अवकाश के पक्ष में

नई सरकार के बनने के बाद से प्रधानमंत्री के कार्य-व्यसनी होने के किस्से अभिभूत होकर प्रकाशित किए  जा रहे हैं.यह भी बताया जा रहा है कि किस प्रकार उनकी वजह से मंत्रियों, आला अफसरों और मामूली बाबुओं को बिलकुल सुबह से देर रात तक काम करना पड़ रहा है. उनकी शनिवार की छुट्टियों में भी सेंध लग गई है. आराम के दिन लद गए. यह सब कुछ इस तरह बताया जा रहा है मानो पिछले दिनों अर्थव्यवस्था के सुस्त हो जाने की वजह लोगों का आरामतलब या कामचोर हो जाना था.मानों पूंजीवादी विश्व-अर्थव्यवस्था लोगों के काम न करने की वजह से ढह गई थी!

अफसरों और बाबुओं से परपंरागत चिढ़ की वजह से इन खबरों से लोगों को एक विकृत खुशी मिलती है. कुछ लोगों ने फेसबुक पर बताया कि यही अखबार मनमोहन सिंह की सरकार के बनने के बाद भी उनके अठारह-बीस घंटे काम करने की खबर इसी उत्साह से छाप रहे थे!

सन्देश यह है, जो दुर्भाग्य से जवाहरलाल नेहरू के समय ही आह्वान के रूप में दिया गया था, “आराम  हराम है!” जितना अधिक काम करेंगे उतना ही देश प्रगति और विकास की दौड़ में आगे निकलेगा.कम काम का मतलब या आराम की माँग एक तरह से राष्ट्रद्रोह है.

यह आराम या अवकाश विरोधी अवधारणा भारत में ही नहीं धीरे-धीरे पूरी दुनिया में प्रभावकारी होती जा रही है. जापान में तो कार्याधिक्य से मृत्यु के लिए 1993 में एक अलग शब्द ‘कारोशी’ ही गढ़ा गया. ‘काम के घंटे आठ’ के नारे के साथ आंदोलन की याद अब उसमें बहे खून के निशान की तरह ही धुंधला गई है. जैसे-जैसे एक ही काम में जीवन गुजर जाने की सम्भावना कम होती जाती है, काम के घन्टों पर काम करने वाले का नियंत्रण घटता जाता है.काम में लगने वाले वक्त का अध्ययन करने वाले बताते हैं कि सबसे कम घंटे काम का,यानी पैंतीस घंटा प्रति हफ्ता,आंकड़ा फ्रांस का है लेकिन अब वह यूरोप के बाकी देशों और दक्षिण कोरिया या अमरीका और एशियाई मुल्कों की राह धीरे-धीरे चल निकला है.

टेक्नोलॉजी में क्रांतिकारी परिवर्तन के कारण काम की प्रकृति भी बदलती जा रही है. अब कई मुल्कों के लोग, जिनके दिन-रात अलग-अलग हैं,एक ही काम में लगे होते हैं और उन्हीं एक-दूसरे से संपर्क में रहना होता है. इस वजह से वे अपने दिन के हिसाब से तो काम करते ही हैं,अपनी टीम के दूसरे साथियों से मशविरे के लिए उन्हें अपनी रातें भी काम के हवाले करनी पड़ती हैं.

नए प्रकार के कामों के वजूद में आने की वजह से दिन और रात का फर्क भी मिट गया है. कॉल सेंटर नाम का नया कार्यस्थल न सिर्फ काम करने वालों की जैविक घड़ी को उलटा चलाता है, वह धीरे-धीरे उनकी आत्मछवि पर भी असर डालता है.आशिम आहलुवालिया की डाक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘जॉन एंड जेन टौल फ्री’ इसे ज़बर्दस्त ढंग से दिखाती है.

धीरे धीरे विकास या प्रगति हमसे त्याग करने को कहती है और हम अपने जीवन का एक-एक हिस्सा उसकी बलिवेदी पर चढ़ाते जाते हैं. जितने का करार था, उससे ज़्यादा काम लेने पर अब पहले की तरह मुआवजे की कोई जगह नहीं रही.अगर ऐसा करने में आप कोताही करते हैं तो आपकी जगह किसी और को काम पर रख लिए जाने में देर नहीं की जाती.

छुट्टी, अवकाश, आराम को काहिली से जोड़कर देखने की आदत पुरानी है.ठेकेदारों को मजदूरों से काम लेते देखिए.बीड़ी पीने के लिए फाँक निकालने लेने को कामचोरी ठहरा दिया जाता है.कारखानों में काम की स्थितियाँ श्रमिकों के विरुद्ध होती जा रही हैं.

ऐसे कार्यस्थल बचे थे,जहाँ काम के घंटों को उस सख्ती से लागू नहीं किया जाता था.विश्वविद्यालय उनमें सबसे प्रमुख थे.लेकिन अभी दिल्ली विश्वविद्यालय ने तय किया है कि वह अध्यापकों के लिए अंगूठे की छाप वाली इलेक्ट्रॉनिक हाजिरी शुरू करेगा.कुलपति का कहना है कि सुबह नौ से शाम के पाँच तक उन्हें पर काम रखना उनकी प्राथमिकता है.जब उनसे यह पूछा गया कि वे शोध या लेखन कब करेंगे, उन्होंने कहा कि इसके लिए पूरी रात पड़ी है.उनका यह भी कहना था कि खुद वे भी रात में ही शोध का काम करते हैं!उनकी इस टिप्पणी से हम समझ सकते हैं कि काम के बारे में हमारी समझ में कितना क्रांतिकारी बदलाव आ गया है. विश्वविद्यालय और कारखाने में फर्क का मिटना हमारे समाज की दिशा का संकेत है.

अक्सर अध्यापकों को लेकर शिकायत रहती है कि उन्हें अवकाश अधिक है और वे तनख्वाह के हिसाब से काम कम करते हैं.अगर वे दिन में सिर्फ दो घंटे की कक्षा ले रहे हैं तो फिर कितना उपयोगी काम कर रहे हैं! अगर इस बहस को हम छोड़ भी दें तो अवकाश को विलासिता मानने की प्रवृत्ति पर विचार करना रह ही जाता है.

संस्कृति ही नहीं मनुष्यता के लिए अवकाश अनिवार्य है,इस पर काफी सोच-विचार किया जा चुका है.आराम या अवकाश किसके हिस्से आता है और कौन उससे वंचित रहता है, इससे आप पता कर सकते है कि कौन शिष्ट वर्ग का सदस्य है और कौन असभ्य माना जाता है या, जैसा हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि एक की संस्कृति दूसरे की वंचना है.किसके पास समय है और किसके पास नहीं है को  यों भी पूछा जा सकता है कि कौन अपने समय का मालिक है.

समय के स्वामित्व से मेरी हैसियत तय होती है और मेरी इयत्ता भी. लेकिन अज्ञेय की ‘रोज़’ या ‘गैंग्रीन’ कहानी के चलते हम जानते हैं कि कई बार खाली समय को अवकाश नहीं कहा जाता क्योंकि वह समय मैंने सृजित नहीं किया है. जिस समय को मैं नहीं पैदा करता,वह खाली होकर मुझ पर बोझ बन जाता  है. प्रसंगवश, यह कह देना भी उचित होगा कि समय, अवकाश और जेंडर के बीच के रिश्ते की समझ की कुछ आरंभिक रचनाओं में यह एक है.

अक्सर श्रम और अवकाश में विरोध माना जाता है.यह इसलिए कि श्रम हममें से बहुलांश के लिए आनंददायी गतिविधि या अनुभव नहीं होता,बोझ होता है.कार्ल मार्क्स ने, और उनके पहले अन्य विचारकों ने मनुष्य की श्रम करने की क्षमता या वृत्ति को ही मनुष्यता का स्रोत माना है. यहाँ तक कहा  गया है कि श्रम के दौरान मनुष्य स्वयं को गढ़ता है. लेकिन मानवता के इतिहास के साक्ष्य से हम जानते हैं कि प्रायः साधारण जन के श्रम से उनका नाश ही होता है और किसी और का जीवन समृद्ध होता है. इसलिए अगर श्रम के प्रति के किस्म की वितृष्णा या उदासीनता उनमें पाई जाती है तो बहुत ताज्जुब की बात नहीं. इसकी सबसे तीखी अभिव्यक्ति प्रेमचंद की ‘कफ़न’ में मिलती है लेकिन उसके पहले ‘पूस की रात’ में अपनी लगाई फ़सल को उजड़ते देख हल्कू का उल्लास दरअसल श्रम के उस दमनकारी प्रभुत्व से मुक्ति की राहत की अभिव्यक्ति है जिसके चलते यह खेत उसके गले का तौक बन गया था.

मार्क्स अवकाश को अनिवार्य मानते हैं.अवकाश का अर्थ काम का अभाव नहीं है बल्कि वह ऐसा समय है जिसमें मनुष्य अपनी प्रजातिगत विवशता या उसके बंधन से मुक्त अनुभव करता है और कुछ ऐसा करता है जो उसके जैविक अस्तित्व के बने रहने भर के लिए ज़रूरी न हो. एक तरह से वह अनिवार्य कार्य नहीं कर रहा होता,अतिरिक्त का सृजन कर रहा होता है.लेकिन हम सब जानते हैं कि संस्कृति इसी अतिरिक्तता का दूसरा नाम है.यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर किसी और की नज़र नहीं और न  किसी का नियंत्रण है.

अवकाश की बलि की माँग दो जगहों से आती है और वे हैं पूँजी और राष्ट्र. शर्मिन्दा करने के लिए कहा जाता है कि बिल गेट्स या स्टीव जॉब्स या भारत के प्रधान मंत्री को देखिए, वे तो सोते ही नहीं हैं. लेकिन जैसा चलती जुबान में हमारे मित्र मनोज ने कहा, वे मालिक हैं! यानी उनका काम उन्हें पहचान देता है या सत्ता. दोनों ही एक-दूसरे के स्रोत हैं.जबकि मैं जितना ही काम करता जाता हूँ, मेरी पहचान लुप्त होती जाती है और मैं एक साधन या संसाधन में शेष होकर रह जाता हूँ.

अगर मैं अपने काम में अपनी पहचान पैदा नहीं कर पा रहा तो अपना अवकाश भी क्यों किसी और पहचान को समर्पित करूँ? वह प्रगति नाम की देवी या राष्ट्र नामक देवता ही क्यों न हो!

  • जनसत्ता, सितम्बर, 2014
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