अतिदृश्यता

मैं ‘फिलहाल’ पढ़ रहा हूँ.यह एक तरुण कवि, अशोक वाजपेयी के लेखों का संग्रह है जो उसने प्रायः अपनी उम्र की तीसरी दहाई में लिखे थे. हिंदी में ये दो दशक साहित्य की दृष्टि से सक्रियता की उत्तेजना से भरे हुए दशकों के रूप में जाने जाते हैं. प्रगतिवाद संगठित तौर पर उत्कर्ष पर पहुँचकर चुक गया था. इस लिहाज से कि अब वह नई रचनात्मकता के लिए अनिवार्य स्रोत नहीं रह गया था. लेकिन साहित्य संबंधी अवधारणात्मक विवाद  प्रयोगवाद के बाद नई कविता और नई कहानी से लेकर युवा कविता, अकविता, अकहानी, भूखी पीढ़ी और श्मशानी पीढ़ी तक के अनुभवों से वह समृद्ध भी हुई थी और क्षत-विक्षत भी.

भाषा के तौर पर हिंदी से भारत नामक राष्ट्र का रोमांस समाप्त हो चुका था. धूमिल और रघुवीर सहाय की भाषा और हिंदी संबंधी कविताएँ इसका सबूत पेश करती हैं. जनतंत्र के संवैधानिक वायदे को लेकर संदेह गाढ़ा होने लगा था. जनतंत्र पर फासीस्टी प्रवृत्तियों के हावी होने की आशंका इतनी प्रबल थी कि उसने ‘अँधेरे में’ जैसी कविता लिखने के लिए मुक्तिबोध को बाध्य किया.जल्दी ही नक्सलबाड़ी का विस्फोट होने वाला था. उसके साथ ही पहली बार कांग्रेस पार्टी के बीस वर्षीय शासन की निरंतरता को चुनौती मिली जब राज्यों में मिली जुली सरकारें बनीं और उनके  माध्यम से भारतीय जनसंघ ने, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा थी,सत्ता में प्रवेश किया. अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य हर तरह की हलचल से भरा हुआ था. मार्क्सवाद के सोवियत संस्करण को यूरोपीय मार्क्सवादी धाराएँ प्रभावी रूप से चुनौती पेश कर चुकी थीं. पूर्वी यूरोप में सोवियत समाजवाद के प्रति विद्रोह  कुचला जा चुका था. मार्क्सवाद की मुक्तिकारी संभावना पर सवालिया निशान लग चुका था. चीन की सांस्कृतिक क्रांति ने संस्कृति का अर्थ ही बदलकर रख दिया था. लेकिन पश्चिमी जनतंत्र की बेचैनियाँ भी सतह पर थीं. जगह-जगह युवा-विद्रोह हो रहे थे. अशोक वाजपेयी के शब्दों में ‘दूसरे जनतंत्र की खोज’ शुरू हो चुकी थी.

नई रचनात्मकता के स्रोत, सामजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक, फिर कहाँ थे?इस सवाल का जवाब खोजते हुए मुक्तिबोध की बेचैनी पोलिश अध्येता आग्नेस्का को लिखे उनके पत्रों में झलकती है.अशोक वाजपेयी इसी दौर में वे लेख लेख रहे थे जो 1970 में ‘फिलहाल’ की शक्ल में एक जिल्द में संकलित किए गए.नाम से ही लेखक का तात्कालिकता को लेकर आग्रह प्रकट होता है.

‘फिलहाल’ एक तरुण कवि का उसके समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में आलोचनात्मक हस्तक्षेप है. आज तकरीबन पैंतालीस साल बाद इस संग्रह को पढ़ते हुए यह तथ्य ओट नहीं किया जाना चाहिए,वयस का यह तथ्य. जो ताजगी इस संग्रह के लेखों में दीख पड़ती है, वह इस उम्र के साहस की वजह से है. वयस क्या भूमिका निभाती है, इस पर विचार करने का पर्याप्त अवकाश यहाँ नहीं है लेकिन वह विचारणीय अवश्य है

इस बात पर अक्सर आश्चर्य जाहिर किया जाता रहा है कि अशोक वाजपेयी को इसकी शिकायत क्यों है कि वे एक अल्पलक्षित और अल्पपठित रचनाकार हैं. वे सबसे अधिक चर्चित साहित्यकारों में हैं, सबसे अधिक दुनिया हिंदी रचनाकारों  की बिरादरी में उन्होंने घूमी और देखी है, लेखकों से बाहर कलाकारों के वृहत्तर समाज में उनकी जो पैठ है वह किसी दूसरे रचनाकार को नसीब नहीं, फिर यह दुःख क्यों!

अशोक वाजपेयी का दुःख संभवतः इस बात को लेकर है कि जिसे वे अपना प्राथमिक कार्य मानते रहे,यानी कविता, उसे सहृदयता के साथ नहीं पढ़ा गया, परखने की बात तो दूर.एक लंबे समय तक माना जाता रहा कि अशोक वाजपेयी प्रेम और प्रकृति की कविताएँ लिखते हैं और राजनीति से परहेज करते हैं, इसलिए महत्वपूर्ण कवि नहीं हैं. उन्हें तिरस्कारपूर्वक ‘देह और गेह का कवि’ कहा गया मानों दोनों ही मानव-जीवन के लिए घृण्य वस्तुएं हों. पूंजीवाद की मार्क्स की पूरी आलोचना का आधार ही यह है कि वह देह की संपूर्ण ऐंद्रिकता को कुंठित कर देता है. मार्क्स इस ऐंद्रिकता के पुनर्वास के लिए पूँजीवाद को सर्वथा अनुपयुक्त मानते हैं क्योंकि यह देह को उत्पादन के साधन मात्र के रूप में उपयोगी मानता है. श्रमिक देह को उन तमाम अनुभवों से वंचित रहना होता है जो प्रकृत्या उसी के हैं.मनुष्य को उसके मानवीय आशयों से वंचित कर आर्थिक मनुष्य मात्र में शेष कर देना पूँजीवाद की विशेषता है और मार्क्स का संघर्ष यही है: मानव-देह को उपयोगिता के संकीर्ण दायरे से आज़ाद करना और उसे प्रामाणिक मानवीय अनुभवों से समृद्ध होने के अवसर उपलब्ध कराना. समाजवाद की अगर कोई सार्थकता हो सकती थी तो यही.लेकिन ट्रेजेडी यही हुई कि उसने पूँजीवाद की इस परियोजना को और दमनकारी तरीके से आगे बढ़ाया. समाजवादी क्रांति के बाद देह उत्पादन तंत्र के अलावा राजकीय वस्तु में भी तब्दील कर दी गई. इस तरह देह की स्वायत्तता और दैहिकता के पुनर्वास का प्रश्न वास्तविक राजनीतिक प्रश्न भी बन गया. पूँजीवाद से दूसरी बड़ी गहरी शिकायत मार्क्स को इस वजह से है कि वह मनुष्य को उसके एकांत से वंचित कर देता है और उस पर चिरंतन सामाजिकता लाद देता है. एकांतविहीनता की अवस्था एकाकीपन को जन्म देती है और मानवीयता का  हरण भी करती है.

गेह या घर किसे उपलब्ध है और किसे नहीं? औद्योगिक क्रांति के बाद से गृह-हीनता मनुष्य का सार्वभौम अनुभव बन गई. अपना घर सर पर लादे-लादे दर-दर भटकते असंख्य लोग न होते तो कुछ लोगों को घर नसीब न होता.बीसवीं सदी के अंत आते आते पता चला कि घर बचाना एक बड़ा राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष है. क्रांति करने से कहीं बड़ा और कठिन संघर्ष. क्योंकि उसमें ‘विकास’की उस अवधारणा की जड़ पर ही प्रहार करना होगा जो पूँजीवाद और लोकप्रिय,प्रचलित या परिचित समाजवाद का आधार है.विस्थापन बीसवीं और इक्कीसवीं सदी की परिभाषित करने वाली परिघटना है.बल्कि कहा जा सकता है कि बिना विस्थापन के आधुनिक सभ्यता संभव न थी.  घर की याद कोई ‘रोमांटिक’ धारणा नहीं है.किसी ‘पैस्टोरल’ युग में ले जाने की प्रतिगामिता भी नहीं.

प्रश्न यह होना चाहिए कि अशोक वाजपेयी की कविताओं में मानव स्मृति से देह और गेह के लोप की कोई पीड़ा है या नहीं या क्या वे मात्र इनका उत्सव मनाते हैं. दूसरी बात यह भी है कि जब देह की संवेदना हमारे अनुभव-लोक से ही  विस्थापित हो रही हो, तो उसे कला या कविता के अलावा और कहाँ शरण मिलेगी? बीसवीं सदी के अंत और इक्कीसवीं सदी के आरंभ में देह-केंद्रित राजनीति के आशयों पर अभी कायदे से विचार नहीं हुआ है. क्यों धर्म और राज्यसत्ता उसे प्रजनन के साधन से अधिक दर्जा देने से घबराती है? और क्यों बाज़ार उसका इस्तेमाल उपभोग मात्र के लिए करना चाहता है और निरन्तर संचार-माध्यमों के जरिए एक लोभनीय देह का मॉडल हमारे सामने पेश करता रहता है?

देह सिर्फ वह नहीं है जो प्रकृति से हमें मिलती है,देह वह है, जिसे हम गढ़ते है.कविता या साहित्य में देह या शरीर के अनुभवों को कवि रचता है. एक तरह से उपयोगिता और उपभोग के संसार में खो गई हुई देह को वह वापस हासिल करता है.शमशेर बहादुर सिंह के बाद हिंदी में अशोक वाजपेयी ने देह को उसके संपूर्ण ऐन्द्रिक ऐश्वर्य में रचने की कोशिश की है. वह कितनी कामयाब हुई है, यह विचार और विश्लेषण का विषय है लेकिन इस काम के महत्व को स्वीकार करने के बाद ही.

कविता लिखने के साथ ही अशोक वाजपेयी आरंभ से ही वह कार्य भी करते रहे जिसे व्यापक अर्थ में आलोचना कहा जाना चाहिए. उन्होंने बाकायदा समीक्षाएं और लेख लिखे, नए से नए कवियों की कविताओं के संगृह निकाले, पत्रिकाओं का संपादन किया, आयोजन किए, संस्थाएँ बनाईं .इन सारे ही कार्यों को  आलोचना के दायरे में रखा जाना चाहिए क्योंकि इन सबमें किसी पर रोशनी डालना, चयन, त्याग, क्रम-निर्धारण, प्रतिमानीकरण शामिल है.और यही काम आलोचना का है. अच्छा संगठनकर्ता स्वभावतः आलोचक होता है और आलोचक  अच्छा संगठनकर्ता होता है. वह रिश्ते बनाता है और यह काम भी आलोचना का है.दो परस्पर भिन्न प्रवृत्तियों के बीच, जो जाहिर है, व्यक्तियों के रूप में ही प्रकट हो सकती हैं, संबंध को पहचान पाना और उस संबंध के महत्त्व को स्थापित करना आलोचना का ही काम है. यह भी बताना कि संबंध एक ही तरह के नहीं होते, संबंधों का एक संजाल होता है या कई संजाल होते हैं जिसमें रह कर ही कोई एक प्रकार का अर्थ ग्रहण करता है,उसका काम है. आलोचना इस तरह समावेशन का काम करती है. लेकिन यह समझना बहुत कठिन नहीं कि यह सीमित अर्थों में समावेशन मात्र नहीं है. वह किसे आमंत्रित करती है और किसे छोड़ देती है, इससे खुद उसकी दृष्टि का पता चलता है. संबंध-स्थापन भी बहुत महत्वपूर्ण दायित्व है.कितने लोग मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह, या ब. व. कारंथ और कुमार गन्धर्व या जगदीश स्वामीनाथन के बीच संबंध देख पाए? या हरिशंकर परसाई और श्रीकांत वर्मा के बीच? या हबीब तनवीर और मल्लिकार्जुन मंसूर के बीच?

आलोचना का काम विवेकपूर्ण और तर्कसंगत निर्णय के लिए पर्याप्त अवकाश या स्थितियां पैदा करना भी है. वाल्टर बेंजामिन का कहना है कि अच्छा आलोचक स्वयं राय देने की जगह किसी रचना या रचनाकार का ऐसा विश्लेषण करता है कि उसके सहारे पाठक उसके बारे में अपनी आज़ाद राय कायम कर पाएं.बेजामिन ने यह भी कहा कि आप किसी आलोचक को उसकी प्रतिबद्धता से भी पहचानते हैं.

अशोक वाजपेयी की प्रतिबद्धता जनतांत्रिकता के साथ है, इसे बिना हिचक और संकोच के कहा जा सकता है.लेखन में इसका अभ्यास इतना आसान नहीं, यह बात आज तक बहुत लोग समझ नहीं पाए हैं. जनतांत्रिकता का अर्थ यह नहीं कि आप हर किसी विचार को समान भाव से स्वीकार कर लेंगे, बल्कि यह है कि अपने विचार पर दृढ़ता के साथ टिके रहकर उसके प्रतियोगी या प्रतिद्वंद्वी विचार या विचारों को भी न सिर्फ बने रहने, बल्कि फलने-फूलने का पूरा मौक़ा और साधन भी मुहैया कराएँगे. हम किसी भी समाज या राज्य प्रणाली या व्यक्ति की भी जनतांत्रिकता की जाँच इस कसौटी पर उसे कसकर कर सकते हैं .ऐसा करने के लिए प्रयत्न और अभ्यास करना होता है और कई बार अपने आप से संघर्ष करना होता है क्योंकि यह सहज, मानवीय स्वभाव नहीं है. हम आलोचक या लेखक के पहले तरह-तरह के विशेषणों के आदी हैं. अब तक किन्तु हमने जनतांत्रिक लेखक या आलोचक की कोई कोटि नहीं गढ़ी है. हिंदी में अगर किसी एक के लिए यह कोटि सर्वथा उपयुक्त है तो अशोक वाजपेयी के लिए.

अशोक वाजपेयी मानते हैं कि हर किसी का एक पूर्व-आग्रह होगा ही.उनका मानना यह भी है कि पूर्वग्रह जनतंत्र के ली आवशयक हैं.असल बात है तरह-तरह के पूर्वग्रहों की जाँच करना और यह देखना कि आपके पूर्वग्रह में क्या इतनी दृढ़ता या शक्ति है कि वह अन्य आग्रहों के संग रहते हुए या उनसे टकराते हुए टिक जाता है या नहीं. यह बदल भी सकता है. इसका मतलब यह है कि अपने विशवास या विचार की श्रेष्ठता के कारण उससे दूसरों को सह्मत करने की चेष्टा के साथ आप भी दूसरों को सुनने और उनसे सहमत होने को तैयार हों. अपने विचार या आग्रह की श्रेष्ठता की परख आप उसे अकेला करके नहीं कर सकते. उसके पुष्ट होने के लिए भी आवश्यक है विचारों का एक समृद्ध पर्यावरण होना. जैसे किसी कोई एक प्रजाति अकेले नहीं,विविध प्रकार की प्रजातियों के साथ ही जीवित और विकसित हो सकती है वैसे ही कोई विचार भी सिर्फ अपनी  प्रतिध्वनियों के संसार में अधिक दिन जीवित नहीं रह सकता या बढ़ नहीं सकता. क्या यह संयोग है कि मार्क्सवाद में जो भी रचनात्मकता है वह सोवियत विश्व में नहीं, यूरोप, अमरीका या लैटिन अमरीका में हुए विचार-संग्राम के कारण?और भारत जैसे देश में भी वह इसलिए निष्प्राण रहा कि उसके व्यवहारकर्ताओं ने अपना मुँह भीतर को घुमा लिया. उन्होंने अन्य विचारों से कायदे से विवाद भी नहीं किया,संवाद तो बहुत दूर की बात है.उन्होंने दूसरों से अभिप्रमाणित होने की जगह अपनी वैधता अपनी ही दुनिया से हासिल करने का सुविधाजनक रास्ता अपना लिया.इस तरह भारत में मार्क्सवाद जीवित और जीवंत विचारधारा न बन सका और  लोकतांत्रिक व्यवहार को समृद्ध करने में भूमिका निभाने का अवसर उसने गँवा दिया.

आलोचना लिखी तो ढेर जाती है, महत्वपूर्ण वही होती है जो अपने समय की रचनाशीलता को प्रभावित कर सके और उससे प्रभावित हो सके. प्रभावित करने से आशय यह नहीं कि रचनात्मकता का मार्ग वह निर्धारित करे, बल्कि यह है कि वह निरंतर उसे चुनौती देती रहे.यह दोतरफा व्यापार है.आलोचना के जीवित और सक्रिय रहने की भी एक शर्त रचनाशीलता में उत्तेजना का बने रहना है. उसे भी अपने समय की आलोचनात्मक प्रतिभा को लगातार चौकन्ना रहने की चुनौती देने की क्षमता होनी चाहिए.यह विषय-वस्तु, भाषा और रूप, प्रत्येक स्तर पर होगा.अगर वह आलोचना को यह चुनौती नहीं देती कि पढ़ने के बन चुके ढर्रे से वह बाहर आए, अगर वह सहज ही आयत्त हो जाती है, तो आलोचना के लिए वह कोई प्रेरणा नहीं है, कोई चुनौती नहीं है.फिर यह शिकायत नहीं  की जा सकती कि प्राणवान समीक्षा या आलोचना क्यों नहीं लिखी जा रही.आलोचना का खामोश रहना हमेशा उसकी असमर्थता नहीं है.वह तो सिर्फ इस बात का स्वीकार है कि आलोचना रचना के पहले नहीं है,उससे स्वतंत्र भले हो. वह हमेशा ‘पश्चात-पद’ है. इसे लेकर उसे कोई हीन भावना नहीं.

दूसरे, आलोचना का काम मात्र सिद्धांत-निरूपण नहीं है.उसकी इच्छा रचना-संसार में हस्तक्षेप की है जबकि रचनाकार प्रायः उससे अनुमोदन मात्र चाहते हैं. अधिक से अधिक वे उसे यह भूमिका देने को तैयार हैं कि वह कुछ पाठ-विधियाँ सुझाए और उनकी व्याख्या करे. जो कुछ भी लिखा जा रहा है,वह सब सृजन हो ही,आवश्यक नहीं. सफलता और असफलता की श्रेणियों से परे किसी रचनात्मक प्रयास की सार्थकता को, भले ही वह पूर्णता प्राप्त न पाए या ‘सफल’ न हो पाए,चिह्नित करना आलोचना का काम है. ऐसा करके ही आलोचना समझ और आस्वाद के संसार को जितना वह उसके पहले था, उससे अधिक विस्तार देने का काम करती है.आस्वाद की  स्वीकृत पद्धतियों को वह प्रश्नांकित भी करती है.

आलोचना को नए का स्वागत अवश्य करना चाहिए लेकिन वह बिना शर्त नहीं हो सकता.भले ही ब्रेख्त ने उसकी वकालत यह कह कर की हो कि नया,चाहे बुरा ही क्यों न हो, पुराने से बेहतर होता है लेकिन आलोचना का काम नए की भी परीक्षा करना है. नए के सामने वह हीनभाव से हाथ बांधे खड़ी नहीं रह सकती. आलोचना का काम नए को परिभाषित करना है, नए और नए में फर्क करना है. यह सवाल करना है कि हर कुछ जो नया दीखता है क्या वाकई ‘नया’ है या पुरानी संवेदना  ही नया भेस धरकर सामने आ गई है.

नए की परीक्षा जैसे आलोचना का दायित्व है वैसे ही विद्रोह, क्रान्ति आदि के दावे की भी. जो कविता विद्रोही उग्रता से लैस दीखती है, वह वस्तुतः रूढ़िवादी हो सकती है. अकविता और युवा कविता के दौर को हिंदी कविता में उग्रता के प्रदर्शन का दौर कहा जा सकता है जिसे रूढ़ियों को तोड़ने के नाम पर उचित ठहराया गया. अशोक वाजपेयी ने ‘युवा कविता’ शीर्षक अपने निबंध में लिखा, “स्त्री को लेकर भी एक भयानक और आक्रामक दकियानूसी युवा कविता में विकसित हुई है. जिसके रहते स्त्री-पुरुषों के संबंधों में चाह, कोमलता, ललक और कामना की संभावना का कोई अहसास तक नहीं रह गया है,और ज़्यादातर प्रेम कविताएँ प्रेम के बारे में न होकर आत्मलिप्त पुरुषत्व की उद्घोषणाएँ बनकर रह जाती हैं. इस दकियानूसी में स्त्री कोई विशेष व्यक्ति न होकर एक सामान्यीकरण मात्र हो गई है.”

युवा कविता के इस आक्रामक और पुरुषत्व को लक्ष्य करना जितना कठिन था उसे उसी वक्त बोलने के लिए भी साहस चाहिए था, साहस जिसके बिना न रचना संभव है, न आलोचना. यह कहना कि इन युवा कवियों की प्रेम कविताओं में छद्म है और वे प्रेम की संवेदना के लिए इस वजह से अनुपयुक्त हैं कि उन पर  एक घातक आत्मलिप्त पुरुषत्व हावी है,गहरी राजनीतिक अंतर्दृष्टि के बिना संभव नहीं था. एक दूसरे लेख ‘युवा लेखन: साहस और उग्रता की पड़ताल’ में अशोकजी ने युवा कविता की छिपी हुई रूमानियत को पकड़ा, “यह आकस्मिक नहीं है कि सारे शोरोगुल और ‘ऐंटी रोमांटिक’ होने के दावे के बावजूद अ-कवि हों या अ-कथाकर, उनकी रचनाओं का मूल स्वर रूमानी अतिरंजना का है.अ-कवियों की रचना का सामान्य संगठन ‘रोमांटिक लिरिक’ का संगठन है और उनकी सारी भयावह बिंबमालाएँ उनकी बुनियादी रूमानी दृष्टि को नहीं छिपा पातीं.” मेरी याद में अशोकजी के अलावा शायद ही किसी ने इस दौर की तथाकथित यौन क्रांति में छिपे स्त्री विरोध को लक्ष्य किया और उसकी भर्त्सना की हो.

युवा कवियों या अकवियों की जमात प्रायः पुरुषों की थी. स्त्री पारंपरिक प्रेम कविताओं का विषय तो थी ही, जो इस दौर में भी नहीं बदला, अपनी यौन कुंठाओं या वर्जनाओं से मुक्ति के लिए भी स्त्री शरीर या स्त्री अंगों का ‘खुला वर्णन’ युवा या अकवि कवि की विशेषता थी. ‘अकविता: एक रूमानियत’ नामक अपने लेख में अशोक वाजपेयी ने इनमें से एक कवि के बारे में  लिखा, “स्त्री …एक मानवीय उपस्थिति के रूप में व्यक्त न होकर एक वस्तु, चीज़ के रूप में प्रकट होती है. स्त्री को मानव-प्राणी न मानकर ‘चीज़’ समझना, जिसके साथ कुछ भी खिलवाड़ करना विधिसम्मत हो, दकियानूसी भारतीय का रुख है.”

स्त्री के प्रति कवियों के रुख पर वे खासकर ध्यान देते हैं, भले ही वे अज्ञेय जैसे निर्विवाद रूप से  स्थापित कवि ही क्यों न हों. ‘अकेलेपन का वैभव’ शीर्षक निबंध में वे लिखते हैं, “एक दिलचस्प बात अज्ञेय की प्रेम-कविताओं में यह भी है कि स्त्री के प्रति अज्ञेय की दृष्टि संरक्षक और दाता की है. स्त्री, भले ही वह प्रेमिका ही क्यों न हो, पुरुष से हमेशा कुछ नीचे है, कभी समान स्तर पर नहीं.(शमशेर बहादुर सिंह के यहाँ, यह याद रखने की बात है, स्त्री हमेशा पुरुष के ऊपर है)”

‘फिलहाल’ के लेखों की प्रस्तावना में ही वे इस यौन-मुक्ति के झूठ और उसके भीतर की हीन ग्रंथि को पकड़ते हुए कहते हैं, “….स्त्री, यौन-संबंध, प्रेम आदि,को लेकर जो ‘जीभ और जांघ का चालू भूगोल’ इन रचनाओं में नज़र आता है वह शायद सामाजिक स्तर पर आपने पिछड़े होने के अहसास को संबंधों में आक्रामकता और उग्रता द्वारा दुरुस्त करने की एक परिणति है. बहुत-सा युवा लेखन स्त्री से अगर आक्रान्त है, और उसका खासा भाग स्त्रियों के जीवन में आने-जाने पर केंद्रित है, तो यह आकस्मिक नहीं है.बल्कि जो अपेक्षाकृत गंभीर और सक्षम लेखक हैं, जैसे महेंद्र भल्ला और श्रीकांत वर्मा, उनमें भी एक तरह का आत्म प्रदर्शन इस सिलसिले में नज़र आता है:वे भी अपने तथाकथित पुरुषत्व की इमेज में गिरफ्तार लेखक हैं, और कई बार लगता है कि उनका उद्देश्य स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर कुछ नया खोजना-रचना उतना नहीं है जितना कि अपना पुरुषत्व साबित करना.”

वे स्त्री को ठोस, वास्तविक मानवीय उपस्थिति के रूप में देखे जाने पर एकाधिक बार बल देते हैं.स्त्री के प्रति उस दौर के कवियों के रुख की बुनियाद में अगर रूमानियत थी, तो दूसरी ओर हिंसा थी. स्त्रीत्व और पुरुषत्व को लेकर उस समय कोई बौद्धिक बहस हिंदी या भारतीय भाषा में चल रही हो, इसका प्रमाण नहीं. जेंडर एक अवधारणा के रूप में कायदे से विचार और विश्लेषण का संदर्भ बिंदु नहीं बन पाया था. लेकिन अब समझना कठिन नहीं कि युवा अशोक वाजपेयी की उपर्युक्त टिप्पणियों में तत्कालीन हिंदी कविता में स्त्री-पुरुष के बीच के शक्ति संबंध की गहरी  पहचान है.

मेरी समझ में अशोक वाजपेयी की इस अन्तःप्रज्ञा का स्रोत  आधुनिकता की प्रतिज्ञाओं से उनकी मूल प्रतिबद्धता है जिसमें ईश्वरीय संसार के  संबंध-क्रम से भिन्न मानवीकृत संबंध-निर्माण की आकांक्षा है.प्रेम की सम्वेदना में आधुनिकता का तत्व कैसे प्रवेश करता है? पुरुष और स्त्री के बीच प्रेम खोखली रूमानियत से परे एक-दूसरे के व्यक्तित्व की स्वायत्ता का स्वीकार कैसे हो सकता है? इसके साथ ही यह प्रश्न भी कि क्या कोमलता नकारात्मक और त्याज्य है?

कोमलता का निषेध अमानवीयता की ओर भी ले जाता है. अक्सर मुद्रा हिंसक यथार्थ का विरोध करने की होती है.लेकिन वह सतहीपन की शिकार भी हो सकती है और वृहत्तर यथार्थ के साक्षात्कार में असमर्थता का परिणाम भी.अशोक वाजपेयी ने अकविता संबंधी इसी लेख में लिखा, “इससे इनकार नहीं है कि हमारे जमाने की सचाई हिंसा-भरी आक्रामक और उग्र सचाई  है…लेकिन सचाई सीधी-सरल चीज़ नहीं है. वह हमेशा,और अब तो और भी,मानवीय संभावना से कई स्तरों पर एक साथ जुड़ी हुई है.इसलिए लाजिमी है कि इस सचाई को और उजागर करने वाली कविता न केवल उग्र और नाटकीय हो बल्कि संभावना के लगातार और अनंत अहसास से अविकल घिरी हो.”

साठ के दशक के कवियों की जेंडरग्रस्त दृष्टि को लक्ष्य करने के साथ उनकी संवेदना में छिपी हिंसक वृत्ति की पहचान उनकी एक दूसरी ,अगर अशोक वाजपेयी के शब्द में ही कहें तो, सूझ थी. हिंसा जनतांत्रिक व्यवहार के ली बाधा है.अगर पूँजीवाद की प्रकट-अप्रकट हिंसा को अस्वीकार करना है तो इसके प्रति सजगता आवश्यक है कि यह विरोध स्वयं हिंसक न हो.

अशोक वाजपेयी ने ठीक ही पहचाना था कि असल समस्या कवियों की दुनिया और उनकी निगाह के संकरेपन की है.कस्बाई संवेदना आधुनिकता की मांगों के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती और उसकी चुनौतियों का उत्तर भी देने में असमर्थ रहती है.अशोक वाजपेयी के इन लेखों के लिखे जाने के कोई पैंतालीस साल बाद भी यह बात उतनी ही सच है.गाँव-कस्बे से लेकर माता-पिता के संसार को छोड़ने लेकर एक अपराधबोध महानगर के कवियों में व्यक्त होता रहता है जिसका मतलब यह है कि वे महानगरयीता से संगति बैठाने में असमर्थ रह गए हैं : “हमारा संसार तेजी से अमानवीय बनता जाता संसार है, खासकर महानगरों वाला. लेकिन उसे संबंधहीन या उनकी संभावनाओं से शून्य संसार मान  लेना एक बेहद आसान भोलापन है:यह संसार के अमानवीयकरण के विरुद्ध मानवीय को प्रतिष्ठित करने का जोखम मोल लेना नहीं,बल्कि उसका शिकार हो जाना है.यह सोचकर ही दहशत होती है कि ये कविताएँ अमानवीयकरण के विरुद्ध चीख नहीं, उसका उत्सव मनाती किशोर उत्साह की गीतकल्पी रचनाएँ हैं.”

क्या यह आश्चर्य की बात है कि आज भी हमारे पास नगर-बोध का एक सक्षम कवि नहीं है? ऐसा कवि जिसमें शहरीपन अपने सारे तनावों-खिंचावों,लगावों-दुरावों,सामाजिकता की नई संभावनाओं के साथ व्यक्त हो सके?ऐसा कवि जिसको शहर से सिर्फ शिकायत ही न हो?

अशोक वाजपेयी खुद एक छोटे कस्बानुमा शहर से दिल्ली आकर  स्वेच्छ्या छोटे शहरों की ओर लौट जानेवाले और फिर अपने प्रदेश से दूर देश की राजधानी में बसने का फैसला करने वाले कवि हैं.विदेश सेवा की जगह प्रशासनिक सेवा को चुनने का अर्थ था कस्बों के धूल-धक्कड़ में वापस जाना.फिर भी अगर उनकी साहित्यिक संवेदना का संसार सिकुड़ा नहीं तो इसकी वजह है उनका विश्व-साहित्य की दुनिया से गाढ़ा परिचय.यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है लेकिन सच है कि हिंदी के मार्क्सवादी लेखकों के मुकाबले अशोक वाजपेयी की दृष्टि में,निराला के शब्दों का प्रयोग करें तो,अधिक सार्वदेशिकता या अंतर्राष्ट्रीयता मिलती है.इसकी विशेषता यह भी है कि इस वृहत्तर संसार से वे  पश्चिमी यूरोप या उत्तरी अमरीका के जरिए ही नहीं जुड़े बल्कि पूर्वी यूरोप, अरब संसार और दक्षिणी अमरीका या लैटिन अमरीका के साहित्य के माध्यम से इसके साथ उन्होंने अपना संबंध बनाया.इस वजह से वे बीसवीं सदी की आधुनिकता के दावों,वायदों और विडम्बनाओं को अधिक तीव्रता से समझ पाए. क्या यह भी संयोग है कि उनकी इस काव्य चेतना के केंद्र में पोलैंड के कवि हैं, जिनका उन्होंने अनुवाद भी किया,उसी पोलैंड के,जिसके रचना-संसार में मुक्तिबोध को भी सोवियत दुनिया के रेजिमेंटेशन से मुक्ति के चिह्न मिले थे?

बीसवीं सदी में मुक्ति, स्वतंत्रता और समानता जैसे शब्दों को उनकी पवित्रता से वंचित कर जिस प्रकार रक्ताक्त किया गया, उसने अशोक वाजपेयी को इनके प्रति संदेहशील बना दिया.वे इस प्रकार के किसी भी निर्भ्रान्त वायदे की सख्ती से जाँच करना ज़रूरी समझते हैं क्योंकि उसके पीछे छिपी वर्चस्व की लालसा और दमन के इतिहास से परिचित हैं. एक कारण इसका यह  भी है कि अशोक वाजपेयी ने रचनाकारों या रचना का अधिक विश्वास किया, बनिस्पत सिद्धांतकारों या सिद्धांत के.यह बात कितनी दुर्भाग्यपूर्ण है, इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि भारत के मार्क्सवादी ही नहीं, गैर मार्क्सवादी भी, निर्मल वर्मा जैसे अपवाद को छोड़ दें तो,पास्तरनाक,आख्मातोवा,बावेल,मेंदेलश्ताम,आदि को सुन ही नहीं पाए.

आशोक वाजपेयी की दिमागी बनावट अंतर्राष्ट्रीयतावादी है और उनकी राजनीति समाजवादी झुकाववाली उदारवादी  राजनीति है.उन्हें नेहरू युग का प्रतिनिधि लेखक कहा जा सकता है. बावजूद उनके खुद को लोहिया से अधिक प्रभावित बताने के. नेहरू एक सार्वजनिक व्यक्ति थे लेकिन उन्हें सार्वजनिकता पर बहुत यकीन न था. एकांत से वंचित, और एकाकीपन से बिंधे हुए नेहरू प्रायः अपने मन के भीतर रहते थे. इसका एक कारण था उनके समकालीनों में किसी भी प्रकार की ब्रह्मांडीय नियति के बोध का नितांत अभाव और राष्ट्रवादी सांसारिकता का घिराव जो उनकी परिष्कृत संवेदना को कुंठित करता था. गांधी भारत के लिए  अजनबी बने रहे,अब भी हैं, बावजूद भारत के इस दावे के कि वे उसके सबसे श्रद्धेय हैं. नेहरू भारत लौट कर भी नहीं लौट पाए. नेहरू जिस विश्व-नागरिकता की कल्पना कर रहे थे,उसे समझने वाले मित्र उनके पास न थे. नेहरू का एकाकीपन समय गुजरने के साथ बढ़ता ही गया.नेहरू में भारत नामक राष्ट्र और बाद में राज्य के प्रति ही नहीं, मनुष्य मात्र के प्रति एक गहरी जिम्मेदारी का बोध हमेशा था.जिम्मेदारी का यह बोध उन्हें निरंतर एक सार्वजनिक संवेदना-निर्माण के लिए प्रवृत्त करता रहा  और इसलिए वे लगातार संवादरत दिखलाई पड़ते हैं. लेकिन इस मुखरता के पीछे एक एकांत की आकांक्षा भी है जिसे दुर्भाग्य से कोई समझ न पाया. नेहरू का बार-बार मनुष्येतर प्रकृति की ओर खिंचना यों ही न था.

नेहरू समाजवादी आदर्श से प्रभावित थे लेकिन कम्युनिस्ट-व्यवहार में, राजनीतिक और सामाजिक,दोनों स्तरों पर, उन्हें सरलीकरण मालूम पड़ता था.वे सोवियत संसार में मानव मात्र की अवहेलना से भी परिचित थे. नेहरू आधुनिक थे लेकिन आधुनिकता की परियोजना के दावों को लेकर पर्याप्त संदेह और शंका उनके  मन में थी. उन्होंने एक नए राष्ट्र राज्य की स्थापना में भूमिका निभाई लेकिन राष्ट्र की अवधारणा को लेकर वे बहुत आश्वस्त न थे कि समाज-संगठन या नई सामुदायिकता का यह सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत है .

नेहरू लेनिन और स्टालिन के नए इन्सान के नारे से बहुत प्रभावित नहीं थे और मनुष्य की कमजोरियों के लिए शर्मिंदा भी न थे. वे राज्य सत्ता को अभिभावक और चिकित्सक की भूमिका देने को तैयार न थे. नेहरू के सार्वजनिक व्यक्तित्व और उनके निजीपन में एक प्रकार का द्वंद्व था जिसका समाधान समभव न था.परिष्कृति को एक सामाजिक मूल्य बनाने की उनकी इच्छा भी पूरी न हो सकी और उसे अभिजातवादी कहकर लांछित किया गया.

अशोक वाजपेयी में भी सार्वजनिक और वैयक्तिक के बीच का द्वंद्व दीख पड़ता है. वे इस अंतर्द्वंद्व के महत्व को पहचानते हैं और उसका शमन नहीं करना चाहते.बल्कि, यह सिर्फ उनके ही नहीं दूसरों के संदर्भ में भी कहा जा सकता है कि इस द्वंद्व या तनाव का पूरा शमन उचित भी नहीं है. सामाजिक की अंतिम प्रतिष्ठा श्रेय है भी या नहीं, यह विचारणीय है. बेहतर हो कि व्यक्ति हमेशा प्रभुत्वशील सामाजिकता को चुनौती देने की स्थिति में बना रहे. अशोक वाजपेयी को विश्व-साहित्य,विशेषकर बीसवीं सदी के साहित्य के साक्ष्य से मालूम था कि प्रायः सामाजिकता ने व्यक्ति के अपने प्रामाणिक आत्म के संधान और निर्माण के प्रयास का  दमन ही किया है.

‘कविता और राजनीति’ में मुक्तिबोध की कविताओं के हवाले से वे कहते हैं, “…सामाजिक दृश्य सिर्फ एक पीड़ा-भरा बाह्य नहीं, वैसी ही पीड़ावाला ‘अंतस’ भी है,और इसलिए अत्यंत सामाजिक होते हुए भी अत्यंत निजी है.व्यक्तित्व की अद्वितीयता और सामाजिक चेतना,कविता के निजी मूल्य और राजनीति की सार्वजनिक भाषा, ये द्वैत उनकी कविता में समाप्त हो जाते हैं.” लेकिन युवा अशोक वाजपेयी की इन पंक्तियों में इस द्वैत के समाप्त होने को लेकर जितनी निश्चितता है,क्या प्रौढ़ अशोक वाजपेयी उस पर खुद मुस्करा नहीं उठेंगे? उसकी जगह यह कहना कहीं अधिक मुनासिब है कि व्यक्तित्व की अद्वितीयता और सामाजिकता के बीच हमेशा एक तनाव बना रहता है

मुक्तिबोध अशोक वाजपेयी की साहित्यिक संवेदना के संगठक तत्व हैं. उनके आलोचनात्मक निबंधों के ‘पहले संग्रह ‘फिलहाल’ में मुक्तिबोध की उपस्थित केंद्रीय महत्त्व की है.‘भयानक खबर की कविता’ में वे लिखते हैं,“मुक्तिबोध अपने समय में अपने पूरे दिल और दिमाग के साथ, अपनी पूरी मनुष्यता के साथ रहते हैं.वे अपनी एक ऐसी निजी प्रतीक-व्यवस्था विकसित करते हैं जिसके माध्यम से सार्वजनिक घटनाओं की दुनिया और कवि की निजी दुनिया एक सार्थक और अटूट संयोग में प्रकट हो सके…एक तो वे राजनीतिक दुनिया से अपने लगाव को मानवीय आस्था और अंतर्जगत में उतने ही गहरे लगाव के साथ जोड़ते चलते हैं,और दूसरे, एक सच्चे कवि की तरह वे सरलीकरणों से इनकार करते हैं.वे विचार या अनुभव से आतंकित नहीं होते.”

मुक्तिबोध अशोक वाजपेयी को इसलिए भी प्रभावित करते हैं कि “मनुष्य की उनकी चारित्रिक प्रतिमा संघर्षरत मनुष्य की है और वे एक नई समाज-व्यवस्था की कल्पना करते हैं.मुक्तिबोध निराशा की …दकियानूसी में शामिल नहीं हुए.समकालीन दुःस्वप्न को उन्होंने पूरे साहस के साथ देखा और उसकी भयानकता को न तो कभी कम किया और न ही सरलीकृत.”

परिस्थिति की भयावहता का अहसास स्तंभन और ऐसी निराशा की ओर ले जा सकता है जिससे उबरना मुश्किल है. लेकिन यदि मनुष्य की नियति के बारे में अंदाज हो कि संघर्ष ही उसकी मनुष्यता को परिभाषित करता है तो अकर्मण्यता या निष्क्रियता के गर्त से बचा जा सकता है. मुक्तिबोध के बारे में जो वे लिखते हैं, उससे उनके आदर्श कवि व्यक्तित्व की एक तस्वीर भी उभरती है, “मुक्तिबोध मनुष्य के विरुद्ध हो रहे विराट षड्यंत्र के शिकार के रूप में ही नहीं लिखते, बल्कि वे उस षड्यंत्र में अपनी हिस्सेदारी की भी खोज करते हैं और उसे बेझिझक जाहिर करते हैं….उनकी कविता निरा तटस्थ बखान नहीं, बल्कि निजी प्रामाणिकता और ‘इन्वॉल्वमेंट’ की कविता है. उनकी आवाज़ एक दोस्ताना आवाज़ है और उनके शब्द मित्रता में भीगे और करुणा भरे शब्द हैं. कविता के केंद्र में एक दृढ़ व्यक्तित्व है, लेकिन वह अपने को मानवीय संपर्क से बचाता, अपनी अद्वियीयता और परमता को सुरक्षित करने में आत्मतुष्ट व्यक्तित्व नहीं है.वह एक ऐसा व्यक्तित्व है जो ललककर  उत्साह से दूसरों से तादात्म्य होता है,बल्कि वह अपनी परिभाषा के लिए मनुष्य के नितांत अकेलेपन को नहीं,उसके साहचर्य और बिरादरीपन को आधार बनाता है.संसार में कोई निजी सुलह संभव नहीं है,और अगर हो भी तो मक्तिबोध के अनुसार वह मानवीयतारहित  और मूल्यच्युत होगी..”

मुक्तिबोध के साथ-साथ अज्ञेय का भी ‘फिलहाल’ के लेखों में बार-बार उल्लेख होता है.लेकिन किस तरह? एकाधिक बार वे दोनों की तुलना करते हैं और इस तुलना में उनका अपना पक्ष स्पष्ट है. इसी लेख में वे आगे लिखते हैं, “मक्तिबोध की कविता निर्विकल्प ढंग से विचलित करती है, और उसका केन्द्रीय मूल्य साहस का है. जहाँ अज्ञेय, मसलन, एक पुरानी धारणा को ही भावुक ढंग से पीसते नज़र आते हैं, वहाँ मुक्तिबोध उस धारणा के प्रति पर्ख्र आलोचनात्मक रुख अपनाते है: धारणा है ‘आत्मा’ की और ये हैं प्रासंगिक कवितांश:

अरी ओ आत्मा री,

कन्या भोली क्वाँरी

महाशून्य के साथ भांवरें तेरी रची गईं.

( चक्रांत शिला: अज्ञेय)

 

पर तुम भी खूब हो,

देखो तो-

प्रतिपल तुम्हारा ही नाम जपती हुई

लार टपकाती हुई आत्मा की कुतिया….

राह का हर कोई कुत्ता जिसे छेड़ता है, छेंकता

( एक अरूप शून्य के प्रति; मुक्तिबोध)

अंतर सिर्फ दृष्टियों का नहीं है.अज्ञेय की दृष्टि जाने हुए को एक परिचित बिंब की सहायता से ‘सेलीब्रेट’ भर करती है, जबकि मुक्तिबोध एक परिचित बिंब के सहारे आत्मा की तथाकथित गरिमा को ध्वस्त कर उसके बारे में कुछ विचलित करने वाला (ख्याल) जाहिर करते हैं.”

अज्ञेय की परवर्ती काव्यभाषा में शिथिलता, तनावहीनता और शालीनता और उनकी कविताओं की उत्सवधर्मिता को लेकर अशोक वाजपेयी की उसने शिकायत है.यह नहीं कि वे अज्ञेय की क्षमता को स्वीकार नहीं करते. वे उन्हें अकेलेपन के वैभव का कवि कहते हैं लेकिन यह महसूस करते हैं कि उनमें अन्य के बोध का अभाव है. मुक्तिबोध और अज्ञेय की काव्यभाषा में भी उन्हें तुलनात्मक रूप से मुक्तिबोध अधिक आकर्षित करते हैं.परवर्ती अज्ञेय उन्हें समृद्ध,उदार और लचीला नहीं,अपनी गरिमा पर मुग्ध व्यक्तित्व लगता है जो अपने आत्मदान का उत्सव मनाता है.

युवा अशोक वाजपेयी की साहित्यिक संवेदना के केंद्र में मुक्तिबोध के होने की बात, हो सकता है, आज के प्रौढ़ अशोक वाजपेयी को भी आश्चर्यजनक लगे. ‘फिलहाल’की भूमिका में वे भीड़ से आतंकित युवा कवियों के समक्ष मुक्तिबोध का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. मुक्तिबोध की कविताओं में उन्हें समय के जटिल सचाई के तीखे अहसास के साथ समाज की सक्रिय अवधारणा मिलती है: “समाज में कारगर शक्तियों के उलझाव टकराव और तनाव को उनकी कविता बिना किसी सरलीकरण के सीधे और तीव्र ढंग से पहचानती है.मुक्तिबोध के काव्य-संसार में समकालीन मनुष्य का सारा भय और संदेह मौजूद है,लेकिन भीड़ें नहीं, समाज और उसमें विविध शक्तियों का स्पष्ट बखान और कई बार तो विश्लेषण तक है. यह….निजता और सामाजिकता के द्वैत को अप्रासंगिक कर देती है और आधुनिक मनुष्य के निजी संसार और उसकी सामाजिक जड़ों की हमारी पहचान और असमझ को गहरा और सार्थक करती है….मुक्तिबोध के यहाँ इसलिए व्यक्ति का संघर्ष किसी सरलीकरण या सामान्यीकरण से नहीं, बल्कि ठोस सामाजिक और आतंरिक शक्तियों से है.”

युवा लेखन में साहस और उग्रता की पड़ताल करते हुए वे लेखक के मानवीय साक्षात्कार के प्रयत्न का मानवीय और कलात्मक चरम बिंदु मुक्तिबोध में पाते हैं, “प्रगतिवाद की निर्वैयक्तिक सार्वजनिकता से अलग हटकर उन्होंने व्यक्ति के गहन अंतर्जगत और बाहर की दुनिया और मानव नियति को एक प्रखर और विचलित करने वाले संतुलन में देखा.हमारे समाज में मानवीय अन्तःकरण की मृत्यु और संभावना का, उनका कृतित्व, एक मार्मिक दस्तावेज है. उनकी रचनाओं में भी एक भयावह उग्रता है, पर वह साक्षात्कार और व्यापक दृष्टि की उग्रता है: सच्ची,बेलौस, प्रसंगानुकूल और मानवीय रूप से अत्यंत समृद्ध.”

अशोक वाजपेयी के लिए, “ मनुष्य की संपूर्ण हालत के कवि हैं. उन्होंने मानवीय अन्तःकरण को पक्षाघात देखा, पर यह नहीं माना कि वह मर चुका है….जहाँ मुक्तिबोध की कविता में घोर भय और हिंसा है, वहाँ साथ-ही-साथ उसमें उम्मीद, सहानुभूति  और करुणा भी मानवीय बिरादरीपन के दृढ़ कथन के साथ व्याप्त है.” इनके बीच के तनाव को किसी अनुष्ठान के जरिए नहीं शमित किया जाता. इसके उलट अज्ञेय में वे अकलेपन का वैभव देखने के साथ इस बात से निराश होते हैं कि किसी ठोस मानवीय उपस्थिति को उन्होंने दरकिनार कर दिया है और उनकी कविता की मुद्रा आनुष्ठानिकता की हो गई है.अज्ञेय की कविता की गरिमा इसीलिए युवा अशोक को सारहीन लगती है.

अज्ञेय और मुक्तिबोध का तुलनात्मक उल्लेख पूरी किताब में व्याप्त है. ‘कविता और राजनीति’ शीर्षक निबंध में  की गई तुलना का आधार या कारण दिलचस्प है, “मुक्तिबोध की दुनिया सीधे-सीधे समकालीन है. उसमें अज्ञेय जैसा क्लासिकी ठंडापन नहीं,उद्वेग है. मुक्तिबोध की दुनिया आदमियों की दुनिया है …जबकि अज्ञेय  की संस्कारी दुनिया में आदमी नहीं है,सामान्यीकरण और अमूर्तन है.”

एक के साथ हमेशा या प्रायः दूसरे की याद आने का अर्थ यही है कि अशोक श्रेष्ठ कविता का सिद्धांत तलाश कर रहे हैं. उनका यह प्रश्न अभी भी उतना ही सार्थक है जितना पचास साल पहले था, “क्या मनुष्य से सरोकार और सार्थकता और स्वायत्ता की खोज कई बार इतनी अलग हो सकती है कि कलात्मक परिपक्वता और मानवीय समृद्धि में (अ)सामंजस्य और अलगाव पैदा हो जाए?”

क्या इसका कारण यह है कि कविता का एक उद्देश्य उदात्त की खोज या उसका सृजन माना जाता है?और साधारणता से उसका मेल नहीं?साधारण जीवन में उसका दुर्लभ होना क्या मानवीय स्थिति के कारण है या दृष्टि की सीमा है?जीवन में उदात्त अनुभव की खोज कई बार मनुष्य से असम्पृक्ति या विराग की अवस्था उत्पन्न करती है.यह दोनों तरह से तरह से होता है:क्रांतिकारी को भी रोजमर्रापन से उलझन होती है और संन्यासी को भी. मानवता से दोनों ही अधीर हो उठते हैं.यह अधैर्य ही हिंसा को जन्म देता है,तानाशाही की ओर ले जाता है या ऐसे संगठनों के लिए प्रेरणा बनता है जो मनुष्यों को खुद में समाहित करके एक विराट अनुभव का आश्वासन देते हैं.

मुक्तिबोध में भी क्रांति की आकांक्षा है जो पूरी नहीं होती और इसे गनीमत माना जा सकता है. बार-बार स्वप्न भंग के कारण वे उसी खिंचाव-तनाव और संघर्ष की दुनिया में लौट आते हैं जो साधारण रूप से मानवीय है.

तत्कालीन युवा कवियों में जनता को भीड़ मानने के कारण  उससे घृणा की अभिव्यक्ति भी देखी जाती थी. क्या यह संभवतः इस कारण है कि इस ‘भीड़’ में इन कवियों को उदात्त के  अनुभव की संभावना नहीं दीखती थी? इस प्रसंग में भी अशोक वाजपेयी इन कवियों को मुक्तिबोध की याद दिलाते हैं जिनके लिए जनता ठोस मानवीय उपस्थिति है.जनता और राष्ट्र या देश उनके लिए कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है. जनता रोज़मर्रा के छोटे-छोटे प्रसंगों में ज़िंदगी जीने को जूझती और फिर भी मानवीय मुक्ति जैसे एक बड़े उपक्रम में संलग्न एक सत्ता है.

‘विचारों से विदाई’ एक और महत्पूर्ण निबंध है जिसमें अशोक युवा काव्यों और अकवियों की भर्त्सना इसलिए करते हैं कि वे बौद्धिक काहिली के शिकार हैं और वैचारिक रूप से दरिद्र और अकर्मण्य हैं.मुक्तिबोध जनतांत्रिक रवैय्ये के लिए सोचने की आदत डालना बहुत ज़रूरी मानते हैं. उनकी समझ है कि ‘स्थापित व्यवस्था के प्रायः सभी पक्षों में सोचने का फिजूलपन एक तरह से मूल प्रतिज्ञा है. जातिप्रथा, नौकरशाही, गोहत्या-विरोध, साम्प्रदायिक दंगे—इन सबकी पकड़ हिन्दुस्तानी नागरिक पर इसलिए है कि उसने फिजूल मान लिया है.” सोचने के अभ्यास पर यह बल बिना कहे मुक्तिबोध और दूसरे ढंग से अज्ञेय अपने लेखन में देते हुए देखे जा सकते हैं. सोचने का अर्थ बुद्धिवाद की शरण में जाना  नहीं है क्योंकि बीसवीं सदी में ही उसकी सीमाएं जाहिर हो गई हैं. लेकिन बुद्धिवाद की अपर्याप्तता का अर्थ सरल अबुद्धिवाद के इत्मीनान में पलायन नहीं है. बुद्धि से अबुद्धि की ओर जाना कोई नई बात नहीं. कला के मामले में कई बार अबुद्धि उर्वर भूमि हो सकती है. इस प्रसंग में भी वे मुक्तिबोध का हवाला देते हैं, “मुक्तिबोध के काव्य-संसार में बौद्धिकता के साथ-साथ अबुद्धि, अर्थात बुद्धि से परे का, दबाव बहुत गहरा है. मुक्तिबोध का चारित्रिक फॉर्म फैंटेसी बुद्धि से अबुद्धि की ओर जाने का,दोनों के बीच की अंतःक्रिया का ही माध्यम है.लेकिन इस अत्यंत समृद्ध मानवीय कविता में कहीं भी बुद्धि से अपसरण या बुद्धि-विरोध नहीं है.”

बुद्धिविरोध और सरलदिमागीपन में एक रिश्ता है.यह उस लेखन में भी पाया जा सकता है जो ऊपर से बुद्धि-आधारित लगता है.अशोक वाजपेयी के लिए सोचने को फिजूल मानने का अर्थ है उस अमानवीयता का समर्थन करना जो समाज के बहुलांश को ‘मनुष्य से एक दर्जा नीचे’ रहने को बाध्य करती है और इस तरह स्थापित व्यवस्था को मुंहमांगा सहयोग देना.मनुष्यता की संभावनाओं का उद्घाटन,उसकी सीमाओं की सारी समझ के साथ लेखक का कर्तव्य है.इसके लिए यथार्थ को उसकी जटिलता में और अपने फौरी अनुभव की सीमा से परे जा कर देखना और समझना आवश्यक है.

समाज और राजनीति अशोक वाजपेयी की एक ऐसी मुश्किल है जिसका कोई आसान हल वे नहीं देना चाहते. ‘फिलहाल’ के लेखों में समाज और राजनीति को लेकर उनमें खासा उत्साह नजर आता है. बाद में वे समाज और राजनीति के प्रति शंकालु दिखलाई पड़ते हैं क्योंकि उन्हें यह भय बना रहता है कि व्यक्ति को इन्हीं दोनों पदों में परिभाषित कर दिया जाएगा जबकि मानवीय सचाई कहीं बड़ी है. उसी तरह ‘फिलहाल’ में विचार शून्यता या विचार-शिथिलता को वे बर्दाश्त करने को तैयार नहीं जबकि बाद में उन्हें इस बात पर बल देना पड़ता है कविता या साहित्य को विचार में घटाकर उसकी व्याख्या या मूल्यांकन उसका अवमूल्यन है. रचना की प्रधानता जो प्रत्येक निश्चित और बने बनाए को चुनौती देती हुई कुछ अप्रत्याशित का प्रस्ताव कर सकती है, अशोक वाजपेयी की आलोचना के केंद्र में है. एक तरह से  गेटे के उस सुख्यात कथन को दुहराते से जान पड़ते हैं कि विचार की झाड़ी मुरझा जाती है जबकि जीवन का वृक्ष हरा रहता है. इस जीवन में सब कुछ जाना पहचाना नहीं है, आश्चर्य के अवसर अधिक हैं लेकिन विचाराक्रांत या विचार्मोह में पड़कर होकर हम आश्चर्य की क्षमता गँवा बैठते हैं. हम उस यथार्थ को  देखने से भी इनकार करने लगते हैं जो हमारे विचार का अनुमोदन नहीं कर रहा हो. इस तरह कुदरत या ज़िंदगी की हम अवमानना करते हैं जिसमें निरंतर नया गढ़ने की अपार क्षमता है.

साहित्य में अशोक वाजपेयी की खोज कुल मिलाकर एक विश्वसनीय,प्रामाणिक और दृढ़ शब्द की है. आप इसे पहचान पाएँ, इसका सबसे कारगर तरीका है शब्दों के संसार में अधिक से अधिक रहना और उस अनुभव को समृद्ध करते जाना. फिर शब्द और शब्द के बीच विवेक करने का अभ्यास भी होता जाता है.नई रचनाशीलता के प्रति उनमें स्वाभाविक स्वागतभाव है और सदाशयता भी लेकिन उससे सख्ती की माँग वे लगातार करते रहते हैं.

आधी सदी से कुछ पहले ‘फिलहाल’ के लेख लिखे गए थे. ये उस तरुण दृष्टि के प्रमाण हैं जिनसे अशोक वाजपेयी ने तब अपनी दुनिया और साहित्य के संसार को देखा था. साहित्य के प्रति जो नज़रिया आशोक वाजपेयी ने उस समय प्रस्तावित किया,वह प्रायः अभी भी प्रासंगिक है. क्यों? इसका उत्तर उस पद्धति में है जो अशोक वाजपेयी ने इन लेखों में समान रूप से अपनाई है: रचना या रचनाकार को ही प्रमाण मानना और सृजन को सर्वोपरि मानना. कोई भी विचार, जो किसी काल खंड में कितना ही अपराजेय क्यों न माना जाता हो, इससे ऊपर नहीं हो सकता. दूसरे,किसी सावधानी या होशियारी या रणनीति से परहेज. विचार निष्कवच होकर किया जाना चाहिए,खुद को खुला छोड़ते और असुरक्षित करते हुए.तीसरे,रचना का तमाशा किनारे खड़े होकर देखने की जगह धार के बीच धँस कर उसके खिलाफ तैरने का जोखिम उठाना.

नई सृजनात्मकता की पहचान और इसका विवेक कि कहाँ वह एक रूढ़ि का निर्वाह मात्र है या स्वयं एक रूढ़ि का निर्माण, आलोचना की कसौटी है. मसलन, धूमिल के बारे में यह कहने के बाद कि “धूमिल में भाषा की अपर्याप्तता की पहचान भाषा का अत्यंत सघन और नाटकीय उपयोग करने के बाद उभरती है और वास्तविक जान पड़ती है .” वे आगे उनकी कविता ‘पटकथा’ को ‘एक दिलचस्प असफलता’ कहते हैं. इस असफलता का कारण उनके सामने साफ है, “उसकी थीम व्यापक है और यह कहना भी शायद काफी न हो कि वह देश के समकालीन बिखराव और प्रजातंत्रकी सचाइयों का जायजा लेने की कोशिश करती है.जनता,संसद, संविधान और प्रजातंत्र जैसे शब्द और धारणाएँ इधर की कविता में चालू मुहावरा बन गई हैं और ‘पटकथा’ भी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है.यह ज़रूरी नहीं कि  जो दूसरों में चालू मुहावरा हो वह किसी समर्थ कवि में विशिष्ट और ठोस अभिव्यक्ति न हो सके. खेद है कि चालू मुहावरों को मात्र मुद्राओं के स्तर से ‘पटकथा’ में धूमिल ऊपर उठाकर किसी सार्थक और विशिष्ट वक्तव्य में नहीं  बदल पाते.” वे अफसोस करते हैं कि धूमिल की काव्यात्मक समझ यहाँ चूक गई  है और इस कारण वे इन प्रचलित मुहावरों के प्रति व्यंग्यात्मक दृष्टि न रखकर खुद इसके शिकार हो गए हैं. अतिव्याप्ति,चुस्त फिकरेबाजी, बडबोलापन, रेटोरिक,आत्मतुष्टि,पैगम्बराना अंदाज और कलात्मक संगति के लिए आवश्यक केंद्रीय संगठक तत्व का अभाव धूमिल की ‘पटकथा’ को ही नहीं अन्य कविताओं को  भी कमजोर बनाता है.

समकालीन लेकिन अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों के प्रति आलोचनात्मक रूप से सजग भाषा उपलब्ध करना किसी भी कवि का कर्तव्य है : “..विचारों और अपने मातृलोक से कटी भाषा में जानबूझकर या किसी ट्रैजिक विडम्बना के स्तर पर नहीं, अपनी असमर्थताओं के कारण सपाटता और सतहीपन है.यही नहीं कि वह एक विपन्न भाषा है, वह एक चरम अर्थ में अनुत्तरदायी भी है.”

भाषा और शिल्प का अर्जन इस प्रकार रचनात्मक उत्तरदायित्व से जुड़ा मसला है. अगर कोई रचनाकार नया शिल्प या नई भाषा या अपना शिल्प और भाषा नहीं गढ़ता तो वह बौद्धिक आलस्य का शिकार है.परिचित, स्वीकृत भाषा अपना लेना और भाषा से विद्रोह के नाम पर इस जिम्मेदारी से छुट्टी पा लेना एक ही बात है. आलोचक की पहचान भी इसी में है कि वह शिल्प रचने के प्रयास को नोट कर पाता है या नहीं और क्या वह विद्रोह के पीछे छिपे खोखलेपन को पकड़ लेता है या नहीं.

सुगठन और ऊबड़खाबड़न को एक-दूसरे का विरोधी मानकर यह भी किया जाता है कि विचार के स्तर पर तो किसी कवि को स्वीकार कर लिया जाए लेकिन उसके शिल्प से उलझन बनी रहे. मुक्तिबोध के शिल्प से सिर्फ अज्ञेय को दिक्कत न थी,आरंभिक दौर में नामवर सिंह ने भी मुक्तिबोध को इस संबंध में सावधानी की सलाह दी थी. मुक्तिबोध के परम मित्र,उनके वैचारिक गुरु और उनके संपादक नेमिचंद्र जैन भी गद्यात्मकता और अन्य न्यूनताएं उनकी कविता में पाते थे. अशोक वाजपेयी  ने ‘भयानक खबर की कविता’ नामक अपने निबंध में सिका प्रत्याख्यान इस प्रकार किया, “मुक्तिबोध का मुहावरा ज़्यादातर ऊबड़खाबड़ लगता है, और इसीली यह नतीजा निकालना कइयों के लिए बड़ा आसान हुआ है कि उनमें कलात्मक सौष्ठव की कमी है और उनका शिल्प सशक्त नहीं है. यह सारी धारणा नई कविता के दौरान लिखी गई ज़्यादातर छोटी कविताओं से उपलब्ध परिपाटी का नतीजा है.नई कविता अंततः छोटी जटिल रचना की कविता ही रही है, लेकिन मुक्तिबोध लंबी कविता के कवि हैं—वे एक ऐसे कवि भी हैं जिन्होने हमारे असमय को उसकी भयावह व्यापकता और गहराई में परिभाषित करने की कोशिश की है. उनके मुहावरे में बिम्ब्धार्मिता, सपाटबयानी, उत्सवधर्मिता, विश्लेषण, बातचीत, रिटौरिक, विनोदप्रियता आदि अनेक तत्वों का एक अद्भुत और जटिल संयोजन संभव हुआ है. …वह ऊपर से ऊबड़-खाबड़ लगता है तो इसीलिए कि वह किसी स्वायत्त संसार को नहीं, एक-दूसरे से टकराते,उलझते-लिपटते समकालीन मनुष्य के कई संसारों को चरितार्थ करने में संलग्न मुहावरा है.”

मुक्तिबोध को वे बाद की युवा कविता का स्रोत कवि मानते हैं. उनका सबसे बड़ा गुण साहस. मुक्तिबोध जैसा मैंने कहा,मुझे अशोक वाजपेयी की साहित्यिक संवेदना के केंद्रीय बिंदु मालूम पड़ते है. इसका कारण उनकी मार्क्सवादी चे राजनीति नहीं, उनका मनुष्य से सच्चा लगाव और मुहब्बत है जो उनकी तरह किसी और में उस शिद्दत से दिखाई नहीं पड़ती और वह साहस है जो उन्हें कविता के अनजान और रहस्यपूर्ण सफ़र पर ले चलता है इस अहसास के साथ कि इस यात्रा का अंत शायद उनके जीवनकाल में नहीं है. आज अगर युवा अशोक पचहत्तर छु  रहे अशोक वाजपेयी को देखे तो यह संतोष उसे अवश्य होगा कि वह तरुण साहस उसमें बना हुआ है. गलत वह हो सकता है पर कायर वह नहीं हुआ.

  • समास/नटरंग, अगस्त, 2014
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