मार्क्स का जन्मदिन : प्रासंगिकता की कसौटी

आज मार्क्स का जन्मदिन है. दो सौ साल में तीन कम.कल ही खबर मिली कि कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के दर्शनशास्त्र विभाग ने कार्ल मार्क्स को पाठ्यक्रम से निकाल बाहर किया है.दर्शन की किस धारा में मार्क्स को पढ़ाया जाए,इसे लेकर खासी बहस है.वे विश्लेषणात्मक दर्शन की धारा में हों या राजनीतिक दर्शन की धारा में, इसे लेकर बहस है. आज से दो साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्या परिषद में भी मार्क्स ने हंगामा खड़ा किया था. कई अध्यापक कह रहे थे: मार्क्स कुछ ज़रूरत से ज़्यादा हो गया है! उसे घटाओ या हटाओ.

कुछ का कहना है कि चूँकि मार्क्स का सामाजिक बदलाव का कार्यक्रम सफल न हुआ,वे प्रासंगिक नहीं रह गए हैं. पाठ्यक्रम में उन्हें रखा क्यों जाए! फिर सवाल यह उठेगा कि सफल कौन हुआ? ईसा या मुहम्मद या बुद्ध या गाँधी या टैगोर? कबीर या प्रेमचंद? कामू या आख्मातोवा? असफल विचारकों की कतार लम्बी है. ये विचारक वे कसौटियां हैं जिनपर इंसानियत खुद को कसती है और अपने बारे में फैसले करती है. ये सब हमें अपने अधूरेपन के बारे में बताते हैं, सावधान करते हैं: रुकने की सहूलियत नहीं है, मनुष्यता का मेनिफेस्टो अभी कायदे से लिखा नहीं गया. तो सभी असफल या नाकामयाब विचारकों को पाठ्यक्रम से निकालकर कहीं हम चैन की नींद तो नहीं सोना चाहते!

यह बहस जैसी भी हो,एक बात पर कोई मतभेद नहीं: मार्क्स के अलावा कोई विचारक ऐसा न हुआ जो इस कदर वैचारिक खून खराबे की नौबत ला दे.या जिसके भूत कक्षा से लेकर संसद के गलियारों और सड़कों से लेकर जंगलों में घूमते हों और सबकी नींद हराम करते हों.वह उस विक्रम के उस बेताल की तरह है जिसे अपनी पीठ पर हमें ढोना है, जो हमें एक कहानी सुनाता है और फिर सवाल करके उसे हल करने की चुनौती देता है, धमकी भी: सवाल हल न किया तो सर के टुकड़े हो जाएंगे! तो मार्क्स को पढने का मतलब लगातार दिमागी कसरत करते रहना है.

खुद मार्क्स को दर्शन शास्त्र के या किसी भी पाठ्यक्रम में रहना पसंद होता या नहीं? आखिर यह वाक्य तो उन्हीं का है कि दार्शनिकों ने आज तक अलग-अलग ढंग से विश्व की व्याख्या की है जबकि सवाल इसे बदलने का है. तो, वे शायद खुद ही कहते कि मैं सिर्फ पढ़ाए जाने के लिए नहीं हूँ, मैं तो दुनिया को बदलने की तरकीबों की तलाश हूँ. वे कक्षा की चहारदीवारी से निकलकर राजनीतिक उथल-पुथल के मैदान में अधिक सुकून महसूस करते.

दुनिया को बदलने के औजार के रूप में मार्क्सवाद की साख पिछले तीस-चालीस सालों में काफी घट गई है.साम्यवादी दुनिया ढह चुकी है. कम्युनिस्ट पार्टी के शासन वाला एकमात्र देश चीन पूंजीवाद का नया मक्का बन गया है.लेकिन इसी बीच एक बार फिर पूंजीवाद भी दलदल में फँस गया. और वाल स्ट्रीट में मार्क्स के कैपिटल की मांग बहुत बढ़ गई.

टेरी इगल्टन ने उस वक्त लिखा कि यह विडंबना है कि जब मार्क्सवाद राजनीतिक रूप से सबसे कमजोर हालत में है,अकादमिक हलकों में इसकी पूछ बढ़ गई है और उनकी किताबों की बिक्री में उछाल आ गया है.क्योंकि मार्क्सवादी होना हीगेलवादी या कांटवादी,एकान्तवादी या अनेकान्तवादी होने से कुछ अलग है. मार्क्सवादी होना कुछ-कुछ बढ़ई होने जैसा है.यानी अगर आप मार्क्सवादी हैं तो आपको कुछ न कुछ बनाना पड़ेगा.मार्क्सवाद सिर्फ दिमागी जुगाली नहीं है.उसे ऑब्जेक्टिव टाइप या मल्टिपल चॉइस क्वेश्चन में नहीं समेटा जा सकता.

कहने के मायने शायद यह हैं कि मार्क्सवादी होने का मतलब ही दुनिया में कुछ ठोस हस्तक्षेप करना है.क्योंकि जैसा मार्क्स ने फायरबाख की आलोचना करते हुए लिखा, भौतिकवादी चिंतन यह समझता है कि मनुष्य अपने परिवेश की पैदावार है और बदला हुआ मनुष्य बदले हुए परिवेश की पैदाइश है लेकिन दरअसल ये मनुष्य ही हैं जो हालात बदलते हैं.

मार्क्स के बारे में यह ख्याल जड़ जमा गया है कि वे मनुष्य को भौतिक स्थितियों पर निर्भर मानते हैं .लेकिन यह भी मार्क्स का ही कहना है कि एक समय आकर विचार खुद भौतिक शक्ति में बदल जाते हैं.

कहा जाना चाहिए कि एक विचार के रूप में मार्क्सवाद धर्म जितना ही ताकतवर साबित हुआ. ईसा, मुहम्मद और बुद्ध के बाद पूरे संसार में अगर किसी एक विचारक ने सबसे अधिक अनुयायी पैदा किए तो मार्क्स ने. और जितनी शाखाएं ईसाइयत,इस्लाम या बौद्ध धर्मों की बनीं,उससे कहीं ज़्यादा मार्क्सवाद की. यहाँ तक कि मार्क्स ने धर्मों को भी झकझोर दिया और अपनी भूमिका बदलने को मजबूर किया. ईसाइयत और इस्लाम में लिबरेशन थिओलोजी इसी टकराहट का नतीजा है.

धर्म के बाद यह मार्क्सवाद ही है जिसने दुनिया की सारी भाषाओं के साहित्य और हर प्रकार की कला को प्रभावित किया.सारे भाषाओं ने मनुष्य की अंतिम मुक्ति का सपना कभी न कभी मार्क्स की भाषा में देखा. सिर्फ साहित्य नहीं, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शन, शिक्षा:विद्या की हर शाखा ने मार्क्स को सन्दर्भ बिंदु बनाया ही.

इसका जवाब लेकिन मार्क्स के मानने वाले खोज रहे हैं कि यह क्योंकर हुआ कि मार्क्सवाद के नाम जितनी सत्ताएं बनीं वे मनुष्य-विरोधी साबित हुईं.लेनिन और स्टालिन के कम्युनिस्ट राज में हिटलर के फासीवादी राज के मुकाबले कोई कम लोग नहीं मारे गए. जो इंसान को आजादखयाल और खुदमुख्तार बनने का आह्वान करता था, उस मार्क्सवाद को इंसान को जकड़ने की जंजीर में कैसे तब्दील कर दिया गया?क्यों साम्यवादी सत्ताओं ने अपने बेहतरीन लेखकों , कलाकारों को या तो मार डाला या उनकी जुबान सिल दी? भारत में ही मार्क्सवादी पार्टी ने ही नंदीग्राम काण्ड किया?जो विद्रोह का दर्शन था, उसने आज्ञाकारी नागरिक पैदा करने का काम कैसे किया?

इन सवालों का जवाब शायद सत्ता के अपने चरित्र की समझ की तलाश में मिले.इसमें भी कि खुद कम्युनिस्ट पार्टियों ने मार्क्स को कितना और कैसे पढ़ा? लेकिन यह तो कहना होगा कि सोवियत संघ,पूर्वी यूरोप चीन, कम्पूचिया या कोरिया की तानाशाहियों के लिए मार्क्स को अपराधी ठहराना कुछ सही न होगा. मार्क्स और कुछ थे, भविष्यवक्ता न थे. और उन्होंने समाजवाद बनाने का दर्शन नहीं गढ़ा था. वे पूँजीवाद के अध्येता और शोधकर्ता थे और वे पूंजीवाद के बारे में ही लिख रहे थे. पूंजीवाद की उनकी आलोचना को आज तक गलत साबित नहीं किया जा सका है.

कुछ बात है कि मार्क्स को प्रेरणा स्रोत मानने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों के बदहाल होने पर भी कम्युनिस्टों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर अयातोल्लाह खोमैनी तक बड़ा खतरा मानते हैं और उनके खात्मे के हर उपाय करते हैं.क्या इसलिए कि मार्क्स  कुछ बुनियादी सवाल उठाते हैं, जिनका जवाब पूँजीवाद के बड़े पैरोकारों से लेकर महान धार्मिक गुरुओं तक के पास नहीं और वे इनसे मुंह चुराते फिरते हैं?

मसलन,तीन साल पहले आज के ही दिन ‘क्रिस्चियन साइंस मॉनिटर’ ने मार्क्स के इन शब्दों को याद किया, “आप भयभीत हो जाते हैं जब हम निजी संपत्ति के खात्मे की बात करते हैं.लेकिन आपके आज के समाज में तो पहले ही आबादी के दस में से नौ के लिए निजी संपत्ति खत्म कर दी गई है, अगर यह कुछेक के पास है तो सिर्फ इस वजह से कि यह दस में नौ के पास नहीं है.”

यह कथन आज भूमि अधिग्रहण क़ानून की बहस में कितना प्रासंगिक जान पड़ता है. पूँजी के साथ मिलकर राज्य किसानों से कह रहा है कि उन्हें राष्ट्र और समाज एक भले की सोचकर अपनी निजी संपत्ति का त्याग करना चाहिए.लेकिन वह यह नहीं बताता कि इससे कुछेक की निजी संपत्ति में कितना इजाफा होगा.आखिर वे कभी यह त्याग क्यों नहीं करते!किसान आखिर निजी संपत्ति की रक्षा का संघर्ष ही तो कर रहे हैं?फिर राज्य उनके साथ न होकर पूँजी के साथ क्यों है? उसी तरह जब वह आदिवासियों को कहता है कई वे उस जंगल और जमीन से हट जाएं जिसके नीचे खनिज दबा है तो वह उस संपत्ति से उन्हें वंचित कर उसपर अपनी या पूंजीपतियों की दावेदारी पेशकर रहा है.

मार्क्स को पढ़ने में खतरा यह है कि पूँजी के ऊपर जो एक पर्दा पड़ा है, जिससे यह एक रहस्यमय, दैवी या कुदरती चीज़ मालूम पड़ने लगती है जिसकी पूजा के अलावा उपाय नहीं, उस पर्दे को वह चीर देता है और  उसकी असली शक्ल उघाड़ देता है जिसकी दाढ़ में इंसानी खून लगा है.

मार्क्स क्या सिर्फ मजदूरों का वकील है? वह दरअसल इस पूँजी की प्रभुता के चलते हमारी मनुष्यता के छीजते चले जाने की चेतावनी देता है.वह कहता है कि अगर ज़्यादातर इन्सान खुश नहीं हैं तो इसलिए कि वे जो कुछ करते हैं, उसपर उनका फैसला या हक नहीं होता, कि वे खुद को अपने काम से अलहदा महसूस करते हैं , वे देखते हैं कि वे जो कुछ रचते हैं, वह उनकी शख्सियत का हिस्सा न रह कर पराया हो जाता है.और फिर इसी वजह से हम इतने अहमक हो जाते हैं कि जब तक किसी चीज़ को हथिया न लें,जब तक वह हमारी निजी संपत्ति  न हो जाए,तब तक  हम उससे कोई अपनापा महसूस नहीं करते.

ठीक है कि मार्क्स ने दुनिया को बदलने की बात की थी क्योंकि जिस शक्ल में यह थी और है,वह इंसान को इंसानियत से महरूम करती है.लेकिन उसे बिना समझे बदलना भी मुमकिन नहीं. और उसके लिए तो पढ़ना पड़ेगा ही.जितना बुद्ध को, उतना ही मार्क्स को.लेकिन बिना बौद्ध हुए या बिना मार्क्सवादी हुए.आखिर यह मार्क्स ने ही कहा था कि एक बात जो तय है, वह यह कि मैं मार्क्सवादी नहीं!

  • बी.बी.सी., मई, 2015
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