जगदीश भगवती और अमर्त्य सेन का विवाद

जगदीश भगवती और अमर्त्य सेन के  विवाद में अखबारी दिलचस्पी अब चुक गई है. इसका अर्थ क्या यह है कि उन दोनों के बीच भारत के आर्थिक जीवन के  सिद्धांत को लेकर जो बहस थी, वह ख़त्म हो गई?  दोनों के आर्थिक सिद्धांतों में कौन सा श्रेष्ठ है और भारत के लिए वरेण्य,क्या इसका निर्णय हो गया? इन दोनों के वैचारिक द्वंद्व से भी आम टेलिविज़न की मुर्गों की लड़ाई की तरह का ही मज़ा खींचने की बदहवासी देखते ही बनती थी. लेकिन अब वह क्षण गुजर चुका है और उस बहस के नुक्तों को याद करना नामुमकिन सा हो गया है. आर्थिक संकट पर खबरें रोज़ हैं और उनका विश्लेषण भी लेकिन उनमें कहीं उस बहस का हवाला कहीं नहीं. क्या किसी विचार की प्रासंगिकता का दायरा इतना संकुचित हो सकता है?

सेन-भगवती विवाद पर अपनी राय रखने के लिए अर्थशास्त्र की कम से कम दो शताब्दियों की बहसों की ऐतिहासिक संवेदना का होना आवश्यक था. उसके बिना इस पर बात करने में संकोच होना चाहिए था.लेकिन ऐसी सभ्यता और शिष्टाचार की आशा करना ही अब व्यर्थ है.फिर हम जैसे साहित्य के विद्यार्थियों के लिए क्या यह बहस बिलकुल ही अबूझ रह जाएगी? क्या हमारे पास इसमें प्रवेश करने के लिए भाषा नहीं है? या क्या साहित्य के पाठकों के लिए यह वैचारिक द्वंद्व अप्रासंगिक था?

पूरा विवाद जिस तरह चला या चलाया गया, उसका अध्ययन साहित्यिक दृष्टि से अब किया जा सकता है. हमारे लिए  वह अपने अखबारी क्षण से मुक्त होकर ही प्रासंगिकता प्राप्त कर सकता था .हाल में नागार्जुन से एक कथाकार की बातचीत के बारे में पढ़ रहा था जो किसी एक घटना से उद्वेलित कहानी लिख डालने पर आमादा थे  और नागार्जुन ने उन्हें यह कह कर रोका था कि कुछ बरस रुक जाओ, कहानी अखबारी रिपोर्ट नहीं. घटना से उत्पन्न विचार को कहानी की शक्ल लेने के लिए वक्त चाहिए.नागार्जुन के मुँह से यह सलाह और भी महत्वपूर्ण हो उठती है क्योंकि वे तो खुद ही क्षण और तात्कालिकता की कविता के माहिर थे.  लेकिन साथ ही यह भी कहा जाना चाहिए कि तात्कालिकता की कविता या गद्य लिखने के लिए नागार्जुन जैसा दीर्घ और गहन साहत्यिक अभ्यास चाहिए. छंद और शब्दों से खेल सकने तक की घनिष्ठता जब तक न हो,नागार्जुन जैसी कविता लिखने का ख़याल आत्मघाती दुस्साहस ही होगा. खैर! यहाँ इतना ही कि  सेन-भगवती विवाद भी साहित्यिक आलोचना का विषय ठंडा हो जाने के बाद बन सकता था.

पूरी बहस एक तरह के अप्रिय छिछलेपन की शिकार थी. जगदीश भगवती के सहयोगी अरविन्द पानागारिया अपनी खुशी छिपा न सके  जब उन्होंने कहा कि वे आखिरकार अमर्त्य सेन को उकसाने में कामयाब हो गए.मानों अमर्त्य सेन का उनसे बात करने को तैयार हो जाना ही उनकी पहली जीत हो. अपने कनिष्ठ सहयोगी के इस सड़कछाप उद्धतपन के शिकार भगवती भी हुए.उन्होंने एक सैद्धांतिक या वैचारिक प्रश्न को व्यक्तिगत प्रसंगों से उलझा दिया. उनका पक्ष इसलिए भी कमजोर हो गया क्योंकि अपने सैद्धान्तिक पक्ष की रक्षा करने की तत्परता और तैयारी की जगह उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय का दुखड़ा अधिक सुनाई दिया दिया. इस देश ने उनकी सेवाओं का प्रतिदान उन्हें नहीं दिया, उन्हें उनका पावना नहीं मिल सका और अमर्त्य सेन अधिक चतुर निकले, कुल मिला कर यही कहा उन्होंने,ऐसा लगा. सेन को  नोबेल पुरस्कार मिलने से लेकर प्रतीची संस्था की स्थापना में भारतीय राज्य की सहायता  और फिर उनके  सहयोगी अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ को  वर्तमान सरकार के नीति-निर्माण में सलाहकार के रूप में शामिल किये जाने तक- भगवती की शिकायतों की फेहरिस्त इतनी लम्बी थी कि यह मानना असंभव हो गया कि वे बहस किसी वैचारिक बाध्यता के कारण कर रहे हैं. जान पड़ा कि वे सेन से बहस नहीं कर रहे थे, मनमोहन सिंह को यह कह रहे  थे कि करीब तो मैं आपके ज़्यादा हूँ, फिर आपकी दोस्ती सेन से क्यों!

बहस शुरू होने के पहले ही इसलिए बौद्धिक रूप से अप्रासंगिक हो गई क्योंकि आरम्भ में ही पानागारिया और भगवती ने कहा कि उनका इरादा सेन को पूरी तरह ध्वस्त कर देने का है क्योंकि वे भारत के लिए घातक रूप से हानिकारक सिद्ध हुए हैं. ऐसा कहते हुए वे क्षुद्र तो नज़र आए ही, यह भी भूल गए कि विचारों के संसार में किसी को ध्वस्त करने का विचार अब बहुत संदिग्ध हो गया है. आर्थिक विचारक्रम में ही न तो रिकार्डो अप्रासंगिक हुए , न एडम स्मिथ. सोवियत संसार के धवस्त होते ही यह भ्रम हुआ कि कार्ल मार्क्स अब कूड़ेदान में फ़ेंक दिए गए लेकिन कुछ ही समय बाद वॉल स्ट्रीट में उनकी किताबों की मांग शुरू हो गई. आर्थिक विचारक के रूप में अमर्त्य सेन की स्वीकृति भारत की आर्थिक नीतियों पर उनके प्रभाव और उनकी सफलता-असफलता आदि से अपेक्षाकृत स्वतन्त्र थी. और यह स्वीकृति सेन को अर्थशास्त्रियों के अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने दी थी, किसी एक सरकार ने नहीं. सेन की मान्यता राजकीय अर्थशास्त्री होने के कारण नहीं थी इसलिए भारतीय सरकार को उनसे विमुख करना और उन्हें ध्वस्त करना एक ही बात नहीं.

विचार की दुनिया में विवाद बुरी बात नहीं और उसमें गर्मी भी ज़रूरी है. वैचारिक आक्रमण-प्रत्याक्रमण में फूटने वाली चिनगारियों का सौन्दर्य अलग ही है. भाषा में व्यंग्य, कटूक्ति का आ जाना अस्वाभाविक नहीं.पैंतरे  वहां भी लिए और  बदले जाते हैं. लेकिन  तुच्छता और सतहीपन अक्षम्य है. अगर कम्युनिस्ट जगत के वाद-विवाद को देखें, या लेनिन की भाषा को ही ले लें तो उसमें एक हिंसा है जो उसे खतरनाक बना देती है. लेनिन की भाषा कई बार गाली-गलौज तक उतर जाती है. 1917-18-19 के मैक्सिम गोर्की के निबंधों को देखें जिनमें उनकी राजनीतिक भाषा  की अमानुषिक हिंसा के कारण वे लेनिन पर आक्रमण करते हैं.

सेन-भगवती विवाद में शैलियों के द्वंद्व का सौन्दर्य नहीं दिखा.यह  भी कहा जा सकता है कि एक प्रकार से यह शैली और शैलीविहीनता का द्वंद्व था. अर्थशास्त्री , अगर वह बड़ा अर्थशास्त्री है तो शैलीकार भी होता है. यही बात वैज्ञानिक या किसी भी अनुशासन से जुड़े माहिर पर लागू होती है. दुर्भाग्य से भगवती इस मामले में सेन से बहुत पीछे हैं. उनकी भाषा रोजमर्रे के कामकाजीपन से बंधी हुई है और यही उसकी न्यूनता है.

भगवती ने यह भी कहा कि सेन दरअसल खालिस अर्थशास्त्री  नहीं रह गए हैं, उनका आखिरी महत्वपूर्ण अर्थशास्त्रीय काम काफी पहले का है और अब तो वे दर्शन में ज़्यादा रुचि ले रहे हैं. सेन की शैली का एक स्रोत अगर साहित्य है (उनका यूरोप और बांग्ला साहित्य का अध्ययन व्यापक और गहरा है) तो दूसरा दर्शन है. और यही उनके  आर्थिक विचार को स्थायित्व का गुण देता है. दार्शनिक आधार से विहीन कोई भी बौद्धिक उपक्रम या उद्यम, चाहे कितना ही उपयोगी क्यों न हो ,टिकाऊ नहीं हो सकता.  एडम स्मिथ के ‘ग्रन्थ द वेल्थ ऑव नेशंस’ का महत्त्व  उनकी  दार्शनिक रचना ‘द थ्योरी ऑव मोरल सेंटीमेंट्स’ के कारण धूमिल नहीं हो जाता.कार्ल मार्क्स प्राथमिक रूप से दार्शनिक हैं या अर्थशास्त्री, इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है.अर्थशास्त्र भी सार्थकता दार्शनिक भूमि पर ही प्राप्त कर पाता है. साहित्य के, विशेषकर कविता,प्रसंग में कहा गया है कि दो प्रकार के कवि होते हैं :एक जो विचारक या चिंतक कवि हो, दूसरा जो काव्यकौशल में निपुण हो. महान पहले दर्जे का कवि  ही होगा भले ही उसमें काव्यकौशल की दृष्टि से कुछ कमी  और लडखडाहट हो. इसलिए सामाजिक विषय आदि के लिहाज से प्रासंगिक और अपने समय में लोकप्रिय होने के बावजूद कृतियाँ अगर कालकवलित हो जाती हैं तो इसलिए कि उनमें मानवीय अस्तित्व की चिंता या ब्रह्मांडीय नियति का बोध नहीं होता. इस दार्शनिक चिंता के कारण ही वे अपनी राजनीति और सामाजिक विचार से स्वतंत्र व्यापक रुचि-संसार को संबोधित कर पाती हैं. मायकोव्स्की क्यों अभी भी प्रासंगिक हैं या गोर्की क्यों पढ़े जाएं जबकि उनकी दुनिया ध्वस्त हो चुकी ? जगदीश  भगवती जिस आधार पर अमर्त्य सेन को ख़ारिज करना चाहते हैं, विडंबना यह है कि वही उन्हें दीर्घजीवी बनाए रखेगा.

भारत के वर्तमान राजनीतिक वातावरण में नरेंद्र मोदी के प्रति सेन और भगवती के रवैये में अंतर है. एक अपनी ऐतिहासिक संवेदना और व्यापक मानवीय सचेतनता के कारण आर्थिक विकास के  तर्कों को अस्वीकार  करता है और दूसरा अपने आर्थिक तर्कों की सफलता के लिए व्यापक मानवीय प्रश्नों को नज़रअंदाज करने में कुछ गलत नहीं देखता. क्या कहने की आवश्यकता है कि साहित्य इनमें से किसे चुनेगा?

 

– अप्रासंगिक, जनसत्ता, सितंबर, 2013

 

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