प्रामाणिक संबंध कायम करने में अक्षमता की वेदना : रोहित का पत्र – we are cut off from nature and from ourselves too

“मैं विज्ञान,सितारों और प्रकृति से प्रेम करता था लेकिन तब मैं लोगों से प्यार करता था बिना जाने कि इंसान बहुत पहले ही प्रकृति से कट चुका है.हमारी भावनाएँ मौलिक नहीं.हमारा प्रेम गढ़ा हुआ है.हमारे विश्वासों पर रंग चढ़े हुए है.हमारी मौलिकता कृत्रिम कला के जरिए ही जायज ठहराई जाती है.बिना चोट खाए प्रेम करना असंभव है.”

यह रोहित वेमुला के उस पत्र का एक अंश है जो उन्होंने आत्म हत्या के ठीक पहले लिखा.इसके तुरत बाद रोहित ने इस पर अफ़सोस जाहिर किया कि इंसान की कीमत उसकी फौरी पहचान में शेष कर दी गई है और उसे एक मन के तौर पर समझने की कोशिश नहीं की जाती.

रोहित के इस पत्र को आज की भारतीय राजनीतिक उत्तेजना में ध्यान से नहीं पढ़ा गया.यह शायद संभव भी न था.जिस हिंसक घटियापन और नारेबाजी का शिकार हमारी भाषा हो चुकी है,उसने हमारे पढ़ने और सुनने को भी सतही बना कर छोड़ दिया है.

रोहित के पत्र के इस अंश में एक युवा मन की छहपटाहट है.यह कितनी नई और कितनी पहचानी हुई भी है! प्रकृति की तरह स्वाभाविक होने की इच्छा लेकिन इस अहसास का तीखापन कि हम सब मनुष्य प्रकृति-च्युत प्राणी हैं?कि हमारा दुबारा प्राकृतिक होना नामुमकिन है? इसीलिए हम आदिवासी समाज को कई बार ईर्ष्या से देखते हैं,वे हमें किसी किसी भूले सपने की याद दिलाते हैं, उस अवस्था की जो हमारी हो सकती थी लेकिन अब हमने खुद को जिसके लिए नाकाबिल बना दिया है? और क्या इसी वजह से हम उनके प्रति एक खूनी नफरत से भर उठते हैं, उन्हें उनके आदिवासीपन से आज़ाद कराने के लिए हर कुछ करते हैं: उन्हें सभ्य धर्म देना या उनकी जमीन और जंगल से उन्हें मुक्त करना?

रोहित के पत्र में प्राकृतिकता के लोप या उसके अभाव के साथ एक और वेदना है,प्रामाणिक संबंध कायम करने में अक्षमता की.दोनों को एक-दूसरे से जुड़ा माना गया है.

इंसान प्रकृति का अंग है,सितारों पशु-पक्षी ,पेड़ पौधे,वनस्पति या नदी,समंदर अथवा पहाड़ की तरह,इसे स्वीकार करना इतना आसान न था.क्या इसका अर्थ यह है कि उसमें कोई विलक्षणता नहीं है?खुद को बाकी सबसे अलग समझने या ईश्वर की एक विलक्षण कृति मानने के पीछे यह धारणा भी थी कि यह धरती ही ब्रह्मांड का केंद्र है.

ब्रूनो,गैलीलियो और डार्विन ने मनुष्य और पृथ्वी केन्द्रिक विचार को धक्का दिया. ब्रूनो ने बताया कि यह विश्व कोई अपवाद नहीं है, ढेर सारी दुनियाओं का एक हिस्सा भर है.उसे इस ख्याल से बाज आने को कहा गया और आखिरकार इस पाप के लिए जलाकर मार डाला गया.गैलीलियो ने जब सितारों को करीब से देखा और सूरज पर धब्बे पाए, साथ ही यह खबर इस पृथ्वीवासियों को दी कि सिर्फ उनकी धरती के इर्द-गिर्द चाँद नहीं घूमता,बृहस्पति के चाँद भी हैं.जैसे धरती विलक्षण नहीं,वैसे की इंसान कोई खुदा की अकेली संतान नहीं.यह डार्विन ने इतने विस्तार और ब्योरेवार तरीके से बताया कि इंसान उसी समूह का हिस्सा है,जिसमें मछली,बंदर, छिपकिली और गीदड़ हैं कि अब उससे अलग कुछ सोचना संभव नहीं.

यह मानना लेकिन इतना आसान भी न था.ब्रूनो, गैलीलियो के साथ जो सलूक उनके हमवक्तों ने किया,हम जानते हैं.वैज्ञानिक जे. ब्रोनोवस्की ने अपनी छोटी सी किताब,“आदमी की पहचान” में इस संघर्ष की बानगी देते हुए जॉन टिनडेल के उस वक्तव्य को उद्धृत किया है जो उन्होंने ब्रिटिश अकेडमी फॉर द अडवांसमेंट ऑफ साइंस के अध्यक्ष के तौर पर बेलफ़ास्ट में 1874 में वैज्ञानिकों की एक बैठक में दिया. इस वक्तव्य को इसलिए भी पढ़ना ज़रूरी है कि हमारे स्कूलों और आगे विज्ञान को भाषा का मामला माना ही नहीं जाता.वे कहते हैं, “हालाँकि मैं प्रकृति की निरंतरता में यकीन करता हूँ, लेकिन मैं वहाँ यकायक नहीं रुक जा सकता जहाँ से हमारा माइक्रोस्कोप हमारी मदद करना बंद कर देता है.यहाँ हमारे मस्तिष्क की दृष्टि दृढ़ता से हमारी बाह्य दृष्टि की जगह ले लेती है. मैं उस आवश्यकता से प्रेरित और बाध्य हूँ जो विज्ञान ने ही पैदा की है और जिसका उसने पोषण किया है. मैं प्रयोगजन्य प्रमाण से परे जाता हूँ. सारे पदार्थमय जगत के स्रष्टा के प्रति अपनी घोषित भक्ति के बावजूद हम जिस पदार्थ को ही तुच्छ मानते हैं मैं उसी में इस ब्रह्मांडीय जीवन की सारी संभावनाओं और क्षमता के दर्शन करता हूँ.”

इस वक्तव्य के चार दिन बाद लन्दन के व्यापारी ने सत्रहवीं सदी के एक क़ानून के तहत जॉन टिनडेल पर दूषण या ईश निंदा के लिए मुकदमा चलाने की अर्जी दी.

इक़बाल ने एक ज़र्रे में कायनात को देखने की बात अगर की या दर्शन ने अणु में ब्रह्मांड के दर्शन किए तो उसके पीछे विज्ञान की यह खोज भी थी कि हम सबके भीतर वस्तुतः वे ही परमाणु नृत्य कर रहे हैं जो एक कुत्ते या सूअर या पेड़ को जिलाए और टिकाए हुए है.बिल ब्राइसन ने इसे बहुत दिलचस्प तरीके से यों कहा है: हम क्या हैं? इसे इस तरह समझें कि एक ख़ास इत्तफाकिया लम्हे में दो लोग जब एक-दूसरे से मिलते हैं तो जो चीज़ पैदा होती है,वह लाखों लाख अणुओं का एक विशेष संयोजन या शकल में एक दूसरे के साथ एक लम्बे समय तक बंधे रहने के फैसले का ही नतीजा तो है.फर्ज कीजिए, इन सबके बीच का यह तालमेल और समझौता टूट जाए तो फिर हम जो इतने ठोस जान पड़ते है,बिखर ही तो जाएँगे!

मुझमें और व्यापक प्राणी जगत में एक ही सामान्य तत्त्व है,उसे जड़ कहो या चेतन,यह तो हमारा कवि भी  कह गया है.अणुओं का यह नृत्य या संयोजन तो यांत्रिक है,वह एक चट्टान या तारे या वनस्पति और मुझमें एक ही नियम से काम करता है.ब्रोनोवस्की लिखते हैं कि इस तथ्य से हमारे अहं को ठेस पहुँचती है.अगर यह ठीक है तो फिर मेरा मैं क्या है!

यह भी ठीक है, जैसा विज्ञान बताता है कि प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से भिन्न है. यह उसकी रासायनिक संरचना के कारण भी है. आपके शरीर की चमड़ी उतर जाए तो किसी और की चमड़ी का प्रत्यारोपण नहीं हो सकता.आपकी देह के ही दूसरे हिस्से से निकालकर उपचार करना होगा. हम जानते हैं कि गुर्दा खराब होने पर हर किसी का गुर्दा हमारी देह कबूल नहीं करेगी. तो क्या मनुष्यों के बीच संबंध की बुनियाद यह प्राकृतिक तथ्य है या कुछ और!

रोहित की पीड़ा यह है कि कोई मेरे मन को नहीं समझना चाहता.यह मन इन रासायनिक क्रियाओं और आणविक संयोजनों से अलग है.यह मन या मेरापन बहुत कुछ मेरे परिवेश का अंग है लेकिन उसमें काफीकुछ  ऐसा हैं जो मैंने सिरजा है. इसलिए मैं किसी फतिंगे या बारिश की तरह प्रत्याशित नहीं हूँ,आप मेरे बारे में अनुमान एक हद तक ही कर सकते हैं. मेरी विशेषता मेरी अप्रत्याशितता ही है. आप मेरे हर फैसले का अंदाज नहीं कर सकते,या जिसे वैज्ञानिक ने कहा,मनुष्य समझ लिए जाने के विरुद्ध एक पहेली बने रहना चाहता है.

जब कोई कहता है कि आप मुझे समझ नहीं रहे तो वह दरअसल कहना चाहता है कि आपको मेरी अप्रत्याशितता के तत्त्व को समझना चाहिए.आप यह न चाहें कि मैं आपकी पकड़ में आ जाऊँ तभी आपके-मेरे बीच एक इत्मीनान का रिश्ता है. दूसरे शब्दों में मेरा पूरा अर्थ आपकी समझ में आ जाए, यह एक विकृत कामना है.पूरी तरह समझने के क्रम में हम दूसरे को नष्ट ही न कर डालें,यही मानवीय सावधानी है.

इस तरह ही रिश्तेदारी में एक नाजुक संतुलन बनाने की आवश्यकता है:साथ और एकांत के बीच संतुलन की. सार्वजनिकता और वैयक्तिकता के बीच.और हर किसी को अपना बनाने के बहाने अपने में मिला लेने के लोभ पर भी संयम की ज़रूरत होगी.

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