वेंडी डॉनिगर: किताब रुकेगी तो क्या बात भी?

वेंडी डोनिगर की किताब ‘हिंदूइज्म:ऐन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ की प्रतियों की लुगदी बना देने का और आगे उसे हिन्दुस्तान में न छापने का आश्वासन पेंगुइन इंडिया ने शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति को दिया है.चार साल पहले इस किताब पर हिन्दू भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाते हुए इस समिति ने मुकदमा किया था. प्रकाशक ने मुकदमा लड़ते रहने से बेहतर समझा समिति के साथ समझौता कर लेना.आखिर यह किताब भारत के बाहर तो उपलब्ध रहेगी ही और अब तो ई-बुक का ज़माना है.अगर छापे की शक्ल में वह न भी रहे तो कोइ बड़ा नुकसान  तो नहीं!

पेंगुइन ने इस आत्मसमर्पण से लेखक और बुद्धिजीवी बहुत खफा हैं. उससे कुछ लेखकों ने अपनी किताबें वापस ले ली हैं और उसे  कानूनी नोटिस भेजी गई है कि डोनिगर की किताब वापस लेकर उसने आम पाठक के अधिकार का हनन किया है.कहा जा रहा है कि पेंगुइन दुनिया का सबसे धनी प्रकाशन गृह है और उसके पास उच्चतम न्यायालय तक टिके रहने के लिए ज़रूरी साधन थे. इसलिए उसका घुटना टेकना शर्मनाक है.यह तर्क पद्धति हमें कहाँ ले जाती है? क्या कम साधनों वाले प्रकाशक या निर्माता का ऐसे मामलों में समझौता कर लेना क्षम्य होना चाहिए? और जब मकबूल फिदा हुसेन या सलमान रश्दी या तसलीमा नसरीन जैसे व्यक्तियों पर आपराधिक मुक़दमे कर दिए जाएं तो उनको हमारी सलाह क्या होगी?हुसेन पर अलग अलग शहरों में  इसी समिति के परिवार के सदस्यों ने इन्हीं आपराधिक धाराओं में तकरीबन सौ मुक़दमे कर डाले थे. उनका सामना करते हुए एक अदालत से दूसरी में पेश होते रहने से बेहतर समझा हुसेन ने भारत छोड़ देना ताकि वे इत्मीनान से अपना काम कर पाएं: चित्र बनाने का.

यह बहुत दिलचस्प दृश्य है कि अभी हमारे क्रोध का निशाना पेंगुइन इंडिया है जो एक तरह से इस प्रसंग में पीड़ित पक्ष है क्योंकि वही पिछले कुछ वर्षों से मुकदमा झेल रहा है. शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति को  शायद हम इस लायक नहीं मानते कि उसके खतरनाक तरीकों पर कुछ देर बात करें.हमें यह सवाल करना चाहिए कि क्यों इस छोटी सी समिति का आतंक इतना अधिक है!उसका कारण बहुत स्पष्ट है.अंग्रेज़ी आउटलुक की पत्रकार सबा नकवी भौमिक ने आज से एक दशक से भी पहले भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले शासन काल में इस समिति और इसके प्रमुख के प्रभाव का कारण स्पष्ट कर दिया था. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की एक शाख है. इसका दावा है कि यह सिर्फ वैधानिक तरीकों से काम करती है:यानी वैसी किताबों की पहचान कर जो हिंदू या राष्ट्रीय भावनाओं के खिलाफ हैं,उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना.उसे इसका आश्वासन है कि आवश्यकता पड़ने पर उसके बाकी सहयोगी, जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् या बजरंग दल ‘सांस्कृतिक’ तरीकों से उसका सहयोग करेंगे और फिर राजनीतिक सहारा देने के लिए भारतीय जनता पार्टी मौजूद है ही!

शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति के पास जीत के और भी कई तमगे हैं और हिंदू तथा राष्ट्रीय भावनाओं के लिए उसके संघर्ष का रिकॉर्ड भी प्रभावशाली है. 2004 से 2009के बीच उसने एन.सी. ई. आर. टी. पर दस मुक़दमे किए थे. उसके कारण अलग-अलग विषयों की किताबों से तकरीब पचहत्तर अंश हटाने या बदलने पड़े. तीन साल पहले देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय के स्नातक स्तर के इतिहास के छात्रों की पाठ-सूची से प्रख्यात कवि-अनुवादक-लोकसाहित्य विशेषज्ञ ए.के. रामानुजन के निबंध ‘तीन सौ रामायण’ को निकवा कर उसने एक बड़ी विजय हासिल की थी. वह आत्मसमर्पण ज़्यादा दयनीय और भयावह भी था क्योकिं वह बिना किसी आसन्न भय  के किया गया था.उच्चतम न्यायालय ने समिति के पक्ष में फैसला देने से इनकार किया था, निबंध की उपयुक्तता की परीक्षा करने वाली विशेषज्ञ समिति ने उसके पक्ष में मत दिया था, फिर भी विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद ने उस निबंध को अनावश्यक झगड़े की जड़ मानते हुए हटा देने का निर्णय किया.

ज्ञान के लिए अनिवार्य स्वाधीन चर्चा के अधिकार के लिए संघर्ष को विश्वविद्यालय या शिक्षा-संस्थान अपना कर्तव्य नहीं मानते: गोया वह ज्ञान-निर्माणके लिए कोइ अतिरिक्त वास्तु हो, जिसके लिए प्रयास बाहरी समाज या राजनीति को करना है, उसे नहीं. हाल के मुम्बई विश्वविद्यालय के एक उपन्यास को हटाने का निर्णय हो या कालीकट विश्वविद्यालय द्वारा एक विदेशी मुस्लिम कवि की रचना हटाने का प्रसंग हो,अक्सर तर्क दिया जाता है कि पढने को इतना कुछ है , अगर यह एक चीज़ नहीं ही रही तो क्या पहाड़ टूट पड़ेगा! ‘तीन सौ रामायण’ को हटाने के समय भी यही दलील हमने सुनी, और वह भी अपने सहकर्मी शिक्षकों के मुँह से!

ब्योरे इतने हैं कि कई लेख लिखने पड़ेंगे इसलिए जो सवाल हमें खुद से आज के राजनीतिक माहौल में करना चाहिए वह यह कि क्या अभिव्यक्ति की और ज्ञान की स्वतंत्रता के अधिकार जैसे उदार मूल्य के प्रति हमारी प्रतिबद्धता क्षीण क्यों पड़ती जा रही है! इस प्रश्न का उत्तर शायद भारतीय लोकतंत्र के विशेष चरित्र में ही खोजा जा सकता है.कहना बहुत गलत नहीं होगा कि यह लोकतंत्र एक अकेले स्वाधीन व्यक्ति के वजूद को समझ ही नहीं पाया है. धर्म हो या जाति, वर्ग हो या राष्ट्र, व्यक्ति को सिर्फ व्यक्ति के तौर पर कबूल करना मुमकिन नहीं रहा है. व्यक्ति हमेशा समुदाय के सन्दर्भ में ही पहचाना जा सकता है. जहां समुदाय का मामला न हो, वर्ग या विचारधारा का होगा. लोकतंत्र की बुनियाद इस एक अकेले के खड़े रहने की जगह की हिफाजत के बिना कमजोर ही रहेगी!

व्यक्ति का तिरस्कार जब लोकतंत्र का आधार हो जाए और जब व्यक्ति को किसी न किसी सामूहिक पहचान में खुद को विलीन करके ही सत्ता या शक्ति मिलने का आश्वासन हो,उम्मीद बहुत कम है.इस मामले में अलग-अलग काल खंड में अग्रगामी कही जाने वाली राजनीति का इतिहास आश्वस्त नहीं करता. कमुनिस्ट विचारधारा में व्यक्ति की असुरक्षा के बारे में अलग से कहने की ज़रूरत नहीं. लेकिन अस्मिता की राजनीति ने भी, जो वामपंथी राजनीति के सामाजिक सन्दर्भ के विस्मरण को दुरुस्त करने के दावे के साथ आई, व्यक्ति को बाध्य किया कि वह खुद को मात्र अपनी जातिगत पहचान की भाषा में ही परिभाषित करे. आज़ादी के दौरान और उसके बाद ‘सामाजिक सुधार’ की परियोजना के तहत लोगों ने धर्मसूचक और जातिवाचक संज्ञाएँ छोडी थीं. लेकिन यह दिलचस्प था कि पिछली सदी के नब्बे के दशक और उसके बाद इन्हें खोद कर वापस सतह पर लाया गया. अब ऐसी स्थिति है जब किसी तर्क की परीक्षा उसके प्रस्तोता के धर्म या जाति के आधार पर की जाती है. यह किस हद तक जा सकता है इसका एक उदाहरण यह है: ए. के. रामानुजन ने ‘तीन सौ रामायण’ इसलिए लिखा कि वे दलित रचनाकार वाल्मीकि की रामायण की श्रेष्ठता और सर्वोच्चता को कम करना चाहते थे. यह एक ब्राह्मणवादी षड्यंत्र ही है कि दलित वाल्मीकि की रचना के समकक्ष अन्य राम-कथाओं को रखकर उन्हें उतना ही महत्त्व दिया जाए. यों ऊटपटांग मालूम पड़ने वाली यह बात अस्मितावादी तर्क पद्धति में बिलकुल फिट बैठती है. यह बहुत आश्चर्य की बात नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संघर्ष में अस्मितावादी राजनीति बहुत दिलचस्पी नहीं लेती. दूसरे,वह हर विचार का स्रोत विचार करने वाले की अस्मिता को मानती है.हाल में यौन-हिंसा के प्रसंग में हुई बहसों में देख्जा गया है कि क्लासिक नारीवादी रवैये से अलग कोई भी तर्क फौरन पुरुषवादी या पितृसत्तावादी ठहरा दिया गया है. ऐसा लेबल उस पर चिपका देते ही वह तर्क विचार के दायरे से ही बाहर हो जाता है.

आलोचना लोकतंत्र का प्राण है. लेकिन आलोचना व्यक्ति की अपनी स्वायत्ता के स्वीकार के बिना संभव नहीं.

 

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