एक किशोर-उत्साह और वह कवि के स्वर में उल्लास भर देता है. नौजवानी की बेपरवाह  हिमाकतों और हौसलों की एक सुंदर कविता है: “असली किस्सा तबीयत के हिरन हो जाने का”. यहाँ भी एक छोटी-सी नौकरी की तलाश करता युवक है. इस तलाश में बारहा नाकामयाब होने के बाद भी वह पस्तहिम्मत नहीं है. उसके हौसले की बुलंदी देखिए;

ब्रह्मांड की टेबिल पर

चांदी की चमचमाती तलवार की तरह

रखी थी आकाशगंगा

 

यह थी मेरी तलवार!

……..

जिसे धारण करके निकल जाना था मुझे

दिग्विजय पर

कविता का अंत भी उसी हौसले के साथ होता है:

बदलो ! बदलो !

बदलो इस संसार को !!

मैंने खटखटाए तमाम सितारों के दरवाजे

और हुक्म दिया उन्हें

कि कल आना

हाजिर होना कल

हमारे दरबार में

कल लिखाऊँगा मैं तुम्हें

नई दुनिया की संरचना का नया ड्राफ्ट!!

वाग्मिता का ऐश्वर्य, जो ऊपर उद्धृत कविता में है, राजेश जोशी की आरंभिक कविताओं में एकाधिक स्थलों पर मिलता है. ऊँची उड़ान भरने की उमंग भी. राजेश ने इस दौर में “उसके स्वप्न में जाने का यात्रा-वृत्तांत” जैसी प्रेम कविता लिखी:

मैं उसके स्वप्न में जाना चाहता था

…………………

……………………..

पसंद था उसे समुद्र

अगर कोई न टोके तो

घंटों, दिनों या शताब्दियों तक

देखती रह सकती वह

लहरों का आना-जाना

पोलीथिन की विशाल थैली में

मैंने समुद्र को भर लिया

…………..

……………..

चांद मैंने कमीज की एक जेब में रख लिया

दूसरी जेब में क्योंकि सिगरेटें थीं

इसलिए तारे ,वो प्यारे-प्यारे

ढेर सारे सितारे, पैंट की जेबों में भर लिए

 

राजेश की कल्पनाशीलता उनकी शुरुआती गद्यात्मक कविताओं में जान भर देती है. लेकिन धीरे-धीरे उम्र गुज़रने के साथ कवि पर यथार्थ हावी होता जाता है और इस यथार्थ में उम्मीद नहीं के बराबर है. उदासी है, कुछ खो दिए जाने का गम है, मित्रों-परिजनों के बिछड़ जाने की तकलीफ है. जो गुज़र गया उसकी याद है. ‘दो पंक्तियों के बीच’ इस मनोभूमि का संग्रह है .‘खोई हुई चीज़ें’ में इस मनःस्थिति को देखिए:

वहाँ बरसों से खोई हुई चीज़ें इकट्ठा थीं

और एक भूत उनकी रखवाली करता था

…………………………….

……………………

बरसों पहले खो चुके खिलौने थे

…………………

वहाँ कुछ पुरानी घड़ियाँ थीं जिनके बारे में कहा जाता है

कि वे चोरी चली गई थीं

उनमें वो समय अभी तक ठहरा हुआ था

बीत गया समय अभी भी वहाँ था

उस पर कुछ धूल जम गई थी और वो पीला पड़ गया था

…..

उस भूत ने एक दिन मुझसे कहा कि मैं इस किले से बाहर जाना चाहता हूँ

लेकिन इस किले के दरवाजे की चाबी कहीं खो बैठा हूँ!

कई कविताओं को पढ़ कर ऐसा लगता है कि यह भूत दरअसल कवि ही है जो अपनी नौस्तैल्जिया में कैद हो गया है. संग्रह की कविताओं के नीचे दी गई तारीखों से मालूम होता है कि वे तकरीबन दो दशकों के बीच लिखी गई हैं. एकाध कविता सत्तर के दशक की भी है, लेकिन संग्रह की अधिकतर कविताएँ कुछ छूट जाने के अफ़सोस की अभिव्यक्ति हैं. ‘संयुक्त परिवार’ नामक कविता में संयुक्त परिवार के समाप्त हो जाने की तकलीफ है :

टूटने के क्रम में टूट चुका है बहुत कुछ, बहुत कुछ

अब इस घर में रहते हैं ईन मीन तीन जन

निकलना हो कहीं तो सब निकलते हैं एक साथ

घर सूना छोड़ कर

यह छोटा सा एकल परिवार

कोई एक बाहर चला जाए तो दूसरों को

काटने को दौड़ता है घर

घर की याद’, ‘छाते’, ‘खोड़ला गाँव’, ‘हमारे शहर की गलियाँ’, ‘अहद होटल’ जैसी कविताओं में भाषा पर भावुकता हावी है. भावों की पाराफ्रेजिंग का लोभ कवि नहीं छोड़ पाता. कविता में वह वस्तुस्थिति की व्याख्या भी करने लगता है. संभवतः उसे विश्वास नहीं कि जिस वस्तु या भावस्थिति का वर्णन उसकी कविताएँ कर रही हैं, पाठक के मन तक उनका आशय संप्रेषित हो जाएगा. भावों की पैराफ्रेजिंग से बचना, विशेषकर गद्य में कविता लिखने वालों के लिए एक बड़ी कलात्मक चुनौती है. दुर्भाग्य से, राजेश की कविताएँ इससे बच नहीं पाई हैं :

हमें कितना अकेला किया है हमारे समय ने , समाज ने

स्वजन भी इसके अपवाद नहीं ( तीन शोकगीत , शोकगीत :1)

 

जगहों से प्यार करने का रिवाज तो

ख़त्म हो चुका कब का ( शोकगीत :2 )

कविता और भावुकता में घालमेल अक्सर  होता रहा है. कविता की प्रचलित रूमानी समझ तो भावुकता के बिना काव्यात्मकता की कल्पना नहीं कर सकती. लेकिन जब कविता ने निर्णायक मोड़ गद्य की ओर ले लिया तो फिर उसे गद्य की सख्ती भी हासिल करनी चाहिए थी. अगर कविता का स्वभाव प्रगीतात्मक ही बना रहा तो कहना पड़ेगा कि कम से कम भाषा के स्तर पर वह पाँच दशक पहले के वक्त में ठहरी हुई है.

प्रगीतात्मकता को अपनी राजनीतिक कविताओं से नष्ट करने का प्रयास नागार्जुन ने किया, खतरा इतनी दूर तक उठाते हुए कि उनकी कविताओं को कविता मानने में लोगों को शक होने लगा. लेकिन नागार्जुन वस्तुतः गद्य में कविता करने की पूरी कीमत देने को तैयार थे. इसलिए पाठकों को भावुक बनाने का शॉर्टकट उन्होंने नहीं लिया. शमशेर ने अलग रास्ता लेते हुए शिल्प को कठोर, अभेद्य बनाने का प्रयास किया. भाषा और शिल्प के साथ, जो कविता के पाठक का पहचाना है, संघर्ष और प्रायः उसका अस्वीकार, कविता में नएपन के लिए अनिवार्य है. सुविधा का रास्ता है भावना की पहचानी हुई गलियों की राह चुनना और खुद भावुक होते हुए पाठक की आँखें गीली करने की कोशिश करना.

पहचानी गलियों का मोह राजेश की कविताओं की खासियत है. इसलिए अक्सर यह शिकायत कि उनकी गलियों से, उनकी सुरक्षा से उन्हें दूर किया गया. शोकगीत: 2 की आरंभिक पंक्तियाँ  हैं:

हमें हमारे बचपन से जुड़ी हर चीज़ से दूर ले जाया गया

हमें हमारी गलियों पटियों और महफ़िलों से बाहर ले जाया गया

बहुत टुच्ची ज़रूरतों के बदले छीना गया हमसे

इतना सारा सब कुछ

 

कचोट इस बात की है कि :

 

हम जहाँ  से निकाले गए

निकाल नहीं पाए उसे कभी अपने से बाहर

हम जहाँ  भेजे गए वहाँ के हो नहीं पाए

यह कचोट या कसक इस कदर पैबस्त है कविताओं में कि विषाद के अलावा और कोई भाव बचता नहीं पाठक के पास. थोड़ी बहुत खुशी पुरानी यादों से ही मिलती है, घर के सामान से नन्हें पैरों के मोज़े निकल आने पर बेटी के पैदा होने के इन्तजार की खुशगवार याद-सी. लेकिन इसके मौके बहुत कम हैं.

ऐसा लगता है कि ज़िंदगी ने अपने वादे पूरे नहीं किए और वक्त ने धोखा दिया. नतीजा अपने आप में सिकुड़ जाना. जैसे कोई माँ की कोख में लौटकर निश्चिन्त हो जाना चाहे. बचपन और किशोरावस्था को लेकर जो आकर्षण राजेश में है और वह उन्हें वयस्क होने से रोक देती है. इस वजह से एक आत्मग्रस्तता उन्हें ग्रसने लगती है. राजेश की कविताओं को आत्मग्रस्त कहने पर कई लोगों को ताज्जुब हो सकता है. लेकिन वह इन कविताओं की विषय-वस्तु की सीमितता से भी प्रकट होती है. कवि की दुनिया सिकुड़ गई है और उसका परिप्रेक्ष्य भी संकुचित हो गया है. उसके अपने समय और संसार की तसवीरें भी पाठक को नहीं मिलतीं. यथार्थ ने छल किया इसलिए कवि ने भी उससे आँखें मोड़ लीं.

जैसा पहले कहा गया, अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के आरंभ में समाजवाद के स्वप्न के भंग हो जाने के बाद एक असहायता बोध ने कल्पना और बोध को जकड़ लिया. यथार्थ समझ के बाहर हो गया. कुछ सामान्यीकरणों के अलावा कुछ बचा नहीं. सामान्यीकरण से मुक्ति पाने का संघर्ष कठिन है, वह जितना भावनात्मक है उतना ही बौद्धिक भी.

राजेश जोशी की कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि एक संभावना थी जो फलीभूत होते-होते रह गई. लेकिन क्यों? क्या इसका कारण कोई आलस्य है या जमाने का स्वभाव? राजेश जोशी और उनके समकालीन अन्य कवियों में जो एक चीज़ दिखलाई पड़ती है वह है अत्यधिक अनुभवग्रस्तता. कहा जा सकता है कि कविता अपने अनुभवों के बल पर ही लिखी जा सकती है. वह है, लेकिन अगर कवि अपने ही अनुभवों के दायरे में कैद होने लगे तो वह दिल को छूनेवाली, सुंदर कविताएँ तो लिख सकता है, बड़ी कविता नहीं. अनुभवों के आगे अमूर्तन भी आवश्यक है. वह कैसे किया जाए? दूसरे, वक्त और ज़माने को खुद पर हावी होने से कैसे रोका जाए? एक अर्थ में समय और युग का प्रतिरोध करने का उद्यम.

यहाँ तक आते-आते मैं संशय में पड़ गया हूँ. क्या यह राजेश जोशी की सम्यक आलोचना है? क्या उनके बहाने मैं अपनी दुविधाएँ ही तो नहीं व्यक्त कर रहा हूँ?

  • सबलोग, जुलाई, 2013
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