वाग्मिता और वाक् छल

पिछले दिनों राहुल गाँधी का संसद का भाषण चर्चा में रहा. उसके पहले दिल्ली में किसानों की सभा के उनके संबोधन को लेकर मीडिया में दिलचस्पी दिखाई गई. मीडिया ने कुछ आश्चर्य के साथ, लेकिन प्रशंसापूर्वक उनकी आक्रामकता को नोट किया. संसद में अपने भाषण में वे व्यंग्य कर रहे थे, सरकार पर चुटकी भी ले रहे थे, इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि अब वे इत्मीनान से हिन्दी में अपनी बात कह पाते हैं. संसद के उनके भाषण पर उनकी माँ सहित उनके दल के लोग अत्यंत ही मुदित थे. माँ कहती हुई सुनी गईं, मैं हमेशा से कहती थी कि वे अच्छा बोल सकते हैं. खुद राहुल भी अपने प्रदर्शन पर बच्चे की तरह उत्साहित देखे गए.

कांग्रेस पार्टी की जनता में अलोकप्रियता का एक कारण उसमें प्रभावशाली वक्ताओं की कमी बताया जाता है. उसकी सर्वोच्च नेता की हिन्दी में स्वाभाविक गति नहीं है और वे लिखा हुआ पढ़ती हैं, यह बात हमेशा उनके और उनकी श्रोता जनता के बीच एक दीवार सी बनी रहती है. उनके पति भी, जो दुर्दैववश नेता बन गए थे, अच्छे दिल के आदमी, लेकिन कमजोर वक्ता माने जाते थे. कांग्रेस के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी में कहा जाता है, वक्ताओं की कमी नहीं है. आज के प्रधान मंत्री की वक्तृता पर मुग्ध लोगों की कमी नहीं है. वे आशुभाषण की कला में निष्णात हैं, पांच मिनट से एक घंटे तक श्रोताओं का ध्यान बांधे रख सकते हैं. कहा जाता है, उन्होंने यह कला जन संघ और फिर भारतीय जनता पार्टी के अब तक के सबसे लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी से सीखी है. उनमें श्रोताओं को मोह लेने की क्षमता थी.

हरिशंकर परसाई लेकिन वाजपेयी से प्रभावित न हो सके. उन्होंने लिखा कि मैं उनकी सभा में मूँगफली लेकर जाता हूँ. मूंगफली खत्म, अटल का भाषण भी ख़त्म. यानी एक सस्ता मनोरंजन भर है, कोई तत्त्व नहीं. लेकिन जनता तो परसाई नहीं है और नेता की सफलता जनता को अपने साथ बहा ले जाने में ही देखी जाती है.

बोलना मानवीय बाध्यता है या अनिवार्यता. सबसे निजी और गोपन क्षणों में भी कोई बोलना और कोई  सुनना चाहता है. माशूक चाहता है कि आशिक उससे, उसके बारे में कुछ बोले. ‘मौन भी अभिव्यंजना है’, कहने से ऐसे क्षणों में काम नहीं चलता. लेकिन यह सार्वजनिक नहीं है. जो दो के बीच की बात है, प्रकाशित होते ही अश्लील हो सकती है. प्रेमी एक दूसरे को अपने प्रेम के बारे में यकीन दिलाना चाहते हैं. लेकिन यह अपनी ही भाषा में होना चाहिए. किसी प्रेम कविता के सहारे अपनी बात पहुंचाना एक हद तक चलेगा, लेकिन आखिरकार खुद बोलना होगा ही. वाक्-संकोच या कंठरोध प्रेम का गला घोंट सकता है.

सारे लोग प्रेम के प्रसाद के भागी नहीं हो पाते, उसी प्रकार सभी नेताओं को जनता का स्वीकार नहीं मिलता. किस समय किस तरह के वक्ता को जनस्वीकृति मिल रही है, इससे उस समय की गुणवत्ता का भी अंदाज किया जा सकता है. उपनिवेश-विरोधी आन्दोलन के समय के सबसे प्रभावशाली नेता गांधी प्रचलित अर्थों में प्रभावशाली वक्ता न थे. लेकिन जनता यत्नपूर्वक गांधी की फुसफुसाहट को भी कान लगाकर सुनती थी. अटल को वक्ता माननेवाले जवाहरलाल नेहरू को प्रभावशाली वक्ता न मानेंगे. भगत सिंह ने सुभाष चंद्र बोस के भाषणों के आधार पर उन्हें भावुक, अतीतवादी, सैन्यवादी राष्ट्रवाद से ग्रस्त बताया था और उनकी जगह नेहरू को तर्कवादी, वैज्ञानिक दृष्टिसंपन्न वक्ता और नेता ठहराया. युवकों के लिए नेहरू वरेण्य होने चाहिए, अपनी वक्तृता से भावुकता पैदा करने करनेवाले सुभाष नहीं, ऐसा सुझाव भगत सिंह का था. आज तब तक के उन्नीस-बीस साल के इस नौजवान की इस स्थिर राय को पढ़कर ताज्जुब हो सकता है.

वक्तृता में वक्ता और श्रोता के बीच एक समझ और विश्वास का रिश्ता बनना चाहिए. लेकिन यह कैसे  बनाया जाता है, इसका अध्ययन हमारे यहाँ ठीक से नहीं किया गया है. जनतांत्रिक राजनीति में, जहाँ मत-निर्माण ही आधार है, लोगों का एक-दूसरे से बात करना आवश्यक है. नेता का जनता से निरंतर संवाद हो, जनतंत्र की यह शर्त ही मानी जाती है. जब यह संवाद टूटने लगता है तो एक शून्य पैदा होता है जिसके चलते लफ्फाजी की आँधी आती है और फिर तार्किक संवाद का कोइ अवकाश नहीं रह जाता. कांग्रेस पार्टी को इस संवादहीनता की भारी कीमत चुकानी पड़ी है. लेकिन वह यह समझ पाई है या नहीं कि संवाद एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और यह नेता के प्रसाद पर निर्भर नहीं, इसका अंदाज हमें नहीं है. यानी आप गाहे-बगाहे आकर बोलने लगें तो उससे उत्सुकता तो पैदा होगी, पर वह किसी स्थायी सम्बन्ध की गारंटी नहीं है. लोगों को इसका भरोसा होना चाहिए कि नेता की उससे रिश्ता रखने में दिलचस्पी है.

गाँधी ने इसीलिए प्रार्थना सभा को एक मंच बनाया जिसमें प्रत्यक्षतः तो भारी भीड़ नहीं होती थी, लेकिन उनमें दिए गए उनके वक्तव्य फिर छपे हुए रूप में वहां अनुपस्थित जनता तक भी पहुंच जाते थे. कठिन से कठिन और झंझावत भरे वक्तों में भी गांधी ने यह क्रम टूटने नहीं दिया. प्रार्थना सभा को राजनीतिक मंच में तब्दील कर देने की उनकी सुगमता भी हैरान करती है.

गाँधी के इन भाषणों को पढ़ते या सुनते हुए ध्यान जाता है उनकी पारदर्शिता पर. वाक्-पटुता या वाक्-चातुर्य या वाग्मिता की जैसे गांधी को आवश्यकता ही नहीं है. वैसे ही यह भी ध्यातव्य है कि वे प्रायः जनता के लिए असुविधाजनक बातें करते हैं और उसे अपने विचारों की समीक्षा करने की चुनौती देते हैं. यह सबसे तीक्ष्ण हो जाता है उनके आख़िरी दिनों में जब दिल्ली के हिंसक वातावरण में वे बदले की भावना में जल रहे हिन्दुओं और सिखों से अपनी प्रार्थना सभा में बात करना जारी रखते हैं.

बड़ी जन सभाओं में भाषण देने में संवाद की गुंजाइश नहीं है. लेकिन हर प्रकार की वक्तृता अगर इस तरह के मंच का संबोधन बन जाए तो समाज के भीतर कोई भारी गड़बड़ हो गई है, मान लेना चाहिए. मसलन, विश्वविद्यालय के कुलपति या अध्यापक से इस प्रकार की वक्तृता की अपेक्षा नहीं होती. हर अध्यापक वक्ता होता है, लेकिन उसे पता है कि उसका काम एक प्रभाव उत्पन्न करना भर नहीं है, कक्षा में मौजूद सभी मस्तिष्कों को सोचने की कठिनाई में डालना उसका मकसद है. इसलिए किसी नेता की तरह छात्रों को अपने पक्ष में करने की जगह उन्हें अपने, संभव हो तो विरोधी मत निर्माण करने और व्यक्त करने का अवसर पैदा करने में ही अध्यापक की सार्थकता है. इसीलिए अकादमिक परिसर नेताओं को भी एक भिन्न वैचारिक अनुशासन में डालते हैं. वे इन स्थानों पर उद्बोधन मात्र नहीं करते.

ऐसा देखा जा रहा है कि विश्वविद्यालयों के मंच चुनाव-सभाओं के मंचों में तब्दील हो रहे हैं. विश्वविद्यालयों के प्रमुख प्रेरणादायी वक्तृता का अभ्यास करने लगे हैं. क्या इसका एक कारण यह है कि पिछले कुछ वर्षों से समाज में नेताओं की जगह तरह-तरह के गुरुओं का आविर्भाव हुआ है जो सार्वजनिक वक्ता भी हो गए हैं? क्या इस परिघटना ने राजनीतिक और अकादमिक वक्तृता को प्रभावित किया है?

ऐसा कैसे हुआ कि हम वाक्-पटुता, वाक्-कौशल, वाक्-चातुर्य से इतना अभिभूत हो गए कि उनमें छिपे वाक्-छल को पहचान भी नहीं पाए? स्वतंत्र भारत के पहले माध्यमिक शिक्षा आयोग के अध्यक्ष मुदलियार ने भाषा की शिक्षा का एक मकसद इस वाक्-चातुर्य में छिपे छल को पहचानने और उससे सचेत होने का बताया था. स्वतंत्र मत-निर्माण इसके बिना मुमकिन नहीं, बात में दाने और भूसा को अलग करना संभव नहीं, ऐसा उनका मानना था. लेकिन जब शिक्षालय ही भाषा का ऐसा व्यवहार करने लगें जिसमें सत्य की खोज की जगह उसपर पर्दा डालने और उपदेश और उत्साह पैदा करना ही लक्ष्य हो, तो सार्वजनिक वक्तृता की आलोचना कौन करेगा! इसलिए साहित्य या भाषा विभागों का एक काम भाषा के इस विशिष्ट व्यवहार, यानी वक्तृता के गंभीर अध्ययन का होना चाहिए.

 

– जनसत्ता, अप्रैल, 2015

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