अंतिम युवा : भगत सिंह

कभी कभी हर समाज में ऐसे क्षण आते हैं जब उसे अपने अस्तित्व के तर्क की पड़ताल करनी पड़ती है. उस समय वह अपने किन बौद्धिक संसाधनों का प्रयोग करता है और किन स्रोतों से तर्क की सामग्री जुटाता है, यह  काफी महत्वपूर्ण है.क्या एक समाज के रूप में भारत के लिए अभी ऐसा ही कोई क्षण उपस्थित हो गया है? एक ऐसा तबका है जो भारत नामक किसी एक सामाजिक इकाई के बौद्धिक औचित्य को ही नहीं मानता. उसकी बात जाने दें.भारत अभी भी अनेकानेक लोगों के लिए एक यथार्थ है जिसकी अपनी भावनात्मक और बौद्धिक वैधता है.वे उसे बार-बार समझने और अपने लिए आयत्त करने की कोशिश करते हैं.इस क्रम में वे किनकी ओर  देखते हैं?

भारत अभी उम्र के लिहाज से नौजवान है. नौजवानों की आबादी का प्रतिशत किसी भी दूसरे आयु-वर्ग की तुलना में काफी अधिक है.युवावस्था की अपनी एक स्वायत्तता है. उसके इस स्वायत्त विचार या मनोलोक को हम कैसे  समझें? अभी कुछ समय पहले उसने दिल्ली की सड़कों पर अपने आप को अभिव्यक्त किया.वह युवा क्षोभ की सुन्दर अभिव्यक्ति थी. उसके पहले कुछ महीनों तक भष्टाचार के विरोध में संगठित एक आन्दोलन के केंद्र में भी युवा ही था.

अपने समाज के संचालन और उसकी दिशा तय करने के लिए इसके पहले दो और बड़े अवसर दीखते हैं जब युवा वर्ग ने निर्णयकारी हस्तक्षेप किया, परिणाम भले ही उसके जो हुए हों.एक था उन्नीस सौ चौहत्तर का छात्र-युवा आन्दोलन और दूसरा उन्नीस सौ सडसठ से शुरू हुआ नक्सल-विद्रोह. दुर्भाग्य से इन सभी युवा-क्षणों को अपनी स्वायत्त बौद्धिक अभिव्यक्ति देने वाला कोई स्वर सामने नहीं आया.नक्सल-विद्रोह का बौद्धिक तर्क मार्क्सवाद-लेनिनवाद  और उससे भी अधिक चैयरमैन माओ से ग्रहण  किया गया.उन्नीस सौ चौहत्तर के बौद्धिक प्रवक्ता गतयुवा जय प्रकाश नारायण थे. हाल में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने तो एक  अबौद्धिक वृद्ध को ही अपना नेता चुन लिया जबकि वह गढ़ा गया एक युवा के द्वारा था.उसने तात्कालिकता को ही अपना आधार बनाया.यह अवसर था कि वह उसका अतिक्रमण कर देश और समाज के सम्मुख एक युवा भारत का स्वप्न प्रस्तुत करे. उसकी जगह उसमें रणनीतिक कौशल  अधिक दिखाई पड़ा जिसने सबको चमत्कृत और प्रभावित तो किया लेकिन वह किसी दीर्घस्थायी विचार का सृजन नहीं कर पाया.उसने जिन प्रतीकों का इस्तेमाल किया, वे भी थके हुए और नई ऊर्जा दे पाने में असमर्थ थे.यह ज़रूर कहा जाना चाहिए कि उस आन्दोलन ने एक चतुर युवता से हमारा सामना कराया.

अगर हम इस पर सोचें कि वे आखिर कौन से विचार हैं जो आज  युवा वर्ग को उसके रोज़मर्रापन और उपयोगितावादी दायरे से बाहर खींच लाने में कामयाब हैं तो एक बड़ा प्रभावी विचार अभी भी धर्म दिखाई पड़ता है.धर्म-रक्षा अभी भी एक ऐसा मकसद है जिसके लिए नौजवान शहीद होने को तैयार हैं.भारत में पिछले समय की सबसे बड़ी जन-गोलबंदी रामजन्म भूमि आन्दोलन के रूप में दिखाई पड़ी जिसने युवा-ऊर्जा का इस्तेमाल किया. कश्मीर में अभी सेना और पुलिस पर जिन्होंने घातक हमला किया वे बीस साल से भी कम उम्र के थे. यह कहने का पर्याप्त आधार है कि मुज्ज़फरनगर में हुए साम्प्रदायिक हमलों में नौजवानों ने बढ़कर हिस्सा लिया और अब वे क़ानून से बचने के लिए अपने समुदायों के बुजुर्गों की शरण में जाने को मजबूर हैं.युवता का यह नैतिक क्षरण दयनीय और त्रासद है .इस पर किसी ने ठीक से विचार नहीं किया कि सामूहिक हिंसा को जायज रास्ता मान कर जब युवा समुदाय उसे ही एकमात्र प्रेरक शक्ति समझ बैठता है जो उसे सक्रिय कर सकती है तो उसका प्रभाव  उसके जीवन पर क्या पड़ता है.गुजरात के जनसंहार में हिस्सा लेने के आरोप में सालों से जेल में बंद युवाओं से किसी मनोवैज्ञानिक ने बात कर उनकी मानसिकता समझने का प्रयास किया हो, इसका प्रमाण नहीं. उसी तरह इस्लामी निजाम की स्थापना लेकर अनजान लोगों के क़त्ल को फर्ज मानने वाले नौजवानों का आगे क्या होता है इसका अध्ययन ठीक तरीके से नहीं किया गया है.

मुक्ति और स्वतंत्रता का विचार भी युवा-समुदाय को आंदोलित करता है लेकिन वह अस्पष्ट सा है और उसे ठोस रूप देने के लिए कोई  बड़ा प्रयास नहीं दिखाई देता है.कुछ उम्मीद अरब-वसंत के  आस-पास ही इस्राईल में फूटे युवा आन्दोलन के नेतृत्व के वक्तव्यों से बंधी थी पर वह  आवाज बहुत जल्दी गुम हो गई. फिर क्या हिंसा का विचार ही क्या युवता का पर्याय है?

28 सितंबर इसका एक मौक़ा है कि हम आज की युवावस्था के लिए बौद्धिक स्रोतों की तलाश करें.इसलिए कि यह  भगत सिंह का जन्मदिन है और हम सबके लिए अगर कोई अंतिम युवा है तो वह भगत सिंह ही हैं. राजकीय युवा- दिवस विवेकानंद के जन्मदिन पर मनाया जाता है. यह दिलचस्प है कि भारतीय राज्य ने आधिकारिक युवता के विचारक के रूप में विवेकानंद को चुना जबकि उसके सामने भगत सिंह भी थे. एक लिहाज से यह ठीक भी हुआ क्योंकि भगत सिंह को राजकीय प्रतीक के रूप में शेष करके शायद उनकी  क्रांतिकारी संभावना की भी ह्त्या कर दी जाती. विवेकानंद पर विचार का यह समय नहीं है लेकिन प्रामाणिक युवा भगत  सिंह ही हो सकते हैं, ऐसा मानने का आधार है. विवेकानंद की आयु उनकी चुनी हुई नहीं थी.लेकिन भगत सिंह ने युवता से आगे जाना मंजूर नहीं किया.मानने का पूरा कारण है कि वे फांसी से बच सकते थे लेकिन दृढतापूर्वक उन्होंने वह दरवाजा बंद कर दिया.यह बात उनके दिमाग में उस वक्त थी या नहीं , मालूम नहीं लेकिन क्या वे वार्धक्य की संभावना को ही नकार रहे थे?क्या वे शहीद के रूपमें ज़िंदा रहना चाहते थे?इस पर विस्तार से विचार किया जा सकता है लेकिन शहादत  अपने आप में भगत सिंह जैसे व्यक्ति के लिए  कोई  मूल्य नहीं हो सकती थी, यह मानने का पर्याप्त आधार है.

भारत के युवा वर्ग का आदर्श आज कौन हो सकता है? ऐसा कोई  प्रस्ताव यहाँ नहीं दिया जाना है कि दो प्रतियोगी युवताओं में, जिनका प्रतिनिधित्व विवेकानंद और भगत सिंह करते हैं,किसी एक को ही चुना जाय.आखिर युवा ह्रदय सम्राट अपने समय में जवाहरलाल नेहरू भी कहे जाते थे और जयप्रकाश के नाम पर भी नौजवान पागल थे.लेकिन ये  युवा  छवियों के रूप में स्थायी नहीं रहे.स्थायी सिर्फ दो व्यक्तित्व ही दीखते हैं और वे विवेकानंद और भगत सिंह के हैं. दोनों ही जीवन इसलिए दिलचस्प हैं कि वे युवावस्था के  पर्याय , अर्थात उन्मुक्त मन की व्याकुलता के कारण उद्विग्न यात्रियों की तरह दीख पड़ते हैं जो अपनी राह खोज रहे हैं .एक और कारण से वे महत्वपूर्ण हैं:दोनों ने ही स्वयं को विचारकर्ता के रूप में देखा. विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस को गुरु माना लेकिन खुद को उनके दर्शन के प्रचारक मात्र के रूप में नहीं देखा.उनकी खोज नितांत उनकी अपनी थी, यह उनेक लिखे से पता चलता है. उसी तरह भगत सिंह ने भी खुद को किसी पूर्व-प्रमाणित विचार को लागू करने वाले  कार्यकर्ता की तरह नहीं देखा. इस कारण दोनों की युवता को कर्तृत्वमान या कर्तागुण युक्त युवता कहा जा सकता है. दूसरे शब्दों में ये ऐसी युवताएं हैं जो अपने आप को खुद रच रही हैं, किसी और की शक्ल में खुद को नहीं गढ़ रहीं.

विवाद का ख़तरा उठा कर कहा जा सकता है कि  विवेकानंद को आधिकारिक युवा के रूप में चुन कर भारतीय  राज्य ने अपने एक ख़ास रुझान का संकेत दिया. इसके बारे में नेहरू ने ही कहा था कि  भारत की ‘डिफौल्ट सेटिंग’  हिन्दू है और इसे  धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए सचेत प्रयास की आवश्यकता होगी. वह एक निरंतर शिक्षा और परिष्कार का कार्य होगा. विवेकानंद के प्रति झुकाव इस ‘डिफौल्ट सेटिंग’ के कारण सहज और स्वाभाविक  है जबकि भगत सिंह को उनकी शहादत से अलग करके विचार के रूप में ग्रहण करना श्रमसाध्य है.विवेकानंद को एक आधुनिक हिंदू धर्म के पुरस्कर्ता के रूप में देखा जा सकता है लेकिन वे इसी कारण अन्य मतावलंबियों के लिए बहुत दिलचस्पी के नहीं रह जाते.भगत सिंह ने अपनी एक नई पहचान गढ़ने का निर्णय लिया. इसके लिए अपनी अत्यंत अल्प जीवनावधि में तमाम क्रांतिकारी सक्रियताओं के बावजूद उन्होंने जो भीषण बौद्धिक श्रम किया, उसके अर्थ पर हमने  पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है. वे सहज ही सिख क्रांतिकारी हो सकते थे,उग्र हिंदू क्रांतिकारी होने के लिए भी सारी स्थितियां मौजूद थीं.पर ऐसा उन्होंने किया नहीं. वे एक राष्ट्रवादी हो सकते थे पर  इससे भी उन्होंने इनकार किया. हथियार और हिंसा पर टिका क्रान्ति का विचार उन्हें स्थायी महत्त्व का नहीं मालूम पड़ता था. वे भारत को नया बनाने के विचार में विश्वास रखते थे और इसके लिए सही रास्ते की तलाश उन्हें थी.

भगत सिंह के विचार करने के तरीके और उनके रास्ते का अंदाज उनके एक अल्प-चर्चित निबंध से लगता है जो जुलाई,1928 के ‘किरती’ में प्रकाशित हुआ.’नए नेताओं के अलग-अलग विचार’ शीर्षक इस निबंध में वे असहयोग की असफलता के बाद की पस्ती को पीछे छोड़ भारतीय जनता में आ रहे नए जोश के लिए सही वैचारिक भूमि की खोज करते हैं. मुख्यतया वे जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस के विचारों की तुलना करते हैं , हालांकि वे नौजवानों के बीच तब लोकप्रिय साधू वासवानी के विचारों की भी पड़ताल करते हैं और इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि “पुरातन सभ्यता के शोर के अलावा उनके पास कोई  कार्यक्रम नहीं.युवाओं के दिमागों को वे कुछ नया नहीं देते.केवल दिल को भावुकता से भरना चाहते हैं.”

भगत सिंह सुभाष और नेहरू की तुलना करते हुए लिखते हैं कि एक को भारत की प्राचीन संस्कृति का उपासक कहा जाता है तो दूसरे को पक्का  पश्चिम का  शिष्य.एक को कोमल ह्रदयवाला भावुक कहा जाता है तो दूसरे को पक्का  युगांतरकारी.” दोनों को समझदार और सच्चा देशभक्त मानते हुए भी भगत  सिंह उनमें अंतर करना ज़रूरी समझते हैं.सुभाष के विषय में लिखते हैं,” वह प्रत्येक बात में अपने पुराने युग की महानता देखते हैं. पंचायती राज का ढंग भी उनके विचार में कोई नया नहीं…वे तो यहाँ तक कहते हैं कि साम्यवाद भी हिन्दुस्तान के लिए नई चीज़ नहीं.” वे सुभाष के इस विचार से सहमत नहीं कि  हिन्दुस्तान का दुनिया के लिए एक विशेष सन्देश है.उनकी जगह वे नेहरू का समर्थन करते हैं जो भारत को दुनिया के किसी भी दूसरे देश से श्रेष्ठ नहीं मानते. नेहरू को वे युगांतरकारी कहते हैं और सुभाष को राज-परिवर्तनकारी. सुभाष पश्चिम और पूर्व में जो आत्यंतिक अंतर करते हैं , भगत सिंह उसके हामी नहीं. आगे वे लिखते हैं,“सुभाष बाबू राष्ट्रीय(!) राजनीति की ओर उतने समय तक ही ध्यान देना आवश्यक समझते हैं जितने समय तक दुनिया की राजनीति में हिन्दुस्तान की रक्षा और विकास का सवाल है. परन्तु पण्डित जी राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरों से निकल कर खुले मैदान में आ गए हैं.”

सुभाष और नेहरू के विचारों को सामने रखने के बाद वे पंजाब के नौजवानों को  दोनों में एक को चुनने की दावत देते हैं, “सुभाष आज शायद दिल को कुछ भोजन देने के अलावा कोई  दूसरी मानसिक खुराक नहीं दे रहे हैं. …इस  समय पंजाब के नौजवानों को मानसिक भोजन की सख्त ज़रूरत है और यह पण्डित जवाहरलाल नेहरू से ही मिल सकता है. इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अंधे पैरोकार बन जाना चाहिए. लेकिन जहां तक विचारों का सम्बन्ध है ,…इस समय पंजाबी नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए…”

भावुक राष्ट्रवाद और पीछेदेखू परम्परावाद की जगह अंतरराष्ट्रीयतावाद और तार्किक नयेपन की तलाश से भगत सिंह की युवा मानसिकता संघटित होती है.आज की बेचैनी में फिर हमें भावुकता की जगह मानसिक भोजन की सख्त आवश्यकता है.उसका एक स्रोत भगत सिंह निश्चय ही हैं.

 

– अप्रासंगिक, जनसत्ता, सितंबर, 2013

 

 

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